काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)
Kashyapa Samhita Hindi
महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा
स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)
पृष्ठ 676, कुल 942 में से
संदर्भ में पढ़ें| ३१६ | काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम् | भोजनकल्पः ? ] |
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स्नेहाद्गुरुत्वात् सकषायशैत्याद्विस्रंस्य सद्यो बलमादधाति।
सस्नेहशैत्यान्मधुरान्वयत्वात् कफात्मनां वर्धयते कफं च ॥९४॥
(इति ताडपत्रपुस्तके १८९ तमं पत्रम्।)
दूध, स्निग्ध, गुरु, कषाय एवं शीतल होने के कारण शरीर में शीघ्र ही बल को बढ़ाता है। स्निग्ध शीतल एवं मधुर गुण के कारण कफ प्रकृति वाले मनुष्यों में यह कफ की वृद्धि करता है ॥९४॥
एतद्धितं सात्म्यकषायभावात् पाकस्य तुष्टिं कुरुते न दोषम्।
गौरं च वर्णं कुरुते सितत्वात् स्नेहं च सस्नेहतया करोति ॥९५॥
सात्म्य एवं कषाय होने के कारण यह शरीर के लिये हितकर है, यह पाचकाग्नि को सन्तुष्ट करता है तथा शरीर में कोई दोष (विकार) उत्पन्न नहीं करता है। दूध श्वेत होने के कारण वर्ण को गौर करता है तथा स्निग्ध होने के कारण शरीर में स्निग्धता उत्पन्न कर देता है ॥९५॥
शैत्यात् कषायाद्धनसान्द्रभावात् संपर्कतश्चाभिषवाच्च भाण्डे।
क्रमेण चोष्मोपचयान्निरुद्धं पयो दधित्व्याय शनैरुपैति ॥९६॥
पयो हि वातातपपीडितं द्राक्कूर्चीभवत्येष हि तत्र हेतुः।
औष्ण्याद्धनत्वादथ वर्धमानः संक्लेदनाच्चाभिषवाच्च दध्नः ॥९७॥
शीतल, कषाय, घन एवं सान्द्र होने के कारण तथा पात्र के सम्पर्क एवं सन्धान के (Fermentation) कारण क्रमशः ऊष्मा (गरमी) के उपचय (वृद्धि) के कारण निरुद्ध हुआ दूध धीरे २ दधिभाव को प्राप्त हो जाता है। अर्थात् दूध दही के रूप में परिणत हो जाता है। वायु एवं धूप से पीडित होने के कारण दूध में शीघ्र ही जो कूर्चीभाव (फुट्टियां) उत्पन्न हो जाता है उसका कारण यह है कि उसमें उष्णता एवं घनता के कारण धीरे २ क्लेद तथा सन्धान (Fermentation) हो जाता है ॥९६-९७॥
निर्वर्तयत्यम्लरसं पयोऽग्निर्मस्तुं तथा चाप्यतिवर्तमानः।
ऊर्ध्वं सरश्चोत्प्लवते स्वभावात् किट्टं ततोऽधश्च निषीदतेऽस्य ॥९८॥
अधिक मात्रा में बढ़ी हुई अग्नि (ऊष्मा) दूध में अम्ल रस एवं मस्तु (दधिमस्तु) को उत्पन्न कर देता है। इसका सरभाग (पतला भाग) स्वभाव से ही ऊपर तैरता रहता है तथा इसका किट्ट भाग नीचे रहता है। अर्थात् यदि उष्णता न हो तो दुग्ध में अम्लभाव उत्पन्न नहीं होता है तथा दही नहीं जमती है। दही जमने के लिये उष्णता का होना आवश्यक है। हम व्यवहार में भी प्रतिदिन देखते हैं कि शीतऋतु में हमें दही जमाने के लिये दूध को गरम स्थान पर तथा अग्नि के पास रखना पड़ता है तथा उसके लिये पर्याप्त प्रयत्न करना पड़ता है। अन्यथा दही नहीं जम पाती है ॥९८॥
दिव्येन च ज्ञानबलेन दृष्टं मुख्यैः(ख्यैः)पुरा मन्थनमस्य युक्त्या।
ततो घृतोदश्विद्रुपलभ्य गावः प्रतिष्ठाः सचराचरस्य ॥९९॥
प्राचीन काल में हमारे मुख्य २ ऋषियों ने दिव्य एवं ज्ञान बल से युक्तिपूर्वक दही के मन्थन को श्रेष्ठ माना है। दही के मन्थन से घृत एवं उदश्वित् (लस्सी) प्राप्त किया जाता है। इस प्रकार गौएं सम्पूर्ण चर एवं अचर (जड़ तथा चेतन) जगत् की प्रतिष्ठा का कारण हैं। अर्थात् गौएँ अपने दूध, दही, घृत तथा तक्र के द्वारा सम्पूर्ण जगत् का पोषण करती हैं ॥९९॥
तस्माच्चिरव्याधिनिपीडितानां मूर्च्छागतानां पततां नराणाम्।
परायणं क्षीरमुशन्ति वैद्या निद्रासुखायुर्बलकृत् पयो हि ॥१००॥