काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)
Kashyapa Samhita Hindi
महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा
स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें२३४ | काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम् | वमनविरेचनीया सिद्धिः ३ ]
हस्तस्वेदं च शूलेषु बालकानां विधापयेत् ।।
षड्वर्षप्रभृतीनां तु पटस्वेदः प्रशस्यते ।
बालकों को यदि शोधन काल में शूल होतो उन्हें हस्तस्वेद देना चाहिये अर्थात् हाथों को गरम करके उन के द्वारा स्वेदन करना चाहिये । तथा ६ वर्ष से अधिक अवस्था वाले बालकों में पटस्वेद दिया जाना चाहिये । वस्त्र द्वारा स्वेदन करने में इस बात का पूर्ण रूप से ज्ञान नहीं हो सकता है कि बालक को कितना स्वेद दिया जा रहा है। छोटे बालकों में अधिक स्वेदन नहीं किया जाना चाहिये इसीलिये उन में हस्तस्वेद का विधान किया गया है । इस प्रकार स्वेदन करने पर इस बात का पूर्ण ज्ञान हो सकता है कि बालक को कितना स्वेद पहुंच रहा है । हाथों द्वारा दिये गये स्वेदन की हम पूर्णरूप से नियन्त्रित (Regulate) कर सकते हैं । प्रकृत ग्रन्थ के सूत्रस्थान के स्वेदाध्याय में चार-मास तक के बालक के लिये हस्तस्वेद का विधान दिया गया है । कहा है—जातस्य चतुरो मासान् हस्तस्वेद प्रयोजयेत् । अप्रमादी निवातस्थो विधूमाग्न्यूष्मणा शनैः ।। निवर्तमाने बालस्य सौकुमार्ये यथाक्रमम् । प्रवर्तमाने काठिन्ये तेषां स्वेदं प्रवधयेत् ।।
अथ खल्वतिबृंहणादतिरूक्ष्यादतिकार्श्यादतिमांसमेदो ............ (ऽ)त्यल्पौषधत्वादौषधस्यातिघनत्वादतिद्रवत्वादत्युष्णत्वादतिशीतत्वादतिमधुरत्वादतिकटुत्वादतिलवणत्वादतिकषायत्वादत्यम्लत्वादतिक्षारत्वादतिबीभत्सरूपरसगन्ध(त्वात्) .......... त्रस्य पीतौषधस्य वा प्रचलायतः प्रस्वपतोऽन्यमनसः शीतवातशीतगृहशीतोदकशीताम्बरोपसेवनादुपानत्पादुकाग्निवर्जनाद्वेगविधारणाद् वेगप्रेरणात् ............ (वमनविरेच) नौषधानां दुर्योगातियोगावुत्पद्येते; तयोर्लक्षणानि भवन्ति-आध्मानप्रतिश्यायविबन्धहृदयोपग्रहशूलपरिकर्तिकाच्छर्दिशिरोग्रहप्रवाहिकाहिक्काश्वासकासतालुशोषकण्ठ .......... (मुखवै)रस्यनिष्ठोविकारोघातज्वरविषादस्त्रोतोमलप्रादुर्भावा दुर्योगलक्षणोपद्रवाः । श्रमदौर्बल्यविषादमोहस्मृतिश्रोत्रभ्रंशवाक्तंनुत्वविप्रलापजीवादानपक्वाशयशूलाप्लवन ........... मुखहृदयशोषमन्यापार्श्वाक्षेपहृदयकम्पकेशमुखाङ्गरूक्षताकटिबस्तिवङ्क्षणशूलमेढ्रदाहगुदशूलपाकभ्रंशातीसारोरुकम्पजानुघातजङ्घावा ....... च महागदा अतियोगादुत्पद्यन्ते ।।
वमन तथा विरेचन के अयोग तथा अतियोग के कारण—अतिबृंहण, अतिरूक्ष, एवं अतिकृशता से तथा मांस और मेद की अधिकता से, ओषधि के अत्यल्प, अत्यन्त गाढा (सान्द्र), अत्यन्त द्रव, अत्यन्त उष्ण, अत्यन्त शीत, अत्यन्त मधुर, अत्यन्त कटु, अत्यन्त लवण, अत्यन्त कषाय, अत्यन्त अम्ल और अत्यन्त क्षारयुक्त होने से तथा ओषधि के रूप, रस एवं गन्ध के अत्यन्त बीभत्स होने से, पी हुई ओषधि के अपने स्थान से प्रचलित हो जाने से, दिन में सोने से, अन्यमनस्क होने से (मन के दूसरी ओर लगा होने से), शीतल वायु, शीतलगृह, शीतलजल तथा शीतल वस्त्रों के सेवन से, जूते—खड़ाऊं तथा अग्नि के त्याग से, प्रवृत्त वेगों के धारण करने से तथा अप्रवृत्त वेगों को प्रवृत्त करने इत्यादि के द्वारा वमन एवं विरेचक ओषधि का दुर्योग (अयोग) तथा अतियोग हो जाता है । उन के निम्न लक्षण होते हैं । अयोग के लक्षण—आध्मान, प्रतिश्याय, विबन्ध, हृदयोपग्रह, शूल, परिकर्तिका, छर्दि शिरोग्रह, प्रवाहिका, हिक्का, श्वास, कास, तालुशोष, कण्ठ.....एवं मुखवैरस्य, बार २ थूक आना, उरोघात, ज्वर, विषाद, तथा स्रोतों के अयोग के लक्षण एवं उपद्रव हैं । अति योग के लक्षण—श्रम, दौर्बल्य, विषाद, मोह स्मृतिभ्रंश, जीवादान (जीव—शुद्ध रक्त का निकलना), पक्वाशय में शूल, आप्लवन, ....... मुखशोष, हृदयशोष, मन्याश्रय, पार्श्वाक्षेप, हृदय का कांपना, केश, मुख एवं अङ्गों की रूक्षता, कटि, बस्ति तथा वंक्षण (Groin) में शूल, मेढ्रदाह, गुदशूल, गुदपाक, गुदभ्रंश (Prolapse of Rectum) अतिसार, ऊरुकम्प, जानुघात.......इत्यादि महारोग—अतियोग से हो जाते हैं । चरक सू. अ. १५ में इन अयोग तथा अतियोग के लक्षण एकत्र ही किये गये हैं। कहा है—तत्रातियोगायोगनिमित्तान्युपद्रवान्