भारतकोश
काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

Kashyapa Samhita Hindi

महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा

स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished942 पृष्ठ

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पृष्ठ 666
३०६काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम्भोजनकल्पः ? ]

शूलारताध्मानगुदप्रकोपज्वराङ्गदाहश्रममोहतृष्णाः ॥१७॥
शय्यासनस्त्रीविषयेष्वभक्तिर्भवन्ति रूपाण्यपतर्पितस्य ।

अपतर्पित व्यक्ति के लक्षण—शूल, ग्लानि, आध्मान, गुद रोग का प्रकोप, ज्वर, अङ्गों में जलन, थकावट, मोह, तृष्णा, शय्या, आसन एवं मैथुन में इच्छा न होना ये अपतर्पित व्यक्ति के लक्षण होते हैं ॥१६॥

आदातुमिच्छत्यपि यस्तु भूयो मध्यस्थता चेद्भवतीप्सितेषु ॥१८॥
तद्देशकालौ भजते च युक्त्या मन्दाशितं तं प्रवदन्ति तज्ज्ञाः ।

मन्द अशित (कम भोजन किये हुए) व्यक्ति के लक्षण-जो बार २ भोजन को ग्रहण करना चाहता हो, ईप्सित पदार्थों में मध्यस्थता हो, उस २ देश एवं काल का युक्तिपूर्वक सेवन करता हो-उसे विद्वान् लोग मन्द अशित कहते हैं ॥१८॥

अत्याशितानां वमनं प्रशस्तं मन्दाशितानामशनं तु युक्त्या ॥१९॥
कालं च देशं च वयो बलं च समीक्ष्य चोपद्रवभेषजं च ।

अत्यशित तथा मन्द अशित का उपक्रम-काल, देश, अवस्था, बल, उपद्रव तथा औषध को दृष्टि में रखते हुए जिसने बहुत भोजन कर लिया हो उसे वमन कराना चाहिये तथा जो मन्द अशित है अर्थात् जिसने कम भोजन किया है उसे युक्तिपूर्वक भोजन कराना चाहिये ॥१९॥

दृष्टिप्रसादो वचनप्रसिद्धिः स्वरस्य गाम्भीर्यमदैन्यमूर्जाः ॥२०॥
इष्टेन्द्रियार्थेषु मनःप्रहर्षः स्निग्धं मुखं भुक्तवतश्च विद्यात् ।

भुक्तवान (जिसने भोजन किया हुआ है) व्यक्ति के लक्षण—भोजन करने के बाद उसके नेत्र निर्मल हो जाते हैं, वचन (वाणी) में प्रसिद्धि होती है अर्थात् जो कुछ वह कहना चाहता है उसे कहने में समर्थ होता है, स्वर गंभीर एवं दीनतारहित हो जाता है तथा शरीर में ऊर्ज (बल) बढ़ता है, इन्द्रियों के इष्ट विषयों में मन प्रसन्न होता है तथा मुख स्निग्ध हो जाता है ॥२०॥

कान्तिर्बलस्मृतिमेधावयांसि प्रमोदसत्त्वस्थितिरङ्गवृद्धिः ॥२१॥
दृढेन्द्रियत्वं स्थिरताऽऽयुषश्च सम्यग्गुणा भुक्तवतो नरस्य ।

सम्यक् प्रकार से भोजन किये हुए व्यक्ति के लक्षण-अच्छी प्रकार भोजन करने के बाद मनुष्य के शरीर में कान्ति, बल, स्मृति, मेधा वय, (अवस्था) की प्राप्ति होती है, प्रमोद, सत्त्वस्थिति (मनः स्थिति) तथा अङ्गों में वृद्धि होती है, इन्द्रियां दृढ़ होती हैं तथा आयु स्थिर होती है ॥२१॥

भोज्यस्य कालं मुनयो बुभुक्षां वदन्ति तृष्णामपि पानकालम् ॥२२॥

मुनिगण बुभुक्षा (भूख-Appetite) को भोजन का काल तथा तृष्णा (प्यास) को पान (पानी पीने) का काल कहते हैं। अर्थात् जब भूख लगे तब भोजन तथा प्यास लगने पर पानी पीना चाहिये ॥२२॥

भोज्यानुपूर्वी तु या हिता स्यात् तां तु प्रवक्ष्यामि निबोध वत्स ! ।
तृष्णाक्षुधौ चेद्युगपद्द्रवेतां तयोर्भिषक् तां प्रथमं चिकित्सेत् ॥२३॥

भोजन में कौनसा द्रव्य पहले तथा कौनसे पीछे अर्थात् किस क्रम से खाना हितकर होता है-वह मैं बतलाता हूँ, हे वत्स ! इसे तुम सुनो—यदि प्यास और भूख दोनों इकट्ठी लगें तो वैद्य को इन दोनों में से प्रथम अर्थात् प्यास की पहले चिकित्सा करनी चाहिये ॥२३॥