काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)
Kashyapa Samhita Hindi
महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा
स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें२३२ काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम् वमनविरेचनीया सिद्धिः ३ ]
जिस प्रकार पर्वत नदियों के आशय (उद्गम स्थान) होते हैं उसी प्रकार धात्री (शिशु के) दोषों का आशय होती है। प्रकुपित हुए दोष धात्री से बालक में पहुंचकर उसे कष्ट पहुंचाते हैं। इसलिये उन दोनों का संशोधन किये बिना निश्चित रूप से बालक के रोगों की शान्ति नहीं होती है।
स्वयं छर्दयते यस्तु पीतं पीतं पयः शिशुः ।।
न तं कदाचिद्बाधन्ते व्याधयो देवमानुषाः ।
जो बालक बार २ दुग्ध का पान करके स्वयं वमन कर देता है उसे दैवी (ग्रह आदि से उत्पन्न होने वाली) तथा मानुषी (मनुष्य-सुलभ) व्याधियां कभी कष्ट नहीं देती हैं।
स्तनमौ ....................................................
................................................... रार्यते ।।
मुखपाकं च बालानां कुर्याद्धात्र्या ज्वरं तथा । तस्माद्बलादिवाचूच्या दद्यादेवौषधं शिशोः ।।
स्तन (स्तन के द्वारा निकलने वाले दूध) के द्वारा दोष बालक में पहुंच जाता है और बालकों को मुखपाक एवं धात्री को ज्वर इत्यादि कर देता है। इसलिये बालक को बल पूर्वक चूचक (स्तन के दूध) के द्वारा ही ओषधि देनी चाहिये।
अथ खलु विधिवदुपस्निग्धस्विन्नंसुखोषितजीर्णाहार ......................... (द)न्तीश्यामा-कम्पिल्लकनीलिकासप्तलावचाविषाणिकादीनां पूर्वोक्तानां लाभतः कर्षिणां भागानर्धपलिनां वा प्रस्थद्विप्रस्थमात्रीष्वप्सु चतुर्भागावशेष ........................ मूत्रसंयुक्तं नातिद्रवबोष्णाशीतं पाययेत् कालबलवयोगदावेक्ष्यम् । बालं तु पूर्ववदाडूकेन प्रपाययेन्नवनीतेन वा सार्धमेतं लेहयेत्तपश्चित्तं नित्यं द्वित्रिवेगं चतु ..................................................................
(इति ताडपत्रपुस्तके १४६ तमं पत्रम्।)
मेकद्वित्रिप्रस्थम् । अत ऊर्ध्वमतियोगमाचक्षते । तत्रापि वमनवदुपचारः सर्व इति ।।
अब विरेचन की विधि का वर्णन किया जायगा। वमन कराने के १५ दिन बाद विरेचन देना चाहिये। सुश्रुत में कहा है—'पक्षाद्विरेको वान्तस्य'। इन १५ दिनों में रोगी को पेयादि का सेवन तथा स्नेहन एवं स्वेदन आदि कराना चाहिये। इसके बाद जिस का विधिपूर्वक स्नेहन एवं स्वेदन किया गया है, जो रात्रि को सुखपूर्वक सोया है, जिसका पूर्व भोजन पच गया है उसे पूर्वोक्त दन्ती (जमालगोटा), श्यामा (त्रिवृत्), कम्पिल्ल (कमीला), नीलिका, सप्तला (सातला), वचा तथा विषाणिका (अजशृंगी) आदि में से जो मिल सके उन की एक कर्ष या आधापल (२ कर्ष) मात्रा को एक या दो प्रस्थ पानी में पकाकर चतुर्थांश शेष रहने पर ...... उसमें गोमूत्र मिलाकर न अत्यन्त द्रव, न अत्यन्त उष्ण तथा न अत्यन्त शीत अवस्था में काल (समय), बल, अवस्था एवं रोग के अनुसार उसे पिलाये। चरक सू. अ. १५ में विरेचन विधि निम्न प्रकार दी है—'अथैनं पुनरेवर स्नेहस्वेदाभ्यामुपपाद्यानुपहतमनसमभिसमीक्ष्य सुखोषितं सुप्रजीर्णभक्तं कृतहोमबलिमङ्गलजपप्रायश्चित्तमिष्टतिथिनक्षत्रकरणमुहूर्ते ब्राह्मणान् स्वस्ति वाचयित्वा त्रिवृत्कल्काक्षमात्रां यथार्हलोडनप्रतिविनीतां पाययेत् प्रसमीक्ष्यदोषभेषजदेशकालबलशरीराहारसात्म्यसत्त्वप्रकृतिवयसामवस्थान्तराणि विकारंश्च। सम्यग्विषिक्तं चैनं वमनान्तरोक्तेन धूमवर्जेन विधिनोपपादयेदावलवर्णप्रतिलाभात्। बलवर्णोपपन्नं चैनमनुपहतमनसमभिसमीक्ष्य सुखोषितं सुप्रजीर्णभक्तं शिरःस्नातमनुलिप्तगात्रं स्त्रग्विणमनुपहतवस्त्रसंवीतमनुरूपालङ्कारालङ्कृतं सुहृदां दर्शयित्वा ज्ञातीनां दर्शयेत्, अथैनं कामेष्ववसृजेत् ।। बालक को पूर्ववत् शंखाकृति पात्र के द्वारा ओषधि का कषाय बनाकर पिलादे—अथवा मक्खन में मिलाकर या मलाई के साथ चटादे। विरेचन के सम्यक् योग में दो तीन या चार वेग आने चाहिये अर्थात् हीन वेग दो,