काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)
Kashyapa Samhita Hindi
महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा
स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंभोजनकल्पः ? ] कल्पस्थानम् ३१७
इसलिये जो व्यक्ति बहुत काल से रोग से पीडित हैं, मूर्च्छा से युक्त हैं तथा जो ऊपर से गिर पड़ते हैं—उनके लिये वैद्यलोग दूध को उत्कृष्ट पदार्थ मानते हैं। दूध निद्रा, सुख, आयु एवं बल को देने वाला है॥१००॥
मूढस्तु यः स्यान्मदनस्य बीजैर्भल्लातकैः पूगफलादिभिश्च।
पयो हि तस्योपदिशेद्द्विपश्चिद्गुडोदकं वा शिशिरं पिबेत् सः॥१०१॥
क्षीरेण चैनं सगुडेन नित्यं संभोजयेत् सर्पिषि संस्कृतेन।
धान्वीरकार्तेऽपि तथैव कार्यं क्षीरं हि तस्यौषधमुक्तमग्न्यम्॥१०२॥
जो मैनफल के बीज, भिलावे तथा सुपारी के कारण मूढ़ हुआ है, उसे विद्वान् व्यक्ति दूध का प्रयोग कराये अथवा उसे ठण्डा किया हुआ गुडोदक पिलाये। अथवा उसे घृत में संस्कृति किये हुए गुड़युक्त दुग्ध का सेवन कराना चाहिये। धान्वीरक रोग (इसका अभिप्राय संभवतः धनुःस्तम्भ आदि वात रोग से है) से पीडित व्यक्ति में भी यह उपक्रम करना चाहिये। दूध इसकी श्रेष्ठ औषध कहा गया है॥१०१-१०२॥
आनूपजो जाङ्गलजो वरिष्ठः सुभूमिजातो गुरुबद्धचक्षुः।
सामुद्रषण्ढे(पौण्ड्रे)क्षुकवंशकानाभिक्षुः प्रशस्तस्तु परः परो यः॥१०३॥
उपर्युक्त रोग में आनूप एवं जांगल देश में उत्पन्न होने वाला, श्रेष्ठ, उत्तम भूमि में उत्पन्न हुआ गुरु एवं बंधे हुए चक्षु (अंकुर) वाला तथा सामुद्र, पौण्ड्र एवं इक्षुक वंश (जाति) वाला इक्षु अत्यन्त प्रशस्त माना गया है॥१०३॥
स्वादुः शीतः पुष्टिकृद्दीपनीयः स्निग्धो वृष्यो वर्णचक्षुःप्रसादी।
श्लेष्माणमुत्क्लेदयते च जग्धो रसस्तु पीतः कुरुते विदाहम्॥१०४॥
इक्षु स्वादु (मधुर), शीतल, पुष्टिकारक, दीपक, स्निग्ध, वृष्य तथा वर्ण एवं चक्षु को प्रसन्न करने वाला होता है। दांत से चबाकर पिया हुआ गन्ने का रस श्लेष्मा को बढ़ाता है तथा पिरा हुआ रस (अर्थात् यन्त्र-कोल्हू आदि से निकाला हुआ) विदाह को उत्पन्न करता है। गन्ने का स्वयं दांतों से चबाकर निकाला हुआ रस श्रेष्ठ माना गया है। कोल्हू से निकाला हुआ रस शरीर में विदाह उत्पन्न करता है। चरक सू. अ. २७ में कहा है—वृष्यः शीतः स्थिरः स्निग्धो बृंहणो मधुरो रसः। श्लेष्मलो भक्षितस्येक्षोर्यान्त्रिकस्तु विदाह्यते॥ इसीप्रकार सुश्रुत सू. अ. ४५ में भी कहा है। यान्त्रिक अथवा कोल्हू से निकले हुए रस के विदाही होने के कारण अष्टाङ्गहृदय सू. अ. ५ में बताया है—मूलाग्रजन्तुजग्धादिपीडनान्मलसङ्करात्। किंचित्कालं विधृत्या च विकृति याति यान्त्रिकः॥ विदाही गुरु विष्टम्भी तेनासौ॥ अर्थात् यान्त्रिक रस ईख के मूल, अग्रभाग, एवं कीटयुक्त अंश के पेरे जाने से, उसमें मिट्टी आदि मल के मिले होने से अथवा कुछ काल पड़ा रहने से विदाही, गुरु एवं विष्टम्भी हो जाता है॥१०४॥
भुक्त्वा पिबेदिक्षुरसं कफात्मा प्राग्भोजनात् पैत्तिकवातिकौ तु।
संसृष्टदोषस्य हितोऽन्नमध्ये तथाहि सर्वे सुखमाप्नुवन्ति॥१०५॥
कफप्रकृति वाले मनुष्य को भोजन के बाद तथा वात एवं पित्तप्रकृति वाले मनुष्य को भोजन से पूर्व और संसृष्ट दोष वाले व्यक्ति को भोजन के मध्य में इक्षुरस का पान करना चाहिये। इस प्रकार इसके द्वारा सम्पूर्ण व्यक्ति सुख (स्वास्थ्य) को प्राप्त करते हैं॥१०५॥
इति प्रकृत्येक्षुरसप्रकारा रोगांस्तु वक्ष्यामि हितार्थमेषाम्।
ज्वरातिसारामगलामयेषु विसूचिकाकुष्ठवि(कि)लासकासे॥१०६॥
पाण्ड्वामये शूलजलोदरेषु छर्द्यां कफोद्रेकविरिक्तवान्ते।
नस्तः क्रियावस्तिनिरूहितेषु स्वरोपघातक्षयपीनसेषु॥१०७॥