काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)
Kashyapa Samhita Hindi
महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा
स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंभोजनकल्पः ? ] कल्पस्थानम् ३०९
मद्यं पयस्तक्रमथो दधीनि येऽश्नन्ति वाराहमथापि मत्स्यान्।
ताम्बूलपूगोन्मथिताश्च ये स्युः कालोचिता यस्य भवेच्च तृष्णा ।। ३९ ।।
एते तथाऽन्येऽपि च तद्विधा ये तेषां जलं शीतमुशन्ति पथ्यम्।
विष्टम्भतृष्णाग्निनिपीडिता ये तथा लभन्ते बलसत्त्वपुष्टीः ।। ४० ।।
किन्हें शीतल जल हितकर है ?—जो पित्त प्रकृति वाला है तथा जिसमें कफ की क्षीणता है, जो रोग रहित है, जो मूर्च्छा, श्रम तथा अत्यधिक मार्गगमन से पीड़ित है, अत्यन्त उष्ण अन्नपान तथा मद्य के सेवन से जिसकी दृष्टि नष्ट हो गई है अथवा क्षीण हो गई है, जो कष्टपूर्वक शुष्क कफ थूकता है तथा थूकते हुए विकाररहित होने पर भी जिसे कष्ट होता है। जिस स्त्री को कष्ट से प्रसव हो तथा जिसे प्यास लगी हो, जिस व्यक्ति की इन्द्रियां क्षीण हो गई हैं तथा मदात्यय रोग से पीड़ित हो, जो कम भोजन करता हो, जो स्त्रियों में जागरूक हो अर्थात् अधिक मैथुन आदि करता हो, जो व्यक्ति संशोधनों के कारण कमजोर हो गये हों, जो दग्ध हो गये हों, जो विसर्प, विदाह, कास, कोप एवं मद से पीड़ित हैं, जो पूगफल (सुपारी) के अधिक सेवन से उद्भ्रान्त हो गया हो, जो मदनफल के सेवन से मूढ़ हो गया हो, जो किंपाक (कुचले) तथा भिलावे के विष से पीड़ित हों, जो मधु का नित्य सेवन करते हों, जो गर (संयोगज विष) से पीड़ित हों, जो मद्य, दूध, तक्र, दही, सूअर का मांस तथा मछली का सेवन करते हों, पान एवं सुपारी का जो प्रतिदिन व्यवहार करते हों, जिसकी कालोचित तृष्णा हो तथा जो विष्टम्भ तृष्णा एवं अग्नि से पीड़ित हों—इन उपर्युक्त तथा अन्य भी इसी प्रकार के व्यक्तियों के लिये शीतल जल पथ्य माना गया है। इससे उनका बल एवं सत्त्व (मन) पुष्ट होता है ।। ३५-४०।।
कौरुक्षेत्राः कुरवो नैमिषेयाः पाञ्चालमाणीचरकौसलेयाः ।
हारीतपादाश्चरशौरसेनामात्स्या दशार्णाः शिशिराद्रिजाश्च ।। ४१ ।।
सारस्वताः सिन्धुसौवीरकाख्या ये चान्तरे स्युर्मनुजाः कुरूणाम् ।
उद्गविपाट्सिन्धुवसातिजाश्च काश्मीरचीनापरचीनखश्याः ।। ४२ ।।
बाहीकदाशेरकशातसाराः सरामणा ये च परेण तेषाम् ।
एषामवक्षार्यशनादिरुक्ता सात्म्योचितत्वाद्विभिषा विधेया ।। ४३ ।।
सा ह्यास्य तृष्णां शमयत्युदीर्णां बलं च पुष्टिं च रुचिं च धत्ते ।
वातानुलोम्यं प्रकृतिस्थतां च विण्मूत्रदेहेन्द्रियजां करोति ।। ४४ ।।
संतर्पयत्याशु च तेन सैभ्यो हिता मता सात्म्यगुणेन चैव ।
कुरुक्षेत्र के रहने वाले, कुरु एवं निमिष के निवासी तथा पाञ्चाल, माणीचर, कौसल, हारीतपाद, चर, शूरसेन, मत्स्य, दशार्ण, शिशिराद्रि के रहने वाले, सारस्वत, सिन्धु, सौवीरक, तथा कुरूओं के मध्य में रहने वाले मनुष्य, उदग्, विपाट्, सिन्धु, वसातिज, काश्मीर, चीन, अपरचीन तथा खस के निवासी, बाहीक, दासेरक, शातसार तथा रामण देश के निवासियों के लिये सात्म्य होने के कारण वैद्यों ने क्षाररहित भोजन का विधान बताया है। इससे उनकी उदीर्ण हुई पिपासा शान्त होती है तथा बल, पुष्टि एवं अन्न में रुचि बढ़ती है। वायु की गति अनुलोम हो जाती है तथा मल, मूत्र और देह की सम्पूर्ण इन्द्रियां प्रकृतिस्थ हो जाती हैं। इसके द्वारा उस व्यक्ति का शीघ्र ही सन्तर्पण हो जाता हैं। सात्म्य गुण के कारण यह इनके लिये हितकर माना गया है ।। ४१-४४ ।।
पात्रेषु हृद्येषु सुपुष्पवत्सु भुञ्जीत देशे च मनोऽनुकूले ।। ४५ ।।
तक्रं शुक्तं दधि मस्तुगुडं च द्राक्षा मुख्याः सुकृताः शक्तवश्च ।