काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)
Kashyapa Samhita Hindi
महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा
स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें३१८ काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम् भोजनकल्पः ? ]
प्रमेहशोथोरुगदेषु नाद्याद्रोगेष्वभिष्यन्दसमुत्थितेषु । ग्रहेषु सर्वेषु पयोऽतिवृद्धौ बालेऽतिनिद्रे कफरोगिते च ॥१०८॥
इस प्रकार प्रकृति के अनुसार इक्षुरस के भेदों का वर्णन किया गया है। अब मैं इनके हित के लिये रोगों का वर्णन करूंगा। इक्षु का सेवन किन्हें नहीं करना चाहिये—ज्वर, अतिसार, आमदोष, गलरोग, विसूचिका, कुष्ठ, किलास, कास, पाण्डुरोग, शूल, जलोदर तथा वमन रोग में, विरेचन एवं वमन में कफ का उद्रेक (अधिकता) होने पर, नस्य, बस्ति एवं निरूह कराने के बाद, स्वपोघात, क्षय एवं पीनस रोग में, प्रमेह, शोथ एवं ऊरुस्तम्भ में, अभिष्यन्द से उत्पन्न हुए रोगों में, सम्पूर्ण ग्रहरोग, दूध की अत्यधिक वृद्धि, बालक के अत्यन्त निद्रायुक्त होने पर तथा कफ का रोग होने पर इक्षु का प्रयोग नहीं करना चाहिये ॥१०६-१०८॥
इक्षुः प्रयोगो न हितो, हितस्तु येषामिमांस्तानपि मे निबोध ।। जीर्णज्वरारोचकरक्तपित्तकासक्षतक्षीणकफक्षयेषु ।।१०९।। तृष्णाग्निविसर्पमदात्ययेषु मूत्रामये कर्णशिरोक्षिवाते ।। त्वङ्मांसवर्णद्युतिबुद्धिरेतोनिद्राबलौजोरुधिरक्षयेषु ।।११०।।
जिन रोगियों के लिये इक्षुरस हितकर है वे भी तू मेरे से सुन—जीर्ण ज्वर, अरोचक, रक्तपित्त, कास, क्षत, क्षीण एवं कफ के क्षय में तथा तृष्णा, अग्निविसर्प, मदात्यय, मूत्ररोग, कर्ण, शिर, अक्षि एवं वायुरोग में, त्वचा, मांस, वर्ण, द्युति, बुद्धि, रेतस् (वीर्य), निद्रा, बल, ओज तथा रक्त के क्षय में, तथा जिन २ के लिये दूध हितकर होता है उन सबोंके लिये तथा शिशुओं के लिये इक्षुरस हितकर होता है ॥१०९-११०॥
येषामथोक्तं च पयः प्रशस्तं तेषां हितश्चेक्षुरसः शिशूनाम् ।। कफप्रसेकारुचितृप्तिमोहशूलप्रतिश्यायगलामयार्तान् ।।१११।।
जिन व्यक्तियों को कफप्रसेक (कफयुक्त लालास्राव होना), अरुचि, तृप्ति, मोह, शूल, प्रतिश्याय, गलरोग, प्रमेह, हल्लास, जडता तथा अग्निनाश हो—उनमें अधिक मात्रा में पिया हुआ रस ज्वर को उत्पन्न करता है ॥१११॥
प्रमेहहल्लासजडाग्निनाशान् रसोऽतिपीतः कुरुते ज्वरं च ।। इत्येष धन्यः प्रवरश्च कल्पो भोज्यं प्रति प्रश्न उदाहृतस्ते ।।११२।। नृणां हितार्थं भिषजां च वृद्ध ! सुखस्य मूलं प्रवदन्ति धर्म्यम् ।।११३।।
इति ह स्माह भगवान् कश्यपः ।। (इति कल्पस्थाने) भोजनकल्पः ।
इस प्रकार हे वृद्धजीवक ! मनुष्यों तथा वैद्यों के हित के लिये भोजन के प्रति यह धन्य एवं श्रेष्ठ कल्प तुम्हारे लिये कहा गया है । इसे सुख एवं धर्म का मूल कहा गया है ॥११२-११३॥
ऐसा भगवान् कश्यप ने कहा था ?
(इति कल्पस्थाने) भोजनकल्पः ।