भारतकोश
काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

Kashyapa Samhita Hindi

महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा

स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished942 पृष्ठ

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पृष्ठ 680

३२० काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम् विशेषकल्पः ? ]

इस प्रकार ज्ञानी शिष्य द्वारा प्रश्न किये जाने पर सन्निपातों के विशेष ज्ञान के लिये प्रजापति कश्यप ने निम्न आश्चर्यजनक उपदेश दिया ॥११॥

शृणु भार्गव ! तत्त्वार्थं सन्निपातविशेषणम् । जानते भिषजो नैनं बहवोऽकृतबुद्धयः ॥१२॥

हे भार्गव ! तत्त्वज्ञान के लिये सन्निपातों के विशेषों (भेदों) को तू सुन क्योंकि बहुत से अज्ञानी वैद्य इसे नहीं जानते हैं ॥

शीतोपचारात् सूतानां मैथुनाद्विषमाशनात् । प्रजागराद्दिवास्वप्राच्चिन्तेर्ष्याल्लौल्यकर्षणात् ॥१३॥
तथा दुःखप्रजातानां व्यभिचारात् पृथग्विधात् । शिशोर्दुष्टपयःपानात्तथा संकीर्णभोजनात् ॥१४॥
विरुद्धकर्मपानान्नसेविनां सततं नृणाम् । अभोजनादध्यशनाद्विषमाजीर्णभोजनात् ॥१५॥
सहसा चान्नपानस्य परिवर्तार्द्दितोस्तथा । विषोपहतवाय्वम्बुसेवनाद्गरदूषणात् ॥१६॥
पर्वतोपत्यकानां च प्रतिकूले विशेषतः । अवप्रयोगात् स्नेहानां पञ्चानां चैव कर्मणाम् ॥१७॥
यथोक्तानां च हेतूनां मिश्रीभावाद्यथोच्छ्रिताः । त्रयो दोषाः प्रकुप्यन्ति क्षीणे चायुषि भार्गव ! ॥१८॥

हे भार्गव ! प्रसूता तथा दुःखप्रजाता (जिन्हें कष्टपूर्वक प्रसव हुआ हो) स्त्रियों के शीत उपचार, मैथुन, विषमाशन (विषम भोजन), रात्रि जागरण, दिवा स्वप्न, चिन्ता, ईर्ष्या, जिह्वालौल्य तथा अपकर्षण से, नाना प्रकार के व्यभिचार से, बालक के दूषित दूध के पीने तथा संकीर्ण भोजन से, मनुष्यों के निरन्तर विरुद्ध कर्म, विरुद्धपान एवं विरुद्ध भोजन के सेवन से, भोजन के न करने से, अध्यशन (पूर्व भोजन के ऊपर पुनः भोजन) करने से, विषम एवं अजीर्ण भोजन से, अन्नपान एवं ऋतु के सहसा परिवर्तन से, विष से दूषित वायु एवं जल के सेवन से, गरविष (संयोगज विष) से दूषित होने के कारण, विशेषकर प्रतिकूल अवस्थाओं में पर्वत एवं उपत्यकाओं (तलहटी-Valley) में रहने से, स्नेहन एवं पञ्चकर्म के असम्यक् प्रयोग से तथा उपर्युक्त हेतुओं के मिश्रित हो जाने से और आयु के क्षीण होने पर बढ़े हुए तीनों दोष प्रकुपित हो जाते हैं ॥१३-१८॥

ततो ज्वरादयो रोगाः पीडयन्ति भृशं नरम् । सर्वदोषविवोधाच्च दुश्िकित्स्यो महागदः ॥१९॥

तब ज्वर आदि रोग रोगी को अत्यन्त पीडित करते हैं। सम्पूर्ण दोषों के परस्पर विरुद्ध होने से यह महाव्याधि अत्यन्त दुश्िकित्स्य होती है ॥१९॥

यथाऽग्निवज्रपवनैर्न स्यादभिहतो द्रुमः । वातपित्तकफैस्तद्वत् क्रुद्धैर्देही न जीवति ॥२०॥

जिस प्रकार अग्नि, वज्र, एवं पवन के द्वारा आहत वृक्ष जीवित नहीं रहता उसी प्रकार वात, पित्त, कफ आदि तीनों दोषों के प्रकुपित हो जाने से व्यक्ति (रोगी) जीवित नहीं रहता ॥२०॥

विषाग्निशस्त्रैर्युगपन्न जीवन्ति यथा हताः । सन्निपातार्दितास्तद्वन्न जीवन्त्यतपस्विनः ॥२१॥

जिस प्रकार विष, अग्नि एवं शस्त्रों के द्वारा एक साथ अहित हुआ व्यक्ति जीवित नहीं रहता उसी प्रकार सन्निपात के द्वारा पीडित हुए रोगी भी जीवित नहीं रहते ॥२१॥

द्वयं तदुपरिष्टाच्च यथा प्रज्वलितं गृहत् । न शक्यते परित्रातुं सन्निपातस्तथा नृषु ॥२२॥

जिस प्रकार ऊपर एवं नीचे दोनों ओर से जलते हुए गृह की रक्षा नहीं की जा सकती उसी प्रकार मनुष्यों में सन्निपात से भी रक्षा नहीं की जा सकती ॥२२॥