काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)
Kashyapa Samhita Hindi
महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा
स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)
पृष्ठ 643, कुल 942 में से
संदर्भ में पढ़ेंरेवतीकल्पः ? ] कल्पस्थानम् २८३
वक्तव्य—(i) इससे काल की महिमा बतलाई गई है। अथर्ववेद के १९वें काण्ड में भी काल की विशेष महिमा का वर्णन किया गया है। वहां ५३ तथा ५४ पूरे सूक्त काल के विषय में दिये हैं। वहां काल का घोड़े के रूप में वर्णन किया गया है। वे सूक्त निम्न प्रकार हैं—कालो अश्वो वहति सप्तरश्मिः सहस्राक्षो अजरो भूरिरेताः। तमारोहन्ति कवयो विपश्चितस्तस्य चक्रा भुवनानि विश्वा।। सप्तचक्रान् वहति काल एष सप्तास्य नाभिरमृतं न्वक्षः। स इमा विश्वा भुवनान्यञ्जत्कालः स ईयते प्रथमो नु देवः।। पूर्णः कुम्भोऽधिकाल आहितस्तं वै पश्यामो बहुधा नु सन्तः। य इमः विश्वा भुवनानि प्रत्यङ्कालं तमाहुः परमे व्योमन्।। स एवं स भुवनान्यभरत्स एव सं भुवनानि पर्यैत्। पिता सन्नभवत्पुत्र एषां तस्माद्वै नान्यत्परमस्ति तेजः।। कालोऽमू दिवमजनयत्काल इमाः पृथिवीरुत। काले ह भूतं भव्यं चेष्टितं ह वितिष्ठते।। कालो भूतिमसृजत काले तपति सूर्यः। काले ह विश्वा भूतानि काले चक्षुर्विपश्यति।। काले मनः काले प्राणः काले नाम समाहितम्। कालेन सर्वा नन्दन्त्यागतेन प्रजा इमाः।। काले तपः काले ज्येष्ठं काले ब्रह्म समाहितम्। कालो ह सर्वस्येश्वरो यः पितासीत्प्रजापतेः। तेनेषितं तेन जातं तदु तस्मिन्प्रतिष्ठितम्। कालो ह ब्रह्म भूत्वा बिभर्ति परमेष्ठिनम्।। कालः प्रजा असृजत कालो अग्रे प्रजापतिम्। स्वयंभूः कश्यपः कालात्तपः कालादजायत।। अथर्व. कां. १९ सूक्त ५३—कालादापः समभवन्कालाद्ब्रह्म तपो दिशः। कालेनॊदेति सूर्यः काले निविशते पुनः।। कालेन वातः पवते कालेन पृथिवी मही। द्यौर्मही काल आहिता।। कालो ह भूतं भव्यं च पुत्रो अजनयत्पुरा। कालादृचः समभवन् यजुः कालादजायत।। कालो यज्ञं समैरयद्देवेभ्यो भागमक्षितम्। काले गन्धर्वाप्सरसः काले लोकाः प्रतिष्ठिताः।। कालेऽयमङ्गिरा देवोऽथर्वा चाधितिष्ठतः। इमं च लोकं परमञ्च लोकं पुण्यांश्च लोकान्विधृतींश्च पुण्याः। सर्वाँल्लोकानभिजित्य ब्रह्मणा कालः स ईयते परमो नु देवः।। (ii) सप्त पशून्—वेदों में भी प्रारंभ में पशुओं को उत्पन्न करने का वर्णन मिलता है। परन्तु वहाँ सात के स्थान पर ५ पशुओं का वर्णन मिलता है। रुद्र (पशुपति) का वर्णन करते हुए अथर्ववेद में कहा है—पशुपते नमस्ते। तवेमे पञ्च पशवो विभक्ता गावो अश्वाः पुरुषा अजावयः।। (iii) ओषधि—ओषधि का अभिप्राय गेहूँ, चावल, जौ, तिल तथा मूंग आदि अन्न से है जो फल के पक जाने पर नष्ट (समाप्त) हो जाते हैं। सुश्रुत सू. अ. १ में कहा है—‘फलपाकनिष्ठा ओषधय’ इति। इसी प्रकार मनुस्मृति में भी कहा है—‘ओषध्यः फलपाकान्ता बहुपुष्पफलोपगाः’ ।।३।।
स प्रजापतिरग्रीयमेव रसमासां यस्मादग्रहीत्, तस्मात् स तृप्त एव स्यात्। ऋ^१जीषं प्राणिन ओषधीनां रसमश्नन्ति। तस्मादहरहः क्षुध्यन्ति प्रजाः ।।४।।
उस प्रजापति ने क्योंकि प्रारंभ में ही इन ओषधियों के अन्न का आदान (ग्रहण) कर लिया था इससे वह तृप्त हो गया। अन्य प्राणी ओषधियों के नीरस (रस-साररहित) चूर्ण (कल्क) को ही खाते हैं इसलिये प्राणियों को निरन्तर क्षुधा (भूख) सताती (लगती) रहती है ।।४।।
प्रजापतिर्ह्यासां सारमघसत्, स प्रजापतिस्तृप्तस्तां क्षुधं काले न्यदधात्। ततः स कालः क्षुधितो देवाँश्चासुराँश्च प्राभक्षयत् ।।५।।
प्रजापति ने इसके सार का भक्षण कर लिया इससे तृप्त होकर उसने क्षुधा (भूख) का काल में आधान कर दिया। इससे वह काल क्षुधित (भूखा) हुआ देवता तथा असुरों का भक्षण करने लगा ।।५।।
ते देवाश्चासुराश्च कालेन भक्ष्यमाणाः प्रजापतिमेव शरणमीयुः। स एभ्योऽमृतमाचख्यौ, तेऽमृतं ममन्युस्तदभवदिति। कोन्विदमग्रे भक्षयिष्यतीति। तं देवा एवाभक्षयन्त। ततो देवा अजराश्चामराश्चाभवन्।
१. ऋजीषं नाम सारांशे गृहीतेऽवशिष्टं नीरसचूर्णम्, 'ऋजीषं नीरसं सोमलताचूर्णम्' इति वेददीपे। तत्र सोमपद्मुपलक्षणम्।