भारतकोश
काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

Kashyapa Samhita Hindi

महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा

स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished942 पृष्ठ

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पृष्ठ 587

वमनविरेचनीया सिद्धिः ३ ] सिद्धिस्थानम् २२९

लाभतः पल्लवान् सर्वशो वाऽऽहृत्यापां द्रोणमात्रेऽधिके वारिण्युत्क्वाथ्य ग्रहणीकृतवेधनवचासैन्धव- पिप्पलीवत्सकत्रपुसमदनबीजा ............. (उप) विष्टमासने प्राङ्मुखो भिषगालोड्य तं कषायं ग्रहण्यादिकल्कैर्नातिघनोष्णशीतमाकण्ठात् पाययेत्, यथाबलमरिष्टं वा पञ्चषट्कालोत्तरमथ विधायोत्पलकु (मुद) ............. न वेगमुत्पन्नमवगृह्णीयात्, न वेगान्तरे विश्रमयेत्, उपसंगृहीतपार्श्वः स्यादीषन्न्युब्जः ।।

अपने २ लक्षणों के अनुसार रोगी को वमन देवे । एतदर्थ यथाविधि स्नेहन करके अग्नि और बल को देखकर यथाशक्ति जिसने स्वेदन किया हुआ है तथा जो रात्रि को सोया है ऐसे रोगी को अगले दिन रात्रि के भोजन के जीर्ण हो जाने पर प्रातःकाल दन्तधावन आदि के बाद ....... कट्फल, निचुल (समुद्र फल) तथा शिरीष आदि सबके अथवा इनमें से जो मिल सकें उनके पत्ते लेकर एक द्रोण अथवा अधिक जल में क्वाथ बनाये तथा ग्रहणी (गौरसर्षप), कृतवेधन (कोषातकी अथवा अमलतास), वचा, सैन्धव, पिप्पली, इन्द्रजौ, खीरा तथा मदनफल के बीज ....... इत्यादि का कल्क बनाये । फिर पूर्व की ओर मुख कराकर उत्तम आसन पर रोगी को बिठाकर वैद्य उस कषाय का जो न अत्यन्त गाढ़ा हो, न अत्यन्त उष्ण तथा न अत्यन्त शीत हो—आलोडन करके पूर्वोक्त ग्रहणी आदि के कल्क के साथ कण्ठ पर्यन्त पिलाये । अथवा ५-६ काल के बाद अरिष्ट पिलाये इसके बाद उत्पल (नील कमल) तथा कुमुद ....... (आदि की नाल बनाकर उससे कण्ठ को स्पर्श करते हुए सुखपूर्वक वमन कराये), उत्पन्न हुए वेग को न रोके, वमन के वेगों के बीच में विश्राम न करे । पार्श्वों को सिकोड़ कर थोड़ा आगे को झुक कर वमन के लिये बैठना चाहिये (जिससे सुख पूर्वक वमन हो सके) । चरक सू. अ. १५ में वमन का निम्न विधान दिया है—"ततस्तं पुरुषं स्नेहस्वेदोपपन्नमनुपहतमनसमभिसमीक्ष्य सुखोषितं सुप्रजीर्णभक्तं शिरःस्नातमनुलिप्तगात्रं स्रग्विणमनुपहतवस्त्रसंवीतं देवताग्निद्विजगुरुवृद्धवैद्यानर्चितवन्तं, इष्टे नक्षत्रतिथिकरणमुहूर्ते कारयित्वा ब्राह्मणान् स्वस्तिवाचनं प्रयुक्ताभिराशीर्भिरभिमन्त्रितं मधुमधुकसैन्धवफाणितोपहितां मदनफलकषायमात्रां पाययेत्” । तदनन्तरं—"पीतवन्तं तु खल्वेनं मुहूर्तमनुकाङ्क्षेत् । तस्य यदा जानीयात्स्वेदप्रादुर्भावेण दोषं प्रविलयनमापद्यमानं, लोमहर्षेण च स्थानेभ्यः प्रचलितं, कुक्षिमध्मापनेन च कुक्षिमनुगतं, हल्लासास्रस्रवणाभ्यामपचितोध्र्वमुखीभूतं, अथास्मै जानुसममसंबाधं सुप्रयुक्तास्तरणोत्तरप्रच्छदोपधानं स्वापाश्रयमासनमुपवेष्टु प्रयच्छेत् ।।

वमनं तु द्वित्रिवेगं कनीयः, चतुष्पञ्चवेगं मध्यमं, षट्सप्तवेगमुत्तममिति कोत्सः, श............... महतां कृशमध्यबलवतां योग्यमिति पाराशर्यः, व्याध्यवेक्षमिवित भूयांसः ।।

कौत्सने कहा—वमन की कनिष्ठ (लघु या अल्प) मात्रा में दो या तीन वेग होते हैं । मध्य मात्रा में चार-पांच वेग तथा उत्तम मात्रा में ६-७ वेग होते हैं । पाराशर ने कहा-वमन की मात्रा कृश, मध्य एवं बलवान् व्यक्ति के अनुसार होती है अर्थात् कृश व्यक्ति को कम तथा बलवान् व्यक्ति को अधिक वमन होना चाहिये । बहुत से विद्वान् कहते हैं कि भिन्न २ व्याधि (रोग) के अनुसार वमन की मात्रा होती है । चरक सि. अ. १ में वमन के वेगों के विषय में कहा है—'जघन्यमध्यप्रवरे तु वेगाश्चत्वार इष्टा वमने षडष्टौ' अर्थात् जघन्य (अवर) वमन में ४, मध्य में ६ तथा प्रवर (उत्कृष्ट) वमन में ८ वेग होने चाहिये । वमन में निकले हुए दोषों का प्रमाण क्रमशः १, १-१/२ तथा २ प्रस्थ होना चाहिये अर्थात् अवर (निकृष्ट) वमन में १ प्रस्थ, मध्य में १-१/२ प्रस्थ तथा उत्कृष्ट वमन में २ प्रस्थ होना चाहिये । सुश्रुत में यह मात्रा निम्न प्रकार से दी है—हीन वमन का प्रमाण १/२ प्रस्थ, मध्य का १ प्रस्थ तथा उत्तम वमन का प्रमाण २ प्रस्थ होना चाहिये । यहां प्रस्थ १३-१/२ पल का माना जाता है । कहा भी है। वमने च विरेके च तथा शोणितमोक्षणे । सार्धत्रयोदशपलं प्रस्थमाहुर्मनीषिणः ।। अर्थात् वमन, विरेचन तथा रक्तनिर्हरण में प्रस्थ १३-१/२ पल के बराबर होता है ।

अथैनं वान्तमुष्णाभिरद्भिराचाम्य निवाते प्राक्शिरसं शाययित्वाऽपामार्गपिप्पलीशिरीषान्यतमतण्डुला ............ रितविलग्नस्य कफस्याकर्षणार्थं संक्षम्य तिष्ठन् प्रतिश्यायशिरोरोगाक्ष्यभिष्यन्दकर्णशूलकर्णपा- कमन्याग्रहदन्तपुप्पुटकदन्तमूलशोथकण्ठगलग्रह ............. स्य मण्डादिदिवाजागरोष्णोदकोपचार