काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)
Kashyapa Samhita Hindi
महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा
स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंभोजनकल्पः ? ] कल्पस्थानम् ३०५
उत्साहवर्णस्वरदृष्टिहानिविषादकार्श्यश्रमवाग्विकाराः ॥१०॥
भृशं च पीडा हृदयस्य जन्तोर्ग्लानिर्मुखस्यातिबुभुक्षितस्य ।
बुभुक्षित (भूखे) व्यक्ति के लक्षण—अत्यन्त भूखे व्यक्ति में उत्साह, वर्ण, स्वर तथा दृष्टि की कमी हो जाती है, शरीर में विषाद, कृशता तथा थकावट होती है, वाणी विकृत हो जाती है, रोगी के हृदय में अत्यन्त पीडा तथा मुख में ग्लानि होती है ॥१०॥
ताल्वोष्ठजिह्वागलगण्डशोषः श्रोत्राक्षिदौर्बल्यविषादमोहाः ॥११॥
स्मृत्यग्निमेधासुखवाक्यहानिर्जिह्वाविवृद्धिश्च पिपासितस्य ।
पिपासित (प्यासे) व्यक्ति के लक्षण—प्यासे व्यक्ति के तालु, ओष्ठ, जिह्वा, गला तथा गण्डप्रदेश सूख जाते हैं, कर्ण एवं नेत्र दुर्बल हो जाते हैं, विषाद एवं मोह होता है स्मृतिशक्ति, जाठराग्नि, मेधा एवं सुख (स्वास्थ्य) एवं वाणी शक्ति नष्ट हो जाते हैं तथा जिह्वा की वृद्धि हो जाती है ॥११॥
एतानि रूपाण्युभयानि विद्यात् पिपासिते चैव बुभुक्षिते च ॥१२॥
विशोषणं तत्र शिरोरुजार्तिमूत्रग्रहो भुक्तवतश्च भेदः ।
तत्रान्नपानानि यथोपजोषं सात्म्यानि भोज्यानि वदन्ति तज्ज्ञाः ॥१३॥
प्यासे एवं भूखे दोनों व्यक्तियों में सामान्यरूप से शरीर का शोषण, शिरोरोग, मूत्रग्रह तथा भोजन करते ही मल का आ जाना—इत्यादि लक्षण होते हैं। इस अवस्था में विद्वान् लोग आवश्यकतानुसार सात्म्य अन्न पान का भोजन करने को कहते हैं ॥१२-१३॥
तृष्णाबुभुक्षाभृशपीडितेत तु सकृत् कृतं पूरणमप्रशस्तम् ।
ओजो हि दग्धं ज्वलनानिलाभ्यां पुनः पुनः शोषयते च पीतम् ॥१४॥
लोहं यथा तप्तमपोनिषिक्तं तत्रान्नपानस्य गतिः कथं स्यात् ।
तृष्णा (पिपासा) एवं बुभुक्षा (भूख) से अत्यन्त पीडित होने पर एक दम पेट भर के खाना या पीना प्रशस्त नहीं माना गया है। क्योंकि अग्नि एवं वायु के द्वारा जला हुआ ओज जो कुछ पिया जाता है उसे बार २ सुखा डालता है। उस अवस्था में अन्नपान की गति कैसे हो सकती है अर्थात् किसी प्रकार नहीं हो सकती है। एक गरम किये हुए लोहे को पानी में डुबो देने से उसकी जो अवस्था होती है वैसे ही इस व्यक्ति के अन्नपान की होती है ॥१४॥
सकृत्प्रपीतस्य वदन्ति चैके तृप्तिं प्रशस्तां भिषजोऽनुचिन्त्य ॥१५॥
सकृत्पपीतस्य हि नश्यते क्षुद् यथा पृथिव्याः सकृदाप्लुतायाः ।
कुछ वैद्य लोग विचार करके कहते हैं कि—प्यास लगने पर एक दम पानी पी लेने से पूर्णरूप से तृप्ति हो जाती है। परन्तु सहसा जल से आप्लुत हुई पृथ्वी के समान एक दम जल पीने से रोगी की भूख नष्ट हो जाती है ॥१५॥
आदाय पित्तं पवनो ह्युदीर्णओजोदहां संजनबेद्धि तृष्णाम् ॥१६॥
शिरोगतः स्थाननिरुद्धवेगीहृत्कोम संतापयते ततस्तृट् ।
अपने स्थान पर जिसका वेग रुक गया है ऐसा वायु शिर में पहुँचकर उदीर्ण हुआ पित्त को लेकर ओज को जलाने वाली प्यास उत्पन्न कर देता है। जिससे हृदय एवं क्लोम में सन्ताप उत्पन्न होता है तथा अन्त में प्यास लगती है ॥१८॥