भारतकोश
काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

Kashyapa Samhita Hindi

महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा

स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished942 पृष्ठ

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रेवतीकल्पः ? ] कल्पस्थानम् ३०१

मृगव्यालभयं न भवति । रूपे रूपेऽश्वमेधफलमवाप्नोति । सर्वतीर्थेषु स्नातो भवति । सर्वोपवासाः कृताभवन्ति । सर्वाणि दानानि दत्तानि भवन्ति । अर्थविद्या, नचैतामूहैत् । नमो मातङ्गस्य ऋषि(वर्य)स्य सिद्धकस्य नम आस्तीकस्य, तेभ्यो नमस्कृत्या इमां विद्यां प्रयोजयामि, सा मे विद्या समृद्धयतां, सत्यव हिलि मिलि महामिलि कुरुट्टा अट्ठे ममटे तुम्बिपसे करटे गन्धारि केयूरि भुजङ्गमि ओजहारि सर्पच्छेदनि अलगणिलगणि पंसुमसि कक्किकाकण्डि हिलि हिलि बिडि बिडि अट्ठे मट्टे अजिहट्टे कुक्कुक्कुक्कुमति, स्वाहा । इत्येतया मतङ्गविद्यया शमीमयीनां समिधानमष्टशतं पालाशीनामश्वत्थमयीनामष्टशतं श्वेतानां पुष्पाणामष्टशतं सर्षपाणामग्निवर्णानामष्टशतं घृतं तैलं वसामित्युपकल्प्य, समध्वज्यमैकध्यमालोड्य, युगपत्तिस्त्रः समिधो हुत्वा मन्त्रान्ते चाज्यंजुहोति; एवमष्टशतं हुत्वा प्रतिसरं लक्ष्मणापुत्रञ्जीवफल-समुद्रफेनप्रतिग्रथिता(तं) लम्बा(म्बं)ग्रहणीवासुशुक्तिजीवोर्णानां रुद्रमातङ्ग्या विद्ययाऽभिमन्त्र्य कण्ठे विसर्जयेत् । अथैषा विद्या रुद्रमातङ्गी भवति । नैनामूहेत् । नमो भगवतो रुद्रस्य मातङ्गि कपिले जटिले रुद्रशामे रक्ष रक्षेमं रिरक्षुमाज्ञापयेति स्वाहा । इत्येतया रुद्रमातङ्ग्या प्रतिसरं बध्नीयात् । बद्धे प्रतिसरे प्रजावरणं बद्धं भवति । नास्याः सर्वभूतेभ्यो भयं भवति, आशा समृद्धयते, जीवत्पुत्रा सुभगा चाविधवा च भवति । ततः स्विष्टकृतं हुत्वा, यथा पूर्वोक्तं शान्तिं जपित्वा, महाव्याहृतिभिर्हुत्वा, देवतामभ्यर्च्य, विसर्ज्य, बलिं कृत्वाऽग्निमभ्युक्ष्य, तूष्णीं ब्राह्मणान् साधून् पुत्रवत आयुष्मतश्चान्नवासोदक्षिणाभिरभ्यर्च्य, तत उपवसेत् । तत्स्र्वमाह¹वनमुपसंगृह्य चतुष्पथे वोदके वा क्षीरवृक्षे वा निदधाति । एवमेतेन विधिना प्रजावरणं बद्धं भवति, नास्याः प्रजा न भवतीत्याह भगवान् कश्यपः ।। अत ऊर्ध्वं सप्तरात्रं प्राजापत्यं चरुं पयसि शृतं प्रजापतये जुहुयात्, पूर्वोक्तं गोघृतमित्येके । प्रजाकामपशुकामाऽऽयुष्कामानामिति वा ।।८०।।

अब हम वरण बन्ध का वर्णन करेंगे । (जिस बन्धन के द्वारा गर्भ स्थित होता है तथा गर्भपात का भय नहीं रहता उस बन्धन को वरणबन्ध कहते हैं) गर्भिणी स्त्री को आठवें मास से पूर्व यह बन्ध लगाना चाहिये । इसके बाद इसका निषेध किया गया है । हे वृद्धजीवक ! जो पवित्र है तथा जिसने उपवास किया है ऐसा वैद्य श्रद्धा करने वाली तथा धर्मयुक्त आचरण करने वाली स्त्रियों को तीन दिन तक उपवास कराकर उनमें प्रजावरण (सन्तान को स्थिर करने वाला) बन्ध बांधे । तथा बन्धन बांधने के बाद इष्ट दक्षिणाओं के द्वारा उसकी अर्चना करे । इससे उसे सन्तान की प्राप्ति होती है । इसमें संभारा तथा रोहिणी नक्षत्र में स्नान करना चाहिये । कुछ लोग कहते हैं कि स्नान भी यदि रात्रि में किया जाय तो घर के अन्दर करना चाहिये तथा यदि दिन में करे तो जंगल में करना चाहिये । परन्तु दोनों अवस्थाओं में स्नान का कार्य गुप्तरूप से तथा दिग्बन्ध (चारों ओर दिशाओं का बन्धन करके अर्थात् चारदिवारी के अन्दर बन्द होकर) द्वारा अपने को सुरक्षित करके करना चाहिये । इसके बाद पवित्र स्थान में गोबर तथा पानी के द्वारा गोचर्म² प्रमाण (२१०० हाथ लम्बा) वेदी को लीप कर नवीन वस्त्र पहन कर स्नान करके तथा अलंकृत होकर वैद्य पूर्व दिशा की ओर मुख करके आचमन करे तथा ऊपर हाथ उठाये हुए और शान्त हुए शब्द एवं झागरहित तथा शीतल जल के द्वारा अङ्गस्पर्श करे तथा ब्राह्म तीर्थ के द्वारा तीन बार भक्षण करके दो बार ओष्ठों का परिमार्जन करे । कुछ लोगों के मत में तीन वार ओष्ठों का परिमार्जन करना चाहिये । दोनों चक्षु, दोनों कर्ण, दोनों नासिका तथा गुदा का स्पर्श करे । फिर महान् सूर्य के दिखाई देने पर वेदी पर जल के छींटे देकर हिरण्यपाणि (हाथ में स्वर्ण अथवा स्वर्णमय पदार्थ युक्त) होकर दर्भपिञ्जुलि (कुश के गुच्छे-Bunch


१. आहवनं हवनोपकरणमिति यावत् । २. गोचर्म—२१०० हाथ लम्बा चौड़ी भूमि को कहते हैं— सप्तहस्तेन दण्डेन त्रिंशद्दण्डैर्निवर्तनम् । दश तान्येव गोचर्म दत्त्वा स्वर्गे महीयते ॥ अर्थात् ७×३०×१०=२१०० हाथ (अनुवादक)