काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)
Kashyapa Samhita Hindi
महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा
स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंवमनविरेचनीया सिद्धिः ३ ] सिद्धिस्थानम् २३३
मध्य वेग तीन तथा उत्कृष्ट वेग चार होने चाहिये। ........... अथवा प्रमाण के अनुसार वे क्रमशः १, २ या ३ प्रस्थ होने चाहिये। यहां यह स्मरण रखना चाहिये कि चरक सिद्धि. अ. १ में "दशैव ते द्वित्रिगुणा विरेके प्रस्थास्था द्वित्रिचतुर्गुणाश्च' द्वारा विरेचन के वेगों की जो १०, २० तथा ३० संख्या तथा विरेचन का प्रमाण दिया है वह पूर्ण युवा पुरुष (Adult) के लिये हैं। यहां इस सहिता में जो २, ३ तथा ४ वेगों की संख्या दी है वह बालकों के लिये दी गई है। इससे अधिक वेग होने पर विरेचन का अति योग कहलाता है। विरेचन के बाद भी वमन के समान ही सम्पूर्ण उपचार करना चाहिये। चरक सू. अ. १५ में कहा है, सम्यग्विरिक्तं चैनं वमनान्तरोक्तेन धूमवर्जेन विधिनोपपादयेदावलवर्णप्रतिलाभात्”। अर्थात् विरेचन के सम्यक् प्रकार से हो जाने के बाद धूम्रपान को छोड़ कर वमन में कहे गये विधान के अनुसार कर्म करे जब तक कि उस संशोध्य पुरुष में बल एवं वर्ण की प्राप्ति न हो जाय। परन्तु इसे विरिक्त पुरुष के समान धूम्रपान कराना निषिद्ध है।
तत्र श्लोकाः—
पित्तान्तं वमनं कुर्यात् कफान्तं च विरेचनम्। स्वयं चोपरतं श्रेष्ठमनाबाधं त ............ ।।
चिकित्सक लोग पित्तान्त वमन तथा कफान्त विरेचन को, जो कि स्वयं रुक जाते हों तथा बाधा (उपद्रव) रहित हों—श्रेष्ठ मानते हैं। अर्थात् वमन इतना होना चाहिये जिसमें अन्तिम वेग में पित्त आ जाय तथा विरेचन इतना होना चाहिये जिस में अन्तिम वेग में कफ आ जाय। चरक सि. अ. १ में कहा है—‘पित्तान्तमिष्टं वमन विरेकादूर्ध्वं कफान्तं च बिरेकमाहुः।’ सम्यक् प्रकार से शुद्धि होने के बाद वमन एवं विरेचन के प्रवृत्त हुए वेगों का स्वयं रुक जाना तथा विशेष कष्ट न होना आवश्यक है अन्यथा शोधन का अतियोग हो जायगा। चरक सू. अ. १५ में कहा है—काले प्रवृत्तिरनतिमहती व्यथा यथाक्रमं दोषहरणं स्वयं चानवस्थानमिति योगलक्षणानि भवन्ति”। अर्थात् उचित काल में वेगों का प्रवृत्त होना, अत्यधिक कष्ट न होना, क्रमशः दोषों का निकलना तथा शुद्धि हो जाने पर वेगों का स्वयं रुक जाना—सम्यक् योग के लक्षण होते हैं। वमन में दोषों के निकलने का क्रम चरक सि. अ. १ में कहा है—‘क्रमात्कफः पित्तमथानिलश्च यस्यैति सम्यग्वमितः स इष्टः' इसी प्रकार सुश्रुत चि. अ. ३३ में कहा है। विरेचन में दोषों के निकलने का क्रम—चरक सि. अ. १ में कहा है—'प्राप्तिश्च विट्पित्तकफानिलानां सम्यग्विरिक्तस्य भवेत् क्रमेण'। इसी प्रकार सुश्रुत चि. अ. ३३ में कहा है—‘एवं विरेचने मूत्रपुरीषपित्तौषधकफाः'। अर्थात् इसमें पहले पित्त तथा अन्त में कफ निकलता है। इस प्रकार आमाशय के खाली हो जाने पर वमन तथा विरेचन दोनों में अन्त में वायु निकलता है। वायु तो अन्त में स्वाभाविक रूप से निकलेगा ही। इस का दोषों में परिगणन नहीं किया गया है। इसी लिये चरक सहिता के सूत्रस्थान में वायु का निर्देश होने पर भी इस प्रकृत ग्रन्थ (काश्यपसंहिता) तथा चरक संहिता के सिद्धि स्थान में वमन को 'पित्तान्त' तथा विरेचन को 'कफान्त' कहा गया है।
........................ न तु वेगान् विधारयेत्।
प्रवृत्त हुए वमन तथा विरेचन के वेगों को रोकना नहीं चाहिये। वेगों को धारण न करने का चरक में विस्तार पूर्वक-वर्णन किया गया है। वहां 'न वेगान्धारणीय' नामक एक पूरा अध्याय ही दिया गया है जिसमें प्रवृत्त हुए वेगों को धारण करने का निषेध किया गया है तथा उन्हें धारण करने से उत्पन्न रोग एवं उन की चिकित्सा का वर्णन किया गया है। उपर्युक्त अध्याय (चरक सू. अ. ७) में कहा है—न वेगान्धारयेद्धीमाञ्जातान्मूत्रपुरीषयोः। न रेतसो न वातस्य न वम्याः क्षवथोर्न च।। नोद्गारस्य न जृम्भायाः न वेगान् क्षुत्पिपासयोः। न बाष्पस्य न निद्राया निःश्वासस्य श्रमेण च ।। यहां विरेचन (पुरीष) तथा वमन का प्रकरण है पुरीष के वेग को रोकने से जो रोग (उपद्रव) हो जाते हैं वे चरक सू. अ. ७ में निम्न दिये हैं—पक्वाशयशिरःशूलं वातवर्चोनिरोधनम्। पिण्डिकोद्वेष्टनाध्मानं पुरीषे स्याद्विधारिते ।। वमन के वेग को रोकने से निम्न रोग उत्पन्न हो जाते हैं—कण्डूकोठारुचिव्यङ्गशोथपाण्ड्वामयज्वराः । कुष्ठहृल्लासवीसर्पश्छर्द्दिनिग्रहजाः गदाः ।।