काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)
Kashyapa Samhita Hindi
महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा
स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)
पृष्ठ 664, कुल 942 में से
संदर्भ में पढ़ें| ३०४ | काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम् | भोजनकल्पः ? ] |
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मारीचमासीनमृषिं पुराणं हुताग्निहोत्रं ज्वलनार्कंतुल्यम्।
तपोदमाचारनिधिं महान्तं पप्रच्छ शिष्यः स्थविरोऽनुकूलम् ॥३॥
किं लक्षणं भोः क्षुधितस्य जन्तोः पिपासितस्याथ तथोभयस्य ।
भृशे च मन्दे च कथं नु विद्यात् तृषाक्षुधे तत्र च किं हितं स्यात् ॥४॥
भोज्यानुपूर्वी च कथं हिता स्याद् भक्तं क्व देशे परिपच्यते च ।
किं लक्षणं भुक्तवतो महात्मन्! मन्दाशितात्याशितयोश्च कानि ॥५॥
गुणाश्च दोषाश्च हि तत्र के स्युरत्युष्णशीताशनयोश्च के च ।
विपर्यये के च भवन्ति दोषाः क्षुत्तृष्णायोर्भोजनपानयोगात् ॥६॥
(इति ताडपत्रपुस्तके १८५ तमं पत्रम्)
मण्डश्च केषां भवति प्रशस्तः केषां प्रशस्तो भगवन्न मण्डः ।
मण्डस्य सम्यक् च निषेवितस्य गुणाश्च दोषाश्च विपर्यये के ॥७॥
केषां यवागुरहिता हिता वा कृताकृतौ चाप्यथ मुद्गमण्डौ ।
यूषश्च कस्मै विरसः प्रदिष्टः समूलको वाऽथ सदाडिमो वा ॥८॥
सजाङ्गलो वा रसकौदनो वा संभोजनस्नानमथो हितं क्व ।
इत्येवमुक्त्वा स बभूव जोषं प्रजापतिर्वाक्यमथो बभाषे ॥९॥
अग्निहोत्र करके बैठे हुए, देदीप्यमान सूर्य की समान कान्ति वाले, तप, दम एवं आचार के निधि (कोश=खजाने), मारीचपुत्र प्राचीन महर्षि कश्यप से ज्ञानी शिष्य वृद्धजीवक ने अनुकूल अवस्था में देखकर निम्न प्रश्न किये—
१. जिस व्यक्ति को भूख लगी है उसके क्या लक्षण हैं ? २. प्यासे व्यक्ति के क्या लक्षण हैं ? ३. इन दोनों के क्या लक्षण हैं ? ४. पिपासा एवं क्षुधा के तीव्र एवं मन्द होने पर क्या लक्षण होते हैं ? ५. उस अवस्था में क्या देना हितकर होता है ? ६. भोजन के समय भोज्य पदार्थों का क्या क्रम होना चाहिये ? ७. खाया हुआ भोजन किस स्थान में पचता है ? ८. हे महात्मन् ! भोजन किये हुए व्यक्ति के क्या लक्षण हैं ? ९. मन्द अशित (अल्प भोजन किये हुए) तथा अत्यशित (अधिक भोजन किये हुए) के क्या लक्षण होते हैं ? १०. अत्यन्त उष्ण तथा अत्यन्त शीत भोजन के गुण एवं दोष क्या हैं ? ११. भोजन एवं पान के योग से क्षुधा एवं तृष्णा के विपर्यय (विपरीतावस्था) के क्या दोष हैं ? १२. मण्ड किन्हें हितकर है तथा किन्हें नहीं ? १३. सम्यक् प्रकार से सेवन किये हुए मण्ड के क्या गुण हैं ? तथा असम्यक् प्रकार से सेवन किये हुए के क्या दोष हैं ? १४. यवागू किन्हें अहितकर तथा किन्हें हितकर हैं ? १५. कृत एवं अकृत यूष किन्हें हितकर एवं अहितकर हैं ? १६. मुद्गमण्ड किन्हें हितकर तथा किन्हें अहितकर हैं ? १७. विरस (मसाले आदि से रहित) तथा मूली एवं दाडिम युक्त यूष किनके लिये हितकर कहा गया है ? १८. जांगल मांस रस तथा ओदन किनके लिये हितकर है ? १९. भोजन तथा स्नान किनके लिये हितकर है ? इस प्रकार प्रश्न करके वह शान्त हो गया। तब प्रजापति कश्यप ने उत्तर दिया ॥३-९॥
नासर्वविन्नो खलु मांसचक्षुः प्रश्नानिमान् वक्तुमिहोत्सहेत ।
असर्ववित् (सब कुछ न जानने वाला–असर्वज्ञ) व्यक्ति केवल इन मांस चक्षुओं के द्वारा इन सब उपर्युक्त प्रश्नों का उत्तर नहीं दे सकता है। अर्थात् दिव्य चक्षुओं के द्वारा इनका उत्तर दिया जा सकता है, इसलिये सर्वसाधारण व्यक्ति इसका उत्तर नहीं दे सकता है।