भारतकोश
काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

Kashyapa Samhita Hindi

महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा

स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished942 पृष्ठ

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भोजनकल्पः ? ] कल्पस्थानम् ३१३

इसलिये कफ प्रकृतिवाले मनुष्यों को मण्ड का प्रयोग कराना वैद्य प्रशस्त नहीं मानते हैं। इन व्यक्तियों के लिये सैन्धव तथा त्रिकटु मिश्रित मुद्गमण्डोदक ही सुखकारी माना गया है॥७०॥

कषायतिक्तः कटुपाकिभावात् कफं निहन्त्याशु हि मुद्गमण्डः।
तस्मात् कृशं रोगविमुक्तदेहं दीप्तानलं वा सविलम्बिरोगम्॥७१॥
व्यायामिनं वा बलिनं सरोगं यश्चोचितो गोरसमांसमत्स्यैः।
संयोजयेत्तं विरसेन यूष्णा सास्रेण वा गोरससाधितेन॥७२॥

मुद्गमण्ड—रस में कषाय एवं तिक्त तथा विपाक में कटु होने के कारण शीघ्र ही कफ को नष्ट कर देता है। इस लिये जो कृश हैं, जिसका शरीर रोग से मुक्त हो गया है, जिसकी जाठराग्नि प्रदीप्त है, जिसे विलम्बिका रोग हुआ है, जो नित्य व्यायाम करता है, बलवान है तथा रोगयुक्त है, जिसे गोरस (गोदुग्ध), मांस, एवं मछली सात्म्य हैं—ऐसे व्यक्ति को मसालों से रहित तथा रक्त अथवा दूध से सिद्ध किया हुआ यूष देना चाहिये॥

वक्तव्य—विलम्बिका रोग-यह विसूचिका का ही एक भेद है। माधवनिदान में इसके लिये कहा है—दुष्टं च भुक्तं कफमारुताभ्यां प्रवर्तते नोर्ध्वमधश्च यस्य। विलम्बिकां तां भृशदुश्चिकित्स्यामाचक्षते शास्त्रविदः पुराणाः॥७१-७२॥

त्रिःप्रस्रुतो दीपनतोयसिद्धः स्यात्तण्डुलैः संपरिभृष्टकैर्वा।
मुद्गैर्यवैश्चापि तथैव लाजैरुष्णाः सुगन्धिविशदेन पीतः॥७३॥
(इति ताडपत्रपुस्तके १८८ तमं पत्रम्।)
मण्डः क्षणेनास्य बलं दधाति व्याधिस्तथा मार्दवमभ्युपैति।
सर्वेन्द्रियाणि प्रकृतिं भजन्ते भोज्यानुपूर्वी च तथा कृता स्यात्॥७४॥

तीन बार प्रस्रुत किये हुए तथा दीपनीय जल से सिद्ध किये हुए भुने हुए तण्डुल (चावल), मुद्ग, यव तथा लाजा (चावलों की खील) के बने हुए उष्ण सुगन्धि एवं विशद मण्ड के पीने से क्षण भर में बल की प्राप्ति हो जाती है, रोग मृदु (मन्द) हो जाता है तथा सम्पूर्ण इन्द्रियां प्रकृतिस्थ हो जाती हैं। इस प्रकार भोजन का क्रम होता है॥७३-७४॥

मण्डं यथोक्तं पिबतो गुणास्ते विपर्यये चापि विपर्ययः स्यात्।
य एव मण्डस्य भवन्ति योग्या .....................॥७५॥

यथोक्त मण्ड को पीने से उपर्युक्त गुण होते हैं। इसके विपरीत होने से गुणों में भी विपर्यय हो जाता है। जो व्यक्ति मण्ड के योग्य होते हैं (वे ही यवागू के भी योग्य होते हैं)॥७५॥

लघ्वी यवागूर्न विदह्यते च दोषानुलोम्यं विदधाति चोष्णा।
पित्तं च माधुर्यगुणेन हन्ति भोज्यानुपूर्वी क्रमशःश्च युङ्क्ते॥७६॥

यवागू लघु होने के कारण शरीर में दाह उत्पन्न नहीं करती है तथा इसका उष्ण अवस्था में प्रयोग करने से यह दोषों का अनुलोमन करती है। माधुर्य गुण के कारण यह पित्त को नष्ट करती है तथा क्रमशः भोजन के क्रम से युक्त होती है।

सदाडिमा वातकफार्दितस्य, सशर्करा पित्तकफान्वितस्य।
रसेन वा जाङ्गलकेन सिद्धा सगोरसा वा सह दाडिमैर्वा॥७७॥
हितां नृणां मारुतपीडितानां गुल्मे तथा प्लीह्नि च पीनसे च।
सभोजनस्नानविहारयानव्यायामसंभाषणगीतपथ्याम् ॥७८॥