काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)
Kashyapa Samhita Hindi
महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा
स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)
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बाद भी जल नहीं पीना चाहिये। इन अवस्थाओं में जल के पीने से जाठराग्नि शीघ्र ही शान्त (मन्द) हो जाती है तथा ज्वर आदि रोग उत्पन्न हो जाते हैं ॥२८-२९॥
स्नेहं समाक्रम्य विचित्रभोज्यै र्जलं पिबेन्मध्य इवा(हा)शनस्य । भुक्त्वाऽपि पित्तप्रकृतिः पिबेच्च मात्रां च सर्वत्र हितं च सात्म्यम् ॥३०॥ जिह्वौष्ठताल्वन्त्रगलोदरौजो विदह्यते भुक्तफलं न वेत्ति । आनाहदुर्नामजलोदरासृग्वैसर्पतृष्णाक्षिशिरोरुजश्च ॥३१॥
पूर्व सेवन किये हुए स्नेह को नाना प्रकार के भोजनों के द्वारा आच्छादित करके भोजन के मध्य में जल पीना चाहिये। अर्थात् स्नेहपान के बाद यदि जल पीना हो तो कुछ अन्य स्नेहरहित पदार्थ खाकर बाद में जल पीना चाहिये। भोजन करने के बाद भी पित्तप्रकृति मनुष्य को मात्रा में हितकारी एवं सात्म्य जल का ही पान करना चाहिये अन्यथा जिह्वा, ओष्ठ, तालु, आंतें, गला, उदर तथा ओज का दहन हो जाता है, उसे भोजन का फल प्राप्त नहीं होता है तथा आनाह, दुर्नाम (अर्श), जलोदर, रक्तविकार, विसर्प (अथवा रक्त विसर्प), तृष्णा, अक्षिरोग एवं शिरोरोग हो जाते हैं ॥३०-३१॥
अत्युष्णपानान्ननिषेवणेन रेतोऽसृगण्डोपचयश्च दुष्येत् । अग्निः क्षयं याति रसं न वेत्ति श्लेष्मा च पित्तं च निचीयतेऽस्य ॥३२॥
अत्यन्त उष्ण अन्नपान के सेवन से वीर्य, आर्तव तथा बीज दूषित हो जाते हैं, जाठराग्नि क्षीण हो जाती है, रस का ज्ञान नहीं होता तथा उसके शरीर में कफ एवं पित्त का संचय हो जाता है ॥३२॥
शीतान्नपानातिनिषेवणात्तु कफानिलारोचकशूलवाताः । हिक्काशिरोनेत्रगलग्रहाद्या आलस्यविण्मूत्रगुरुत्ववृद्धिः ॥३३॥
अत्यन्त शीतल अन्न-पान के सेवन से कफ एवं वायु के रोग तथा अरुचि, वातशूल, हिक्का, शिरोग्रह, नेत्रग्रह, गलग्रह, आलस्य, मल, मूत्र एवं शरीर के भारीपन में वृद्धि हो जाती है ॥३३॥
स्निग्धं च पूर्वं मधुरं च भोज्यं मध्ये द्रवं शीतमथो विचित्रम् । तीक्ष्णोष्णरूक्षाणि लघूनि पश्चाद् भोज्यानुपूर्वी खलु सात्म्यतश्च ॥३४॥
भोजन में सर्वप्रथम स्निग्ध एवं मधुर पदार्थों का सेवन करना चाहिये। भोजन के मध्य में शीतल द्रव्य पदार्थ एवं नाना प्रकार के व्यञ्जनों का प्रयोग करे तथा अन्त में तीक्ष्ण उष्ण, रूक्ष एवं लघु पदार्थों का सेवन करना चाहिये अथवा अपने सात्म्य के अनुसार भोजन करना चाहिये। यह भोजन का क्रम बतलाया गया है ॥३४॥
यः पैत्तिकः क्षीणकफो निरोगो मूर्च्छाश्रमात्यध्वनिपीडितश्च । अत्युष्णपानान्ननिषेवणाच्च दृष्टिर्हता मद्यनिषेवणाच्च ॥३५॥ शुष्कं कफं ष्ठीवति यश्च कृच्छ्रात् ष्ठीवंश्च यः क्लिश्यति निर्विकारः । क्लेशात् प्रसूते तृषिता च या स्त्री क्षीरोन्द्रियो यश्च मदात्ययार्तः ॥३६॥ मन्दाशिनो योषिति जागरूकाः संशोधनैर्यै मृदिताश्च मर्त्याः । दग्धाश्च वैसर्पविदाहिनश्च कासेन कोपेन मदेन चार्ताः ॥३७॥ उद्भ्रामितः पूगफलेन यश्च जग्धेन वा यो मदनेन मूढः । किंपाकभल्लातविषोपसृष्टाः क्षौद्राशिनो ये गरपीडिताश्च ॥३८॥