काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)
Kashyapa Samhita Hindi
महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा
स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें२२८ काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम् वमनविरेचनीया सिद्धिः ३ ]
विण्मूत्रनिग्रहः शूलमानाहो व्याधिसन्नतिः ।।
तन्द्री निद्राऽरुचिस्तृप्तिर्दुर्निरूढस्य लक्षणम् ।।
निरूह (आस्थापन) के अयोग के लक्षण—मल एवं मूत्र की रुकावट, शूल, आनाह, व्याधि का बढ़ना, तन्द्रा, निद्रा, अरुचि तथा तृप्ति (बिना खाये पिये ही तृप्ति का अनुभव होना)—ये निरूह के अयोग के लक्षण हैं। चरक सि. अ. १ में कहा है—स्याद्रुक्शिरोहृद्गुदबस्तिलिङ्ग शोफः प्रतिश्यायविकर्तिके च। हल्लासिकामारुतमूत्रसङ्गः श्वासो च सम्यक् च निरूहिते स्यात्॥
वातप्रकोपो बलवान् सर्वदेहो ............. । ............................... ।।
(इति ताडपत्रपुस्तके १४४ तमं पत्रम्)
निरूह (आस्थापन) के अतियोग के लक्षण—सम्पूर्ण शरीर में बलवान् वायु का प्रकोप होना......इत्यादि निरूह के अतियोग के लक्षण हैं। चरक सि. अ. १. में कहा है—'लिङ्गं यदेवे तिविरेचितस्य भवेत्तदेवातिनिरूहितस्य'। अर्थात् जो अति विरेचन के लक्षण होते हैं वे ही इसके भी होते हैं॥
......................................................।
............ (ब) स्तयः कर्मसंज्ञिताः। अन्तरेषु निरूहाः स्युरतश्चोर्ध्वं न दापयेत् ।।
कर्मसंज्ञक बस्तियां भी होती हैं। इनके बीच में निरूह बस्तियां दी जाती हैं जिनके बाद अन्य बस्तियां नहीं दी जातीं। चरक सि. अ. १ में तीन प्रकार का अन्य बस्ति समुदाय दिया है १. कर्म २. काल ३. योगः। कहा भी है—त्रिंशत्स्मृताः कर्मसु बस्तयो हि कालस्ततोऽर्धेन ततश्च योगः। सान्वासना द्वादश वै निरूहाः प्राक् स्नेह एकः परतश्च पञ्च ।। काले त्रयोऽन्ते पुरतस्तथैकः स्नेहा निरूहान्तरिताश्च षट् स्युः। योगे निरूहास्त्रय एव देयाः स्नेहाश्च पञ्चैव परादिमध्याः।। प्रकृत ग्रन्थ के खिलस्थान के बस्तिविशोधणीय नामक आठवें अध्याय में भी यह तीन प्रकार का बस्ति समुदाय दिया हुआ है।
इति ह स्माह भगवान् कश्यपः।
(इति सिद्धिस्थाने) त्रिलक्षणासिद्धिर्नाम द्वितीयोऽध्यायः ॥२॥
ऐसा भगवान् कश्यप ने कहा था।
इति सिद्धिस्थाने त्रिलक्षणासिद्धिर्नाम द्वितीयोऽध्यायः ॥२॥
वमनविरेचनीयासिद्धिर्नामतृतीयोऽध्यायः ।
अथातो वमनविरेचनीयां सिद्धिं व्याख्यास्यामः ॥१॥।
इति ह स्माह भगवान् कश्यपः ॥२॥
अब हम वमन-विरेचनीय सिद्धि का व्याख्यान करेंगे। ऐसा भगवान् कश्यप ने कहा था॥
........................... मयस्वलक्षणैर्वमनेनोपपादयेद्विधिवदुपस्निग्धमग्निबलावेक्षी वा यथाशक्तिस्विन्नमुषितमपरेद्युर्विजीर्णभक्तं प्रातरेव दन्तकाष्ठाद्यनु..................कटफलनिचुलशिरीषादीनां