भारतकोश
काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

Kashyapa Samhita Hindi

महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा

स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished942 पृष्ठ

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पृष्ठ 667

भोजनकल्पः ? ] कल्पस्थानम् ३०७

पूर्वं पिपासां शमयेद्विपश्चित् त्रिभागसात्म्योचितपानयोगैः ।
ततोऽशनैः कुक्षितृतीयभागं संपूरयेद्भागमथावशिष्टात् ॥ २४॥
एवं हि भुञ्जानमथो पिबन्तं जितेन्द्रियं साहसवर्जिनं च ।
आरोग्यमायुर्बलमग्निदीप्तिः प्रजा च मुख्या भजते सुखं च ॥ २५॥

बुद्धिमान् व्यक्ति को चाहिये कि त्रिभागसात्म्य की दृष्टि से उचित पेय पदार्थों के द्वारा पहले प्यास को शान्त करे अर्थात् कुक्षि के तृतीय (१/३) भाग को पानी (Liquid) से भर ले। इसके बाद कुक्षि के तृतीय (१/३) भाग को भोजन (अन्न-Solid diet) से पूर्ण करे। तथा एक भाग को अवशिष्ट रहने दे अर्थात् कुक्षि के एक भाग को वातादि दोषों की गति के लिये खाली रहने देना चाहिये जिससे वातादि दोषों की गति (Churning movements) के कारण भोजन सम्यक् प्रकार से पच सके। इस प्रकार भोजन एवं जल (अन्न तथा पान) का सेवन करने वाले जितेन्द्रिय एवं साहस रहित व्यक्ति को आरोग्य, आयु, बल, अग्निदीप्ति, उत्तम सन्तान एवं सुख (स्वास्थ्य) की प्राप्ति होती है।

**वक्तव्य—**चरक वि. अ. २ में भी कुक्षि को उपर्युक्त चार प्रकार से ही अन्न एवं जल से पूर्ण करने को कहा है—
'त्रिविधं कुक्षौ स्थापयेदवकाशांशमाहारस्याहारमुपयुञ्जानः, तद्यथा—एकमवकाशांशं मूर्तानामाहारविकाराणाम्, एकं द्रवाणाम्, एकं पुनर्वातपित्तश्लेष्मणाम्। एतावतीं ह्याहारमात्रामुपयुञ्जानो नामात्राहाजं किंचिदशुभं प्राप्नोति। उपर्युक्त दोनों ग्रन्थों में यह क्रम त्रिभाग सौहित्य की दृष्टि से कहा है। अष्टाङ्गहृदय सू. अ. १० में यह क्रम अर्धसौहित्य की दृष्टि से दिया है—अन्नेन कुक्षेद्वौवंशौ पानेनैकं प्रपूरयेत्। आश्रयं पवनादीनां चतुर्थमवशेषयेत्॥ अर्थात् कुक्षि (आमाशय) के चार भाग करके उनमें से दो को अन्न (Solid matter) से, तथा एक को जल आदि पेय पदार्थों से भरे तथा चौथा भाग वायु आदि के लिये रिक्त रखना चाहिये ॥२४-२५॥

बुभुक्षितो यस्तु पिबेत् पुरस्तादश्नाति चान्नानि पिपासितः सन् ।
तस्याशु रोगाः प्रभवन्ति घोरा विपर्ययादानभवा अपायाः ॥ २६॥
ज्वराङ्गदाहश्रमकार्श्यकुष्ठच्छर्दिभ्रमानाहविसुचिकास्तृट् ।
यक्ष्मातिसारौ गलताळुशोषोदेहेन्द्रियार्थेन्द्रियवर्णहानिः ॥ २७॥

जो व्यक्ति भूख की अवस्था में पानी पीता है तथा प्यास लगने पर अन्न (भोजन) खाता है, उसे इनके विपर्यय (विपरीत अवस्था) के कारण शीघ्र ही अपाययुक्त एवं भयंकर ज्वर, अङ्गदाह, श्रम, कृशता, कुष्ठ, छर्दि, भ्रम, आनाह, विसूचिका, तृषा, यक्ष्मा, अतिसार, गलशोष और तालुशोष आदि रोगों की प्राप्ति तथा शरीर, इन्द्रियों के विषय (शब्द स्पर्श आदि) तथा इन्द्रियों एवं वर्ण का नाश आदि शीघ्र ही हो जाते हैं ॥२६-२७॥

प्रतान्तभोक्तुर्विषमाशिनश्च तोयातिपस्यातिमहाशनस्य ।
विरोध्यजीर्णाधिविभोजनस्य वह्निः प्रशाम्यत्यपि चान्नकाले ॥ २८॥
तस्माच्च पूर्वं न जलं पिबेयुः स्नेहोपरिष्टान्न च चातिभुक्त्वा ।
(इति ताडपत्रपुस्तके १८६ तमं पत्रम्)
पीतं हि सद्यः शमयत्युदर्यं ततो ज्वराद्याः प्रभवन्ति रोगाः ॥ २९॥

बार २ भोजन करने वाले, विषम भोजन करने वाले, अधिक पानी पीने वाले, बहुत अधिक भोजन करने वाले, विरुद्ध भोजन करने वाले, अजीर्ण पर भोजन करने वाले, एवं अध्यशन करने वाले व्यक्ति की अग्नि अन्नकाल में शान्त हो जाती है। इस लिये भोजन से पूर्व जल नहीं पीना चाहिये। इसी प्रकार स्नेह के ऊपर तथा अधिक भोजन करने के