भारतकोश
काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

Kashyapa Samhita Hindi

महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा

स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished942 पृष्ठ

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पृष्ठ 672

३१२ काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम् भोजनकल्पः ? ]

तक्रं हि सद्यो मथितं सुगन्धि रुचिं बलं पुष्टिमथो दधाति। अम्लोष्णवैशद्यलघु स्वरो(?) वा निषेव्यमाणं ज्वलयत्युदर्यम् ।।६२।।

ताजा मथा हुआ एवं सुगन्धित तक्र (मठा) रुचि, बल एवं पुष्टि को बढ़ाता है। यह अम्ल, उष्ण, विशदता करने वाला, लघु तथा स्वर को बढ़ाने वाला है। इसके सेवन करने से यह जाठराग्नि को प्रदीप्त करता है॥६२॥

वान्ते विरिक्ते ज्वरिते विशुष्के महोपवासश्रमपीडिते च। तृष्णातिसारोरुगदोपतप्ते वैसर्पपित्तामयघर्मिते च ।।६३।। संसृष्टरोगेषु महाशनेषु विदह्यमानेषु जलोदरेषु। सद्यःप्रसूतास्वपि चाङ्गनासु मण्डं विदध्यादपि कामलासु ।।६४।।

मण्ड का प्रयोग किन्हें कराना चाहिये ?—वमन एवं विरेचन कराने के बाद ज्वर में रोगी के ज्वर से शुष्क होने पर, दीर्घ उपवास एवं परिश्रम से पीड़ित होने पर, तृष्णा, अतिसार, ऊरुस्तम्भ, विसर्प, पैत्तिक रोग तथा धूप से पीड़ित व्यक्ति के संसृष्ट दोषों से उत्पन्न रोगों में, बहुत अधिक भोजन करने वालों को, जिनके शरीर के अन्दर विदाह हो रहा हो, जिन्हें जलोदर रोग हो तथा सद्यः प्रसूता स्त्रियों एवं कामला रोग में मण्ड का प्रयोग कराना चाहिये ॥६३-६४॥

आमातिसारज्वरयोर्विबन्धे कफोद्भवे श्वासगलामयेषु। हिक्कोपजिह्वागलशुण्डिकासु कासेऽक्षिरोगे शिरसो गुरुत्वे ।।६५।। छर्दिश्रमोन्मादविषूचिकासु योन्यामये प्लीह्नि च पीनसे च। गुल्मेषु हृद्रोगहलीमकेषु वातप्रकोपेष्वथ केवलेषु ।।६६।। धात्र्याः प्रवृद्धे पयसि प्रदुष्टे बालस्य निद्राकफवातवृद्धौ। मूत्राभिवृद्धौ हृदयद्रवे च निष्ठीविकालस्यविषादकेषु ।।६७।। छर्दिषु सर्वेषु तथा ग्रहेषु पृष्ठग्रहे यक्ष्मणि हृद्रदे च। चिन्ताश्रमोन्मादमदोपतापे मण्डं भिषङ्नोपदिशेद्विपश्चित् ।।६८।।

मण्ड का प्रयोग किन्हें नहीं कराना चाहिये ?—आमातिसार, ज्वर, विबन्ध, कफ से उत्पन्न श्वास एवं गलरोग, हिक्का, उपजिह्वा (Ranula), गलशुण्डिका (Enlarged uvula), कास, अक्षिरोग, सिर का भारीपन, वमन, श्रम, उन्माद, विसूचिका, योनि रोग, प्लीहा रोग, पीनस (प्रतिश्याय), गुल्म, हृद्रोग, हलीमक, शुद्ध वायु के प्रकोप, धात्री के प्रवृद्ध हुए दूध के दूषित होने, बालक के निद्राधिक्य तथा कफ एवं वायु की वृद्धि, मूत्रवृद्धि, हृदयद्रव (Palpitation of Heart), निष्ठीविका (थूक का बहुत आना), आलस्य, विषाद, छर्दिरोग, पृष्ठग्रह, यक्ष्मा, हृद्रोग तथा चिन्ता, श्रम, उन्माद एवं मद से पीड़ित अवस्था में विद्वान् वैद्य को मण्ड का प्रयोग नहीं कराना चाहिये ॥६५-६८॥

मण्डो हि पीतः कफिना गदे वा कफात्मके वर्धयते कफस्तान्। सोऽस्याग्निमुत्साद्य गदान् पुनस्तान् प्रकोपयन् कष्टतरान् करोति ।।६९।।

यदि कफ प्रकृतिवाला मनुष्य कफरोगों में मण्ड का सेवन करता है तो इससे उसके शरीर में कफ की वृद्धि होती है। जिससे उसकी जाठराग्नि मन्द हो जाती है तथा वे ही (कफ के) रोग पुनः प्रकुपित होकर कष्टसाध्य हो जाते हैं ॥६९॥

तस्मात्तु तेषां काफनां नराणां न मण्डमाहुर्भिषजः प्रशस्तम्। स्यान्मुद्गमण्डोदक एव तेषां ससैन्धवव्योषयुतः सुखाय ।।७०।।