भारतकोश
काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

Kashyapa Samhita Hindi

महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा

स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished942 पृष्ठ

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३१४ काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम् भोजनकल्पः ? ]

भिन्न २ अनुपान से यवागू सेवन—वात एवं कफ से पीडित रोगी में दाडिम, पित्त एवं कफ से पीडित में कर्करा तथा वात से पीडित और गुल्म, प्लीहा एवं पीनस रोगों में तथा भोजन, स्नान, विहार, यान, व्यायाम, संभाषण तथा गीत (गाना) जिन्हें हितकर है—उनमें भी जांगल मांसरस से सिद्ध की हुई अथवा गोरस (दूध) से सिद्ध करके अनारदाना पड़ी हुई पेया का प्रयोग कराना चाहिये। स्वस्थ अवस्था में भी रोग के निवृत्त हो जाने पर तथा अग्नि के मन्द होने पर इसे हितकारी माना गया है ।।७०-७८।।

तत्स्वस्थवृत्तौ च हितां वदन्ति रोगे निवृत्ते ज्वलने च मन्दे ।
रोगे निवृत्ते ज्वलने च दीप्ते रोगैविमुक्ताः कृशदुर्बलाश्च ।।७९।।
क्षीणेन्द्रिया वर्णबलाग्निहीनावातार्दिताः पित्तनिपीडिताश्च ।
ज्वरातिसारोदरपायुरोगचिन्तेष्यपानाध्वरोगतप्ताः ||८०||
कासेन शस्त्रेण विषेण चैव निपीडिताः शोकहताश्च नित्यम् ।
व्यायामगेयाध्ययनश्रमातर्धूमाग्निवातातपजागरात्र्ताः ||८१||
विदह्यमानाक्षिगलास्यनासाविषीदमानाः स्मृतिबुद्धिहीनाः ।
आनाहिनः शुष्कपुरीषमूत्राभगन्दराशग्रिहकुण्डलात्र्ताः ।।८२।।
निष्पिष्ठभग्नच्युतपी(डि)ताङ्गे शुद्धव्रणे मांसविवर्जिते च ।
जीर्णज्वरात्येद्यतृतीयकेषु नित्यज्वरे चापि चतुर्थके च ।।८३।।
रक्षःपिशाचोरगभूतयक्षुद्ब्रजतृष्णाग्निहिमाहताश्च ।
स्त्रीबालपुत्राल्यविशुष्कदुग्धागर्भश्च यस्या न विवर्धते च ।।८४।।
नाप्यायते यः स्तनपश्व बालो जागर्ति नित्यं भृशरोदनश्च ।
चक्षुर्हतिर्यस्य च तीक्षणनस्यैविशोषणैर्वा प्रतिकर्मणा वा ।।८५।।

दूध का प्रयोग किन्हें कराना चाहिये—रोग के निवृत्त होकर अग्नि के प्रदीप्त हो जाने पर तथा जो व्यक्ति रोगमुक्त हैं परन्तु कृश तथा दुर्बल हैं, जिनकी इन्द्रियां क्षीण हैं, वर्ण, बल तथा अग्नि जिनकी नष्ट हो गई है, जो वात तथा पित्त से पीडित हैं, एवं ज्वर, अतिसार, उदररोग, गुदरोग, चिन्ता, ईर्ष्या, पान (मद्यपान) एवं मार्गगमन के कारण जो रोगग्रस्त हैं, जो नित्य कास, शस्त्र, विष तथा शोक से पीडित हैं, व्यायाम, गीत तथा अध्ययन के श्रम से जो युक्त हैं; धूम, अग्नि, वायु, आतप (धूप) तथा जागरण के कारण जो पीडित हैं जिसके चक्षु, गला, मुख तथा नासिका में विदाह हो जाता हो, जिन्हें विषाद हो तथा जो स्मृति एवं बुद्धि से हीन हों, जिन्हें आनाह रोग हो, जिनका मल एवं मूत्र शुष्क हो, भगन्दर, अर्श, ग्रह एवं वातकुण्डल रोग से जो पीडित हैं, जिनका शरीर निष्पिष्ट (Lacirated), भग्न (Fracture) तथा च्युत (Dislocation) के कारण पीडित हो जिनका व्रण शुद्ध हो, जो मांस से रहित हों अर्थात् जिनके शरीर में मांस की कमी हो तथा जीर्णज्वर, अन्येद्युष्क, तृतीयक, नित्यज्वर तथा चातुर्थिक ज्वर में एवं जो राक्षस, पिशाच, सांप, भूत, यक्ष, क्षुधा, वज्र, तृष्णा, अग्नि तथा हिम से आहत हों, जो स्त्री अथवा बालक हों जिनके पुत्र अल्प हों तथा जिनका दूध सूख गया है, जिनका गर्भ वृद्धि को प्राप्त नहीं होता है, जो दूध पीने वाला बालक दूध से तृप्त नहीं होता है, जो नित्य जागता रहता है तथा अत्यन्त रोता है, तीक्ष्ण नस्यों, शोषणकारक द्रव्यों अथवा चिकित्सा के द्वारा जिसको नेत्ररोग हो गया हो तथा जो व्यक्ति विरेचन के योग्य हैं—इन सबों को शृत किये हुए दूध का प्रयोग करना चाहिये ।

वक्तव्य—शुद्धव्रण का सुश्रुत सू. अ. २३ में निम्न लक्षण दियां है—त्रिभिर्दोषैरनाक्रान्तः श्यावौष्ठः पिडकी समः । अवेदनो निरास्त्रावो व्रणः शुद्ध इहोच्यते ॥ अर्थात् जो व्रण तीनों दोषों से रहित हैं, जिसके किनारे (Edges) श्याव रंग