भारतकोश
काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

Kashyapa Samhita Hindi

महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा

स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished942 पृष्ठ

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भोजनकल्पः ? ] कल्पस्थानम् ३१५

के हैं, जिसमें सूक्ष्म पिडकाएँ (मांसांकुर-Granulations) हैं, जिसका तल सम है, जिसमें वेदना और स्राव अत्यन्त थोड़ा होता है—वह शुद्ध व्रण कहलाता है ॥७९-८५॥

एते शृतं क्षीरमथाभ्यसेयुरलं शृतं यस्तु विरेचनीयः ।
क्षीरं हि सद्यो बलमादधाति दृढीकरोत्याशु तथेन्द्रियाणि ॥८६॥
मेधायुरारोग्यसुखानि धत्ते रसायनं चापि वदन्ति मुख्यम् ।
पुष्टिर्दृढत्वं लभते च गर्भो बन्ध्या च षण्ढश्च जरंश्च सूते ॥८७॥
पायुं पयः शोधयतेऽनुलोमं करोति वातं लघुतां नराणाम् ।
तस्माच्च सर्वेषु रसायनेषु रोगस्य चान्ते प्रवदन्ति दुग्धम् ॥८८॥

दूध शीघ्र ही शरीर में बल को बढ़ाता है, इन्द्रियों को दृढ़ करता है, मेधा, आयु, आरोग्य एवं सुख को करता है तथा यह प्रधान रसायन माना जाता है। इससे गर्भ पुष्ट एवं दृढ़ होता है। इससे बन्ध्या, नपुंसक एवं वृद्ध स्त्री के भी सन्तान हो जाती है। दूध गुदा का शोधन करता है, वायु को अनुलोम करता है तथा मनुष्यों के शरीर में लघुता उत्पन्न करता है इसलिये सम्पूर्ण रसायनों तथा रोग के अन्त में दूध को श्रेष्ठ माना गया है ॥८६-८८॥

क्षीरं सात्म्यं, क्षीरमाहुः पवित्रं, क्षीरं मङ्गल्यं, क्षीरमायुष्यमुक्तम् ।
क्षीरं वर्ण्यं, क्षीरमाहुश्च केश्यं, क्षीरं सन्धानं क्षीरमाहुर्वयस्यम् ॥८९॥

दूध शरीर के लिये सात्म्य होता है, यह पवित्र करने वाला, मङ्गलकारक, आयुष्यकारक, वर्ण्य, केश्य, सन्धान कारक (टूटे हुए अंगों को जोड़ने वाला) तथा वयः-स्थापक है ॥८९॥

क्षीरं सर्वेषां देहिनां चानुशेते, क्षीरं पिबन्तं च न रोग एति ।
क्षीरात् परं नान्यदिहास्ति वृष्यं, क्षीरात् परं नास्ति च जीवनीयम् ॥९०॥

दूध सम्पूर्ण प्राणियों के लिये अनुकूल होता है, दूध पीने वाले व्यक्ति को रोग नहीं होते हैं, दूध से बढ़कर कोई भी वृष्य (वाजीकरण) द्रव्य नहीं है तथा जीवनीय द्रव्यों में भी दूध से बढ़कर कोई द्रव्य नहीं है ॥९०॥

शैत्यात् पयो वर्धयतेऽनिलं प्राक पित्तात्मनस्तेन भिनत्ति वर्चः ।
ईषच्च शूलं कुरुते गुरुत्वात् स्नेहाद्विपाके शमयत्युभे द्वे ॥९१॥

दूध शीतल होने से प्रारम्भ में शरीर में वायु की वृद्धि करता है पित्त प्रकृति वाले व्यक्ति को इससे विरेचन हो जाता है तथा गुरु होने से यह थोड़ा शूल उत्पन्न कर देता है परन्तु विपाक में स्निग्ध होने से यह दोनों (वायु तथा पित्त) को शान्त कर देता है ॥९१॥

माधुर्यतो वर्धयते शरीरं प्रसादयत्याशु तथेन्द्रियाणि ।
स्थैर्यं पयः सान्द्रतया करोति पैच्छिल्यतः शोधयतेऽन्तराणि ॥९२॥

मधुर होने से दूध शरीर की वृद्धि करता है और इन्द्रियों को प्रसन्न करता है। तथा सान्द्र होने के कारण शरीर में स्थिरता उत्पन्न करता है एवं पिच्छिल होने के कारण शरीर के आन्तरावयवों का शोधन करता है ॥९२॥

विष्टभ्यते चापि कषायभावाद्वातात्मनस्तेन करोति शूलम् ।
स्नेहाच्च माधुर्यगुणाच्च शूलं पयो नियच्छत्यनुजीर्यमाणम् ॥९३॥

कषाय होने से यह शरीर में विष्टम्भ उत्पन्न करता है तथा वातप्रकृति वाले पुरुष में शूल उत्पन्न कर देता है। परन्तु स्निग्ध एवं मधुर गुण के कारण दूध जीर्ण होने पर शूल को शान्त कर देता है ॥९३॥