काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)
Kashyapa Samhita Hindi
महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा
स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)
२८४ काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम् रेवतीकल्पः ? ]
ते देवा अमृतेन क्षुधं कालं चानुदन्त । स कालः प्रतिनुन्न इमानि भूतानि तस्मादादत्ते, ततो देवानसुराअभ्यषजन्त; तेऽन्योऽन्यं युयुधिरे । अथो दीर्घजिह्वी नामाऽसुरकन्या सा देवसेनामक़्षिणोत् । ते देवाः स्कन्दमब्रुवन्-दीर्घजिह्वी नो बलं क्षिणोति, तां शाधीति । सोऽब्रवीत्-वरं वृणुतेति, ते देवा ॐ मित्यचुः । सोऽब्रवीत्-वसुष्वेको रुद्रेष्वेक आदित्येष्वेकोऽहं स्यामिति । ते देवा ॐ मित्यचुः; स तथाऽभवत् । सोमो धरोऽग्निर्मातरिश्वा प्रभासः प्रत्यूषश्चैते पुरा सप्त बसव आसन्, तेषामष्टमो ध्रुवो नामाभवत्, ध्रुवो भवत्येषु लोकेषु य एवं वेद । अज एकपादहिर्ब्रध्नो हरो वैश्वानरो बहुरूपस्त्र्यम्बको विश्वरूपः स्थाणुः शिवो रुद्र इत्येते पुरा दश रुद्रा आसन्, तेषां गुह एकादशोऽभवच्छङ्करो नाम; सम एषु लोकेष्वस्य भवति (य एवं वेद) । इन्द्रो भगः पूषाऽर्यमा मित्रावरुणौ धाता विवस्वानंशो भास्करस्त्वष्टा विष्णुरिति द्वादश पुरा आदित्या आसन् । तेषां त्रयोदशो गुहोऽभवदहस्पतिर्नाम, तस्यैष त्रयोदशो मासोऽधिकस्तस्मात्तत्र तपति मुच्यते सर्वेभ्योऽर्तिभ्यो य एवं वेद । तस्मात् सर्वेषु लोकेषु सर्वेषु छन्दःसु सर्वासु देवतासु स्कन्दो राजाऽधिपतिरित्युच्यते । तस्मै नमो नम इत्युक्त्वा सर्वार्थनारभेत, सिध्यन्ति, य एवं वेद ।। ६ ।।
(इति ताडपत्रपुस्तके १७६ तमं पत्रम्)
काल के द्वारा भक्षण किये जाते हुए वे देवता एवं असुर प्रजापति की ही शरण में पहुँचे। प्रजापति ने इनके लिये अमृत का उपदेश किया। उन्होंने अमृत का मन्थन किया तथा उसे प्राप्त किया। फिर यह प्रश्न उपस्थित हुआ कि पहले इसका कौन सेवन करे। तब देवताओं ने ही इसका सेवन किया। इसके सेवन से देवता अजर (जरा-वृद्धावस्था से रहित) तथा अमर हो गये। अमृत के द्वारा देवताओं ने क्षुधा एवं काल दोनों पराभूत कर दिया। पराजित होकर काल ने प्रजापति से इन भूतों को छीन लिया। तब असुरों (राक्षसों) ने देवताओं पर आक्रमण किया। वे परस्पर युद्ध करने लगे। तब दीर्घजिह्वी नाम की असुरकन्या देवताओं की सेना का संहार करने लगी। वे देवता स्कन्द (कार्तिकेय) के पास जाकर कहने लगे-दीर्घजिह्वी हमारी सेना का संहार कर रही है, उसे आप वश में करें। स्कन्द बोला-आप लोग मुझे वर देवें। देवताओं ने ओं का उच्चारण किया। तब वह कहने लगा कि वसुओं, रुद्रों तथा आदित्यों में मैं एक हो जाऊँ अर्थात् मैं वसु, रुद्र एवं आदित्य इन सबमें व्याप्त हो जाऊं। उन देवताओं ने ॐ का उच्चारण किया तथा वह वैसा ही हो गया अर्थात् वह सम्पूर्ण वसु, रुद्र एवं आदित्यों में व्याप्त हो गया। प्राचीन काल में सोम, धर, अग्नि, मातरिश्वा, प्रभास, प्रत्यूष तथा आह-ये सात वसु थे। इनमें आठवां ध्रुव नाम का वसु हो गया। सम्पूर्ण प्राणियों में निश्चित रूप से होने के कारण उसका ध्रुव नाम हुआ। प्राचीनकाल में अज, एकपात्, अहिर्ब्रध्न, हर, वैश्वानर, बहुरूप, त्र्यम्बक, विश्वरूप, स्थाणु तथा शिव-ये १० रुद्र थे। इनमें गुह (कार्तिकेय) शङ्कर नाम का ११ वां रुद्र हो गया। समः एषु लोकेष्वस्य भवति-अर्थात् इन लोकों में इसका कल्याण हो इस व्युत्पत्ति के अनुसार उसका यह नाम हो गया प्राचीनकाल में इन्द्र, भग, पूषा, अर्यमा, मित्र, वरुण, धाता, विवस्वान्, अंश, भास्कर, त्वष्टा तथा विष्णु-ये १२ आदित्य थे। इनमें कार्तिकेय अहस्पति नाम का १३ वां आदित्य हो गया। इसका वर्ष में १३ वां मास अधिक होता है इस लिये उस मास में वह अहस्पति नामक आदित्य तपता है। तथा सम्पूर्ण पीडाओं (रोगों) से मुक्त हो जाता है। इस प्रकार सम्पूर्ण लोक, छन्द (मन्त्रों) तथा देवताओं में स्कन्द (कार्तिकेय) राजा एवं अधिपति माना जाता है। उसे नमस्कार करके सम्पूर्ण कार्य प्रारंभ करने चाहिये। जो इस प्रकार जानता है उसके सम्पूर्ण कार्य सिद्ध हो जाते हैं।
वक्तव्य— ऐतरेय ब्राह्मण में भी दीर्घजिह्वी आसुरी का वर्णन आता है। वहां कहा है—'आसुरी वै दीर्घजिह्वी देवानां प्रातः सवनमवालेट्' ॥ ऐ. ब्रा. २-३ ॥ वहां असुरों को वाणी को दीर्घजिह्वी नामक कुतिया कहा है जो कि कृपणता की शिक्षा देती है ॥ ६ ॥
रेवतीकल्पः ? ] कल्पस्थानम् २८५
अथो स दीर्घजिह्व्यै रेवतीमेव प्राहिणोत् । सा शालावृकी भूत्वाऽसुरसेनाभ्यवर्तत । अथो दीर्घजिह्वीमेवाग्रेऽभक्षयत् । तां हत्वा शकुनिर्भूत्वा सोल्का सविद्युत्साऽश्मवर्षा सर्वप्रहरणवर्षिणी बहुरूपाऽसुरानभ्यजयत्तेऽसुरा वध्यमाना बहुरूपया गर्भानीयुर्मानुषीणां चामानुषीणां च । अथो रेवती तान्सुरान् गर्भेष्वपश्यत् मानुषीणां चामानुषीणां च । तत एनानवधीज्जातहारिणी भूत्वा । तस्माज्जातहारिणी पुष्पं हन्ति वपुश्च हन्ति गर्भंश्च हन्ति जातांश्च हन्ति जायमानांश्च जनिष्यमाणांश्च हन्ति, यद्भवत्या-सुरमधार्मिकाणामपत्यमधर्मोपहतं विशेषेण । सैषा वृद्धजीवक ! रेवती बहुरूपा जातहारिणी पिलिपिच्छकेति चोच्यते, रौद्रीति चोच्यते, वारुणीति चोच्यते । सैषा स्कन्दवराज्ञया सर्वजातिषु भूता याऽधार्मिकाणि मूढयत्यसतां विच्छेदाय । वृद्धजीवक ! तस्यास्तु निदानं चागमनं च पूर्व रूपं च निवर्तनं च भेषजं चोपदेक्ष्यामः । कस्मात्, संस (जने) ह्येषामासुराणामसतां सन्तोऽपि बध्यन्ते । संसर्गे हि जातहारिणी दिव्येन चक्षुषा दृश्यते । तस्यास्तु धर्मएव निवृत्तिकारणमुक्तमिति ।।७।।
उसने दीर्घजिह्वी के लिये रेवती को भेजा। उसने शालावृकी होकर (गीदड़ या वनविलाव का रूप धारण करके) असुरों की सेना का संहार प्रारम्भ किया। तथा सबसे पहले वह दीर्घजिह्वी का ही भक्षण कर गई। उसे मारकर उसने शकुनि बनकर उल्का, विद्युत् (बिजली), पत्थरों की वर्षा करने वाली तथा सम्पूर्ण प्रहरणों (आयुधों) की वर्षा करने वाली-इत्यादि अनेक रूपों वाली होकर असुरों को पराजित किया। इस प्रकार अनेक रूपों वाली शकुनि द्वारा संहार किये जाते हुए वे असुर मनुष्यों तथा अन्य प्राणियों के गर्भो को प्राप्त हुए अर्थात् उनके गर्भो में स्थित हो गये। रेवती ने मनुष्यों तथा अन्य प्राणियों के गर्भो में उन्हें देख लिया। तब उसने जातहारिणी (उत्पन्न हुए प्राणियों का संहार करने वाली) बनकर उनका संहार किया। इस प्रकार वह जातहारिणी पुष्प (आर्त्तवरूप में विद्यमान गर्भ), वपु (शरीर-पिण्ड), गर्भ, उत्पन्न हुए, उत्पन्न होने वाले तथा उत्पन्न किये जाने वाले-प्राणी को नष्ट करती है। विशेषरूप से वह असुरों, अधार्मिक व्यक्तियों के पुत्रों तथा अधर्म युक्त प्राणियों को नष्ट करती है। हे वृद्धजीवक ! इस प्रकार यह अनेक रूपों वाली तथा जातहारिणी (उत्पन्न हुए प्राणियों का हरण करने वाली) रेवती-पिलिपिच्छिका, रौद्री तथा वारुणी आदि नामों से कहलाती है। यह रेवती स्कन्द की आज्ञा से सम्पूर्ण जातियों में उत्पन्न हुए अधार्मिक व्यक्तियों को मूढ कर देती है तथा दुष्टों का विच्छेद (नाश) करती है। हे वृद्धजीवक ! अब इस रेवती का निदान, आगमन (संप्राप्ति), पूर्वरूप, निवृत्ति तथा ओषधि (चिकित्सा) आदि का उपदेश किया जायगा क्योंकि असुरों एवं दुष्टों के संसर्ग से सज्जन प्राणियों का भी वध हो जाता है। संसर्ग होने पर यह यह जातहारिणी (रेवती) दिव्य चक्षुओं के द्वारा ही दिखलाई देती है तथा धर्म (धार्मिक कृत्य) ही उसकी निवृत्ति का उपाय माना गया है ॥७॥
अथ खलु या स्त्री त्यक्तधर्ममङ्गलाचारशौचदेवक्रिया देवगोब्राह्मणगुरुवृद्धसद्वेषिणी दुराचाराऽहङ्कृताऽनवस्थिता वैरकलिमांसाहिंसानिद्रामैथुनप्रिया चण्डाऽरुन्तुदा दन्दशूका वावदूका विगतसाध्वसाऽथोऽकस्मात्प्रहसनाऽथोऽकस्मात्प्ररोदनाऽथोऽकस्माच्छोचनाऽनृतवादिनी घस्मराऽथो आहुः सर्वशिनी स्वमतकारिणी पथ्यवचनभोजनत्यागिनी भृशमहृद्याना परविजातोपहिंसिका स्वार्थपरा परार्थविलम्बिनी प्रतीपा भर्तरि, पुत्रेषु च निःस्नेहा, तैश्च नित्यशपथा, श्वस्रश्वशुरननन्दादेवरातृृत्विजमन्यान् वा तत्स्थानीयान्महतो वाऽवमन्यते तथैनान्मन्युना निर्दहन्त्यभिशपन्ति वा, सपत्नीं वा दुःशीला पापचक्षुरभिध्यायति, मन्त्रासदौषधकर्मभिर्वैनामभिचरति, मूर्ध्नि चाभिहन्ति बालं, न चैषां सुखदुःखज्ञा भवति, मित्रद्रोहिणी ह्यमङ्गलवादिनी शान्तिहोमजपदानबलिकर्मस्वस्त्ययनावष्ठीवनपरिचुम्बनपरिष्वजनपरिवर्जिता स्थानेष्वपि भवति; तस्या एभिः कर्मभिरन्यैश्चाशुभैः पूर्वकैश्चैह कृतैरतिपानभोजनस्वप्नव्यायामसेवनैश्च छिद्रेष्वेतेष्वधर्मद्वारेषु
| २८६ | काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम् | रेवतीकल्पः ? ] |
|---|
जातहारिणी सज्जते। अथो परितरस्या एवंशीलो भवति। तयोरसाध्यां जातहारिणीं विद्यात्। अथो दम्पत्यो-
(इति ताडपत्रपुस्तके १७७ तमं पत्रम्)
रेकतरोऽधार्मिको भवति कृच्छ्रा भवति। उभयोस्तु धार्मिकयोरार्जवयोरनभिमानिकयोररोगयोश्च प्रजा वर्धते। यदा वा स्त्री प्रथमगर्भिणी म्रियमाणापत्याभिरालिभिर्वाऽन्याभिरचौक्षाभिरशुभाभिरसतीभिर- मानुषपरिगृहीताभिर्जातहारिणीसत्ताभिर्वा संयोगमुपैति, सह भुङ्क्ते, सह स्नाति, वस्त्रालङ्कारं वा ददाति, तासां स्नानमूत्रबलिभूमीराक्रामति, विशेषदार्तवोपहतानि चैतानि केशलोमनुखोद्धर्त्तनकजीर्णवस्त्रावकर्त्तनान्याक्रामति, भोजनशेषं पानशेषमौषधशेषं गन्धशेषं पुष्पशेषं जीर्णोपानहौ वा दधाति, तदा जातहारिणी सज्जते। यदा वैनां प्रथमगर्भिणीं वा दर्शनीयां वपुष्मतीमरोगान्पीनश्रोणिपयोधरोरुबाहुवदनामभिजायमानसौभाग्यां सुकेशीं विशालरक्तान्तलोचनामभिवर्धमानलोमराजिं स्निग्धकरचरणनखदृष्टित्वचमतिसुकुमारीमक्लेशसहामनायासपरमां कालयोगादभिवर्धमानगर्भामुपचीयमानवपुषमाप्यायमानपयसं स्त्रियं गर्भिणीं दृष्ट्वा दुरात्मानोऽन्वीक्षन्तेन चास्याः शान्तिकर्म क्रियते तदाऽस्य जातहारिणी सज्जते। एतस्मात् कारणात् पुत्रीया काम्येष्टिरह न्यहन्युक्ता, सा ह्यस्याः पापं शमयति तस्माज्जनन्याऽपि सह भोक्तुं नार्हति गर्भिणी ।।८।।
जातहारिणी किन्हें आक्रान्त करती है—? जिस स्त्री ने धर्म, मङ्गलाचार, शौच (शुद्धि) तथा देवताओं के पूजन आदि आवश्यक कर्मों का त्याग कर दिया है। जो देवता, गौ, ब्राह्मण, गुरु, वृद्ध तथा सज्जनों से द्वेष करती है, जो दुराचारिणी, अहंकारयुक्त एवं अस्थिर चित्त वाली है, वैर, कलि (लड़ाई-झगड़ा), मांस, हिंसा, निद्रा एवं मैथुन आदि जिसे प्रिय हैं, जो चण्डा (भयंकर), अरन्तुदा (मर्मस्थल पर प्रहार करने वाली), दन्दशूका (बार २ खाने वाली), वावदूका (बकवाद करने वाली) तथा विगतसाध्वसा (भयरहित) है। जो सहसा हंसने, रोने, एवं शोक करने लगती है, जो असत्य भाषण करती है, जो घस्मरा (बहुत खाती) है, जो सब कुछ खा जाती है, अपनी इच्छा के अनुसार ही कार्य करती है, पथ्य वचन एवं पथ्य भोजन का जिसने त्याग किया हुआ है, जो बिलकुल श्रद्धा (विश्वास) नहीं करती है, जो दूसरों की उत्पन्न हुई सन्तान को मार देती है। जो अत्यन्त स्वार्थिनी है, परार्थ में विलम्ब करने वाली है, जो पति के प्रतिकूल रहती हो, पुत्रों से स्नेह (प्रेम) न करती हो, तथा सदा उनकी शपथ खाती हो, जो अपने श्वशुर, ननद, देवर, ऋत्विज अथवा उनके समान अन्य बड़े व्यक्तियों का अपमान करती हो, इन्हें क्रोधपूर्वक मारती हो तथा शाप देती हो। जो दुश्चरित्र स्त्री अपनी सौत के विषय में पापयुक्त विचार करती हो अथवा मन्त्रों, दूषित ओषधियों एवं दूषित कर्मों के द्वारा उसका अभिचार (मान्त्रिक क्रिया जादू टोना आदि) करती हो, जो बालकों के सिर पर प्रहार करती है तथा उसके सुख एवं दुःख का जिन्हें ज्ञान नहीं होता है। जो मित्रों से द्रोह करती है, अमङ्गल भाषण (प्रवचन) करती है, जो उचित स्थान पर भी शान्ति, होम, जप, दान, बलिकर्म, स्वस्त्ययन, अवष्ठीवन (थूकना), चुम्बन तथा आलिङ्गन आदि से रहित होती है—उस स्त्री को इन कर्मों अथवा पूर्व जन्म के या इस जन्म के अशुभ कर्मों, अतिपान (पेय पदार्थ का अत्यन्त सेवन), अतिभोजन, अतिस्वप्न, तथा अति त्व्यायाम आदि के सेवन के कारण उत्पन्न हुए दोषों अथवा अन्य अधार्मिक कार्यों के कारण जातहारिणी आक्रान्त करती है। इससे उसका पति भी इसी स्वभाव अथवा आचरण वाला हो जाता है। उन दोनों में असाध्य जातहारिणी को जाने। यदि इन दोनों पति-पत्नियों में से एक व्यक्ति अधार्मिक हो जाता है तो वह जातहारिणी कृच्छ्र होती है। यदि वे दोनों ही धार्मिक प्रवृत्ति वाले, सरल प्रकृति के, अभिमानशून्य तथा रोगरहित हों तो उनकी सन्तान की वृद्धि होती है। अथवा जब स्त्री को प्रथम गर्भ हो उस समय म्रियमाण (जिनकी सन्तान मर जाती है) पुत्रों वाली सखियों के साथ तथा अन्य अचौक्ष (असुन्दर), अशुभ, असती तथा मनुष्यों ने जिन्हें स्वीकार नहीं किया ऐसी तथा जातहारिणियों
रेवतीकल्पः ? ] कल्पस्थानम् २८७
से युक्त स्त्रियों के साथ संयोग करती हो, उनके साथ भोजन तथा स्नान करती हो, वस्त्र तथा अलंकार प्रदान करती हो, उनके स्नान, मूत्र तथा बलिस्थान को आक्रान्त करती है, तथा विशेषरूप से इनके आर्तव (मासिक स्राव) से युक्त केश, लोम, नख, उबटन, जीर्णवस्त्र तथा कटे हुए नाखून-बाल आदि पर आक्रमण करती है, उनके भोजन शेष (भोजन के अवशिष्ट अंश), पानशेष, औषधशेष, गन्धशेष, पुष्प (आर्तव) शेष पर आक्रमण करती है तथा पुराने जूतों को धारण करती है तब उन पर जातहारिणी आक्रमण कर देती है। अथवा जब प्रथम गर्भ वाली, दर्शनीय शरीर वाली, रोगरहित, मोटे श्रोणि, स्तन, ऊरु (जंघा), बाहु तथा सुन्दर मुख वाली, सौभाग्यवती, उत्तम बालों वाली तथा नेत्र के अन्तः भाग जिसके विशाल एवं रक्तवर्ण के हैं, जिसके लोम (शरीर के बाल) बहुत बढ़े हुए हैं, जिसके हाथ, पैर, नख, दृष्टि तथा त्वचा अत्यन्त स्निग्ध हैं, जो अत्यन्त सुकुमारी है तथा क्लेश और परिश्रम को सहन नहीं कर सकती है, कालयोग से जिसका गर्भ वृद्धि को प्राप्त हो रहा है, जिसके शरीर तथा दूध की वृद्धि हो रही है—ऐसी गर्भिणी स्त्री कोक देखकर दुष्ट लोग ईर्ष्या करते हैं, अथवा नजर लगा देते हैं और यदि उसका शान्ति कर्म न किया जाय तो उस पर जातहारिणी आक्रमण कर देती है। इसी कारण से प्रतिदिन पुत्रीय (पुत्रोत्पत्ति) के लिये काम्येष्टि (उत्तम फल की इच्छा से यज्ञ करना) करने का विधान कहा गया है। इससे उसके पाप शान्त हो जाते हैं। इस लिये गर्भिणी स्त्री को अपनी जननी (माता) के साथ भी भोजन नहीं करना चाहिये ॥८॥
विशेषात् प्रथमे गर्भे प्रमादं चात्र वर्जयेत्। बहुयाज्यस्य विप्रस्य संप्रसक्तस्य याजने ॥९॥
विदुषोऽपि स्वदोषेण सज्जते जातहारिणी।
आक्षेप्ता यश्च वादेषु दाम्भिकोऽहङ्कृतश्च यः ॥१०॥
सर्वे ते जातहारिण्या भक्ष्यभूताः सयाजकाः।
विशेष कर प्रथम गर्भ में प्रमाद नहीं करना चाहिये। क्योंकि बहुत यज्ञ करने वाले ब्राह्मण तथा यज्ञ-याग में लगे हुए विद्वान् व्यक्ति पर भी अपने दोष से ही जातहारिणी आक्रमण कर देती है। विवाद में बहुत आक्षेप करने वाला, बहुत दम्भ करने वाला, अहंकारी तथा याजक आदि सब व्यक्ति जातहारिणी के भक्ष्य होते हैं ॥९-१०॥
रात्रौ यदा गतो मार्गात् पतिः पांसुलपादकः ॥११॥
स्पृशेदृतौ वा गर्भे वा तदाऽऽविशति रेवती।
जब रात्रि में मार्गस्खलित पति पांवों में धूल लगे हुए अथवा ऋतुकाल में स्त्री का स्पर्श करता है तब गर्भ में रेवती प्रविष्ट हो जाती है अर्थात् रेवती गर्भ पर आक्रमण कर देती है ॥
गृहीतां जातहारिण्या सेवित्वा यः स्त्रियं पतिः ॥१२॥
भार्यामुपैति तत्कालं सज्जते जातहारिणी।
जब पति जातहारिणी से आक्रान्त स्त्री से संभोग करके अपनी पत्नी के पास जाता है तब उस समय जातहारिणी आक्रमण कर देती है ॥१२॥
गृहीतं जातहारिण्या गृहं नित्यं च वर्जयेत् ॥१३॥
आददानं ततः किञ्चिद्गृह्णीते जातहारिणी।
जातहारिणी से आक्रान्त घर का सदा त्याग कर देना चाहिये अन्यथा उस घर में से कुछ भी लेने वाले व्यक्ति को जातहारिणी ग्रहण कर लेती है अर्थात् उसे आक्रान्त कर देती है ॥१३॥
वधभेदाङ्करणैर्गवां बन्धनदोहनैः ॥१४॥
४१ का.सं.
२८८ काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम् रेवतीकल्पः ? ]
गोपालस्य प्रजा हन्ति गोमाता जातहारिणी । महिष्युष्ट्र्यजपालानामेवमेव प्रजाक्षयम् ।।१५।। करोत्यधर्मसंजाता प्रसक्ता जातहारिणी ।
गौओं के वध, अङ्गभेद तथा बन्धन, दोहन इत्यादि कारणों से जातहारिणी रूप गोमाता गौओं के पालन करने वाले (ग्वाले) की सन्तान का हनन कर देती है। इसी प्रकार अधर्म से उत्पन्न हुई जातहारिणी भैंस, ऊंटनी तथा बकरी के पालन करने वाले व्यक्तियों की भी सन्तान को नष्ट कर देती है ॥१४-१५॥
ब्रह्मस्वहारिणां लोके विषमाणां दुरात्मनाम् ।।१६।। तस्कराणां शठानां च प्रजा हन्त्युग्ररेवती ।
उग्रस्वरूप वाली रेवती लोक में ब्रह्म (ज्ञान) का हरण करने वाले विषम, दुष्ट, चोर तथा धूर्त व्यक्तियों की सन्तान को नष्ट कर देती है ॥१६॥
रसनाः पापकार्याणां दुष्कुला भिन्नसेतवः ।।१७।। ये भवन्त्यनयप्राया निर्दयाः सर्वजातिषु । अरक्षिणस्तीक्ष्णदण्डा वृद्धानां शासनातिगाः ।।१८।। अनपेक्षितवृत्तान्ता अधर्मस्य प्रवर्तकाः । राज्ञो यस्य च दौर्बल्यात् क्षयं यान्तीह च प्रजाः ।।१९।। गोब्राह्मणं विशेषेण हन्ति तं जातहारिणी ।
जो व्यक्ति पाप कार्यों में रत रहते हैं, नीच कुलवाले होते हैं, जो व्यक्ति मर्यादा का उल्लंघन करने वाले हैं जो अन्याय करते हैं और सम्पूर्ण जातियों के प्रति दयारहित होते हैं, जिनकी कोई रक्षा नहीं की जाती, जो तीक्ष्ण दण्डों को धारण करते हैं, जो वृद्ध व्यक्तियों के शासन (वश) में नहीं रहते, जिनका वृतान्त अपेक्षित नहीं होता, जो अधर्म के प्रवर्तक हों तथा जिस राजा की दुर्बलता के कारण प्रजा—विशेषकर गौ एवं ब्राह्मणों का नाश होता हो—उन्हें जातहारिणी नष्ट कर देती है ॥१७-१९॥
एवमेव दुरात्मानो राजमात्रा नृपाज्ञया ।।२०।। प्रजा यदा प्रबाधन्ते हन्ति ताञ्जातहारिणी ।
इसी प्रकार जब दुष्ट दुष्ट लोग राजा की आज्ञा से प्रजा को सताते हैं तब उन्हें जातहारिणी नष्ट कर देती है ॥२०॥
वणिक् पण्योपघाती यो यश्चाप्यस्य¹ प्रतीक्षकः ।।२१। अतिवार्धुषिकश्चैव हन्यन्ते बहुरूपया ।
जो बनिया बाजार का व्यतिक्रम करता है (अर्थात् Black marketing करता है) अथवा जो इसीका अनुगामी है, तथा जो अत्यन्त धन की वृद्धि का इच्छुक है वह अनेक रूपों वाली जातहारिणी के द्वारा विनष्ट हो जाता है ॥२१॥
कन्याया यश्च भूमेश्च हिरण्यस्याश्वरवाससाम् ।।२२।। कुर्वन्ति येऽनृतान्येषां (घातिनी) जातहारिणी ।
जो व्यक्ति कन्या, भूमि, स्वर्ण, अश्व तथा वस्त्रों के विषय में अनृत (असत्य) व्यवहार करते हैं—उन्हें जातहारिणी नष्ट कर देती है ॥२२॥
१. तदनुगामीत्यर्थः ।
रेवतीकल्पः ? ] कल्पस्थानम् २८९
सन्ध्ययोरप्सु रजसि शून्यदेवालयेषु च ।।२३।।
मैथुनं यान्ति ये मोहाद्धन्ति ताञ्जातहारिणी ।
जो व्यक्ति अज्ञानवश दोनों सन्ध्याओं में, नदी तालाब आदि के पानी में, धूल में तथा खाली मन्दिरों में मैथुन करता है—उन्हें जातहारिणी नष्ट कर देती है ॥२३॥
अधर्मद्वारमासाद्य यदा विशति रेवती ।।२४।।
नारीं तदा भवन्त्यस्या रूपाणीमानि जीवक ! ।
(इति ताडपत्रपुस्तके १७८¹ तमं पत्रम्)
हे जीवक ! उपर्युक्त अधर्मयुक्त मार्गों से जब रेवती स्त्री में प्रवेश करती है तब उसके शरीर के मलिन होने पर निम्न रूप (लक्षण) होते हैं ॥२४॥
प्रम्लायतस्तनोस्तस्या रूपाणीमानि, हीयते ।।२५।।
दृष्टिर्व्याकुलतां याति यथाकालं न पुष्यति । भ्रष्टसत्त्वा निरुत्साहा कुक्षिशूलनिपीडिता ।।२६।।
भवत्यप्रियरूपा च तैस्तै रोगैरुपद्रुता ।। विपरीतसमारम्भा विपरीतनिषेविणी ।।२७।।
उच्छिष्टा विकृता धृष्टा सर्वार्थेषु प्रवर्तते । अर्थसिद्धिर्न भवति संपच्चास्याः प्रलुप्यते ।।२८।।
गोजाविमहिषीष्वस्या न जीवन्ति च वत्सकाः । अयशः प्राप्नुते घोरं वैधव्यं वा निगच्छति ।।२९।।
कुलक्षयं वा कुरुते प्रसक्ता जातहारिणी ।
जातहारिणी के द्वारा उसके शरीर के म्लान होने पर निम्न लक्षण होते हैं—उसकी दृष्टि कमजोर हो जाती है, व्याकुलता रहती है, ठीक समय पर पोषण नहीं होता, उसका मन पतित हो जाता है, कार्य में उत्साह नहीं होता है, तथा वह कुक्षिशूल से पीडित रहती है । उसका रूप (आकृति) अप्रिय हो जाता है तथा अनेक प्रकार के रोगों से व्याप्त हो जाती है । उसके सब कार्यों के प्रारम्भ विपरीत होते हैं तथा वह विपरीत ही आचरण करती है । वह उच्छिष्ट, विकृत तथा धृष्ट होती है । सम्पूर्ण विषयों में वह प्रवृत्त हो जाती है । उसे अर्थ (धन) की प्राप्ति नहीं होती तथा उसकी सम्पत्ति (प्रशस्त गुण) लुप्त हो जाती है । इसकी गौ, बकरी, भेड़ तथा भैंस आदि के बच्चे जीवित नहीं रहते । उसे भयंकर अपयश प्राप्त होता है, वह विधवा हो जाती है तथा प्रसक्त हुई जातहारिणी उसके कुल का क्षय (नाश) कर देती है ॥२५-२९॥
शास्त्रतस्त्रिविधामाहुर्मुनयो जातहारिणीम् ।।३०।।
साध्यां याप्यामसाध्यां च तासां लक्षणमुच्यते ।।
शास्त्रों के अनुसार ऋषियों ने तीन प्रकार की जातहारिणियां कही हैं । १. साध्य २. याप्य ३. असाध्य । अब उ के लक्षण कहे जाते हैं ॥३०॥
आषोडशवर्षप्राप्ता या स्त्री पुष्पं न पश्यति ।।३१।।
प्रम्लानबाहुरुकुचा तामाहुः शुष्करेवतीम् ।।
पहले साध्य जातहारिणी (रेवती) के भेद तथा उनके लक्षण कहे जाते हैं—
१. मूलताडपत्रपुस्तके ७८-७९ पत्रयोः, ८०-८१ पत्रयोश्च मिथः पत्राङ्कव्यत्ययो दृश्यते, परं ग्रन्थसंलापने लेखकप्रमादाद्व्यत्ययमवधार्य सम्बद्धो ग्रन्थपौर्वापर्यविन्यासस्तदनुसारी पत्राङ्कविन्यासश्चात्र निर्दिष्टः ।
| २९० | काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम् | रेवतीकल्पः ? ] |
|---|
शुष्क रेवती के लक्षण—सोलह वर्ष की अवस्था तक भी जिस स्त्री को रजोदर्शन नहीं होता तथा जिसके बाहु एवं कुच (नितम्ब) पतले होते हैं उसे शुष्क रेवती कहते हैं ॥३१॥
विना पुष्पं तु या नारी यथाकालं प्रणश्यति ।।३२।।
कृशा हीनबला क्रुद्धा साऽपि चोक्ता कटम्भरा ।।
कटम्भरा के लक्षण—बिना रजोदर्शन के ही जो स्त्री उचित काल में नष्ट हो जाती है, जो कृश, हीनबल वाली एवं शुद्ध होती है उसे कटम्भरा कहते हैं ॥३२॥
वृथा पुष्पं तु या नारी यथाकालं प्रपश्यति ।।३३।।
स्थूललोमशगण्डा वा पुष्पघ्नी साऽपि रेवती ।।
पुष्पघ्नी के लक्षण—जिस स्त्री को यथासमय रजोदर्शन होता है परन्तु वह व्यर्थ (बिना फल वाला) होता है। जिसके गण्डस्थल (कपोल) स्थूल एवं लोम युक्त होते हैं उस रेवती को पुष्पघ्नी कहते हैं ॥३३॥
कालवर्णप्रमाणैर्या विषमं पुष्पमृच्छति ।।३४।।
अनिवित्तबलम्लानिर्विकुटा नाम सा स्मृता ।।
विकुटा के लक्षण—जिस स्त्री का पुष्प (ऋतुस्त्राव) काल वर्ण एवं प्रमाण से विषम हो अर्थात् विषम काल में, विषम वर्ण वाला तथा प्रारंभ में भी विषम हो। बिना कारण के ही जिसे बल एवं ग्लानि हो जाती हो उसे विकुटा कहते हैं ॥३४॥
अभीक्ष्णं स्त्रवते यस्या नार्या योनिः कृशात्मनः ।।३५।।
परिस्रुतेति सा ज्ञेया नारीणां जातहारिणी ।।
परिस्रुता के लक्षण—जिस कृश स्त्री की योनि से निरन्तर स्राव बहरा रहता है। उस जातहारिणी को परिस्रुता कहते हैं ॥
यस्यास्त्वालक्ष्यमालग्नमण्डं प्रपतति स्त्रियाः ।।३६।।
अण्डघ्नीमिति ह्याहुस्तां दारुणां जातहारिणीम् ।।
अण्डघ्नी के लक्षण—जिस स्त्री का लक्ष्ययुक्त तथा चिपका हुआ अण्ड (गर्भ) गिर जाता है—उस दारुण (भयंकर) जातहारिणी को अण्डघ्नी कहते हैं ॥३६॥
नातिनिर्वृत्तदेहाङ्गो यस्या गर्भो विनश्यति ।।३७।।
दुर्धरा नाम सा ज्ञेया सुघोरा जातहारिणी ।।
दुर्धरा के लक्षण—जिसके देह के अङ्ग अधिक प्रकट नहीं हुए हैं ऐसा गर्भ जिस स्त्री का नष्ट हो जाता है उस अत्यन्त भयंकर जातहारिणी को दुर्धरा कहते हैं ॥३७॥
सम्पूर्णाङ्गं यदा गर्भं हरते जातहारिणी ।।३८।।
कालरात्रीति सा प्रोक्ता दुःखात् स्त्री तत्र जीवतित ।।
कालरात्रि के लक्षण—जब जातहारिणी सम्पूर्ण अङ्गों वाले (अर्थात् पूर्ण रूप से बने हुए) गर्भ का हरण कर लेती है उसे कालरात्रि कहते हैं। इसमें स्त्री बड़े दुःख से जीवित रहती है ॥३८॥
यया विषज्जते गर्भः प्रतीतो वाऽथ मुच्यते ।।३९।।
रेवतीकल्पः ? ] कल्पस्थानम् २९१
स्त्रीविनाशाय सा प्रोक्ता मोहिनी जातहारिणी ।।
मोहिनी के लक्षण—जिसके द्वारा गर्भ आक्रान्त होता है अथवा वह अपने स्थान से मुक्त हुआ प्रतीत होता है उस जातहारिणी को मोहिनी कहते हैं । इससे स्त्री विनष्ट हो जाती है ॥३९॥
यस्या नस्पन्दते गर्भः स्तम्भनी नाम सा स्मृता ।।४०।।
स्तम्भनी के लक्षण—जिसका गर्भ स्पन्दन नहीं करता उसे स्तम्भनी कहते हैं ॥४०॥
उदरस्थो यया क्रोशेत् क्रोशना नाम सा स्मृता ।।
जिस जातहारिणी के कारण उदर में स्थित हुआ गर्भ आक्रोश करता है (चिल्लाता) है उसे क्रोशना कहते हैं ।
दशैता जातहारिण्यो जीवमानासु मातृषु ।।४१।।
असाध्याः पुष्पघातिन्यः साध्या गर्भोपघातिकाः ।।
इस प्रकार जीवित माताओं में ये दस जातहारिणियां कही गई हैं अर्थात् इनमें माताओं की मृत्यु नहीं होती । इनमें पुष्प (आर्तव) को नष्ट करनेवाली असाध्य होती है तथा गर्भ को नष्ट करने वाली साध्य होती हैं ॥४१॥
जायते तु मृतं नित्यं यस्या नार्याः सवे सवे ।।४२।।
नाकिनीमिति तां विद्याद्दारुणां जातहारिणीम् ।।
अब याप्य जातहारिणी के भेद एवं लक्षण कहे जाते हैं—नाकिनी का लक्षण—जिस स्त्री का गर्भ नित्य मृत उत्पन्न होता है उस दारुण जातहारिणी को नाकिनी कहते हैं ॥४२॥
जातं जातमपत्यं तु यस्याः सद्यो विनश्यति ।।४३।।
पिशाची नाम सा घोरा मांसादी जातहारिणी ।।
पिशाची का लक्षण—जिस स्त्री के पुत्र उत्पन्न होते ही नष्ट हो जाते हैं उस मांस भक्षण करनेवाली जातहारिणी को पिशाची कहते हैं ॥४३॥
द्वितीये दिवसे यक्षी, तृतीयेऽहनि चासुरी ।।४४।।
कलिनर्म चतुर्थेऽह्नि, पञ्चमेऽह्नि च वारुणी ।।
षष्ठेऽहनि स्मृता षष्ठी, सप्तमेऽहनि भीरुका ।।४५।।
अष्टमे दिवसे याम्या, मातङ्गी नवमेऽहनि ।।
दशमे भद्रकालीति, रौद्री त्वेकादशेऽहनि । द्वादशे वर्धिका प्रोक्ता, त्रयोदशे च चण्डिका ।।४६।।
कपालमालिनी नाम चतुर्दशे च रेवती । ततः पक्षात् परे काले विज्ञेया पिलिपिच्छिका ।।४७।।
जिस स्त्री के पुत्र जन्म के द्वितीय दिवस नष्ट हो जाते हैं, उसे यक्षी, तृतीय दिवस नष्ट हो जाने वाली को आसुरी, चतुर्थ दिवस नष्ट हो जाने वाली को कलि, पांचवें दिवस नष्ट हो जाने वाली को वारुणी, छठे दिवस नष्ट हो जाने वाली को षष्ठी, सातवें दिवस नष्ट हो जाने वाली को भीरुका, आठवें दिवस नष्ट हो जाने वाली को याम्या, नवें दिवस नष्ट हो जानेवाली को मातङ्गी, दसवें दिवस नष्ट हो जानेवाली को भद्रकाली, ११ वें दिवस नष्ट हो जानेवाली को रौद्री, १२ वें दिवस नष्ट हो जानेवाली को वर्धिका, १३ वें दिवस नष्ट हो जानेवाली को चण्डिका, १४ वें दिवस नष्ट हो जानेवाली रेवती को कपालमालिनी तथा एक पक्ष के बाद जिसका गर्भ नष्ट होता है उसे पिलिपिच्छिका कहते हैं ॥४४-४७॥
एताः षोडश निर्दिष्टा नामभिः कर्मभिः पृथक् । दारुणा जातहारिण्यो याप्या धर्मक्रियावताम् ।।४८।।
२९२ काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम् रेवतीकल्पः ? ]
इस प्रकार धर्म-कर्म से युक्त स्त्रियों में नाम एवं कर्म के अनुसार ये १६ प्रकार की दारुण याप्य याप्य जातहारिणियों का निर्देश किया गया है ॥४८॥
यस्यास्तु गर्भरूपाणि पञ्च षट् सप्त वा मुने ! । म्रियन्तेऽनन्तरं वश्या असाध्या जातहारिणी ॥४९॥
अब असाध्य जातहारिणियों के भेद एवं लक्षण कहे जाते हैं—
वश्या के लक्षण—जिस स्त्री के गर्भरूप बालक ५, ६ या ७ मास की अवस्था में नष्ट हो जाते हैं उसे वश्या नाम की असाध्य जातहारिणी कहते हैं ॥४९॥
म्रियन्ते दारका यस्याः कन्या जीवन्त्ययततः । कुलक्षयकरी नाम साऽसाध्या जातहारिणी ॥५०॥
कुलक्षयकरी का लक्षण—जिसके पुत्र मर जाते हैं तथा कन्याएँ बिना यत्न के भी जीवित रहती हैं उसे कुलक्षयकरी नाम की असाध्य जातहारिणी कहते हैं ॥५०॥
जातं जातमपत्यं तु यस्याश्च म्रियते स्त्रियाः । घोरा पुण्यजनी नाम साऽसाध्या जातहारिणी ॥५१॥
पुण्यजनी का लक्षण—जिस स्त्री की सन्तान उत्पन्न होते ही मर जाती है उसे भयंकर पुणजनी नाम की असाध्य जातहारिणी कहते हैं ॥५१॥
निष्पन्नं म्रियतेऽपत्यं यस्याः प्राक् षोडशाब्दतः । पौरुषादिनी सा प्रोक्ता असाध्या जातहारिणी ॥५२॥
पौरुषादिनी का लक्षण—जिसका पुत्र १६ वर्ष की अवस्था से पूर्व मर जाता है उसे पौरुषादिनी नाम की असाध्य जातहारिणी कहते हैं ॥५२॥
बिभर्त्यन्यं यदा गर्भं तदा पूर्वः प्रमीयते । संदंशीति वदन्त्येनामसाध्यां जात(हारिणीम्) ॥५३॥
इति ताडपत्रपुस्तके १७९ तमं पत्रम्)
संदंशी का लक्षण—जब स्त्री दूसरे गर्भ को धारण करती है तब उसका पहला गर्भ (पुत्र) नष्ट हो जाता है । तब उसे संदंशी नाम की असाध्य जातहारिणी कहते हैं ॥५३॥
गर्भेणैकं ग्रहेणैकं मृत्युनैकेन युज्यते । एषा कर्कोटोकीत्युक्ता दारुणा जातहारिणी ॥५४॥
कर्कोटकी का लक्षण—कभी व्यक्ति गर्भ, कभी ग्रह तथा कभी मृत्यु से युक्त हो जाता है । उस भयंकर जातहारिणी को कर्कोटकी कहते हैं ॥५४॥
यमजं म्रियते यस्या एकं वोभयमेव वा । तामाहुरिन्द्रवडवामसाध्यां जातहारिणीम् ॥५५॥
इन्द्रवडवा का लक्षण—जिसके एक या दोनों यमज (जुडवां-Twins) मर जाते हैं उस असाध्य जातहारिणी को इन्द्रवडवा कहते हैं ॥५५॥
एकनाभिप्रभवयोरेकश्चेन्म्रियते पुरा । म्रियते तद्गदप्येकस्तामाहुर्बडवामुखीम् ॥५६॥
बडवामुखी का लक्षण—एक नाभि से उत्पन्न होनेवाले अर्थात् यमज में से यदि एक की पहले मृत्यु हो जाय तो दूसरे की भी मृत्यु हो जाती है । उसे बडवामुखी कहते हैं ॥५६॥
अथैवंवदिनमृषिं कश्यपं लोकपूजितम् । पुनरेव महाप्रश्नमपृच्छद् वृद्धजीवकः ॥५७॥
इस प्रकार उपदेश करते हुए लोकपूजित महर्षि कश्यप से वृद्धजीवक ने पुनः निम्न प्रश्न किया ॥५७॥
रेवतीकल्पः ? ] कल्पस्थानम् २९३
एकनाभिकयोः कस्मात्तुल्यं मरणजीवितम्। रोगारोग्यं सुखं दुःखं न तु तृप्तिः समानजा ।।५८।।
एक नाभि से उत्पन्न होने वाले (अर्थात् यमल=जुड़वां-Twins) पुत्रों की तृप्ति-पोषण समान न होने पर भी मृत्यु जीवन, रोग, आरोग्य एवं सुख दुःख आदि समान क्यों होते हैं। अर्थात् उनमें से एक की मृत्यु होने पर दूसरे की भी मृत्यु इत्यादि क्यों हो जाते हैं जबकि उनको पोषण समान नहीं मिलता है ॥५८॥
अथ खलु भगवान् कश्यप उवाच-
एकमेव हि तद् बीजं भिन्नं वायुबलादथ ।
समानकर्मकत्वात् प्राङ्नाड्यैकत्वं च जन्म च ।।५९।।
तुल्यं निषेकाद् वृद्धेश्च जन्मनः स्तनसेवनात् ।।
तस्मातुल्यं वयः प्रोक्तं सुखं दुःखं भवाभवौ ।।६०।।
लक्षणाकृतिवर्णाङ्गबलप्रकृतितुल्यता ।। न तु तृप्तिविसर्गाणां पृथग्भावात् समानता ।।६१।। इति
भगवान् कश्यप ने उत्तर दिया—गर्भ में वह बीज एक ही होता है। वह समान कर्मों के कारण वायु द्वारा दो भागों में विभक्त हो जाता है। इन दोनों के नाडी तथा जन्म एक समान होते हैं। इनके निषेक (गर्भाधान), वृद्धि, जन्म तथा स्तनपान आदि तुल्य होने वय (अवस्था-Age), सुख, दुःख, भव (कल्याण-आरोग्य) तथा अभव (रोग) आदि सब समान होते हैं। इनके लक्षण, आकृति, वर्ण, अङ्ग, बल, प्रकृति आदि सब समान होते हैं। परन्तु पृथक् होने से उनकी तृप्ति (पोषण) तथा विसर्ग (मल-मूत्र आदि का त्याग) में समानता नहीं होती है ॥५९-६१॥
अथ खलु वृद्धजीवक ! त्रिविधैव जातहारिणी प्रोच्यते लोकभेदतः—दैवी, मानुषी, तिरश्चीनेति । तस्मात्रयो लोका भगवत्या रेवत्या बहुरूपया व्याप्ताः । इत्यतश्च सर्वलोकभयङ्करी रेवती पठ्यते । तां देवा अ(म)न्यन्त, तत एषां प्रजाः प्रावृध्यन्त; न एषां प्रजा विच्छेदगममत् । नास्य प्रजा विच्छिद्यते य एवं वेद । तामथ रेवतीं सर्वलोकगुरुमभिव्यापिकां सर्वर्षीणां कश्यप एवाग्रे तपसोग्रेणाऽविन्दत । तस्मै प्रजां बहुलामाशीरायुष्मतीमविच्छिन्नां प्रादात् । ततः सर्वेभ्योऽभ्यधिकोऽभवत् । रेवतीमेकशोऽभिज्ञश्च रेवतीकल्पं शिष्येभ्यः प्रादाज्जगद्धितार्थम् ।।६२।।
हे वृद्धजीवक ! लोक भेद से पुनः तीन प्रकार की ही जातहारिणियां कही गई हैं। १ दैवी २ मानुषी ३ तिरश्चीना (पशु-पक्षिसंबन्धी)। इस प्रकार तीनों लोक अनेक रूपों वाली भगवती रेवती के द्वारा व्याप्त हैं। इसलिये रेवती सम्पूर्ण लोकों में भयंकर कही जाती है। देवता उसका सम्मान करते हैं इसलिये उनकी सन्तानों की वृद्धि होती है। उनकी सन्तानों का विच्छेद (वियोग) नहीं होता है। जो इस तथ्य को जानता है उसकी सन्तान का विच्छेद नहीं होता। सम्पूर्ण लोकों की गुरु तथा व्यापक इस रेवती को सब ऋषियों से पूर्व महर्षि कश्यप ने ही उग्र तपस्या के द्वारा प्राप्त किया था। इससे रेवती ने कश्यप को आशीर्वाद दिया तथा उसके बहुत सारी आयुष्मती सन्तान हो गई जो अविच्छिन्न थी। इससे उसके सबसे अधिक सन्तान हो गई। रेवती को प्रकारान्तरूप (पूर्णरूप) से जानकर कश्यप ने लोक कल्याण के लिये शिष्यों को रेवतीकल्प का ज्ञान प्रदान किया ॥६२॥
अतो वृद्धजीवक ! निरुक्ता दैवी रेवती; मानुषीमत्र व्याख्यास्यामः—तत्र यथोक्तैरधर्मद्वारैर्यां यां स्त्रियमत्र प्रविशति, तां तां स्त्रियमनुवर्तयिष्यामः ।।६३।।
२९४ काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम् रेवतीकल्पः ? ]
इस प्रकार हे वृद्धजीवक ! दैवी रेवती का वर्णन कर दिया गया है। अब हम मानुषी रेवती का व्याख्यान करेंगे। यथोक्त अधर्म उपायों के द्वारा जिस २ स्त्री में वह प्रवेश करती है उस २ स्त्री का हम अनुवर्तन करेंगे ॥६३॥
कस्मिन् वयसि काले वा कस्मिन् कर्मणि वा मुने । स्त्रियमाविशते क्रुद्धा भगवञ्जातहारिणी ॥६४॥
हे भगवन् ! क्रुद्ध हुई जातहारिणी (रेवती) किस अवस्था काल तथा कर्म में स्त्री में प्रविष्ट होती है ॥६४॥
अथोवाच भगवान् कश्यपः— रजस्वलां गर्भिणीं वा प्रसूतां वा कुटीगताम् । स्त्रियमाविशते क्रुद्धा त्रिषु कालेषु रेवती ॥६५॥ न चाधर्ममृते नारीं विशते जातहारिणी । मातुः पितुः सुतानां च साऽधर्मेण प्रवर्तते ॥६६॥ ..................... मातृणां च प्रजाक्षयम् । आयुः क्षयं च बालानां करोत्येषा स्वकर्मजम् ॥६७॥
भगवान् कश्यप ने उत्तर दिया—क्रुद्ध हुई रेवती तीनों कालों में रजस्वला, गर्भिणी, प्रसूता तथा कुटी में स्थित अर्थात् कुटीप्रावेशिक नामक रसायन का प्रयोग करनेवाली स्त्रीमें प्रवेश करती है। यह जातहारिणी माता, पिता अथवा पुत्रों के अधर्म के बिना स्त्री में प्रविष्ट नहीं होती है। इसकी प्रवृत्ति का कारण अधर्म ही है। यह अपने कर्मों के कारण माताओं की सन्तान का तथा बालकों की आयु का नाश करती है ॥६५-६७॥
अथ खलु वृद्धजीवक ! इमाः स्त्रियश्चतुविधा जातहारिण्याविश्य स्त्रियमत्र प्रविशति । वर्णां, वर्णान्तरां लिङ्गिनीं, कारूकीमिति । ताः खल्वतो व्याख्यास्यामः । अथो वृद्धजीवक ! ब्राह्मणीं समाविष्टां गृहानागतां स्त्रीं प्रत्युपतिष्ठतेऽभिवादयते संव्यवहरते संवदन्ति संस्पृशति संभुङ्क्तेऽभिहन्त्याक्रोशत्युपशेते पदमृतुनिर्माल्यवासोलङ्कारमाक्रामति वा तस्या ब्राह्मणी जातहारिणी भवति । अथो आहुः—सैवैनां ब्राह्मणी ऋतुमतीमवसिञ्चेत् । सैव तत्र प्रायश्चित्तिः । स्वेनैवैनां भागधेयेन प्रजावतीं करोति । नास्या ब्राह्मणी जातहारिणी भवति, या एवं वेद । अथो वृद्धजीवक ! क्षत्रियां जातहारिणीं समाविष्टां गृहानागतां स्त्रियं प्रत्युपतिष्ठतेऽभिवादयते संव्यवहरते संवदति संस्पृशति संभुङ्क्तेऽभिहन्त्याक्रोशत्युपशेते पदमृतुनिर्माल्यवासोलङ्कारमा-
(इति ताडपत्रपुस्तके १८० तमं पत्रम् ।)
क्रामति वा तस्याः क्षत्रिया जातहारिणी भवति । अथो आहुः—सैवैनां क्षत्रिया ऋतुमतीमवसिञ्चेत्, सैव तत्र प्रायश्चित्तिः । स्वेनैवैनां भागधेयेन प्रजावतीं करोति । नास्याः क्षत्रिया जातहारिणी भवति, या एवं वेद । अथो वृद्धजीवक ! वैश्यां जातहारिण्याऽऽविष्ठामथो महाशूद्रीं स्त्रीं प्रत्युपतिष्ठतेऽभिवादयते संव्यवहरते संवदति संस्पृशति संभुङ्क्तेऽभिहन्त्याक्रोशत्युपशेते पदमृतुनिर्माल्यवासोलङ्कारमाक्रामति वा तस्या वैश्या जातहारिणी भवति, अथो शूद्रा, अथो महाशूद्री वा । अथो आहुः—सैवैनां वैश्याऽथो शूद्राऽथो महाशूद्री स्त्रियमृतुमतीमवसिञ्चेत् । सैव तत्र प्रायश्चित्तिः । स्वेनैवैनां भागधेयेन प्रजावतीं करोति । नास्या वैश्या वा शूद्रा वा महाशूद्रा वा जातहारिणी भवति, या एवं वेद । अथो वृद्धजीवक ! सूतमागधवेनपुक्कसाम्बष्ठप्राच्यकचण्डालमुष्टिकमेत(द)डोम्बडवाकद्रुमिसिंहलोड्रखशशकयवनपह्नवतुखा(षा)-रकम्बोजावन्त्यनेमकाभीरकहूणपारंशवकुलिन्दकिरातशवरशम्बरजा जातहारिण्यो भवन्ति । अथो आहुः—तामेवैनां(ना)स्तिकनिषादप्रभृतीनां वर्णसंकराणां वा या स्त्रियो जातहारिण्याऽऽविष्टा गृहाणीयुस्ताः स्त्रीः प्रत्युपतिष्ठते, अभिवादयते, अभिनन्दयते, संव्यवहरति, संवदति, संस्पृशति, संभुङ्क्तेऽभिहन्त्याक्रोशति, उपशेते पदमृतुनिर्माल्यवासोलङ्कारमाक्रामति वा तस्याः एता वर्णसंकरजा जातहारिण्यो भवन्ति । अथो
रेवतीकल्पः ? ] कल्पस्थानम् २९५
आहुः—तामेवैनां स्त्रियमृतुमतीमवसिञ्चेत् । सैव तत्र प्रायश्चित्तिः । स्वेनैवैनां भागधेयेन प्रजावतीं करोति । नास्या वर्णसङ्करा जातहारिणी स्त्री जातहारिणी भवति, या एवं वेद । अथो वृद्धजीवक ! लिङ्गिनी परिव्राजिका श्रमणका कण्डनी निर्ग्रन्थी चीरवल्कलधारिणी तापसी चरिका जटिनी मातृमण्डलिकी देवपरिवारिका वेक्षणिका वा जातहारिण्यो वा जातहारिण्याऽऽविष्टा वा गृहानुपेयात् तां प्रत्युपतिष्ठतेऽभिवादयते वा संव्यवहरते वा संस्पृशति संभुङ्क्तेऽभिहन्त्याक्रोशत्युपशेते पदमृतुनिर्मात्यवासोलङ्कारमाक्रामति वा तस्या लिङ्गिनी जातहारिणी भवति । अथो आहुः—सैवैनां लिङ्गिनी स्त्रियमृतुमतीमवसिञ्चेत् । सैव तत्र प्रायश्चित्तिः । स्वेनैवैनां भागधेयेन प्रजावतीं करोति । नास्या लिङ्गिनी जातहारिणी भवति, या एवं वेद । अथो वृद्धजीवक ! अयस्करी जातहारिण्याऽऽविष्टा कार्ष्णायसेनार्हेणे^१नाभ्यैत्यथो तक्षणी दारवेणाथो कुलाली मार्तिकेनाथो पदकरी चार्मणेनाथो मालाकारी मुक्तकुसुमेनाथो कुविन्दी तानुकेनाथो सौचिकी स्यूतेनाथो रजकी सुरक्तेनाथो नेजिका निर्णिंक्तेनाथो गोपी तक्रेणाथो कारुकुणी(की) स्वेनार्हेणेन जातहारिण्याविष्टा गृहानुपेयात् तां स्त्री प्रत्युपतिष्ठतेऽभिवादयते संव्यवहरते संवदति संस्पृशति संभुङ्केऽभिहन्त्याक्रोशत्युपशेते पदमृतुनिर्माल्यवासोलङ्कारमाक्रामति वा तस्याः कारुकुणी(की)जातहारिणी भवति । अथो आहुः—सैवैनां कारुकी स्त्रियमृतुमतीमवसिञ्चेत् । सैव तत्र प्रायश्चित्तिः । स्वेनैवैनां भागधेयेन प्रजावतीं करोति । नास्याः कारुकी जातहारिणी भवति, या एवं वेद ।।६८।।
(इति ताडपत्रपुस्तके १८१ तमं पत्रम् ।)
हे वृद्धजीवक ! ये स्त्रियां वर्ण (ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य तथा शूद्र वर्ण वाली), वर्णान्तरा (वर्ण संकर से उत्पन्न हुई), लिङ्गिनी तथा कारुकी आदि चार प्रकार की जातहारिणी स्त्रियों में प्रवेश करके पुनः स्त्रियों में प्रविष्ट होती है । उनका अब हम हम व्याख्यान करेंगे । जो स्त्री घरों में आई हुई तथा ब्राह्मणी जातहारिणी द्वारा आविष्ट स्त्री के पास बैठती है, उसका अभिवादन करती है, उससे व्यवहार करती है, उससे बोलती है, उसका स्पर्श करती है, उसके साथ बैठकर खाती है, उसे मारती है, उसे गाली देती है, उसके साथ सोती है, अथवा उसके पैर, ऋतु, माला, वस्त्र तथा अलंकारों पर आक्रमण करती है उस स्त्री में ब्राह्मणी जातहारिणी प्रवेश करती है । इसका प्रायश्चित (उपचार) यही है कि वही ब्राह्मणी इस ऋतुमती स्त्री का अवसिंचन करे । तथा अपने भागधेय (अंश) से उसे सन्तानयुक्त कर दे । जो इस तत्त्व को जानती है उसे ब्राह्मणी जातहारिणी आक्रान्त नहीं करती है । हे वृद्धजीवक ! जो स्त्री घर में आई हुई तथा क्षत्रिय जातहारिणी द्वारा आविष्ट स्त्री के पास बैठती है, उसका अभिवादन करती है, उससे व्यवहार करती है, उससे बोलती है, उसका स्पर्श करती है, उसके साथ बैठकर खाती है, उसे मारती है, उसे गाली देती है, उसके साथ सोती है अथवा उसके पैर, ऋतु, माला, वस्त्र तथा अलंकारों पर आक्रमण करती है उस स्त्री में क्षत्रिय जातहारिणी प्रवेश करती है । इसका प्रायश्चित (उपचार) यही है कि वह क्षत्रिय (स्त्री) इस ऋतुमती स्त्री का अवसिंचन करे, तथा अपने भागधेय (अंश) से उसे सन्तानयुक्त कर दे । जो इस तत्त्व को जानती है उसे क्षत्रिय जातहारिणी आक्रान्त नहीं करती । हे वृद्धजीवक ! जो जातहारिणी द्वारा आविष्ट वैश्या अथवा महाशूद्री स्त्री के पास बैठती है, उसका अभिवादन करती है, उससे व्यवहार करती है, उससे बोलती है, उसका स्पर्श करती है, उसके साथ बैठकर खाती है, उसे मारती है, उसे गाली देती है, उसके साथ सोती है अथवा उसके पैर, ऋतु, माला, वस्त्र तथा अलंकारों पर आक्रमण करती है उसे वैश्या, शूद्रा अथवा महाशूद्री जातहारिणी आक्रान्त करती है । इसका प्रायश्चित्त (उपचार) यही है कि वे ही वैश्या, शूद्रा अथवा महाशूद्री स्त्रियां इस ऋतुमती स्त्री
१. अर्हेणेन उपहारेणेत्यर्थः स्यात् ।
२९६ काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम् रेवतीकल्पः ? ]
का सिञ्चन करें। तथा अपने ही भागधेय (अंश) से इसे सन्तानयुक्त करें। जो इस तथ्य को जानती है उसे वैश्या, शूद्रा अथवा महाशूद्री जातहारिणियां आक्रान्त नहीं करतीं। हे वृद्धजीवक ! इसके अतिरिक्त सूत, मागध, वेन, पुक्कस, अम्बष्ठ, प्राच्यक, चण्डाल, मुष्टिक, मेत (द) डौम्ब, डवाक, द्रुमिड, सिंहल, उडू, खश, शक, यवन, पह्लव, तुखा (षा), र, कम्बोज, अवन्ती, अनेमक, आभीरक, हूण, पारश, वकुलिन्द, किरात, शबर तथा शम्बर आदि देशों में उत्पन्न होने वाली जातहारिणियां भी होती हैं। जो स्त्रियां इन नास्तिक निषाद आदि वर्णसंकर जातहारिणियों से आक्रान्त अथवा ग्रहण की हुई स्त्रियों के पास बैठती हैं, उनका अभिवादन करती हैं, उनसे व्यवहार करती हैं, उनसे बोलती हैं, उनका स्पर्श करती हैं, उनके साथ बैठकर खाती हैं, जिन्हें मारती हैं, उन्हें गाली देती हैं, उनके साथ सोती हैं, अथवा उनके पैर, ऋतु, माला, वस्त्र तथा अलंकारों पर आक्रमण करती हैं-उन्हें वे वर्णसंकर जातहारिणियां आक्रान्त कर देती है। उनका प्रायश्चित (उपचार) यही है कि ये वर्णसंकर स्त्रियां इस ऋतुमती स्त्री का अवसिंचन करें तथा अपने भागधेय (अंश) से उसे सन्तानयुक्त कर दें जो इस तत्त्व को जानती है उसे वर्णसंकर जातहारिणियां आक्रान्त नहीं करती हैं। हे वृद्धजीवक ! जब लिङ्गिनी, परिव्राजिका, श्रमणका, कण्डनी, निर्ग्रन्थी, चीरवल्कलधारिणी, तापसी, चरिका, जटिनी, मातृमण्डलिकी, देवपरिवारिका, वेक्षणिका, आदि जातहारिणियां अथवा इन जातहारिणियों से आक्रान्त स्त्रियां घरों में आयें-उन स्त्रियों के पास जो बैठती है, उनका अभिवादन करती है, उनसे व्यवहार करती है, उनसे बोलती है, उनका स्पर्श करती है, उनके साथ बैठकर खाती है, उन्हें मारती है, उन्हें गाली देती है, उनके साथ सोती है अथवा उनके पैर, ऋतु, माला, वस्त्र तथा अलंकारों पर आक्रमण करती है-उन्हें लिङ्गिनी जातहारिणी आक्रान्त कर देती है। उनका प्रायश्चित्त (उपचार) यही है कि वही लिङ्गिनी स्त्री इस ऋतुमती स्त्री का अवसिंचन करे तथा अपने भागधेय से इसे सन्तानयुक्त कर दे जो इस तत्त्व को जानती है उसे लिङ्गिनी जातहारिणी आक्रान्त नहीं करती है। हे वृद्धजीवक ! जब अयस्करी जातहारिणी से आक्रान्त स्त्री कृष्ण लोह के बने तथा तक्षणी (बढ़इन) दारव (लकड़ी के बने शस्त्र) सहित उपहार से, कुलाली (कुम्हारिन) मिट्टी के उपहार से तथा पदकरी (चमारिन-जूते बनाने वाली) चमड़े के, मालाकरी (माला बनाने वाली-मालिन) युक्तकुसुम के, कुविन्दी तानुक के, सौचिकी स्यूत के, रजकी (रंगरेजिन) अच्छी प्रकार रंगे हुए वस्त्र के, नेजिका (धोबिन) निर्णिंक्त के, गोपी (ग्वाले की स्त्री) तक्र के तथा कारुकुणी (की) आदि अपने २ उपहारों के सहित जातहारिणियों से आविष्ट हुई स्त्रियां घरों में आयें उन स्त्रियों के साथ जो स्त्री बैठती है, उनका अभिवादन करती है, उनसे व्यवहार करती है, उनसे बोलती है, उनका स्पर्श करती है, उनके साथ बैठकर खाती है, उन्हें मारती है, उन्हें गाली देती है, उनके साथ सोती है अथवा उनके पैर, ऋतु, माला, वस्त्र तथा अलंकारों पर आक्रमण करती है उसे कारुकुणी (की) जातहारिणी आक्रान्त करती है। इसका प्रायश्चित्त (उपचार) यही है कि वही कारुकुणी (की) इस ऋतुमती स्त्री का अवसिंचन करे तथा अपने भागधेय (अंश) से उसे सन्तानयुक्त कर दे। जो इस तत्त्व को जानती है उसे कारुकी जातहारिणी आक्रान्त नहीं करती है ॥
अत ऊर्ध्वं वृद्धजीवक ! तिरश्चीं जातहारिणीमनुव्याख्यास्यामः-पञ्चविधा ह्येषा प्रोच्यते । तद्यथा-शकुनी, चतुष्पदी, सर्पा, मत्सी, वनस्पतिरिति । ता एता प्रायेण सतामेव प्रसज्जन्ते । वृद्धजीवक ! ये शकुनीं वर्द्धन्तीं घ्नन्ति घातयन्ति वा तेषां शकुनिरूपा जातहारिणी प्रसज्जते महाग्रहः । सा काकी भासी कुक्कुटी मयूरी चाषी सारिका तैलपायिका उलूकी भोलन्तिका गृध्री श्येनी भारद्वाजी ततोऽन्यतमा वा भूत्वा स्वप्नेऽपूर्वान् दर्शयति, गर्भिणीं सूतिकां बिभीषयति, बालं चोत्रासयति, महावेगा महाप्राणा घोररूपा रौद्राऽनायतपक्षा वज्रतुण्डनखदशनदंष्ट्रा वैदूर्यज्वलनसदृशलोचना बहुविचित्रमहापत्रा कण्ठे कनकमणिविचित्रगुणधारिणी विविधकुसुमगन्धवसनमुसल्लोज्ज्वलधारिणी वरमुकुटा नूपुरकविकम्बूक-दाङ्ग(टका)दंकुण्डल-वामघण्टापताकाऽऽतपत्रोल्काविद्युन्मेघमालाऽलङ्कृता, भगवतः कुमारवरस्य ग्रानी
रेवतीकल्पः ? ] कल्पस्थानम् २९७
(?) च स्वसा च स्वप्ने धर्षयित्वारोगागममनन्तरमस्य करोति । ततो मध्याह्नेऽर्धरात्रे वा संध्ययोर्वा सुप्ते वा बालगृहे निलीयते यथोक्तानामेकतमा; ततो बाल उच्चैः क्रोशति रोदिति त्रसते वेपते बिभेति ज्वर्यते विह्वलति निस्तनति मुह्यति विस्खलति सूच्यते शून्यते विस्रंस्यते रोगैरन्यैश्चोपद्रूयते । या त्वभीक्ष्णं शकुनीं स्त्री स्वप्ने पश्यति ततः साऽस्याः शकुनी जातहारिणी सज्जते । तस्या एव शकुन्या निभीतस्या (निलीनाया ?) एव पुरीषेण पक्षोदकेन वैनां वृद्धस्त्री शकुनिना(नीं) स्त्रीं तत्रावासिञ्चेत् । सैव तत्र प्रायश्चित्तिः । स्वेनैवैनां भागधेयेन प्रजावतीं स्त्रियं करोति । नास्याः शकुनी जातहारिणी भवति या शकुनीं न हिनस्ति, या एवं वेद । अथो वृद्धजीवक ! ये गां घ्नन्ति घातयन्ति वा, गोमांसं चोपयुञ्जते तेषां गोमाता जातहारिणी प्रसज्जते । एषा एनां स्वप्नेऽभिद्रवति गोपालो वा वत्सकपालो वा; असाध्या तस्या गोमाता जातहारिणी प्रसज्जति । अथो आहुर्गोमध्ये एनां गोमूत्र पुरीषाभ्यामुपोषितां स्त्रापयेत्, सैव तत्र प्रायश्चित्तिः । स्वेनैवैनां भागधेयेन गौः प्रजावतीं करोति । नास्या गोमाता जातहारिणी भवति, या गां न हिनस्ति, या एवं वेद । एवमेव महिषीणामजानामविकानां गर्दभीनां श्राश्वत्तरीणामुष्ट्रीणां सूकरीणां मूषिकाणां शुनीनां गलगोलिकानां गोपानां विष्पम्भराणां मृगादीनां चैवमेष विधिरुक्तः ।। अथो वृद्धजीवक ! सर्पीं गृहचारिणीमगृहचारिणीं वा स्त्री हन्ति घातयति वा, तस्याः सर्पी जातहारिणी प्रसज्जतेऽथो विषमृत्युमस्याः प्रजाया आहुः । एनां वल्मीके नागकुले वा सिञ्चेदथो आहुर्वल्मीकशतमध्य इति । सैव तत्र प्रायश्चित्तिः । स्वेनैवैनां भागधेयेन प्रजावतीं करोति, नास्याः सर्पी जातहारिणी भवति । या सर्पान् न हिनस्ति, नास्याः प्रजाया विषमृत्युर्भवति या एवं वेद ।। अथो वृद्धजीवक ! या मत्स्यमकर-तिमिङ्गिलनक्रशङ्कशम्बूकसुखनकादीनिभूता-
(इति ताडपत्रपुस्तके १८२ तमं पत्रम्)
न्युदकचराणि हन्ति, तस्यास्तेनाधर्मेण रेवती क्रुद्धा प्रजा हिनस्ति; मत्सी वा मकरी शुक्तिः शङ्खी भूत्वा स्वप्ने पूर्वं हर्षयति, ततो हिनस्ति भूयिष्ठं; तस्या अप्सु प्रजा विनश्यति, जलत्रासेन एकैकरोगैर्वा । अथो आहुः—रोहिणीस्नानेनैवैनां प्रत्युदियात्, सैव तत्र प्रायश्चित्तिः । या मत्स्यान् न हिनस्ति नास्या मत्सी जातहारिणी भवति, या एवं वेद ।। अथो वृद्धजीवक ! ये वनस्पतीन् हिंसन्ति परिगृहीतानपरिगृहीतान् वा, तेषां वनस्पतिदेवता अभिक्रुद्ध्यन्ति । अग्निवैश्वानरो नाम, सोमः पितृमान्नाम, स्वधिति शिवो नाम, आपो वरुणो नाम, भूमिर्निर्ऋतिर्नाम, गौर्विद्युन्नाम, गौः श्लोको नाम, देव पव(मा)नो नाम, आदित्यः पूषा नाम, दिशः काष्ठा नाम, इन्द्रो वरुणो नाम, वायुः प्राणो नाम; ता वै द्वादश वनस्पतीनां देवताः । एता एव वनस्पतीन् घ्नन्ति । अथो आहुर्वनस्पतिमध्ये विवृक्षेषुता एव देवताः स्थालीपाकैर्यजेत् । अग्निमाज्येन, सोमं श्यामाकेन, शिवं पायसेन, आपो दध्ना, भूमिं सप्तान्नेकेन, ग्रामधूपैः गां वाऽग्निं पवमानं पिशितेन, पूषाणमन्नाद्यैः, दिशो मध्वैः, इन्द्रं हविष्यभोजनेनेति । अथो अस्या वनस्पतिदेवताः प्रजामेव प्रयच्छन्ति, या वनस्पतीन् न हिनस्ति । नास्या वनस्पतिदेवता जातहारिण्यो भवन्ति, या एवं वेदेति ।।६९।।
हे वृद्धजीवक ! इसके बाद अब हम तिरश्चीन (तिर्यक्जाति) जातहारिणियों का व्याख्यान करेंगे । ये पांच प्रकार की होती हैं—१. शकुनी २. चतुष्पदी ३. सर्पा ४. मत्सी तथा ५. वनस्पति । ये जातहारिणियां प्रायः सज्जन व्यक्तियों को ही आक्रान्त करती हैं । हे वृद्धजीवक ! जो वृद्धि को प्राप्त होते हुए शकुनी (पक्षी) की स्वयं हिंसा करते हैं अथवा दूसरों से हिंसा करवाते हैं उन्हें महाग्रह वाली शकुनीरूप जातहारिणी आक्रान्त करती है । वह शकुनी रूप जातहारिणी काकी,
२९८ काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम् रेवतीकल्पः ? ]
भासी, कुक्कुटी, मयूरी, चाषी, सारिका, तैलपायिका, उलूकी, भोलन्तिका, गृध्री, श्येनो, भारद्वाजी आदि पक्षियों अथवा अन्य रूपों को धारण करके स्वप्न में अपूर्व (पहले कभी न देखी हुई) आकृतियों को दिखाती है, गर्भिणी तथा सूतिका स्त्री को भय दिखाती है (डराती है), बालक को संत्रस्त करती है, तथा महावेग, महाप्राण, भयंकर रूप, भयावनी, अनायतपक्षा (जिसके पंख विस्तृत नहीं है), वज्र के सदृश सुदृढ नख, दांत तथा दंष्ट्रा वाली, वैदूर्य मणि की ज्वाला के समान नेत्रों वाली, अत्यन्त विचित्र तथा बड़े पत्र (पंखों) वाली, गले में सोने तथा मणि की विचित्र माला को धारण करने वाली, विविध प्रकार के पुष्प, गन्ध, वस्त्र, मुसल तथा उज्ज्वल पदार्थों को धारण करने वाली, श्रेष्ठ मुकुट वाली तथा नूपुरक, विकम्बूकत, अङ्गद, कुण्डल, वामघण्टा, पताका, आतपत्र, उल्का, विद्युत्, एवं मेघमाला आदि से अलंकृत भगवान् कार्तिकेय की ग्रानी (?) तथा बहन स्वप्न में डराकर बाद में रोगों को उत्पन्न कर देती है। उसके बाद उपर्युक्त जातहारिणियों में से कोई एक मध्याह्न, अर्धरात्रि, सन्ध्या समय अथवा सोने के बाद बालगृह में छिपकर स्थित हो जाती है। इससे बालक उच्चस्वर से चिल्लाता है, रोता है, डरता है, कांपता है तथा भयभीत होता है। उसे स्वर हो जाता है, वह विह्वल होता है, लम्बे २ सांस लेता है, मोहित हो जाता है, लड़खड़ाता है, दुःखी होता है, शून्य के समान हो जाता है, उसे मल आदि का स्राव होने लगता है तथा उसे उपद्रव स्वरूप अन्य रोग भी घेर लेते हैं। इस प्रकार जो स्त्री स्वप्न में निरन्तर शकुनी को देखती है, उस पर यह शकुनी नाम की जातहारिणी आक्रमण कर देती है। उसका यही प्रायश्चित है कि शकुनी नामक्क जातहारिणी से आक्रान्त स्त्री को कोई अन्य वृद्ध स्त्री उस शकुनी (पक्षी) के घोंसले में स्थित पुरीष (मल) तथा पक्षोदक (पंखों में लगे हुए पानी) के द्वारा सिंचन करे तथा वह अपने भागधेय (अंश) से उसे सन्तानयुक्त कर दे। जो इस प्रकार जानती है तथा शकुनी (पक्षी) की हिंसा नहीं करती उसे शकुनी नामक जातहारिणी आक्रान्त नहीं करती। हे वृद्धजीवक ! जो स्त्री गौ की स्वयं हत्या करती है अथवा दूसरों से हत्या करवाती है तथा गोमांस का प्रयोग करती है उन पर जातहारिणी का रूप धारण करके गोमाता आक्रमण कर देती है तथा यह जातहारिणी स्वप्न में गौओं अथवा बछड़ों की पालना करने वाले ग्वाले को दौड़ाती है। इस पर गोमाता रूप असाध्य जातहारिणी आक्रमण कर देती है। इसका यही प्रायश्चित्त है कि इस स्त्री को गौओं के बीच में बिठाकर गौओं के मूत्र तथा पुरीष (गोबर) के द्वारा स्नान कराये। उस स्त्री को गौ माता अपने भागधेय (अंश) से युक्त करती है। जो इस तथ्य को जानती है तथा गौ की हत्या नहीं करती उसे गोमाता रूप जातहारिणी आक्रान्त नहीं करती है। इसी प्रकार भैंस, बकरी, भेड़, गधी, खच्चरी, ऊंटनी, सूअरी, चुहिया, कुतिया, गलगोलिका (विषयुक्त कीट विशेष), गोप (ग्वाले), विश्वम्भर (सौम्य कीट विशेष) तथा मृग आदि पशुओं की भी यही उपर्युक्त ही विधि कही गई है। हे वृद्धजीवक ! जो स्त्री घर में अथवा घर से बाहर विचरण करने वाली सर्पिणी की स्वयं हत्या करती है अथवा दूसरों से हत्या करवाती है उस पर सर्पिणी रूप जातहारिणी आक्रमण कर देती है। इसकी सन्तान की विष से मृत्यु हो जाती है। इसका यही प्रायश्चित्त है कि सौ बांबियों के मध्य में वल्मीक (वांबी) अथवा नागकुल में इसका सिञ्चन करना चाहिये। वह सर्पिणी रूप जातहारिणी इस स्त्री को अपने अंश से सन्तान युक्त कर देती है। जो इस तथ्य को जानती है तथा सांपों की हिंसा नहीं करती, उसे सर्परूप जातहारिणी आक्रान्त नहीं करती तथा उसकी सन्तान की विष से मृत्यु नहीं होती। हे वृद्धजीवक ! जो स्त्री मत्स्य, मकर (मगरमच्छ), तिमिङ्गिल, नक्र (नाका), शङ्ख (घोंघा) शम्बूक्त तथा सुखनक आदि जलचर प्राणियों की हत्या करती है, उसके इस अधार्मिक कृत्य से क्रुद्ध हुई रेवती उसकी सन्तान का हनन करती है। स्वप्न में मछली, मगरमच्छी, शुक्ति अथवा शङ्खी का रूप धारण करके पहले हर्ष उत्पन्न करती है। तदनन्तर अत्यन्त हनन करती है (कष्ट पहुंचाती है) उसकी सन्तान का जलत्रास (Hydrophobia) अथवा अन्य रोगों से जल में नाश होता है (मृत्यु होती है)। इसका यही प्रायश्चित्त है कि रोहिणी स्नान के द्वारा इसका उपाय करे। जो इस तथ्य को जानती है तथा मछलियों की हिंसा नहीं करती उसे मत्सी जातहारिणी आक्रान्त नहीं करती। हे वृद्धजीवक ! जो स्त्री ग्रहण की हुई अथवा ग्रहण न की हुई वनस्पतियों
रेवतीकल्पः ? ] | कल्पस्थानम् | २९९
की हिंसा करती है उससे वनस्पति देवता क्रुद्ध हो जाते हैं। वैश्वानर नाम वाला अग्नि, पितृमातृ नाम वाला सोम, शिव नाम वाला स्वधा, वरुण नाम वाला अप् (जल), निर्ऋति नाम वाली भूमि, वियत् नाम वाली गौ, श्लोक नाम वाली गौ, पवित्र करने वाला वायु, पूषा नाम वाला आदित्य, काष्ठा नाम वाली दिशायें, वरुण नाम वाला इन्द्र तथा प्राण नाम वाला वायु इत्यादि ये १२ वनस्पतियों के देवता माने जाते हैं। ये देवता वनस्पतियों की हत्या करने वालों का हनन कर देते हैं। इनके उपचार के लिये वनस्पतियों अथवा वृक्षों के समूह के मध्य में इन्हीं देवताओं की स्थालीपाक के द्वारा पूजा करे। अग्नि देवता की घृत के द्वारा, सोम देवता की श्यामाक (धान्य विशेष) के द्वारा, शिव की दूधद अथवा खीर के द्वारा, जल देवता की दही के द्वारा, भूमि देवता की सप्तान्न के द्वारा, गौ अथवा अग्निदेवता की ग्रामधूपों के द्वारा, पवमान (वायु) की पिशित (मांस) के द्वारा, पूषा देवता की अन्न आदि के द्वारा, दिशाओं की मध्यों के द्वारा तथा इन्द्र देवता की हविष्य भोजन के द्वारा आराधन करना चाहिये। जो वनस्पतियों की हिंसा नहीं करती हैं उनको ये वनस्पति देवता सन्तान से युक्त करती हैं। जो इस तथ्य को जानती है उनके लिये ये वनस्पति देवता जातहारिणी (उत्पन्न हुए को मारने वाले) नहीं होते ॥६९॥
तत्र श्लोकाः—
अधर्मस्यातिसंवृद्ध्या रेवती लभतेऽन्तरम् ।
लब्ध्वाऽन्तरमतिक्रुद्धा नानारूपैर्यथोदितैः ॥ ७० ॥
अन्यैश्च दारुणतरैस्ततो हन्ति प्रजा इमाः ।
यौगपद्येन भार्या वा म्रियन्ते वा पृथक् पृथक् ॥ ७१ ॥
अधर्म की वृद्धि के कारण रेवती अन्तर (अवकाश छिद्र अथवा दोषों) को प्राप्त करती है तथा दोषों को प्राप्त करके क्रुद्ध होकर ऊपर वर्णित किये हुए अथवा वर्णित न किये हुए भी अनेक प्रकार के रूपों को धारण करके इनकी सन्तानों की हत्या करती है। उसी के साथ अथवा उससे पृथक् स्त्री की भी मृत्यु हो जाती है ॥७०-७१॥
ग्रस्तस्य जातहारिण्या शिशो रूपाणि मे शृणु ।
सद्यो रूपं तु तत्तै्रकं यदुच्चैस्त्रस्तवा¹शितम् ॥ ७२ ॥
स्तन्यदूषणमेवाग्रे ज्वरस्तन्द्री प्रमीलकः ।
शिरोभितापो वैवर्ण्यं भृशं वा पाण्डुपीतता ॥ ७३ ॥
तृष्णाऽतिसारो वैस्वर्यं तालुशोषः प्रहर्षणम् ।
मुखपाको मुखस्फोटौ वैसर्पः पाण्डुकामले ॥ ७४ ॥
जागर्ति रोदिति भृशं पीड्यते च मुहुर्मुहुः ।
श्वसते कासते क्षौति शीतीभवति च क्षणात् ॥ ७५ ॥
निश्चेष्टो मृतकल्पश्च मुहुः स्थित्वा प्रचेष्टते ।
न पुष्यति यथाकालं स्तनं न प्रतिनन्दति ॥ ७६ ॥
अपूर्वं च जनं दृष्ट्वा भृशमुद्विजते शिशुः ।
बिडालनकुलाखूनां शब्देनाशु प्ररोदिति ॥ ७७ ॥
मृदुनाऽपि च रोगेण पीडामाप्नोति दारुणाम् ।
अभीक्ष्णं त्रसते सुप्तो न शर्म लभते सुखात् ॥ ७८ ॥
जातहारिणी से आक्रान्त शिशु के लक्षणों को तू मेरे से सुन-उसका तात्कालिक रूप तो यही होता है कि शिशु भय सहित उच्चस्वर से रोता है। तथा उसके बाद स्तन्य (दूध) का दूषित होना, ज्वर, तन्द्रा, प्रमीलक (मूढता), शिरोभिताप, विवर्णता,,अत्यन्त पाण्डु एवं पीलापन, तृष्णा, अतिसार, विकृतस्वर, तालुशोष, प्रहर्ष, मुखपाक, मुखस्फोट, विसर्प, पाण्डु, कामला आदि हो जाते हैं तथा बालक बहुत अधिक जागता रहता है, रोता है, उसे बार २ अत्यन्त पीड़ा होती है। उसे श्वास तथा कास रोग हो जाते हैं। वह छींकता है तथा क्षणभर में ठण्डा पड़ जाता है। वह निश्चेष्ट एवं मृततुल्य हो जाता है तथा कुछ देर बाद उसे संज्ञा प्राप्त होती है। उसका ठीक समय पर पोषण नहीं होता तथा वह दूध से प्रसन्न नहीं होता। वह बालक जब किसी अपरिचित व्यक्ति को देखता है तो अत्यधिक डर जाता है।
१. सत्रासं रोदनमित्यर्थः।
| ३०० | काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम् | रेवतीकल्पः ? ] |
|---|
विडाल (बिलाव), नेवले तथा चूहों के शब्दों को सुनकर वह शीघ्र ही रोने लगता है। बहुत स्वल्प (मामूली) रोग से भी उसे भयंकर पीड़ा होती है। वह निरन्तर डरता रहता है तथा सोने पर उसे सुख (आराम) नहीं मिलता ॥७२-७८॥
रूपाण्येतानि संलक्ष्य भेषजं न पृणोति यः । सोऽपत्यैः कुरुते कार्यं स्वप्रलब्धैर्धनैरिव ॥७९॥
जो उपर्युक्त लक्षणों को देखकर इनकी चिकित्सा नहीं कराता, उसकी सन्तान उसी प्रकार नष्ट हो जाती है जिस प्रकार स्वप्न में प्राप्त हुए धन नष्ट हो जाते हैं ॥७९॥
अत ऊर्ध्वं वरणबन्धमुपक्रमिष्यामः । बन्ध्यो हि गर्भिण्याः क्षयति प्रागष्टमान्मासात्, अत ऊर्ध्वं प्रतिषेधस्तस्यान्यत्र । वृद्धजीवक ! श्रद्दधानानां
(इति ताडपत्रपुस्तके १८३ तमं पत्रम् ।)
धर्मक्रियावतां त्रिरात्रोपोषितानां भिषक् छुचिरुपोषितः प्रजावरणं बध्नीयात्; बद्धे चैनां दक्षिणाभिरिष्टाभिरर्चेत्, सा ह्यास्याः प्रजाः प्रयच्छति । तत्र संभारा रोहिणीस्नान स्नाता । स्नपनमप्येके रात्रौ चेत् कुर्याद् गृहेषु, दिवा चेदरण्येऽनुगुप्तमुभयं दिग्बन्धं कृत्वाऽऽत्मर क्षामत्र विधायोद्यारभेत् तत्कर्म । अथ शुचौ देशे गोचर्ममात्रं गोमयेनाद्भिborderश्च स्थण्डिलमुपलिप्य भिषगहतवासाः स्नातोऽलङ्कृतः प्राङ्मुख उपस्पृश्योद्धृतहस्तस्तूष्णीमुपस्पृशेदशब्दवतीभिरफेनाभिरनुष्णाभिरद्भिर्ब्राह्मेण तीर्थेन त्रिः प्राश्नीयात्, द्विरोष्ठौ परिमृजेत्, तत्रित्रित्येके । अक्षिणी कर्णौ नासिकेऽप्यपानं चोपस्पृशेत् । दुव्य(दृश्ये)महति सूर्ये स्थण्डिलमभ्युक्ष्य, हिरण्यपाणिर्दर्भपिञ्जूलीनां गर्भवर्तीं गृहीत्वा, तया लक्षणमुल्लिख्य दर्भपिञ्जूलीमभ्युक्ष्य बहिर्निर्स्यति, तत्राग्निं प्रणयति । यथापूर्वोक्तं परिसमूह्य, परिसंमृक्ष्य, प्रदक्षिणं बर्हिषा परिस्तीर्याग्नेः पुरस्तात् काञ्चनीं राजतीमुशीरमयीं दर्भमयीं वा प्रतिकृतिं प्रतिष्ठाप्य कुमारं षष्ठीं विशाखं च, दक्षिणतो ब्रह्माणमुत्तरत उदपात्रं, द्वाभ्यां दर्भाभ्यामच्छिन्नाग्राभ्यां समाभ्यां विष्टरबद्धाभ्यामाज्यमुत्पूय, आज्यमसि देवभोजनमसि तेजोऽसि चक्षुरसि श्रोत्रमसीन्द्रियमस्यायुरसि सत्यमसि हविरसीति । अथ जुहोति दर्भश्रुवेण आघारौ हुत्वा गर्भिणीं स्त्रियं स्नातामुषितां शुक्लवसनोपसंवीतामलङ्कृतां दक्षिणत उदङ्मुखीं सुखे पीठेऽथोपवेश्य द्वौ दर्भौ हस्ते दत्त्वा, सा तूष्णीमासीत । अथ भिषगनुज्ञातो नित्यं होमं हुत्वाऽऽज्यभागौ हुत्वा मातङ्ग्या विद्यया जुहुयात् । मातङ्गी नाम विद्या पुण्या दुःस्वप्नकलिरक्षोघ्नी पापकल्मषाभिशापमहापातकनाशनी पातकी ब्रह्मर्षिराजर्षिसिद्धचारणपूजिताऽर्चिता मतङ्गेन महर्षिणा कश्यपपुत्रेण कनीयसा महता तपसोग्रेण पितामहादेवासादिता सर्वभयनाशनी सर्वलोकवशीकरणी स्वस्तिककरणी शान्तिकरी प्रजाकरी बन्धनी विमला अमोघकल्याणी; य इमां विद्यां शुचिरावर्तयतिं सन्ध्ययोः पूतो भवति, नास्य सर्वभूतेभ्यो भयं भवति; य एनां शुचिरहन्यहनि जपति बहुपुत्रो बहुधन आयुष्माननमीवा सिद्धार्थश्च भवति, य इमां विद्यां श्राद्धे आवाहयत्यक्षयमस्य पितरश्च श्राद्ध अवतार्यन्ते । य इमां गोमध्ये जपेद् बह्व्योऽस्य भवन्ति गावः । य इमां स्त्रियमृतुस्नातां श्रावयते गर्भिणी भवति । य इमां गर्भिणीं श्रावयति पुत्रवती भवति । य इमां कृच्छ्रप्रसवां श्रावयत्याशु मुच्यते । य इमां म्रियमाणपुत्रां श्रावयति जीवत्पुत्रा भवति । यत्र चैव वेश्मनि सर्पान् रक्षांसि च गुह्यकान् वा विद्यात् तत्र सर्षपानष्टशताभिमन्त्रितानवकिरेत्, सर्वे नश्यन्ति । यो वा द्विष्यात् तस्य वा द्वारेऽवकिरेद्यः पूर्वमाक्रामति, स आर्तिमाप्नोति । दुर्गेषु जपत्तस्तस्कर-
(इति ताडपत्रपुस्तके १८४ तमं पत्रम् ।)
रेवतीकल्पः ? ] कल्पस्थानम् ३०१
मृगव्यालभयं न भवति । रूपे रूपेऽश्वमेधफलमवाप्नोति । सर्वतीर्थेषु स्नातो भवति । सर्वोपवासाः कृताभवन्ति । सर्वाणि दानानि दत्तानि भवन्ति । अर्थविद्या, नचैतामूहैत् । नमो मातङ्गस्य ऋषि(वर्य)स्य सिद्धकस्य नम आस्तीकस्य, तेभ्यो नमस्कृत्या इमां विद्यां प्रयोजयामि, सा मे विद्या समृद्धयतां, सत्यव हिलि मिलि महामिलि कुरुट्टा अट्ठे ममटे तुम्बिपसे करटे गन्धारि केयूरि भुजङ्गमि ओजहारि सर्पच्छेदनि अलगणिलगणि पंसुमसि कक्किकाकण्डि हिलि हिलि बिडि बिडि अट्ठे मट्टे अजिहट्टे कुक्कुक्कुक्कुमति, स्वाहा । इत्येतया मतङ्गविद्यया शमीमयीनां समिधानमष्टशतं पालाशीनामश्वत्थमयीनामष्टशतं श्वेतानां पुष्पाणामष्टशतं सर्षपाणामग्निवर्णानामष्टशतं घृतं तैलं वसामित्युपकल्प्य, समध्वज्यमैकध्यमालोड्य, युगपत्तिस्त्रः समिधो हुत्वा मन्त्रान्ते चाज्यंजुहोति; एवमष्टशतं हुत्वा प्रतिसरं लक्ष्मणापुत्रञ्जीवफल-समुद्रफेनप्रतिग्रथिता(तं) लम्बा(म्बं)ग्रहणीवासुशुक्तिजीवोर्णानां रुद्रमातङ्ग्या विद्ययाऽभिमन्त्र्य कण्ठे विसर्जयेत् । अथैषा विद्या रुद्रमातङ्गी भवति । नैनामूहेत् । नमो भगवतो रुद्रस्य मातङ्गि कपिले जटिले रुद्रशामे रक्ष रक्षेमं रिरक्षुमाज्ञापयेति स्वाहा । इत्येतया रुद्रमातङ्ग्या प्रतिसरं बध्नीयात् । बद्धे प्रतिसरे प्रजावरणं बद्धं भवति । नास्याः सर्वभूतेभ्यो भयं भवति, आशा समृद्धयते, जीवत्पुत्रा सुभगा चाविधवा च भवति । ततः स्विष्टकृतं हुत्वा, यथा पूर्वोक्तं शान्तिं जपित्वा, महाव्याहृतिभिर्हुत्वा, देवतामभ्यर्च्य, विसर्ज्य, बलिं कृत्वाऽग्निमभ्युक्ष्य, तूष्णीं ब्राह्मणान् साधून् पुत्रवत आयुष्मतश्चान्नवासोदक्षिणाभिरभ्यर्च्य, तत उपवसेत् । तत्स्र्वमाह¹वनमुपसंगृह्य चतुष्पथे वोदके वा क्षीरवृक्षे वा निदधाति । एवमेतेन विधिना प्रजावरणं बद्धं भवति, नास्याः प्रजा न भवतीत्याह भगवान् कश्यपः ।। अत ऊर्ध्वं सप्तरात्रं प्राजापत्यं चरुं पयसि शृतं प्रजापतये जुहुयात्, पूर्वोक्तं गोघृतमित्येके । प्रजाकामपशुकामाऽऽयुष्कामानामिति वा ।।८०।।
अब हम वरण बन्ध का वर्णन करेंगे । (जिस बन्धन के द्वारा गर्भ स्थित होता है तथा गर्भपात का भय नहीं रहता उस बन्धन को वरणबन्ध कहते हैं) गर्भिणी स्त्री को आठवें मास से पूर्व यह बन्ध लगाना चाहिये । इसके बाद इसका निषेध किया गया है । हे वृद्धजीवक ! जो पवित्र है तथा जिसने उपवास किया है ऐसा वैद्य श्रद्धा करने वाली तथा धर्मयुक्त आचरण करने वाली स्त्रियों को तीन दिन तक उपवास कराकर उनमें प्रजावरण (सन्तान को स्थिर करने वाला) बन्ध बांधे । तथा बन्धन बांधने के बाद इष्ट दक्षिणाओं के द्वारा उसकी अर्चना करे । इससे उसे सन्तान की प्राप्ति होती है । इसमें संभारा तथा रोहिणी नक्षत्र में स्नान करना चाहिये । कुछ लोग कहते हैं कि स्नान भी यदि रात्रि में किया जाय तो घर के अन्दर करना चाहिये तथा यदि दिन में करे तो जंगल में करना चाहिये । परन्तु दोनों अवस्थाओं में स्नान का कार्य गुप्तरूप से तथा दिग्बन्ध (चारों ओर दिशाओं का बन्धन करके अर्थात् चारदिवारी के अन्दर बन्द होकर) द्वारा अपने को सुरक्षित करके करना चाहिये । इसके बाद पवित्र स्थान में गोबर तथा पानी के द्वारा गोचर्म² प्रमाण (२१०० हाथ लम्बा) वेदी को लीप कर नवीन वस्त्र पहन कर स्नान करके तथा अलंकृत होकर वैद्य पूर्व दिशा की ओर मुख करके आचमन करे तथा ऊपर हाथ उठाये हुए और शान्त हुए शब्द एवं झागरहित तथा शीतल जल के द्वारा अङ्गस्पर्श करे तथा ब्राह्म तीर्थ के द्वारा तीन बार भक्षण करके दो बार ओष्ठों का परिमार्जन करे । कुछ लोगों के मत में तीन वार ओष्ठों का परिमार्जन करना चाहिये । दोनों चक्षु, दोनों कर्ण, दोनों नासिका तथा गुदा का स्पर्श करे । फिर महान् सूर्य के दिखाई देने पर वेदी पर जल के छींटे देकर हिरण्यपाणि (हाथ में स्वर्ण अथवा स्वर्णमय पदार्थ युक्त) होकर दर्भपिञ्जुलि (कुश के गुच्छे-Bunch
१. आहवनं हवनोपकरणमिति यावत् । २. गोचर्म—२१०० हाथ लम्बा चौड़ी भूमि को कहते हैं— सप्तहस्तेन दण्डेन त्रिंशद्दण्डैर्निवर्तनम् । दश तान्येव गोचर्म दत्त्वा स्वर्गे महीयते ॥ अर्थात् ७×३०×१०=२१०० हाथ (अनुवादक)
| ३०२ | काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम् | रेवतीकल्पः ? ] |
|---|
of qrass) युक्त गर्भवती को लेकर तथा उसके द्वारा लक्षणों को लिखकर दर्भपिञ्जुलि को जल के छींटे देकर बाहर आ जाये तथा अग्नि को नमस्कार करे। फिर पूर्वोक्तानुसार सब सामान एकत्रित करके तथा उन्हें पवित्र करके तथा बर्हि (कुश) के द्वारा चारों ओर प्रदक्षिणा कर के अग्नि के सामने स्वर्ण, रजत (चांदी), खस अथवा दर्भ की बनी हुई कुमार, षष्ठी अथवा विशाख की प्रतिकृति (मूर्ति) स्थापित कर के तथा दक्षिण की ओर यज्ञ के ब्रह्मा तथा उत्तर की ओर जलपात्र को रखकर जिनके अग्रभाग कटे हुए नहीं हैं, जो सम हैं, ऐसे तथा परस्पर बंधे हुए दोनों दर्भों के द्वारा वृत को पवित्र कर के ‘आज्यमसि, देवभोजनमसि, तेजोऽसि, चक्षुरसि, क्षोत्रमसि, इन्द्रियमसि, आयुरसि, सत्यमसि, हविरसि, इत्यादि बोले। तथा दर्भस्रुवों (दर्भ की बनी हुई स्रुवाओं) के द्वारा $^१$आधारों (अग्नि के एक स्थान से दूसरे स्थान तक मन्त्रोच्चारण पूर्वक घृत का डालना) में आहुति देकर हवन करे। तदनन्तर स्नान एवं उपवास कर के तथा शुक्ल वस्त्रों को पहन कर अलंकृत हुई गर्भवती स्त्री को दक्षिण की ओर से उत्तर की ओर मुख कर के सुखकारक पीठ (आसन) पर बिठाकर हाथ में दो दर्भ देवे। वह गर्भवती स्त्री शान्त बैठी रहे। इसके बाद आज्ञा लेकर वैद्य नित्य होम कर के उसमें आज्यभाग डालकर मातङ्गी विद्या के द्वारा आहुति डाले। मातङ्गी नामक पुण्यकारक, दुःस्वप्न, कलि (रोग) तथा राक्षस (कृमि) आदियों को नष्ट करनेवाली पाप, कल्मष (पाप विशेष), अभिशाप तथा महान् पापों को नष्ट करनेवाली, पातक, ब्रह्मर्षि, राजर्षि, सिद्ध एवं चारणों के द्वारा पूजित एवं अर्चित विद्या को कश्यप के कनिष्ठ पुत्र महर्षि मातङ्ग ने महान् एवं उग्र तपस्या के द्वारा सीधा पितामह ब्रह्मा से प्राप्त किया था। यह विद्या, सम्पूर्ण भयों को नष्ट करनेवाली, सम्पूर्ण लोकों को वश में करनेवाली, कल्याण एवं शान्ति करने वाली, सन्तान को उत्पन्न करने वाली, गर्भ का बन्धन करने वाली (जिससे गर्भपात न हो), विमल तथा अत्यन्त कल्याण युक्त है। जो व्यक्ति दोनों सन्ध्याकालों में स्नान आदि द्वारा शुचि (पवित्र) होकर इस विद्या की आवृत्ति करता है वह पवित्र हो जाता है। इसे सम्पूर्ण प्राणियों से भय नहीं रहता। जो पवित्र होकर प्रतिदिन इस विद्या का जाप करता है वह बहुत पुत्रों एवं धन से युक्त होता है, दीर्घायुष्य को प्राप्त करता है, रोग रहित हो जाता है तथा उसके सब अभीप्सित प्रयोजन सिद्ध हो जाते हैं। जो व्यक्ति श्राद्ध में इस विद्या को स्मरण करता है उसका कभी क्षय (नाश) नहीं होता तथा उसके पितर श्राद्ध में अवतीर्ण हो जाते हैं। जो गौओं के मध्य में इसका जाप करता है उसके बहुत सी गौऐं हो जाती हैं। जो ऋतुस्नाता स्त्री को इस विद्या को सुनाता है वह स्त्री गर्भवती हो जाती है। जो गर्भवती को सुनाता है वह स्त्री बहुत पुत्रों वाली हो जाती है। जिस स्त्री का प्रसव कष्ट से हो रहा है उसे यदि इसका श्रवण कराया जाय तो उसे शीघ्र ही प्रसव हो जाता है। जिस स्त्री के पुत्र मर जाते हों उसे यदि इस विद्या का श्रवण कराया जाय तो उसके पुत्र जीवित रहते हैं। जिस घर में सर्प, राक्षस तथा गुह्य आदि को जाने वहां आठ सौ मन्त्रों से अभिमन्त्रित सरसों को बिखेर दे। इससे वे सब नष्ट हो जाते हैं। जो द्वेष करता हो उसके द्वार पर उनको (सरसों को) बिखेर दे, जो सर्व प्रथम उन्हें लांघेगा वह रोग से पीडित हो जायगा। दुर्गों (दुर्गम स्थानों) में इसका जाप करने से चोर, मृग (पशु आदि) तथा सर्प आदि का भय नहीं रहता। इसके प्रत्येक रूप में अश्वमेध यज्ञ का फल मिल जाता है अर्थात् अश्वमेध यज्ञ का जो फल होता है वह उसके देखने मात्र से मिल जाता है—इससे सम्पूर्ण तीर्थों में स्नान हो जाता है, सम्पूर्ण उपवास किये हुए के समान हो जाते हैं, सम्पूर्ण दान दिये हुए हो जाते हैं। अर्थविद्या (धन प्राप्ति की विद्या) की उसे अपेक्षा (आवश्यकता) नहीं रहती अर्थात् इस मातङ्गी विद्या से वे सब पुण्य एवं फल प्राप्त हो जाते हैं जो अश्वमेध यज्ञ, सम्पूर्ण तीर्थों के स्नान, सब उपवास तथा सब प्रकार के दानों से मिलते हैं। ऋषिवर मातङ्ग, सिद्धक तथा आस्तीक को नमस्कार है। इन सबको नमस्कार करके मैं इस विद्या को प्रयुक्त करता हूँ। वह विद्या मेरी समृद्धि करे। ‘सत्यव हिलिमिलि महामिलि कुरुङ्गे अट्टे ममटे तुम्बिपसे करटे गन्धारि केयूरि भुजङ्गमि ओजहारि सर्पच्छेदनि अलगणिलगणि पंसुमसि ककिकाकण्डि हिलिं हिलि बिडि बिडि अट्टे मट्टे अजिहट्टे कुक्कु कुक्कुमति स्वाहा’ इस मातङ्ग विद्या के द्वारा शमी, पलाश (ढाक) तथा अश्वत्थ की समिधाएं आठ सौ, श्वेत पुष्प आठ सौ, अग्नि के वर्ण वाले सरसों आठ सौ, तथा घृत, तैल एवं वसा को
१. वह्नेः कश्चिद्देशमारभ्य देशान्तरपर्यन्तं समन्त्रकम् आज्यधारायाः आहरणं प्रक्षेपणम् आधार इत्युच्यते। (अनुवादक)
भोजनकल्पः ? ] कल्पस्थानम् ३०३
एकत्रित करके इन सबका मधु एवं घृत के साथ आलोडन करके युगपत् तीन समिधायें अग्नि में डालकर मन्त्र के अन्त में घृत की आहुति देवे। इस प्रकार आठ सौ बार आहुति देकर लक्ष्मणा, पुत्रञ्जीवफल (पित्तौजिया अर्थात् पतजिव) तथा समुद्र फेनसे ग्रथित लम्बी ग्रहघ्नी (श्वेत सरसों) वासु, शुक्ति, जीव तथा ऊर्णा (ऊन) की बनी हुई माला को रुद्रमातङ्गी विद्या के द्वारा अभिमन्त्रित करके गले में डाल दे। रुद्रमातङ्गी विद्या निम्न होती है। इसमें अधिक तर्क न करे अर्थात् तर्क न करके इसे श्रद्धापूर्वक मान ले। 'नमो भवगते रुद्रस्य मातङ्गि कपिले जटिले रुद्रशामे रक्ष रक्षेमं रिरक्षुमाज्ञापयेति स्वाहा' इस रुद्रमातङ्गी विद्या के द्वारा प्रतिसर (माला) को बांधे। प्रतिसर के बांधा जाने पर प्रजावरण बन्ध बंधा हुआ समझा जाता है। इससे उसे सम्पूर्ण प्राणियों का भय नहीं रहता है। आशा में वृद्धि होती है। उस स्त्री के पुत्र जीवित रहते हैं, वह उत्तम ऐश्वर्य वाली होती है तथा विधवा नहीं होती है। उसके बाद स्विष्टकृत आहुति देकर पूर्वोक्तानुसार शान्ति का जाप करके महाव्याहृतियों (भूः, भुवः, स्वः, महः इत्यादि) के द्वारा आहुति देवे। फिर देवताओं की अभ्यर्चंना तथा विसर्जन करके, बलि देकर, अग्नि में जल के छींटे देकर शान्त हो जाये। फिर चुपचाप ब्राह्मण, साधु, पुत्रवान् तथा आयुष्मान् व्यक्तियों को अन्न, वस्त्र एवं दक्षिणा के द्वारा अभ्यर्चंना करके बैठ जाये। उस सम्पूर्ण हवन के उपकरण आदियों को लेकर किसी चौराहे पर, जल (नदी आदि) में अथवा किसी क्षीरी वृक्ष पर रख दे। इस प्रकार उपर्युक्त विधि से प्रजावरण (बन्धन) बांधा जाता है। इसके द्वारा सन्तान उत्पन्न न हो ऐसा नहीं हो सकता—ऐसा भगवान् कश्यप ने कहा था अर्थात् इससे अवश्य सन्तान उत्पन्न होती है। इसके बाद सात रात्रि तक प्रजापत्य चरु (हव्यान्न) को दूध में शृत (पका) करके प्रजापति के लिये आहुति देवे। कुछ लोग कहते हैं कि इसमें गोघृत की आहुति देवे। तथा प्रजा (सन्तान) को चाहने वाले, पशुओं को चाहने वाले तथा आयु को चाहने वाले, व्यक्तियों को उपर्युक्त आहुतियां देनी चाहिये ॥८०॥
इति प्रधानार्थमुदाहृतं परं नृणां हितार्थं भिषजां यशस्करम्।
अलङ्घनीयं हि रहस्यमुत्तमं शुचिः प्रयुञ्जीत न तु प्रकाशयेत् ॥८१॥
यह उपर्युक्त वरणबन्ध का विधान मनुष्यों के हित के लिये प्रधानरूप से कहा गया है। तथा यह वैद्यों के लिये यश का देने वाला है। इस उत्तम रहस्य का लङ्घन नहीं करना चाहिये। पवित्र होकर इसका प्रयोग करना चाहिये तथा इसे किसी दूसरे पर प्रकट नहीं करना चाहिये। अर्थात् इसे रहस्य के रूप में ही रखना चाहिये। प्रत्येक व्यक्ति को यह रहस्य नहीं बताना चाहिये ॥८१॥
इति ह स्माह भगवान् कश्यपः।
(इति कल्पस्थाने) रेवतीकल्पो नामाध्यायः॥
ऐसा भगवान् कश्यप ने कहा था।
(इति कल्पस्थाने) रेवतीकल्पो नामाध्यायः।
भोजनकल्पाध्यायः।
अथातो भोजनकल्पं वक्ष्यामः ॥१॥
यथोवाच भगवान् कश्यपः ॥२॥
अब हम भोजन कल्पाध्याय का व्याख्यान करेंगे। ऐसा भगवान् कश्यप ने कहा था ॥१-२॥
४२ का.सं.