काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)
Kashyapa Samhita Hindi
महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा
स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)
पृष्ठ 585, कुल 942 में से
संदर्भ में पढ़ेंत्रिलक्षणा सिद्धिः २ ] सिद्धिस्थानम् २२७
शिरोविरेचना में ये लक्षण होते हैं। चरक सि. अ. १ में कहा है-‘उरःशिरोलाघवमिन्द्रियाच्छ्यं स्रोतोविशुद्धि श्च भवेद्विशुद्धे’ । शिरोविरेचन के अयोग के लक्षण-उपर्युक्त लक्षणों का न होना दुर्योंग का लक्षण है। चरक सि. अ. १ में कहा है-गलोपलेपः शिरसो गुरुत्वं निष्ठीवनं चाप्यथ दुर्विरिक्ते। अर्थात् इसमें गला कफ से लिप्त रहता है, सिर भारी रहता है तथा थूक बहुत आता है॥
उन्मादवातपित्तांश्च ............................ ।।
............................ (ह) द्द्रवौ । सूर्यावर्तो न तृप्तिश्च नस्येनात्यपतपिते ।।
शिरोविरेचन के अतियोग के लक्षण-उन्माद, वात तथा पित्त का प्रकुपित होना, हृद्द्रव (Palpitation of HTe Heart), सूर्यावर्तयोग तथा तृप्ति का न होना-ये लक्षण नस्य (शिरोविरेचन) के अतियोग के होते हैं। चरक सि. अ. १ में कहा है-‘शिरोऽक्षिशङ्खश्रवणार्तितोदावर्त्यशुद्ध तिमिर च पश्येत् । अर्थात् इसमें सिर, आखें, शङ्खप्रदेश और कान में पीडा एवं तोद होता है तथा आंखों के सामने अंधेरा आ जाता है॥
अग्निदीप्तिर्वयःस्थानं पुष्टिवर्णौ धृतिर्बलम् । वातानुलोमता शान्तिः स्वनुवासितलक्षणम् ।।
सम्यक् अनुवासन के लक्षण-अग्नि का दीप्त होना, आयु का स्थिर होना, पुष्टि, वर्ण, धृति (धारण शक्ति), बल, वायु का अनुलोम होना तथा रोग की शान्ति-ये सम्यक् प्रकार से हुए अनुवासन के लक्षण हैं। चरक सि. अ. १ में कहा है-प्रत्येत्यसक्तं सशकृच्च तैलं रक्तादिबुद्धीन्द्रियसंप्रसादः । स्वप्नानुवृत्तिर्लघुता बलं च सृष्टाश्च वेगाः स्वनुवासिते स्युः ।। अर्थात् यदि अनुवासन अच्छी प्रकार हो जाय तो तैल पुरीष सहित बिना किसी रुकावट के लौटकर निकल आता है। रक्त आदि धातुएं बुद्धि एवं इन्द्रियां प्रसन्न हो जाती हैं। नींद ठीक प्रकार से आती है, शरीर हलका हो जाता है, बल की प्राप्ति होती है तथा वेग बिना बाधा के अच्छी प्रकार प्रवृत्त होते हैं इसी प्रकार सुश्रुत में भी कहा है॥
विषादस्तृप्तिररुचिर ............................ । ............................ णम् ।।
अनुवासन के अतियोग के लक्षण—अनुवासन के अतियोग में विषाद, तृप्ति तथा अरुचि ....... आदि लक्षण होते हैं-चरक सि. अ. १ में कहा है— 'हल्लासमोहक्लमसादमूर्च्छाविकर्तिका चात्यनुवासिते स्युः' । अर्थात् इसमें जी मचलना, मोह, क्लम, अग्निसाद, मूर्च्छा तथा गुदा में परिकर्तनवत् वेदना होती है॥
विष्टम्भो गाढवर्चस्त्वं रोगवृद्धिर्विवर्णता । वेपथुर्वातवृद्धिश्च रूपं दुरुनुवासिते ।।
अनुवासन के अयोग के लक्षण—मलबन्ध, मल का घना (कठिन) होना, रोगों में वृद्धि, विवर्णता, कंपकंपी तथा वात की वृद्धि—ये अनुवासन के अयोग के लक्षण हैं। चरक सि. अ. १ में कहा है—अधःशरीरोदरबाहुपृष्ठपार्श्वेषु रुग्रूक्षखरं च गात्रम् । ग्रहश्च विण्मूत्रसमीरणानामसम्यगेतान्यनुवासिते स्युः ।। अर्थात् इसमें शरीर के निचले भाग, उदर, बाहु, पृष्ठ और पार्श्वों में वेदना, देह का रूक्ष और खर होना तथा पुरीष, मूत्र और वायु का रुक जाना—ये लक्षण होते हैं॥
शुद्धस्फटिकसंकाशं यदा श्लेष्म विरिच्यते । विना मूत्रपुरीषेण ................... ।।
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निरुपद्रवता क्षुच्च निरूढः सम्यगुच्यते ।
सम्यग् निरूढ (आस्थापन) के लक्षण-जब मूत्र एवं पुरीष न आकर केवल शुद्ध स्फटिक के समान श्लेष्मा का ही विरेचन होता हो उपद्रवों का अभाव हो जाय तथा भूख लगती हो-तब रोगी सम्यग् निरूढ कहलाता है। चरक सि. अ. १ में कहा है—प्रसृष्टविण्मूत्रसमीरणत्वं रुच्यग्निवृद्ध्याशयलाघवानि । रोगोपशान्तिः प्रकृतिस्थता च बलं च तत्स्यात्सुनिरूढलिङ्गम् ।।