काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)
Kashyapa Samhita Hindi
महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा
स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें२८४ काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम् रेवतीकल्पः ? ]
ते देवा अमृतेन क्षुधं कालं चानुदन्त । स कालः प्रतिनुन्न इमानि भूतानि तस्मादादत्ते, ततो देवानसुराअभ्यषजन्त; तेऽन्योऽन्यं युयुधिरे । अथो दीर्घजिह्वी नामाऽसुरकन्या सा देवसेनामक़्षिणोत् । ते देवाः स्कन्दमब्रुवन्-दीर्घजिह्वी नो बलं क्षिणोति, तां शाधीति । सोऽब्रवीत्-वरं वृणुतेति, ते देवा ॐ मित्यचुः । सोऽब्रवीत्-वसुष्वेको रुद्रेष्वेक आदित्येष्वेकोऽहं स्यामिति । ते देवा ॐ मित्यचुः; स तथाऽभवत् । सोमो धरोऽग्निर्मातरिश्वा प्रभासः प्रत्यूषश्चैते पुरा सप्त बसव आसन्, तेषामष्टमो ध्रुवो नामाभवत्, ध्रुवो भवत्येषु लोकेषु य एवं वेद । अज एकपादहिर्ब्रध्नो हरो वैश्वानरो बहुरूपस्त्र्यम्बको विश्वरूपः स्थाणुः शिवो रुद्र इत्येते पुरा दश रुद्रा आसन्, तेषां गुह एकादशोऽभवच्छङ्करो नाम; सम एषु लोकेष्वस्य भवति (य एवं वेद) । इन्द्रो भगः पूषाऽर्यमा मित्रावरुणौ धाता विवस्वानंशो भास्करस्त्वष्टा विष्णुरिति द्वादश पुरा आदित्या आसन् । तेषां त्रयोदशो गुहोऽभवदहस्पतिर्नाम, तस्यैष त्रयोदशो मासोऽधिकस्तस्मात्तत्र तपति मुच्यते सर्वेभ्योऽर्तिभ्यो य एवं वेद । तस्मात् सर्वेषु लोकेषु सर्वेषु छन्दःसु सर्वासु देवतासु स्कन्दो राजाऽधिपतिरित्युच्यते । तस्मै नमो नम इत्युक्त्वा सर्वार्थनारभेत, सिध्यन्ति, य एवं वेद ।। ६ ।।
(इति ताडपत्रपुस्तके १७६ तमं पत्रम्)
काल के द्वारा भक्षण किये जाते हुए वे देवता एवं असुर प्रजापति की ही शरण में पहुँचे। प्रजापति ने इनके लिये अमृत का उपदेश किया। उन्होंने अमृत का मन्थन किया तथा उसे प्राप्त किया। फिर यह प्रश्न उपस्थित हुआ कि पहले इसका कौन सेवन करे। तब देवताओं ने ही इसका सेवन किया। इसके सेवन से देवता अजर (जरा-वृद्धावस्था से रहित) तथा अमर हो गये। अमृत के द्वारा देवताओं ने क्षुधा एवं काल दोनों पराभूत कर दिया। पराजित होकर काल ने प्रजापति से इन भूतों को छीन लिया। तब असुरों (राक्षसों) ने देवताओं पर आक्रमण किया। वे परस्पर युद्ध करने लगे। तब दीर्घजिह्वी नाम की असुरकन्या देवताओं की सेना का संहार करने लगी। वे देवता स्कन्द (कार्तिकेय) के पास जाकर कहने लगे-दीर्घजिह्वी हमारी सेना का संहार कर रही है, उसे आप वश में करें। स्कन्द बोला-आप लोग मुझे वर देवें। देवताओं ने ओं का उच्चारण किया। तब वह कहने लगा कि वसुओं, रुद्रों तथा आदित्यों में मैं एक हो जाऊँ अर्थात् मैं वसु, रुद्र एवं आदित्य इन सबमें व्याप्त हो जाऊं। उन देवताओं ने ॐ का उच्चारण किया तथा वह वैसा ही हो गया अर्थात् वह सम्पूर्ण वसु, रुद्र एवं आदित्यों में व्याप्त हो गया। प्राचीन काल में सोम, धर, अग्नि, मातरिश्वा, प्रभास, प्रत्यूष तथा आह-ये सात वसु थे। इनमें आठवां ध्रुव नाम का वसु हो गया। सम्पूर्ण प्राणियों में निश्चित रूप से होने के कारण उसका ध्रुव नाम हुआ। प्राचीनकाल में अज, एकपात्, अहिर्ब्रध्न, हर, वैश्वानर, बहुरूप, त्र्यम्बक, विश्वरूप, स्थाणु तथा शिव-ये १० रुद्र थे। इनमें गुह (कार्तिकेय) शङ्कर नाम का ११ वां रुद्र हो गया। समः एषु लोकेष्वस्य भवति-अर्थात् इन लोकों में इसका कल्याण हो इस व्युत्पत्ति के अनुसार उसका यह नाम हो गया प्राचीनकाल में इन्द्र, भग, पूषा, अर्यमा, मित्र, वरुण, धाता, विवस्वान्, अंश, भास्कर, त्वष्टा तथा विष्णु-ये १२ आदित्य थे। इनमें कार्तिकेय अहस्पति नाम का १३ वां आदित्य हो गया। इसका वर्ष में १३ वां मास अधिक होता है इस लिये उस मास में वह अहस्पति नामक आदित्य तपता है। तथा सम्पूर्ण पीडाओं (रोगों) से मुक्त हो जाता है। इस प्रकार सम्पूर्ण लोक, छन्द (मन्त्रों) तथा देवताओं में स्कन्द (कार्तिकेय) राजा एवं अधिपति माना जाता है। उसे नमस्कार करके सम्पूर्ण कार्य प्रारंभ करने चाहिये। जो इस प्रकार जानता है उसके सम्पूर्ण कार्य सिद्ध हो जाते हैं।
वक्तव्य— ऐतरेय ब्राह्मण में भी दीर्घजिह्वी आसुरी का वर्णन आता है। वहां कहा है—'आसुरी वै दीर्घजिह्वी देवानां प्रातः सवनमवालेट्' ॥ ऐ. ब्रा. २-३ ॥ वहां असुरों को वाणी को दीर्घजिह्वी नामक कुतिया कहा है जो कि कृपणता की शिक्षा देती है ॥ ६ ॥