भारतकोश
काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

Kashyapa Samhita Hindi

महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा

स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished942 पृष्ठ

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विशेषकल्पः ? ] कल्पस्थानम् ३२१

दिग्धबाणास्त्रयो व्याधाः परिवार्य यथा मृगम् । घ्नन्त्यनौषधयस्तद्वत्त्रयो दोषाः शरीरिणम् ।। २३ ।।

जिस प्रकार विष से बुझे हुए बाणों वाले तीन व्याध (शिकारी) मृग को चारों ओर से घेर कर मार देते हैं उसी प्रकार ओषधियों के अभाव में तीनों वात, पित्त, कफ आदि दोष रोगी को मार देते हैं ॥२३॥

संगता नियतं यस्मात् पातयन्ति कलेवरम् । अन्यच्चाशु संनिपतयतो वा सन्निपातता ।। २४ ।।

क्योंकि ये तीनों दोष मिलकर निश्चितरूप से शरीर को नष्ट कर देते हैं इसलिये इसे सन्निपात कहते हैं अथवा शीघ्र ही नष्ट करने के कारण सन्निपात कहते हैं ॥२४॥

अकस्मादिन्द्रियोत्पत्तिरकस्मान्मूत्रदर्शनम् । अकस्माच्छीलविकृतिः सन्निपाताग्रलक्षणम् ।। २५ ।।

सन्निपातज्वर के मुख्य लक्षण—इसमें सहसा इन्द्रियों के विषयों की उत्पत्ति होती है, सहसा मूत्र आ जाता है तथा सहसा स्वभाव में परिवर्तन हो जाता है। ये सन्निपात ज्वर के मुख्य लक्षण होते हैं। चरक चि. अ. ३ में सन्निपात ज्वर के निम्न लक्षण दिये हैं—क्षणे दाहः क्षणे शीतमस्थिसन्धिशिरोरुजा । सास्रावे कलुषे रक्ते निर्भुग्ने चापि दर्शने ।। सस्वनौ सरुजौकर्णौ कण्ठः शूकैरिव वृतः । तन्द्रा मोहः प्रलापश्च कासः श्वासोऽरुचिर्भ्रमः ।। परिदग्धा खरस्पर्शा जिह्वा स्रस्ताङ्गता परम् । ष्ठीवनं रक्तपित्तस्य कफेनोन्मिश्रितस्य च । शिरसो लोठनं तृष्णा निद्रानाशो हृदि व्यथा । स्वेदमूत्रपुरीषाणां चिराद्दर्शनमल्पशः ।। कृशत्वं नातिगात्राणां प्रततं कण्ठकूजनम् । कोठानां श्यावरक्तानां मण्डलानां च दर्शनम् ।। मूकत्वं स्रोतसां पाको गुरुत्वमुदरस्य च । चिरात्पाकश्च दोषाणां सन्निपातज्वराकृतिः ॥२५॥

निर्दिष्टास्तस्य भेदास्तु भिषक्श्रेष्ठैस्त्रयोदश । हीनमध्याधिकसमद्व्युद्बलैकोद्भवैः¹ लोद्भवाः ।। २६ ।।

श्रेष्ठ वैद्यों ने उस सन्निपात के हीन (निकृष्ट), मध्य, अधिक (प्रधान) अर्थात् तरतम आदि के भेद से सम (तीनों दोषों की समावस्था), दो दोषों की प्रबलता (प्रधानता) एवं एक दोष की प्रबलता के अनुसार १३ भेद कहे हैं। चरक चि. अ. ३ में भी १३ प्रकार के सन्निपात दिये हैं—सन्निपातज्वरस्योर्ध्वं त्रयोदशविधस्य हि । प्राक् सूत्रितस्य वक्ष्यामि लक्षणं वै पृथक् पृथक् ।। इसी प्रकार अष्टाङ्गहृदय.में भी कहा है॥

वातपित्ताधिको यस्य सन्निपातः प्रकुप्यति । तस्य ज्वरोऽङ्गमर्दस्तृट्तालुशोषप्रमीलिकाः ।। २७ ।। अरुचिस्तन्द्रिविड्भेदश्वासकासश्रमभ्रमाः ।

ये १३ भेद निम्न हैं—जिसके वातपित्तप्रधान (कफमन्द) सन्निपात प्रकुपित हो जाता है—उसे ज्वर, अङ्गमर्द, तृषा, तालुशोष, प्रमीलक (मूढता), अरुचि, तन्द्रा अति सार, श्वास, कास, श्रम तथा भ्रमरोग हो जाते हैं। चरक चि. अ. ३ में भी कहा है—भ्रमः पिपासा दाहश्च गौरवं शिरसोऽतिरुक् । वातपित्तोल्वणे विद्याल्लिङ्गं मन्दकफे ज्वरे ॥२७॥

पित्तश्लेष्माधिको यस्य सन्निपातः प्रकुप्यति ।। २८ ।। अन्तर्दाहो बहिः शीतं तस्य तृष्णा च वर्धते । तुद्यते दक्षिणं पार्श्वमुरः शीर्षगलग्रहः ।। २९ ।। निष्ठीवति कफं सासृक्कच्छ्रात् कण्ठश्च दूयते । विड्भेदश्वासहिक्काश्च वर्धन्ते सप्रमीलकाः ।। ३० ।।

जिसके पित्तश्लेष्मप्रधान (वातहीन) सन्निपात प्रकुपित हो जाता है उसके शरीर के आन्तरिक भाग में गरमी परन्तु शरीर का बाह्यभाग ठण्डा होता है। उसे प्यास बहुत लगती है। उसके दायें पार्श्व में वेदना होती है। छाती, सिर एवं


१. प्रबलैकदोष-प्रबलद्विदोषभवा इत्यर्थः ।