काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)
Kashyapa Samhita Hindi
महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा
स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंवमनविरेचनीया सिद्धिः ३ ] सिद्धिस्थानम् २३१
विल (ड)ङ्फलमात्रं तु जातमात्रस्य देहिनः । भेषजं मधुसर्पिभ्यां मतिमानुपकल्पयेत् ।। वर्धमानस्य तु शिशोर्मासे मासे विवर्धयेत् । अथामलकमात्रं तु परं विद्वात्र्न वर्धयेत् ।। वृद्धकाश्यप ने कहा—बालकों को वमन एवं विरेचन में सहायता देने वाली सब ओषधियां चतुर्थ अथवा अष्टम मास में तथा उसमें शर्करा मिलाकर देनी चाहिये । वह वमनद्रव्य युक्तिपूर्वक तथा आवश्यकतानुसार एक, डेढ़, दो अथवा तीन पल अच्छी प्रकार पानी में मिलाकर पिला दें । तथा उसके बाद वैद्य अथवा कुशल धात्री नाखून कटी हुई उंगली बालक के गले में में डालकर अन्तर्मुख हुए वेगों को प्रवृत्त करे । चरक सू. अ. १५ में भी कहा है-‘अथैनमनुशिष्यात्–विवृतौष्ठतालुकण्ठो नातिमहता व्यायामेन वेगानुदीर्णानुदीरयन् किंचिदवनम्य ग्रीवामूर्धशरीरमुपवेगमप्रवृत्तान् प्रवर्तयन् सुपरिलिखितनखाभ्यामङ्गुलीभ्यामुत्पलकुमुदसौगन्धिकनालैर्वाकण्ठमभिस्पृशन् सुखं प्रवर्त्तयस्वेति’ । वैदेह जनक के कहा—अत्यन्त छोटे बालक को मधु एवं शर्करा के साथ अपामार्ग के दो या तीन निस्तुष (छिलके उतरे हुए) बीज सेवन कराने चाहिये । (इसके आगे जिस आचार्य का मत दिया हुआ है उसका नाम लुप्त है) ............ ने कहा—भगवन् ! काल, मात्रा, अवस्था तथा रोग के बलाबल से अनभिज्ञ वैद्य द्वारा अत्यन्त छोटे बालकों में वमन आदि का प्रयोग कराने पर उस बालक तथा चिकित्सक के अपने धर्म का भी नाश हो जाता है अर्थात् वैद्य के अज्ञान के कारण बालक को तो हानि उठानी ही पड़ती है, साथ २ वैद्य का अपना धर्म भी नष्ट हो जाता है क्योंकि इसके द्वारा वह पाप का भागी होता है । (इसके आगे वार्योविद का मत खण्डित है जो कि प्रसङ्ग के अनुसार धात्रीविषयक प्रतीत होता है) वात्स्य ने कहा—धात्री की गुरुता तथा लघुता के कारण बालक को रोग होते हैं इसी लिये अनेक आचार्यों का मत है कि धात्री के कल्याण (स्वस्थ) होने से शिशु भी स्वस्थ हो जाता है । इसके बाद भगवान् कश्यप ने कहा यह ठीक नहीं है–क्योंकि आप सब लोगों के मत पृथक् २ रूप में साधक नहीं है अर्थात् पृथक् २ रूप से किसी सिद्धान्त को स्थिर नहीं कर सकते हैं ।
तत्र श्लोकाः— शिशोर्व्याधौ समुत्पन्ने धात्रीणामेव शोधनम् । अलं बालसुखायेति को लोके नावबुद्ध्यते ।। यस्तु कायगतस्तस्य दोषाणां पूर्वसंचयः । अनुद्धृते कथं तस्मिन् ............ ................ (व्याधिस्तस्य) प्रशाम्यति ।। अनागतविधातस्तु न वर्धयति वाऽऽशयम् ।
इस तथ्य को कौन नहीं जानता है कि बालक को रोग होने पर धात्री का शोधन करने से ही बालक स्वस्थ हो जाता है । परन्तु बालक के शरीर में जो दोषों का पूर्वसंचय होता है उसे हटाये या दूर किये बिना उसका रोग किस प्रकार शान्त हो सकता है । उससे बालक के भविष्य का विघात (नाश) हो जाता है तथा उसके आशय (शरीर आदि) की वृद्धि नहीं होती है । अर्थात् स्वयं बालक का शोधन भी इसलिये आवश्यक है ।
उभयोस्तु यदा सम्यक् शोधनं कुरुते भिषक् ।। तदाऽऽरोग्यं भवत्याशु शिशोलेर्खा यथाऽश्मनि ।
जब वैद्य इन दोनों (धात्री तथा बालक) का अच्छी प्रकार शोधन करता है तब शिशु को शीघ्र ही आरोग्य लाभ हो जाता है । यह बात पत्थर की लकीर के समान सत्य है ।
दोषाणामाशयो धात्री भूधराः सरिता(मिव) ।। ........................... । ........... रोभूतो दोषो बालं प्रबाधते ।। तयोः संशोधनम्ऋते न शान्तिरिति धारणा ।
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