काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)
Kashyapa Samhita Hindi
महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा
स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंशतपुष्पाशातावरीकल्पः ? ] कल्पस्थानम् २८१
जिन स्त्रियों को आर्तव (मासिक ऋतुस्राव) नहीं होता है, अथवा जिनका मासिक स्राव विफल होता है (अर्थात् जो फल शून्य हो—जिसका गर्भप्राप्ति रूप कोई फल न हो), जिन्हें बहुत अधिक या बहुत कम मासिक स्राव आता हो, जिनका मासिक स्राव समाप्त हो गया हो (Menapanse), जिनको अभी मासिक स्राव प्रारंभ न हुआ हो, जिनका मासिक स्राव अकर्मण्य (कर्मशून्य-Inactive) तथा स्रावरहित हो, जिन्हें अनेक प्रकार का स्राव होता हो, जो दुर्बल हों, जिनकी सन्तान कमजोर हो, जो शारीरिक दृष्टि से कृश (Physically weak) हों, जिन्हें अतिसार रोग हो रहा हो अथवा जो विवर्ण तथा प्रचुरमूर्तिवाली हो, जो स्पर्श का अनुभव न करती हो तथा जिनकी योनि शुष्क हो—उन स्त्रियों में शतपुष्पा तथा शतावरी अमृत के समान गुणकारी होता है । पुरुष भी इनका सेवन करने पर उपर्युक्त गुणों को प्राप्त करता है ॥११०-१३॥
चूर्णितायाः पलशतं नवे भाण्डे निधापयेत् । तच्चूर्णं शतपुष्पायाः प्रातरुत्थाय जीर्णवान् ।।१४।। पलार्धार्थं पलार्धं वा पलं वा सर्पिषा लिहेत् । शक्त्या वा तस्य जीर्णान्ते भुञ्जीत पयसौदनम् ।।१५।। विस्रंसितोपचारं च विदध्यादत्र पण्डितः । उपयुक्ते पलशते यथेष्टांल्लभते सुतान् ।।१६।।
१०० पल चूर्ण की हुई शतपुष्पा को एक नवीन पात्र में रखें । प्रातःकाल उठकर पूर्व भोजन के जीर्ण हो जाने पर इस चूर्ण का डेढ़, एक अथवा आधा पल की मात्रा में अथवा शक्ति के अनुसार घृत के साथ लेहन करे तथा उसके जीर्ण हो जाने पर दूध और चावल का भोजन करे । विद्वान् व्यक्ति यहां विरिक्त (जिसे विरेचन दिया गया है) मनुष्य के समान उपचार करे । इस प्रकार १०० पल का सेवन करने पर यथेष्ट पुत्रों की प्राप्ति होती है ॥१४-१६॥
अपि बन्ध्या च षण्ढा च सूयेते शतपुष्पया । युवा भवति वृद्धोऽपि बलवर्णौ लभेत च ।।१७।। तेजसा चौजसा बुद्ध्या दीर्घायुष्केण मेधया । युज्यते प्रजया धृत्या वलीपलिंतवर्जितः ।।१८।।
शतपुष्पा के प्रयोग से बांझ एवं नपुंसक स्त्री को भी पुत्रोत्पत्ति हो जाती है । वृद्ध व्यक्ति भी बल और वर्ण को प्राप्त करके युवा हो जाता है । वह झुर्रियों तथा सफेद बालों से रहित होकर तेज, ओज, बुद्धि, दीर्घायुष्य, मेधा, सन्तान एवं धृति (धारण शक्ति) से युक्त हो जाता है ॥१७-१८॥
अतो बिडालपदकं लिह्यान्मधुघृताप्लुतम् । मेधावी शतपुष्पाया मासाच्छ्रुतधरो भवेत् ।।१९।।
(इति ताडपत्रपुस्तके १७५ तमं पत्रम् ।)
बुद्धिमान् मनुष्य एक मास पर्यन्त एक कर्ष (२ तो.) मात्रा में शतपुष्पा के चूर्ण को मधु एवं घृत के साथ मिलाकर सेवन करने से श्रुतधर (सुनी हुई बात को धारण करने वाला धृतिमान्) हो जाता है ॥१९॥
अग्निकामस्तु मधुना, रूपार्थी क्षीरसर्पिषा । बलकामस्तु तैलेन, प्लीहकी कटुतैलयुक् ।।२०।।
कामलापाण्डुशोथेषु महिषीक्षीरमूत्रवत् । गुल्मी चैरण्डतैलेन, कुष्ठी खदिरवारिणा ।।२१।।
शुष्कविण्मत्स्यवसाया पिबेन्मांसरसेन वा ।। जीर्णमांसरसेनाद्यान्मुद्गमण्डेन कुष्ठिकः ।।२२।।
जाठराग्नि की वृद्धि के लिये मधु के साथ, रूप (सौन्दर्य) की वृद्धि के लिये दूध तथा घी के साथ, बलवृद्धि के लिए तिलतैल के साथ, प्लीहोदरी (प्लीहा रोगी) को कटुतैल (सरसों के तेल) के साथ, कामला, पाण्डु तथा शोथरोगी को भैंस के दूध तथा मूत्र के साथ, गुल्म रोगी को एरण्ड तैल के साथ, कुष्ठरोगी को खदिर के स्वरस अथवा क्वाथ, शुष्कमल, मछली की वसा (चर्बी), मांस रस, जीर्ण मांxrस अथवा मुद्गमण्ड के साथ शतपुष्पा का सेवन करना चाहिये ॥२०-२२॥