काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)
Kashyapa Samhita Hindi
महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा
स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)
पृष्ठ 662, कुल 942 में से
संदर्भ में पढ़ें| ३०२ | काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम् | रेवतीकल्पः ? ] |
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of qrass) युक्त गर्भवती को लेकर तथा उसके द्वारा लक्षणों को लिखकर दर्भपिञ्जुलि को जल के छींटे देकर बाहर आ जाये तथा अग्नि को नमस्कार करे। फिर पूर्वोक्तानुसार सब सामान एकत्रित करके तथा उन्हें पवित्र करके तथा बर्हि (कुश) के द्वारा चारों ओर प्रदक्षिणा कर के अग्नि के सामने स्वर्ण, रजत (चांदी), खस अथवा दर्भ की बनी हुई कुमार, षष्ठी अथवा विशाख की प्रतिकृति (मूर्ति) स्थापित कर के तथा दक्षिण की ओर यज्ञ के ब्रह्मा तथा उत्तर की ओर जलपात्र को रखकर जिनके अग्रभाग कटे हुए नहीं हैं, जो सम हैं, ऐसे तथा परस्पर बंधे हुए दोनों दर्भों के द्वारा वृत को पवित्र कर के ‘आज्यमसि, देवभोजनमसि, तेजोऽसि, चक्षुरसि, क्षोत्रमसि, इन्द्रियमसि, आयुरसि, सत्यमसि, हविरसि, इत्यादि बोले। तथा दर्भस्रुवों (दर्भ की बनी हुई स्रुवाओं) के द्वारा $^१$आधारों (अग्नि के एक स्थान से दूसरे स्थान तक मन्त्रोच्चारण पूर्वक घृत का डालना) में आहुति देकर हवन करे। तदनन्तर स्नान एवं उपवास कर के तथा शुक्ल वस्त्रों को पहन कर अलंकृत हुई गर्भवती स्त्री को दक्षिण की ओर से उत्तर की ओर मुख कर के सुखकारक पीठ (आसन) पर बिठाकर हाथ में दो दर्भ देवे। वह गर्भवती स्त्री शान्त बैठी रहे। इसके बाद आज्ञा लेकर वैद्य नित्य होम कर के उसमें आज्यभाग डालकर मातङ्गी विद्या के द्वारा आहुति डाले। मातङ्गी नामक पुण्यकारक, दुःस्वप्न, कलि (रोग) तथा राक्षस (कृमि) आदियों को नष्ट करनेवाली पाप, कल्मष (पाप विशेष), अभिशाप तथा महान् पापों को नष्ट करनेवाली, पातक, ब्रह्मर्षि, राजर्षि, सिद्ध एवं चारणों के द्वारा पूजित एवं अर्चित विद्या को कश्यप के कनिष्ठ पुत्र महर्षि मातङ्ग ने महान् एवं उग्र तपस्या के द्वारा सीधा पितामह ब्रह्मा से प्राप्त किया था। यह विद्या, सम्पूर्ण भयों को नष्ट करनेवाली, सम्पूर्ण लोकों को वश में करनेवाली, कल्याण एवं शान्ति करने वाली, सन्तान को उत्पन्न करने वाली, गर्भ का बन्धन करने वाली (जिससे गर्भपात न हो), विमल तथा अत्यन्त कल्याण युक्त है। जो व्यक्ति दोनों सन्ध्याकालों में स्नान आदि द्वारा शुचि (पवित्र) होकर इस विद्या की आवृत्ति करता है वह पवित्र हो जाता है। इसे सम्पूर्ण प्राणियों से भय नहीं रहता। जो पवित्र होकर प्रतिदिन इस विद्या का जाप करता है वह बहुत पुत्रों एवं धन से युक्त होता है, दीर्घायुष्य को प्राप्त करता है, रोग रहित हो जाता है तथा उसके सब अभीप्सित प्रयोजन सिद्ध हो जाते हैं। जो व्यक्ति श्राद्ध में इस विद्या को स्मरण करता है उसका कभी क्षय (नाश) नहीं होता तथा उसके पितर श्राद्ध में अवतीर्ण हो जाते हैं। जो गौओं के मध्य में इसका जाप करता है उसके बहुत सी गौऐं हो जाती हैं। जो ऋतुस्नाता स्त्री को इस विद्या को सुनाता है वह स्त्री गर्भवती हो जाती है। जो गर्भवती को सुनाता है वह स्त्री बहुत पुत्रों वाली हो जाती है। जिस स्त्री का प्रसव कष्ट से हो रहा है उसे यदि इसका श्रवण कराया जाय तो उसे शीघ्र ही प्रसव हो जाता है। जिस स्त्री के पुत्र मर जाते हों उसे यदि इस विद्या का श्रवण कराया जाय तो उसके पुत्र जीवित रहते हैं। जिस घर में सर्प, राक्षस तथा गुह्य आदि को जाने वहां आठ सौ मन्त्रों से अभिमन्त्रित सरसों को बिखेर दे। इससे वे सब नष्ट हो जाते हैं। जो द्वेष करता हो उसके द्वार पर उनको (सरसों को) बिखेर दे, जो सर्व प्रथम उन्हें लांघेगा वह रोग से पीडित हो जायगा। दुर्गों (दुर्गम स्थानों) में इसका जाप करने से चोर, मृग (पशु आदि) तथा सर्प आदि का भय नहीं रहता। इसके प्रत्येक रूप में अश्वमेध यज्ञ का फल मिल जाता है अर्थात् अश्वमेध यज्ञ का जो फल होता है वह उसके देखने मात्र से मिल जाता है—इससे सम्पूर्ण तीर्थों में स्नान हो जाता है, सम्पूर्ण उपवास किये हुए के समान हो जाते हैं, सम्पूर्ण दान दिये हुए हो जाते हैं। अर्थविद्या (धन प्राप्ति की विद्या) की उसे अपेक्षा (आवश्यकता) नहीं रहती अर्थात् इस मातङ्गी विद्या से वे सब पुण्य एवं फल प्राप्त हो जाते हैं जो अश्वमेध यज्ञ, सम्पूर्ण तीर्थों के स्नान, सब उपवास तथा सब प्रकार के दानों से मिलते हैं। ऋषिवर मातङ्ग, सिद्धक तथा आस्तीक को नमस्कार है। इन सबको नमस्कार करके मैं इस विद्या को प्रयुक्त करता हूँ। वह विद्या मेरी समृद्धि करे। ‘सत्यव हिलिमिलि महामिलि कुरुङ्गे अट्टे ममटे तुम्बिपसे करटे गन्धारि केयूरि भुजङ्गमि ओजहारि सर्पच्छेदनि अलगणिलगणि पंसुमसि ककिकाकण्डि हिलिं हिलि बिडि बिडि अट्टे मट्टे अजिहट्टे कुक्कु कुक्कुमति स्वाहा’ इस मातङ्ग विद्या के द्वारा शमी, पलाश (ढाक) तथा अश्वत्थ की समिधाएं आठ सौ, श्वेत पुष्प आठ सौ, अग्नि के वर्ण वाले सरसों आठ सौ, तथा घृत, तैल एवं वसा को
१. वह्नेः कश्चिद्देशमारभ्य देशान्तरपर्यन्तं समन्त्रकम् आज्यधारायाः आहरणं प्रक्षेपणम् आधार इत्युच्यते। (अनुवादक)