काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)
Kashyapa Samhita Hindi
महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा
स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)
पृष्ठ 670, कुल 942 में से
संदर्भ में पढ़ें| ३१० | काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम् | भोजनकल्पः ? ] |
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शीतं हितं दाडिमवारि चार्यं स्यात् सैन्धवं भूस्तृणपल्लवाश्च ।।४६।।
तानि त्रिवृद्वासककारवेल्लाद्रसः कुठरादिसमातुलुङ्गात् ।
स्यादार्द्रकयुताः शक्तवश्च सर्पिर्वरिष्ठं लघवः षाडवाश्च ।।४७।।
भक्ष्याश्च मुख्या लघवः सुपक्वाः सूपा रागाः पानकं मद्ययोगाः ।
अतो गणाद्युक्तिमवेक्ष्य कुर्यात् सात्यादवक्षारमथो विधिज्ञः ।।४८।।
हृदय को अच्छे लगने वाले तथा पुष्प युक्त पात्रों में मन के अनुकूल स्थान में बैठकर उन्हें तक्र, शुक्त, दधिमस्तु गुड़ (गुड़ के बने पदार्थ), द्राक्षा, अच्छी प्रकार बनाये हुए पदार्थ, सत्तू, शीतल एवं श्रेष्ठ अनार का रस, सैन्धव, भूस्तृण के पल्लव (कोमल पत्ते) तथा त्रिवृत्, बांसा, करेला, कुठेर एवं मातुलुङ्ग (बिजौरे) का रस, आर्द्रक स्वरस सहित सत्तू, उत्तम घृत तथा लघु षाडव (मधुर अम्ल) आदि पानक विशेष, लघु एवं सुपक्व प्रधान भक्ष्य पदार्थ, सूप (दाल), राग (अचार आदि), पानक तथा मद्य के प्रयोग—इत्यादि उपर्युक्त गण में से विधि को जानने वाला वैद्य सात्म्य के अनुसार द्रव्यों का प्रयोग करे। यह अवक्षारि (क्षाररहित) भोजन कहा गया है ।।४५-४८।।
काशीन्सपुण्ड्राङ्कवङ्ककाचान् ससा(ग)रानानुपकतौ(कौ)सलेयान् ।
पूर्वं समुद्रं च समाश्रिता ये किरातदेश्यानपि पूर्वशैलान् ।।४९।।
शाकैः समत्स्यामिषशालितैलैर्द्रव्यैश्च तीक्ष्णैः समुपक्रमेत ।
कफो हि तेषां निचितः स्वभावद्विलीयमानः कृशतां करोति ।।५०।।
इसके अतिरिक्त काशी, पुण्ड्र, अङ्क, बङ्ग, काच के रहने वाले सागरपर्यन्त एवं आनूप प्रदेश के कौसलवासी तथा पूर्व समुद्र के किनारे रहने वालों तथा पूर्वीय पर्वत के किरात देश के निवासियों को मछली का मांस, शालिचावल एवं तैलयुक्त शाक तथा अन्य तीक्ष्ण द्रव्य देने चाहिये। इनमें सञ्चित हुआ कफ स्वभाव से विलीन होता (पिघलता) हुआ शरीर में कृशता उत्पन्न कर देता है ।।४९-५०।।
कलिङ्गान् पट्टनवासिनश्च सदक्षिणान् वाऽपि च नार्मदेयान् ।
उच्चावचद्रव्यगुणान्विताभिः पेयाभिरेतान् समुपक्रमेत ।।५१।।
(इति ताडपत्रपुस्तके १८७ तमं पत्रम्)
तैलानि कङ्ग्वाढकीयावकाश्च मूलानि कन्दाश्चणकाः कलायाः ।
एतानि सात्म्यानि भवन्ति तेषां पेयास्तथोष्णाः परिसिद्धिकाश्च ।।५२।।
कलिङ्ग, पट्टन, दक्षिण तथा नर्मदा नदी के किनारे रहने वाले व्यक्तियों को नाना प्रकार के द्रव्यों के गुणों से युक्त पेयाओं का प्रयोग कराना चाहिये। इन लोगों को कङ्गु (प्रियङ्गु), आढकी (अरहर) तथा यावक (कुलथी) के तैल, मूल, कन्द, चने तथा मटर एवं पेया और उष्ण परिसिद्धिका (मण्ड विशेष) आदि सात्म्य होते हैं ।।५१-५२।।
पेया हि सिद्धा सह दाडिमेन तक्रेण चुक्रेण जलेन चोष्णा ।
ससैन्धवा चाशु विहन्ति तृष्णां कालोपपन्ना मरिचार्द्रकाभ्याम् ।।५३।।
अनारदाना, तक्र, चुक्र (सिरका) तथा उष्ण जल से सिद्ध की हुई पेया में सैन्धव, मरिच तथा आर्द्रक डालकर योग्य काल में प्रयोग कराने से तृष्णा शान्त हो जाती है ।।५३।।
१. परिसिद्धिका मण्डविशेषः।