काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)
Kashyapa Samhita Hindi
महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा
स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें२८२ काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम् रेवतीकल्पः ? ]
शतपुष्पापलशतं जलद्रोणेषु पञ्चसु । पादावशेषं निष्क्वाथ्य पूतं भूयो विपाचयेत् ।।२३।।
धात्रीचिकित्सिते वर्गः सामान्यो य उदाहृतः । तैलाढकं पचेत्तेन शनैः क्षीरे चतुर्गुणे ।।२४।।
तत् पक्वं नस्यपानाद्यस्नेहम्रक्षणबस्तिषु । प्रशस्तमृषिणा नित्यं यथोक्तगुणलब्धये ।।२५।।
१०० पल शतपुष्पा को ५ द्रोण पानी में पकाकर चतुर्थांश शेष रखें । उसे छान कर धात्री चिकित्सा में कहे सामान्य वर्ग के साथ उसे पुनः पकाये । फिर उसमें एक आढक तैल चतुर्गुण दूध के साथ डालकर पाक करे । सिद्ध हो जाने पर यथोक्त गुणों की प्राप्ति के लिये उसे नित्य नस्य, पान, स्नेहन, मालिश एवं बस्ति आदि के द्वारा प्रयोग करने के लिये महर्षि कश्यप ने श्रेष्ठ माना है ॥२३-२५॥
य एवं शतपुष्पाया विधिर्द्दष्टोऽत्र सर्वशः । स एवोक्तः शतावर्या घृतं पाके तु शस्यते ।।२६।।
इति ह स्माह भगवान् कश्यपः ।
(इति कल्पस्थाने) शतपुष्पाशतावरीकल्पः ।।
जो शतपुष्पा से सेवन की विधि बताई गई है, वही सम्पूर्ण विधि शतावरी के घृत पाक आदि की भी समझनी चाहिये ॥२६॥
ऐसा भगवान् कश्यप ने कहा था ।
(इति कल्पस्थाने) शतपुष्पाशतावरीकल्पः ।।
रेवतीकल्पाध्यायः ।
अथातो रेवतीकल्पं व्याख्यास्यामः ।।१।।
इति ह स्माह भगवान् कश्यपः ।।२।।
अब हम कल्प का व्याख्यान करेंगे । ऐसा भगवान् कश्यप ने कहा था ॥१-२॥
प्रजापतिर्वै खलु ह स्मैक एवेदं सर्वमासीत् । स कालमेवाग्रेऽसृजत । ततो देवाँश्चासुराँश्च पितॄँश्च मनुष्याँश्च सप्त च ग्राम्यान् पशूनारण्यानोषधींश्च वनस्पतींश्च । अथो स प्रजापतिरैक्षत, ततः क्षुदजायत, सा क्षुत् प्रजापतिमेवाविवेश, सोऽग्लासीत्, तस्मात् क्षुधितो ग्लायतीति । स ओषधीः क्षुत्प्रतीघातमपश्यत् । स ओषधीरादत् । स ओषधीरुपह्वित्वा क्षुधो व्यत्यमुच्यत । तस्मात् प्राणिन ओषधीरशित्वा क्षुधो व्यतिमुच्यन्ते । कर्मसु च युज्यन्ते ।।३।।
प्रारंभ में प्रजापति (ब्रह्मा) ही अकेला सब कुछ था । उसने सर्वप्रथम काल को उत्पन्न किया । उसके बाद देव, असुर, पितर, मनुष्य, सात ग्रामीण एवं जंगली पशु तथा ओषधियों एवं वनस्पतियों की रचना की । तब प्रजापति ने इच्छा की जिससे क्षुधा (भूख) की उत्पत्ति हो गई । वह क्षुधा प्रजापति में ही प्रविष्ट हो गई जिससे उसे ग्लानि (खिन्नता) हो गई इसीलिये क्षुधित (भूखे) व्यक्ति को ग्लानि होती है । उसने क्षुधा के प्रतीकार के लिये ओषधियों को देखा । तब उसने ओषधि का सेवन किया । वह ओषधि का सेवन करके क्षुधा से मुक्त हो गया । इसीलिये सब प्राणी ओषधियों को खाकर क्षुधा से मुक्त हो जाते हैं तथा अपने २ कार्यों में लगे रहते हैं ।