काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)
Kashyapa Samhita Hindi
महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा
स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)
पृष्ठ 663, कुल 942 में से
संदर्भ में पढ़ेंभोजनकल्पः ? ] कल्पस्थानम् ३०३
एकत्रित करके इन सबका मधु एवं घृत के साथ आलोडन करके युगपत् तीन समिधायें अग्नि में डालकर मन्त्र के अन्त में घृत की आहुति देवे। इस प्रकार आठ सौ बार आहुति देकर लक्ष्मणा, पुत्रञ्जीवफल (पित्तौजिया अर्थात् पतजिव) तथा समुद्र फेनसे ग्रथित लम्बी ग्रहघ्नी (श्वेत सरसों) वासु, शुक्ति, जीव तथा ऊर्णा (ऊन) की बनी हुई माला को रुद्रमातङ्गी विद्या के द्वारा अभिमन्त्रित करके गले में डाल दे। रुद्रमातङ्गी विद्या निम्न होती है। इसमें अधिक तर्क न करे अर्थात् तर्क न करके इसे श्रद्धापूर्वक मान ले। 'नमो भवगते रुद्रस्य मातङ्गि कपिले जटिले रुद्रशामे रक्ष रक्षेमं रिरक्षुमाज्ञापयेति स्वाहा' इस रुद्रमातङ्गी विद्या के द्वारा प्रतिसर (माला) को बांधे। प्रतिसर के बांधा जाने पर प्रजावरण बन्ध बंधा हुआ समझा जाता है। इससे उसे सम्पूर्ण प्राणियों का भय नहीं रहता है। आशा में वृद्धि होती है। उस स्त्री के पुत्र जीवित रहते हैं, वह उत्तम ऐश्वर्य वाली होती है तथा विधवा नहीं होती है। उसके बाद स्विष्टकृत आहुति देकर पूर्वोक्तानुसार शान्ति का जाप करके महाव्याहृतियों (भूः, भुवः, स्वः, महः इत्यादि) के द्वारा आहुति देवे। फिर देवताओं की अभ्यर्चंना तथा विसर्जन करके, बलि देकर, अग्नि में जल के छींटे देकर शान्त हो जाये। फिर चुपचाप ब्राह्मण, साधु, पुत्रवान् तथा आयुष्मान् व्यक्तियों को अन्न, वस्त्र एवं दक्षिणा के द्वारा अभ्यर्चंना करके बैठ जाये। उस सम्पूर्ण हवन के उपकरण आदियों को लेकर किसी चौराहे पर, जल (नदी आदि) में अथवा किसी क्षीरी वृक्ष पर रख दे। इस प्रकार उपर्युक्त विधि से प्रजावरण (बन्धन) बांधा जाता है। इसके द्वारा सन्तान उत्पन्न न हो ऐसा नहीं हो सकता—ऐसा भगवान् कश्यप ने कहा था अर्थात् इससे अवश्य सन्तान उत्पन्न होती है। इसके बाद सात रात्रि तक प्रजापत्य चरु (हव्यान्न) को दूध में शृत (पका) करके प्रजापति के लिये आहुति देवे। कुछ लोग कहते हैं कि इसमें गोघृत की आहुति देवे। तथा प्रजा (सन्तान) को चाहने वाले, पशुओं को चाहने वाले तथा आयु को चाहने वाले, व्यक्तियों को उपर्युक्त आहुतियां देनी चाहिये ॥८०॥
इति प्रधानार्थमुदाहृतं परं नृणां हितार्थं भिषजां यशस्करम्।
अलङ्घनीयं हि रहस्यमुत्तमं शुचिः प्रयुञ्जीत न तु प्रकाशयेत् ॥८१॥
यह उपर्युक्त वरणबन्ध का विधान मनुष्यों के हित के लिये प्रधानरूप से कहा गया है। तथा यह वैद्यों के लिये यश का देने वाला है। इस उत्तम रहस्य का लङ्घन नहीं करना चाहिये। पवित्र होकर इसका प्रयोग करना चाहिये तथा इसे किसी दूसरे पर प्रकट नहीं करना चाहिये। अर्थात् इसे रहस्य के रूप में ही रखना चाहिये। प्रत्येक व्यक्ति को यह रहस्य नहीं बताना चाहिये ॥८१॥
इति ह स्माह भगवान् कश्यपः।
(इति कल्पस्थाने) रेवतीकल्पो नामाध्यायः॥
ऐसा भगवान् कश्यप ने कहा था।
(इति कल्पस्थाने) रेवतीकल्पो नामाध्यायः।
भोजनकल्पाध्यायः।
अथातो भोजनकल्पं वक्ष्यामः ॥१॥
यथोवाच भगवान् कश्यपः ॥२॥
अब हम भोजन कल्पाध्याय का व्याख्यान करेंगे। ऐसा भगवान् कश्यप ने कहा था ॥१-२॥
४२ का.सं.