काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)
Kashyapa Samhita Hindi
महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा
स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें| २३० | काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम् | वमनविरेचनीया सिद्धिः ३ ] |
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उपदिष्टः पथ्यतमः । शृङ्गवेरश्रुतमुदकं पिपासितः पिबेदीषदूष्णम् । अल्पशोऽपि शीतं ह्यस्य प्रतिश्यायादीन् प्रको (पयति) ........... कुष्ठहृल्लासज्वरारुचिनिद्रातन्द्रीरुपजनयति; तस्मादित्येतत् षड्वर्षादीनामर्थे तदुपदेक्ष्यामोऽतिबालो ह्यशक्त एनं विधिमनुष्ठानहिते चक्षुराख्याति न ............ दुपगृह्य देयमातङ्कशमनं विडङ्गमात्रं बदरास्थिमात्रं बदरमात्रमामलकमात्रमौषधं सर्वमेव संभृतं स्यात् । वमनोपगं विरेचनोपगं वा चातुर्मास्याष्टम .............
(इति ताडपत्रपुस्तके १४५ तमं पत्रम् ।)
........षु सर्वाणि सशर्कराणीति वृद्धकाश्यपः । तेषां पलाध्यर्धपलद्वित्रिपलान्यालोडनानि युक्त्या वा ततो विधार्य भिषग्धात्री वा कुशला क्लृप्तनखयाऽङ्गुल्याऽन्त खावयवा ...............थ सर्पेण गौतमी वाऽङ्गुली हीना स्यान्नस्यमेकेनेति वृद्धकाश्यपः, अतिबालस्य सक्षौद्रशर्करमपामार्गतण्डुलद्वयं त्रयं वेति वैदेहो जनकः ।।
अथ खलु ............ नैरतिबाले हि भगवन् ! भिषग्वमनादीनि प्रयुञ्जानः कालमात्रावयोव्याधिबला-बलानामनभिज्ञो बालविनाशायात्मधर्मविनाशाय च संपद्यत इत्या (ह) ............ मिति वार्योविदः, धात्रीगुरुलघुत्वहेतोरिति वात्स्यः, धात्रीशर्मणि शिशुशर्मेति भूयांसः ।।
अथ भगवान् कश्यपोऽब्रवीदसम्यगेतत् सर्वमप्यसाधकम् ............... मिति ।।
वमन हो जाने के बाद रोगी को उष्ण जल पिलाकर निवात (जहां हवा सीधी न आती हो) स्थान में पूर्व दिशा की ओर सिर करके सुला दे । फिर अपामार्ग, पिप्पली तथा शिरीष आदि में से किसी एक को चावलों के साथ मिलाकर शेष बचे हुए कफ को निकालने के लिये रोगी को सेवन कराये । क्योंकि अन्दर बचा हुआ कफ होने से प्रतिश्याय, शिरोरोग, अक्षिरोग, अभिष्यन्द, कर्णशूल, कर्णपाक, मन्याग्रह, दन्त—पुप्पुटक, दन्तमूल शोथ (Gingivitis), कण्ठग्रह तथा गलग्रह इत्यादि रोग हो जाते हैं । चरक सू. अ. १५ में वमन के ठीक प्रकार न होने पर निम्न उपद्रव दिये हैं—तत्रातियोगायोगनिमित्तान्युपद्रवान् विद्यात्—आध्मानं परिकर्तिका परिस्रावो हृदयोपसरणमङ्गग्रहो जीवादानं विभ्रंशः स्तम्भः क्लमः, उपद्रवा इति । इसी प्रकार चरक सि. अ. ६ में भी कहा है । वमन कराने के बाद रोगी को मण्ड आदि का सेवन तथा दिन में न सोना और उष्ण जल आदि का उपचार पथ्य माना गया है । प्यास लगने पर आर्द्रक से पकाया गया कोष्ण जल पीने को देवे । यदि जल थोड़ा भी शीतल होगा तो वह उसके प्रतिश्याय आदि का प्रकोप कर देगा । चरक सू. अ. १५ में वमन के बाद निम्न पथ्य का विधान दिया है—योगेन तु खल्वेनं छर्दितवन्तमभिसमीक्ष्य सुप्राक्षालितपाणिपादास्यं मुहूर्तमाश्वास्य स्नैहिकवैरेचनिकोपशमनीयानां धूमानामन्यतमं सामर्थ्यतः पाययित्वा, पुनरेवोदकमुपस्पृशेत् ।। अर्थात् थोड़ा आश्वासन देकर उसे धूम्रपान कराये । तदनन्तर—"उपस्पृष्टोदकं चैनं निवातमागारमनुप्रवेश्य संवेश्य चानुशिष्यात्—उच्चैर्भाष्यमत्यासनमतिस्थानमतिचङक्रमणं क्रोधशोकाहिमातपावश्याययतिप्रवातान् यानयानं ग्राम्यधर्ममस्वपनं निशिदिवा स्वप्नं विरुद्धाजीर्णासात्म्याकालप्रमितातिहीनगुरुविषमभोजन वेगसंधारणेदीरणमिति भावानेतान् मनसाऽप्यसेवमानः सर्वमहोगमयस्वति । स तथा कुर्यात् । अर्थात् वमन के बाद रोगी को ऊंचा बोलना आदि विषम भावों को त्याग कर देना चाहिये । अष्टाङ्गहृदय सू. अ. १८ में कहा है—सम्यग्योगेन वामेतं क्षणमाश्वास्य पाययेत् । धूम्रत्रयस्यान्यतमं स्नेहाचारमथादिशेत् ।। अत्यन्त छोटे बालक को प्रयोग कराया गया वमन कुष्ठ, हल्लास (जी मचलाना), अरुचि, निद्रा तथा तन्द्रा को उत्पन्न करता है । इसलिये ६ वर्ष की अवस्था के बाद वमन का प्रयोग करना चाहिये । अत्यन्त छोटा बालक अशक्त होने के कारण इस विधि का प्रयोग करने पर चक्षुरोग से पीडित हो जाता है । बालक को पकड़कर उसके रोग को शान्त करने के लिये विडङ्गफल, बेर की गुठली, बेर अथवा आंवले के प्रमाण के समान आवश्यकतानुसार ओषधि पिलानी चाहिये । इसी संहिता के सूत्राध्याय के लेहाध्याय में भी पूर्व बालक की ओषधि की मात्रा का निर्देश किया जा चुका है । वहां कहा है—