भारतकोश
काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

Kashyapa Samhita Hindi

महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा

स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished942 पृष्ठ

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पृष्ठ 671

भोजनकल्पः ? ] कल्पस्थानम् ३११

पित्तात्मनः सर्पिषि संस्कृता वा क्षीरोदके शर्करयाऽन्विता वा।
ज्वरातिसारश्रममोहकासान् हिक्कां च तृष्णां च हिनस्ति पेया ।।५४।।

पित्त प्रकृति वाले मनुष्य को घृत में संस्कृत की हुई अथवा क्षीरोदक में सिद्ध की हुई पेया में शर्करा मिलाकर प्रयोग करने से ज्वर, अतिसार, श्रम, मोह, कास, हिक्का तथा तृष्णा नष्ट हो जाती है ॥५४॥

यद्यस्य सात्म्यं च हितं च भोज्यं शरीरदेशप्रकृतौ स्थितं च।
तत्तस्य वैद्यो विदधीत नित्यं काले च हृद्यं लघु मात्रया च।।५५।।

शरीर, देश एवं प्रकृति के अनुसार जिसके लिये जो भोजन सात्म्य तथा हितकर हो, वैद्य को चाहिये कि वह उसको नित्य योग्य समय एवं मात्रा में हृदय को अच्छा लगने वाला तथा लघु भोजन देवे ॥५५॥

स्तनस्य वामस्य भवत्यधस्तादामाशयस्तत्र विपच्यतेऽन्नम्।
धातूरसः प्रीणयते विसर्पन् किट्टान्मलानां प्रभवोऽखिलानाम्।।५६।।

वाम (बांये) स्तन के नीचे आमाशय (Stomach) होता है जिसमें अन्न का पाक होता है वहां से सम्पूर्ण शरीर में विसर्पण (गति) करता हुआ रस धातुओं को तृप्त करता है तथा किट्ट के द्वारा सारे मलों की उत्पत्ति होती है ॥५६॥

दीप्ताग्नयो वर्णबला थनश्च व्यायामनित्या बहुभाषिणश्च।
स्त्रीषु प्रसक्ताः क्षयिनो विनिद्रारोगैर्विमुक्ताः कृशदुर्बलाश्च ।।५७।।
विशुष्कविण्मूत्रकफाध्वखिन्नानिपीड्यमाना विषमज्वरैश्च।
एते नरा मांसरसं पिबेयुः प्राग्भोजनाद्वातविकारिणश्च ।।५८।।

मांसरस का सेवन किन्हें करना चाहिये—जिनकी जाठराग्नि दीप्त है, जो वर्ण एवं बल को चाहते हैं, जो नित्य व्यायाम करते हैं, जो बहुत बोलते हैं (अधिक बोलने का कार्य करते हैं), जो नित्य स्त्री-भोग आदि करते हैं, जिन्हें क्षय रोग हैं, जिन्हें नींद नहीं आती है, जो रोगों से युक्त हैं परन्तु कृश तथा दुर्बल हैं, जो शुष्क हैं, जो मल, मूत्र, कफ एवं अध्व (मार्गगमन) से खिन्न हुए हैं, जो विषम ज्वर से पीडित हैं तथा जिन्हें वायु के विकार हुए हैं—उन व्यक्तियों को भोजन से पूर्व मांसरस पिलाना चाहिये ॥५७-५८॥

प्रक्लिन्नकाया गलवक्त्ररोगैरार्ताः क्षताः पित्तकफादिताश्च।
ज्वरातिसारग्रहशोकनिद्राप्रमेहपाण्ड्वामयकामलार्ताः ।।५९।।
विषाान्विताश्चापि मदान्विता वा ये चोपसृष्टा विविधैर्गदैर्वा।
छर्द्दूरुविष्कम्भविकारिणश्च नैते नरा मांसरसं पिबेयुः ।।६०।।

मांसरस का किन्हें सेवन नहीं करना चाहिये—जिनका शरीर क्लिन्न है, जो गले तथा मुख के रोगों से पीड़ित हैं, जिन्हें क्षत एवं पित्त तथा कफ के रोग हैं, जिन्हें ज्वर, अतिसार, ग्रह रोग, शोक, अधिक निद्रा, प्रमेह, पाण्डु एवं कामला रोग हैं, जो विष, मद एवं अनेक प्रकार के संयोगज विषों से पीडित हैं, जिन्हें वमन तथा ऊरुस्तम्भ रोग हैं—उन्हें मांसरस का सेवन नहीं करना चाहिये ॥५९-६०॥

तक्रं तु तेषां भवति प्रशस्तं ससैन्धवं शर्करयाऽन्वितं वा।
सौवर्चलेनाथ विडेन युक्तं मध्येऽपि चान्तेऽपि सनावनीतम् ।।६१।।

इन व्यक्तियों के लिये भोजन के मध्य तथा अन्त में भी सैन्धव, शर्करा, सौवर्चल नमक, विडनमक एवं मक्खनयुक्त तक्र प्रशस्त मानी गई है ॥६१॥