भारतकोश
काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

Kashyapa Samhita Hindi

महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा

स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished942 पृष्ठ

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पृष्ठ 638

२८० काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम् शतपुष्पाशतावरीकल्पः ? ]

ऐसा भगवान् कश्यप ने कहा था।
इति कल्पस्थाने षट्कल्पः ॥


शतपुष्पाशतावरीकल्पाध्यायः ।

अथातः शतपुष्पा(शता)वरीकल्पं व्याख्यास्यामः ॥१॥
इति ह स्माह भगवान् कश्यपः ॥२॥

अब हम शतपुष्पा (सौंफ) तथा शतावरी के कल्प का व्याख्यान करेंगे। ऐसा भगवान् कश्यप ने कहा था ॥१-२॥

शतपुष्पाशतावर्त्यौ रसवीर्यविपाकतः । प्रयोगतश्च भगवंश्छ्रोतुमिच्छामि तत्त्वतः ॥३॥

भगवान् ! मैं शतपुष्पा तथा शतावरी के रस, वीर्य, विपाक एवं प्रभाव को पूर्णरूप से जानना चाहता हूँ ॥३॥

इति पृष्टः स शिष्येण स्थविरेण प्रजापतिः । शतपुष्पाशतावर्त्यौ प्रोवाच गुणकर्मतः ॥४॥

इस प्रकार ज्ञानवृद्ध (ज्ञानी) शिष्य द्वारा प्रश्न किये जाने पर प्रजापति कश्यप ने शतपुष्पा तथा शतावरी के गुण एवं कर्मों का वर्णन किया ॥४॥

मधुरा बृंहणी बल्या पुष्टिवर्णाग्निवर्धनी । ऋतुप्रवर्तनी धन्या योनिशुक्रविशोधनी ॥५॥
उष्णा वातप्रशमनी मङ्गल्या पापनाशनी । पुत्रप्रदा वीर्यकरी शतपुष्पा निदर्शिता ॥६॥

शतपुष्पा के गुण—यह रस में मधुर, बृंहण तथा बलदायक है। पुष्टि, वर्ण और जाठराग्नि को बढ़ाती है। आर्तव को प्रवृत्त करती है। धन्य है। योनि और शुक्र का शोधन करती है। यह उष्ण, वातशामक, मङ्गलकारक, पापनाशक, पुत्रों को उत्पन्न करने वाली तथा वीर्यवर्धक है ॥५-६॥

शीता कषायमधुरा स्निग्धा वृष्या रसायनी । वातपित्तविबन्धघ्नी वर्णोजोबलवर्धनी ॥७॥
स्मृतिमेधामतिकरी पथ्या पुष्पप्रजाकरी । भूतकल्मषशापघ्नी शतवीर्या शतावरी ॥८॥

यह वीर्य में शीत, रस में कषाय एवं मधुर तथा स्निग्ध घृष्य और रसायन है। वात, पित्त तथा विबन्ध (मलबन्ध) को नष्ट करती है। वर्ण, ओज एवं बल की वृद्धि करती है। स्मृति, मेधा एवं मति को बढ़ाती है। पथ्यकारक है। पुष्प (मासिक स्त्राव) तथा पुत्र को उत्पन्न करती है। भूत, पाप तथा शाप को नष्ट करती है तथा यह सैकड़ों वीर्यों वाली है ॥

तयोः प्रयोगं ब्रुवते कृत्वा दोषविशोधनम् । प्रावृटशरद्वसन्तेषु धृतिपथ्यान्नसेविनाम् ॥९॥

दोषों का शोधन करके, प्रावृट्, शरद् तथा वसन्त ऋतु में धृति (धैर्य-धारणशक्ति) एवं पथ्यभोजन के सेवन पूर्वक इनका प्रयोग करना चाहिये ॥९॥

आर्तवं या न पश्यन्ति पश्यन्ति विफलं च याः । अतिप्रभूतमत्यल्पमतिक्रान्तमनागतम् ॥१०॥
अकर्मण्यमविस्त्रांसि किञ्जातमृतयश्च याः । दुर्बलाऽदृढपुत्राश्च कृशाश्च वपुषाऽथ याः ॥११॥
प्रस्कन्दना विवर्णाश्च याश्च प्रचुरमूर्तयः । स्पर्शं च या न विन्दन्ति याश्च स्युः शुष्कयोनयः ॥१२॥
शतपुष्पाशतावर्त्यौ स्यातां तत्रामृतं यथा । पुमानप्युपयुञ्जानो यथोक्तानाप्नुते गुणान् ॥१३॥