काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)
Kashyapa Samhita Hindi
महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा
स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंविशेषकल्पः ? ] कल्पस्थानम् ३१९
विशेषकल्पाध्यायः ।।
अथातो विशेषकल्पं नामाध्यायं व्याख्यास्यामः ।। १ ।।
इति ह स्माह भगवान् कश्यपः ।। २ ।।
अब हम विशेषकल्प नामक अध्याय का व्याख्यान करेंगे। ऐसा भगवान् कश्यप ने कहा था। (इस अध्याय में सन्निपातज्वर के विशेष लक्षण आदि कहे जायेंगे) ।।१-२।।
हुताग्निहोत्रमासीनं कश्यपं लोकपूजितम् । वृद्धो विशेषमन्विच्छन् पप्रच्छ विनये स्थितः ।। ३ ।।
अग्निहोत्र में आहुति देकर बैठे हुये, ऐसे लोक में पूजित महर्षि कश्यप से सन्निपातों के विशेषों को जानने की इच्छा से विनययुक्त वृद्धजीवक ने निम्न प्रश्न किया ।।३।।
सूत्रस्थाने भगवता निर्दिष्टो द्विविधो ज्वरः । हेतुलिङ्गौषधज्ञानैः प्रतिपन्नोऽस्मि तं तथा ।। ४ ।।
संशयस्त्वस्ति भगवन् ! सन्निपातज्वरं प्रति । तन्न मे संशयं छिन्धि विशेषज्ञ ! विशेषणैः ।। ५ ।।
भगवन् ! सूत्रस्थान में आपने हेतु (Causes), लिङ्ग (Symptoms) तथा औषध (Treatment) आदि के ज्ञान सहित दो प्रकार के ज्वर का निर्देश किया था, उसे मैंने सम्यक् प्रकार से जान लिया है। परन्तु भगवन् ! सन्निपात ज्वर के प्रति मुझे कुछ संशय है। इसलिये हे सन्निपातज्वरों के विशेषज्ञ ! उस विषय में विशेषणों के द्वारा आप मेरे संशय को दूर करें ।।४-५।।
किमेकः सन्निपातोऽयं किं वा किं बहवो मुने ! ।
(इति ताडपत्रपुस्तके १९० तमं पत्रम्)
एकश्चेत् किं समैर्दोषैरनेकत्वं कथं पुनः ।। ६ ।।
हे मुनि ! सन्निपात एक ही होता है अथवा अनेक होते हैं ? । यदि दोषों की समानता के कारण वह एक ही होता है तो वह अनेक प्रकार का कैसे हो जाता है ? ।।६।।
वातपित्तकफानां तु त्रयाणां संप्रकुप्यताम् । क एषां प्रथमं दोषः प्रकुप्यति महामुने ! ।। ७ ।।
युगपद्वा प्रकुप्यन्ति दोषाः किं वाऽनुपूर्वशः । प्रकुप्यतां वा विषममेकैकश्येन वा पुनः ।। ८ ।।
विशेषाः के महाभाग ! दोषव्याससमासतः ।
सन्निपाताः कियन्तो वा कानि नामानि वा पृथक् ।। ९ ।।
उपद्रवाश्च के तेषां परिहारविधिश्च कः । उपक्रमश्च कस्तेषां साध्यासाध्यवराश्च के ।। १० ।।
भगवन् ! वात, पित्त, कफ आदि प्रकुपित होते हुए तीनों दोषों में पहले कौन सा दोष प्रकुपित होता है ? ये तीनों दोष एक साथ प्रकुपित होते हैं अथवा आगे-पीछे करके प्रकुपित होते हैं अथवा आगे-पीछे करके प्रकुपित होते हैं ? हे महाभाग ! (ऐश्वर्यशालिन्) प्रकुपित होते हुए इन दोषों में पृथक् २ क्या विशेषताएँ होती हैं ? दोषों की व्यष्टि एवं समष्टि के अनुसार सन्निपातों की संख्या कितनी होती है ? उनके पृथक्-पृथक् क्या नाम है ? उनके उपद्रव, परिहार विधि तथा चिकित्सा क्या हैं ? उनमें से कौन से साध्य एवं कौन से असाध्य हैं ? ।।७-१०।।
इति पृष्टः स विष्येण स्थविरेण प्रजापतिः । सन्निपातविशेषार्थमद्भुतं वाक्यमब्रवीत् ।। ११ ।।
४३ का.सं.