काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)
Kashyapa Samhita Hindi
महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा
स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)
भोजनकल्पः ? ] कल्पस्थानम् ३११
पित्तात्मनः सर्पिषि संस्कृता वा क्षीरोदके शर्करयाऽन्विता वा।
ज्वरातिसारश्रममोहकासान् हिक्कां च तृष्णां च हिनस्ति पेया ।।५४।।
पित्त प्रकृति वाले मनुष्य को घृत में संस्कृत की हुई अथवा क्षीरोदक में सिद्ध की हुई पेया में शर्करा मिलाकर प्रयोग करने से ज्वर, अतिसार, श्रम, मोह, कास, हिक्का तथा तृष्णा नष्ट हो जाती है ॥५४॥
यद्यस्य सात्म्यं च हितं च भोज्यं शरीरदेशप्रकृतौ स्थितं च।
तत्तस्य वैद्यो विदधीत नित्यं काले च हृद्यं लघु मात्रया च।।५५।।
शरीर, देश एवं प्रकृति के अनुसार जिसके लिये जो भोजन सात्म्य तथा हितकर हो, वैद्य को चाहिये कि वह उसको नित्य योग्य समय एवं मात्रा में हृदय को अच्छा लगने वाला तथा लघु भोजन देवे ॥५५॥
स्तनस्य वामस्य भवत्यधस्तादामाशयस्तत्र विपच्यतेऽन्नम्।
धातूरसः प्रीणयते विसर्पन् किट्टान्मलानां प्रभवोऽखिलानाम्।।५६।।
वाम (बांये) स्तन के नीचे आमाशय (Stomach) होता है जिसमें अन्न का पाक होता है वहां से सम्पूर्ण शरीर में विसर्पण (गति) करता हुआ रस धातुओं को तृप्त करता है तथा किट्ट के द्वारा सारे मलों की उत्पत्ति होती है ॥५६॥
दीप्ताग्नयो वर्णबला थनश्च व्यायामनित्या बहुभाषिणश्च।
स्त्रीषु प्रसक्ताः क्षयिनो विनिद्रारोगैर्विमुक्ताः कृशदुर्बलाश्च ।।५७।।
विशुष्कविण्मूत्रकफाध्वखिन्नानिपीड्यमाना विषमज्वरैश्च।
एते नरा मांसरसं पिबेयुः प्राग्भोजनाद्वातविकारिणश्च ।।५८।।
मांसरस का सेवन किन्हें करना चाहिये—जिनकी जाठराग्नि दीप्त है, जो वर्ण एवं बल को चाहते हैं, जो नित्य व्यायाम करते हैं, जो बहुत बोलते हैं (अधिक बोलने का कार्य करते हैं), जो नित्य स्त्री-भोग आदि करते हैं, जिन्हें क्षय रोग हैं, जिन्हें नींद नहीं आती है, जो रोगों से युक्त हैं परन्तु कृश तथा दुर्बल हैं, जो शुष्क हैं, जो मल, मूत्र, कफ एवं अध्व (मार्गगमन) से खिन्न हुए हैं, जो विषम ज्वर से पीडित हैं तथा जिन्हें वायु के विकार हुए हैं—उन व्यक्तियों को भोजन से पूर्व मांसरस पिलाना चाहिये ॥५७-५८॥
प्रक्लिन्नकाया गलवक्त्ररोगैरार्ताः क्षताः पित्तकफादिताश्च।
ज्वरातिसारग्रहशोकनिद्राप्रमेहपाण्ड्वामयकामलार्ताः ।।५९।।
विषाान्विताश्चापि मदान्विता वा ये चोपसृष्टा विविधैर्गदैर्वा।
छर्द्दूरुविष्कम्भविकारिणश्च नैते नरा मांसरसं पिबेयुः ।।६०।।
मांसरस का किन्हें सेवन नहीं करना चाहिये—जिनका शरीर क्लिन्न है, जो गले तथा मुख के रोगों से पीड़ित हैं, जिन्हें क्षत एवं पित्त तथा कफ के रोग हैं, जिन्हें ज्वर, अतिसार, ग्रह रोग, शोक, अधिक निद्रा, प्रमेह, पाण्डु एवं कामला रोग हैं, जो विष, मद एवं अनेक प्रकार के संयोगज विषों से पीडित हैं, जिन्हें वमन तथा ऊरुस्तम्भ रोग हैं—उन्हें मांसरस का सेवन नहीं करना चाहिये ॥५९-६०॥
तक्रं तु तेषां भवति प्रशस्तं ससैन्धवं शर्करयाऽन्वितं वा।
सौवर्चलेनाथ विडेन युक्तं मध्येऽपि चान्तेऽपि सनावनीतम् ।।६१।।
इन व्यक्तियों के लिये भोजन के मध्य तथा अन्त में भी सैन्धव, शर्करा, सौवर्चल नमक, विडनमक एवं मक्खनयुक्त तक्र प्रशस्त मानी गई है ॥६१॥
३१२ काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम् भोजनकल्पः ? ]
तक्रं हि सद्यो मथितं सुगन्धि रुचिं बलं पुष्टिमथो दधाति। अम्लोष्णवैशद्यलघु स्वरो(?) वा निषेव्यमाणं ज्वलयत्युदर्यम् ।।६२।।
ताजा मथा हुआ एवं सुगन्धित तक्र (मठा) रुचि, बल एवं पुष्टि को बढ़ाता है। यह अम्ल, उष्ण, विशदता करने वाला, लघु तथा स्वर को बढ़ाने वाला है। इसके सेवन करने से यह जाठराग्नि को प्रदीप्त करता है॥६२॥
वान्ते विरिक्ते ज्वरिते विशुष्के महोपवासश्रमपीडिते च। तृष्णातिसारोरुगदोपतप्ते वैसर्पपित्तामयघर्मिते च ।।६३।। संसृष्टरोगेषु महाशनेषु विदह्यमानेषु जलोदरेषु। सद्यःप्रसूतास्वपि चाङ्गनासु मण्डं विदध्यादपि कामलासु ।।६४।।
मण्ड का प्रयोग किन्हें कराना चाहिये ?—वमन एवं विरेचन कराने के बाद ज्वर में रोगी के ज्वर से शुष्क होने पर, दीर्घ उपवास एवं परिश्रम से पीड़ित होने पर, तृष्णा, अतिसार, ऊरुस्तम्भ, विसर्प, पैत्तिक रोग तथा धूप से पीड़ित व्यक्ति के संसृष्ट दोषों से उत्पन्न रोगों में, बहुत अधिक भोजन करने वालों को, जिनके शरीर के अन्दर विदाह हो रहा हो, जिन्हें जलोदर रोग हो तथा सद्यः प्रसूता स्त्रियों एवं कामला रोग में मण्ड का प्रयोग कराना चाहिये ॥६३-६४॥
आमातिसारज्वरयोर्विबन्धे कफोद्भवे श्वासगलामयेषु। हिक्कोपजिह्वागलशुण्डिकासु कासेऽक्षिरोगे शिरसो गुरुत्वे ।।६५।। छर्दिश्रमोन्मादविषूचिकासु योन्यामये प्लीह्नि च पीनसे च। गुल्मेषु हृद्रोगहलीमकेषु वातप्रकोपेष्वथ केवलेषु ।।६६।। धात्र्याः प्रवृद्धे पयसि प्रदुष्टे बालस्य निद्राकफवातवृद्धौ। मूत्राभिवृद्धौ हृदयद्रवे च निष्ठीविकालस्यविषादकेषु ।।६७।। छर्दिषु सर्वेषु तथा ग्रहेषु पृष्ठग्रहे यक्ष्मणि हृद्रदे च। चिन्ताश्रमोन्मादमदोपतापे मण्डं भिषङ्नोपदिशेद्विपश्चित् ।।६८।।
मण्ड का प्रयोग किन्हें नहीं कराना चाहिये ?—आमातिसार, ज्वर, विबन्ध, कफ से उत्पन्न श्वास एवं गलरोग, हिक्का, उपजिह्वा (Ranula), गलशुण्डिका (Enlarged uvula), कास, अक्षिरोग, सिर का भारीपन, वमन, श्रम, उन्माद, विसूचिका, योनि रोग, प्लीहा रोग, पीनस (प्रतिश्याय), गुल्म, हृद्रोग, हलीमक, शुद्ध वायु के प्रकोप, धात्री के प्रवृद्ध हुए दूध के दूषित होने, बालक के निद्राधिक्य तथा कफ एवं वायु की वृद्धि, मूत्रवृद्धि, हृदयद्रव (Palpitation of Heart), निष्ठीविका (थूक का बहुत आना), आलस्य, विषाद, छर्दिरोग, पृष्ठग्रह, यक्ष्मा, हृद्रोग तथा चिन्ता, श्रम, उन्माद एवं मद से पीड़ित अवस्था में विद्वान् वैद्य को मण्ड का प्रयोग नहीं कराना चाहिये ॥६५-६८॥
मण्डो हि पीतः कफिना गदे वा कफात्मके वर्धयते कफस्तान्। सोऽस्याग्निमुत्साद्य गदान् पुनस्तान् प्रकोपयन् कष्टतरान् करोति ।।६९।।
यदि कफ प्रकृतिवाला मनुष्य कफरोगों में मण्ड का सेवन करता है तो इससे उसके शरीर में कफ की वृद्धि होती है। जिससे उसकी जाठराग्नि मन्द हो जाती है तथा वे ही (कफ के) रोग पुनः प्रकुपित होकर कष्टसाध्य हो जाते हैं ॥६९॥
तस्मात्तु तेषां काफनां नराणां न मण्डमाहुर्भिषजः प्रशस्तम्। स्यान्मुद्गमण्डोदक एव तेषां ससैन्धवव्योषयुतः सुखाय ।।७०।।
भोजनकल्पः ? ] कल्पस्थानम् ३१३
इसलिये कफ प्रकृतिवाले मनुष्यों को मण्ड का प्रयोग कराना वैद्य प्रशस्त नहीं मानते हैं। इन व्यक्तियों के लिये सैन्धव तथा त्रिकटु मिश्रित मुद्गमण्डोदक ही सुखकारी माना गया है॥७०॥
कषायतिक्तः कटुपाकिभावात् कफं निहन्त्याशु हि मुद्गमण्डः।
तस्मात् कृशं रोगविमुक्तदेहं दीप्तानलं वा सविलम्बिरोगम्॥७१॥
व्यायामिनं वा बलिनं सरोगं यश्चोचितो गोरसमांसमत्स्यैः।
संयोजयेत्तं विरसेन यूष्णा सास्रेण वा गोरससाधितेन॥७२॥
मुद्गमण्ड—रस में कषाय एवं तिक्त तथा विपाक में कटु होने के कारण शीघ्र ही कफ को नष्ट कर देता है। इस लिये जो कृश हैं, जिसका शरीर रोग से मुक्त हो गया है, जिसकी जाठराग्नि प्रदीप्त है, जिसे विलम्बिका रोग हुआ है, जो नित्य व्यायाम करता है, बलवान है तथा रोगयुक्त है, जिसे गोरस (गोदुग्ध), मांस, एवं मछली सात्म्य हैं—ऐसे व्यक्ति को मसालों से रहित तथा रक्त अथवा दूध से सिद्ध किया हुआ यूष देना चाहिये॥
वक्तव्य—विलम्बिका रोग-यह विसूचिका का ही एक भेद है। माधवनिदान में इसके लिये कहा है—दुष्टं च भुक्तं कफमारुताभ्यां प्रवर्तते नोर्ध्वमधश्च यस्य। विलम्बिकां तां भृशदुश्चिकित्स्यामाचक्षते शास्त्रविदः पुराणाः॥७१-७२॥
त्रिःप्रस्रुतो दीपनतोयसिद्धः स्यात्तण्डुलैः संपरिभृष्टकैर्वा।
मुद्गैर्यवैश्चापि तथैव लाजैरुष्णाः सुगन्धिविशदेन पीतः॥७३॥
(इति ताडपत्रपुस्तके १८८ तमं पत्रम्।)
मण्डः क्षणेनास्य बलं दधाति व्याधिस्तथा मार्दवमभ्युपैति।
सर्वेन्द्रियाणि प्रकृतिं भजन्ते भोज्यानुपूर्वी च तथा कृता स्यात्॥७४॥
तीन बार प्रस्रुत किये हुए तथा दीपनीय जल से सिद्ध किये हुए भुने हुए तण्डुल (चावल), मुद्ग, यव तथा लाजा (चावलों की खील) के बने हुए उष्ण सुगन्धि एवं विशद मण्ड के पीने से क्षण भर में बल की प्राप्ति हो जाती है, रोग मृदु (मन्द) हो जाता है तथा सम्पूर्ण इन्द्रियां प्रकृतिस्थ हो जाती हैं। इस प्रकार भोजन का क्रम होता है॥७३-७४॥
मण्डं यथोक्तं पिबतो गुणास्ते विपर्यये चापि विपर्ययः स्यात्।
य एव मण्डस्य भवन्ति योग्या .....................॥७५॥
यथोक्त मण्ड को पीने से उपर्युक्त गुण होते हैं। इसके विपरीत होने से गुणों में भी विपर्यय हो जाता है। जो व्यक्ति मण्ड के योग्य होते हैं (वे ही यवागू के भी योग्य होते हैं)॥७५॥
लघ्वी यवागूर्न विदह्यते च दोषानुलोम्यं विदधाति चोष्णा।
पित्तं च माधुर्यगुणेन हन्ति भोज्यानुपूर्वी क्रमशःश्च युङ्क्ते॥७६॥
यवागू लघु होने के कारण शरीर में दाह उत्पन्न नहीं करती है तथा इसका उष्ण अवस्था में प्रयोग करने से यह दोषों का अनुलोमन करती है। माधुर्य गुण के कारण यह पित्त को नष्ट करती है तथा क्रमशः भोजन के क्रम से युक्त होती है।
सदाडिमा वातकफार्दितस्य, सशर्करा पित्तकफान्वितस्य।
रसेन वा जाङ्गलकेन सिद्धा सगोरसा वा सह दाडिमैर्वा॥७७॥
हितां नृणां मारुतपीडितानां गुल्मे तथा प्लीह्नि च पीनसे च।
सभोजनस्नानविहारयानव्यायामसंभाषणगीतपथ्याम् ॥७८॥
३१४ काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम् भोजनकल्पः ? ]
भिन्न २ अनुपान से यवागू सेवन—वात एवं कफ से पीडित रोगी में दाडिम, पित्त एवं कफ से पीडित में कर्करा तथा वात से पीडित और गुल्म, प्लीहा एवं पीनस रोगों में तथा भोजन, स्नान, विहार, यान, व्यायाम, संभाषण तथा गीत (गाना) जिन्हें हितकर है—उनमें भी जांगल मांसरस से सिद्ध की हुई अथवा गोरस (दूध) से सिद्ध करके अनारदाना पड़ी हुई पेया का प्रयोग कराना चाहिये। स्वस्थ अवस्था में भी रोग के निवृत्त हो जाने पर तथा अग्नि के मन्द होने पर इसे हितकारी माना गया है ।।७०-७८।।
तत्स्वस्थवृत्तौ च हितां वदन्ति रोगे निवृत्ते ज्वलने च मन्दे ।
रोगे निवृत्ते ज्वलने च दीप्ते रोगैविमुक्ताः कृशदुर्बलाश्च ।।७९।।
क्षीणेन्द्रिया वर्णबलाग्निहीनावातार्दिताः पित्तनिपीडिताश्च ।
ज्वरातिसारोदरपायुरोगचिन्तेष्यपानाध्वरोगतप्ताः ||८०||
कासेन शस्त्रेण विषेण चैव निपीडिताः शोकहताश्च नित्यम् ।
व्यायामगेयाध्ययनश्रमातर्धूमाग्निवातातपजागरात्र्ताः ||८१||
विदह्यमानाक्षिगलास्यनासाविषीदमानाः स्मृतिबुद्धिहीनाः ।
आनाहिनः शुष्कपुरीषमूत्राभगन्दराशग्रिहकुण्डलात्र्ताः ।।८२।।
निष्पिष्ठभग्नच्युतपी(डि)ताङ्गे शुद्धव्रणे मांसविवर्जिते च ।
जीर्णज्वरात्येद्यतृतीयकेषु नित्यज्वरे चापि चतुर्थके च ।।८३।।
रक्षःपिशाचोरगभूतयक्षुद्ब्रजतृष्णाग्निहिमाहताश्च ।
स्त्रीबालपुत्राल्यविशुष्कदुग्धागर्भश्च यस्या न विवर्धते च ।।८४।।
नाप्यायते यः स्तनपश्व बालो जागर्ति नित्यं भृशरोदनश्च ।
चक्षुर्हतिर्यस्य च तीक्षणनस्यैविशोषणैर्वा प्रतिकर्मणा वा ।।८५।।
दूध का प्रयोग किन्हें कराना चाहिये—रोग के निवृत्त होकर अग्नि के प्रदीप्त हो जाने पर तथा जो व्यक्ति रोगमुक्त हैं परन्तु कृश तथा दुर्बल हैं, जिनकी इन्द्रियां क्षीण हैं, वर्ण, बल तथा अग्नि जिनकी नष्ट हो गई है, जो वात तथा पित्त से पीडित हैं, एवं ज्वर, अतिसार, उदररोग, गुदरोग, चिन्ता, ईर्ष्या, पान (मद्यपान) एवं मार्गगमन के कारण जो रोगग्रस्त हैं, जो नित्य कास, शस्त्र, विष तथा शोक से पीडित हैं, व्यायाम, गीत तथा अध्ययन के श्रम से जो युक्त हैं; धूम, अग्नि, वायु, आतप (धूप) तथा जागरण के कारण जो पीडित हैं जिसके चक्षु, गला, मुख तथा नासिका में विदाह हो जाता हो, जिन्हें विषाद हो तथा जो स्मृति एवं बुद्धि से हीन हों, जिन्हें आनाह रोग हो, जिनका मल एवं मूत्र शुष्क हो, भगन्दर, अर्श, ग्रह एवं वातकुण्डल रोग से जो पीडित हैं, जिनका शरीर निष्पिष्ट (Lacirated), भग्न (Fracture) तथा च्युत (Dislocation) के कारण पीडित हो जिनका व्रण शुद्ध हो, जो मांस से रहित हों अर्थात् जिनके शरीर में मांस की कमी हो तथा जीर्णज्वर, अन्येद्युष्क, तृतीयक, नित्यज्वर तथा चातुर्थिक ज्वर में एवं जो राक्षस, पिशाच, सांप, भूत, यक्ष, क्षुधा, वज्र, तृष्णा, अग्नि तथा हिम से आहत हों, जो स्त्री अथवा बालक हों जिनके पुत्र अल्प हों तथा जिनका दूध सूख गया है, जिनका गर्भ वृद्धि को प्राप्त नहीं होता है, जो दूध पीने वाला बालक दूध से तृप्त नहीं होता है, जो नित्य जागता रहता है तथा अत्यन्त रोता है, तीक्ष्ण नस्यों, शोषणकारक द्रव्यों अथवा चिकित्सा के द्वारा जिसको नेत्ररोग हो गया हो तथा जो व्यक्ति विरेचन के योग्य हैं—इन सबों को शृत किये हुए दूध का प्रयोग करना चाहिये ।
वक्तव्य—शुद्धव्रण का सुश्रुत सू. अ. २३ में निम्न लक्षण दियां है—त्रिभिर्दोषैरनाक्रान्तः श्यावौष्ठः पिडकी समः । अवेदनो निरास्त्रावो व्रणः शुद्ध इहोच्यते ॥ अर्थात् जो व्रण तीनों दोषों से रहित हैं, जिसके किनारे (Edges) श्याव रंग
भोजनकल्पः ? ] कल्पस्थानम् ३१५
के हैं, जिसमें सूक्ष्म पिडकाएँ (मांसांकुर-Granulations) हैं, जिसका तल सम है, जिसमें वेदना और स्राव अत्यन्त थोड़ा होता है—वह शुद्ध व्रण कहलाता है ॥७९-८५॥
एते शृतं क्षीरमथाभ्यसेयुरलं शृतं यस्तु विरेचनीयः ।
क्षीरं हि सद्यो बलमादधाति दृढीकरोत्याशु तथेन्द्रियाणि ॥८६॥
मेधायुरारोग्यसुखानि धत्ते रसायनं चापि वदन्ति मुख्यम् ।
पुष्टिर्दृढत्वं लभते च गर्भो बन्ध्या च षण्ढश्च जरंश्च सूते ॥८७॥
पायुं पयः शोधयतेऽनुलोमं करोति वातं लघुतां नराणाम् ।
तस्माच्च सर्वेषु रसायनेषु रोगस्य चान्ते प्रवदन्ति दुग्धम् ॥८८॥
दूध शीघ्र ही शरीर में बल को बढ़ाता है, इन्द्रियों को दृढ़ करता है, मेधा, आयु, आरोग्य एवं सुख को करता है तथा यह प्रधान रसायन माना जाता है। इससे गर्भ पुष्ट एवं दृढ़ होता है। इससे बन्ध्या, नपुंसक एवं वृद्ध स्त्री के भी सन्तान हो जाती है। दूध गुदा का शोधन करता है, वायु को अनुलोम करता है तथा मनुष्यों के शरीर में लघुता उत्पन्न करता है इसलिये सम्पूर्ण रसायनों तथा रोग के अन्त में दूध को श्रेष्ठ माना गया है ॥८६-८८॥
क्षीरं सात्म्यं, क्षीरमाहुः पवित्रं, क्षीरं मङ्गल्यं, क्षीरमायुष्यमुक्तम् ।
क्षीरं वर्ण्यं, क्षीरमाहुश्च केश्यं, क्षीरं सन्धानं क्षीरमाहुर्वयस्यम् ॥८९॥
दूध शरीर के लिये सात्म्य होता है, यह पवित्र करने वाला, मङ्गलकारक, आयुष्यकारक, वर्ण्य, केश्य, सन्धान कारक (टूटे हुए अंगों को जोड़ने वाला) तथा वयः-स्थापक है ॥८९॥
क्षीरं सर्वेषां देहिनां चानुशेते, क्षीरं पिबन्तं च न रोग एति ।
क्षीरात् परं नान्यदिहास्ति वृष्यं, क्षीरात् परं नास्ति च जीवनीयम् ॥९०॥
दूध सम्पूर्ण प्राणियों के लिये अनुकूल होता है, दूध पीने वाले व्यक्ति को रोग नहीं होते हैं, दूध से बढ़कर कोई भी वृष्य (वाजीकरण) द्रव्य नहीं है तथा जीवनीय द्रव्यों में भी दूध से बढ़कर कोई द्रव्य नहीं है ॥९०॥
शैत्यात् पयो वर्धयतेऽनिलं प्राक पित्तात्मनस्तेन भिनत्ति वर्चः ।
ईषच्च शूलं कुरुते गुरुत्वात् स्नेहाद्विपाके शमयत्युभे द्वे ॥९१॥
दूध शीतल होने से प्रारम्भ में शरीर में वायु की वृद्धि करता है पित्त प्रकृति वाले व्यक्ति को इससे विरेचन हो जाता है तथा गुरु होने से यह थोड़ा शूल उत्पन्न कर देता है परन्तु विपाक में स्निग्ध होने से यह दोनों (वायु तथा पित्त) को शान्त कर देता है ॥९१॥
माधुर्यतो वर्धयते शरीरं प्रसादयत्याशु तथेन्द्रियाणि ।
स्थैर्यं पयः सान्द्रतया करोति पैच्छिल्यतः शोधयतेऽन्तराणि ॥९२॥
मधुर होने से दूध शरीर की वृद्धि करता है और इन्द्रियों को प्रसन्न करता है। तथा सान्द्र होने के कारण शरीर में स्थिरता उत्पन्न करता है एवं पिच्छिल होने के कारण शरीर के आन्तरावयवों का शोधन करता है ॥९२॥
विष्टभ्यते चापि कषायभावाद्वातात्मनस्तेन करोति शूलम् ।
स्नेहाच्च माधुर्यगुणाच्च शूलं पयो नियच्छत्यनुजीर्यमाणम् ॥९३॥
कषाय होने से यह शरीर में विष्टम्भ उत्पन्न करता है तथा वातप्रकृति वाले पुरुष में शूल उत्पन्न कर देता है। परन्तु स्निग्ध एवं मधुर गुण के कारण दूध जीर्ण होने पर शूल को शान्त कर देता है ॥९३॥
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स्नेहाद्गुरुत्वात् सकषायशैत्याद्विस्रंस्य सद्यो बलमादधाति।
सस्नेहशैत्यान्मधुरान्वयत्वात् कफात्मनां वर्धयते कफं च ॥९४॥
(इति ताडपत्रपुस्तके १८९ तमं पत्रम्।)
दूध, स्निग्ध, गुरु, कषाय एवं शीतल होने के कारण शरीर में शीघ्र ही बल को बढ़ाता है। स्निग्ध शीतल एवं मधुर गुण के कारण कफ प्रकृति वाले मनुष्यों में यह कफ की वृद्धि करता है ॥९४॥
एतद्धितं सात्म्यकषायभावात् पाकस्य तुष्टिं कुरुते न दोषम्।
गौरं च वर्णं कुरुते सितत्वात् स्नेहं च सस्नेहतया करोति ॥९५॥
सात्म्य एवं कषाय होने के कारण यह शरीर के लिये हितकर है, यह पाचकाग्नि को सन्तुष्ट करता है तथा शरीर में कोई दोष (विकार) उत्पन्न नहीं करता है। दूध श्वेत होने के कारण वर्ण को गौर करता है तथा स्निग्ध होने के कारण शरीर में स्निग्धता उत्पन्न कर देता है ॥९५॥
शैत्यात् कषायाद्धनसान्द्रभावात् संपर्कतश्चाभिषवाच्च भाण्डे।
क्रमेण चोष्मोपचयान्निरुद्धं पयो दधित्व्याय शनैरुपैति ॥९६॥
पयो हि वातातपपीडितं द्राक्कूर्चीभवत्येष हि तत्र हेतुः।
औष्ण्याद्धनत्वादथ वर्धमानः संक्लेदनाच्चाभिषवाच्च दध्नः ॥९७॥
शीतल, कषाय, घन एवं सान्द्र होने के कारण तथा पात्र के सम्पर्क एवं सन्धान के (Fermentation) कारण क्रमशः ऊष्मा (गरमी) के उपचय (वृद्धि) के कारण निरुद्ध हुआ दूध धीरे २ दधिभाव को प्राप्त हो जाता है। अर्थात् दूध दही के रूप में परिणत हो जाता है। वायु एवं धूप से पीडित होने के कारण दूध में शीघ्र ही जो कूर्चीभाव (फुट्टियां) उत्पन्न हो जाता है उसका कारण यह है कि उसमें उष्णता एवं घनता के कारण धीरे २ क्लेद तथा सन्धान (Fermentation) हो जाता है ॥९६-९७॥
निर्वर्तयत्यम्लरसं पयोऽग्निर्मस्तुं तथा चाप्यतिवर्तमानः।
ऊर्ध्वं सरश्चोत्प्लवते स्वभावात् किट्टं ततोऽधश्च निषीदतेऽस्य ॥९८॥
अधिक मात्रा में बढ़ी हुई अग्नि (ऊष्मा) दूध में अम्ल रस एवं मस्तु (दधिमस्तु) को उत्पन्न कर देता है। इसका सरभाग (पतला भाग) स्वभाव से ही ऊपर तैरता रहता है तथा इसका किट्ट भाग नीचे रहता है। अर्थात् यदि उष्णता न हो तो दुग्ध में अम्लभाव उत्पन्न नहीं होता है तथा दही नहीं जमती है। दही जमने के लिये उष्णता का होना आवश्यक है। हम व्यवहार में भी प्रतिदिन देखते हैं कि शीतऋतु में हमें दही जमाने के लिये दूध को गरम स्थान पर तथा अग्नि के पास रखना पड़ता है तथा उसके लिये पर्याप्त प्रयत्न करना पड़ता है। अन्यथा दही नहीं जम पाती है ॥९८॥
दिव्येन च ज्ञानबलेन दृष्टं मुख्यैः(ख्यैः)पुरा मन्थनमस्य युक्त्या।
ततो घृतोदश्विद्रुपलभ्य गावः प्रतिष्ठाः सचराचरस्य ॥९९॥
प्राचीन काल में हमारे मुख्य २ ऋषियों ने दिव्य एवं ज्ञान बल से युक्तिपूर्वक दही के मन्थन को श्रेष्ठ माना है। दही के मन्थन से घृत एवं उदश्वित् (लस्सी) प्राप्त किया जाता है। इस प्रकार गौएं सम्पूर्ण चर एवं अचर (जड़ तथा चेतन) जगत् की प्रतिष्ठा का कारण हैं। अर्थात् गौएँ अपने दूध, दही, घृत तथा तक्र के द्वारा सम्पूर्ण जगत् का पोषण करती हैं ॥९९॥
तस्माच्चिरव्याधिनिपीडितानां मूर्च्छागतानां पततां नराणाम्।
परायणं क्षीरमुशन्ति वैद्या निद्रासुखायुर्बलकृत् पयो हि ॥१००॥
भोजनकल्पः ? ] कल्पस्थानम् ३१७
इसलिये जो व्यक्ति बहुत काल से रोग से पीडित हैं, मूर्च्छा से युक्त हैं तथा जो ऊपर से गिर पड़ते हैं—उनके लिये वैद्यलोग दूध को उत्कृष्ट पदार्थ मानते हैं। दूध निद्रा, सुख, आयु एवं बल को देने वाला है॥१००॥
मूढस्तु यः स्यान्मदनस्य बीजैर्भल्लातकैः पूगफलादिभिश्च।
पयो हि तस्योपदिशेद्द्विपश्चिद्गुडोदकं वा शिशिरं पिबेत् सः॥१०१॥
क्षीरेण चैनं सगुडेन नित्यं संभोजयेत् सर्पिषि संस्कृतेन।
धान्वीरकार्तेऽपि तथैव कार्यं क्षीरं हि तस्यौषधमुक्तमग्न्यम्॥१०२॥
जो मैनफल के बीज, भिलावे तथा सुपारी के कारण मूढ़ हुआ है, उसे विद्वान् व्यक्ति दूध का प्रयोग कराये अथवा उसे ठण्डा किया हुआ गुडोदक पिलाये। अथवा उसे घृत में संस्कृति किये हुए गुड़युक्त दुग्ध का सेवन कराना चाहिये। धान्वीरक रोग (इसका अभिप्राय संभवतः धनुःस्तम्भ आदि वात रोग से है) से पीडित व्यक्ति में भी यह उपक्रम करना चाहिये। दूध इसकी श्रेष्ठ औषध कहा गया है॥१०१-१०२॥
आनूपजो जाङ्गलजो वरिष्ठः सुभूमिजातो गुरुबद्धचक्षुः।
सामुद्रषण्ढे(पौण्ड्रे)क्षुकवंशकानाभिक्षुः प्रशस्तस्तु परः परो यः॥१०३॥
उपर्युक्त रोग में आनूप एवं जांगल देश में उत्पन्न होने वाला, श्रेष्ठ, उत्तम भूमि में उत्पन्न हुआ गुरु एवं बंधे हुए चक्षु (अंकुर) वाला तथा सामुद्र, पौण्ड्र एवं इक्षुक वंश (जाति) वाला इक्षु अत्यन्त प्रशस्त माना गया है॥१०३॥
स्वादुः शीतः पुष्टिकृद्दीपनीयः स्निग्धो वृष्यो वर्णचक्षुःप्रसादी।
श्लेष्माणमुत्क्लेदयते च जग्धो रसस्तु पीतः कुरुते विदाहम्॥१०४॥
इक्षु स्वादु (मधुर), शीतल, पुष्टिकारक, दीपक, स्निग्ध, वृष्य तथा वर्ण एवं चक्षु को प्रसन्न करने वाला होता है। दांत से चबाकर पिया हुआ गन्ने का रस श्लेष्मा को बढ़ाता है तथा पिरा हुआ रस (अर्थात् यन्त्र-कोल्हू आदि से निकाला हुआ) विदाह को उत्पन्न करता है। गन्ने का स्वयं दांतों से चबाकर निकाला हुआ रस श्रेष्ठ माना गया है। कोल्हू से निकाला हुआ रस शरीर में विदाह उत्पन्न करता है। चरक सू. अ. २७ में कहा है—वृष्यः शीतः स्थिरः स्निग्धो बृंहणो मधुरो रसः। श्लेष्मलो भक्षितस्येक्षोर्यान्त्रिकस्तु विदाह्यते॥ इसीप्रकार सुश्रुत सू. अ. ४५ में भी कहा है। यान्त्रिक अथवा कोल्हू से निकले हुए रस के विदाही होने के कारण अष्टाङ्गहृदय सू. अ. ५ में बताया है—मूलाग्रजन्तुजग्धादिपीडनान्मलसङ्करात्। किंचित्कालं विधृत्या च विकृति याति यान्त्रिकः॥ विदाही गुरु विष्टम्भी तेनासौ॥ अर्थात् यान्त्रिक रस ईख के मूल, अग्रभाग, एवं कीटयुक्त अंश के पेरे जाने से, उसमें मिट्टी आदि मल के मिले होने से अथवा कुछ काल पड़ा रहने से विदाही, गुरु एवं विष्टम्भी हो जाता है॥१०४॥
भुक्त्वा पिबेदिक्षुरसं कफात्मा प्राग्भोजनात् पैत्तिकवातिकौ तु।
संसृष्टदोषस्य हितोऽन्नमध्ये तथाहि सर्वे सुखमाप्नुवन्ति॥१०५॥
कफप्रकृति वाले मनुष्य को भोजन के बाद तथा वात एवं पित्तप्रकृति वाले मनुष्य को भोजन से पूर्व और संसृष्ट दोष वाले व्यक्ति को भोजन के मध्य में इक्षुरस का पान करना चाहिये। इस प्रकार इसके द्वारा सम्पूर्ण व्यक्ति सुख (स्वास्थ्य) को प्राप्त करते हैं॥१०५॥
इति प्रकृत्येक्षुरसप्रकारा रोगांस्तु वक्ष्यामि हितार्थमेषाम्।
ज्वरातिसारामगलामयेषु विसूचिकाकुष्ठवि(कि)लासकासे॥१०६॥
पाण्ड्वामये शूलजलोदरेषु छर्द्यां कफोद्रेकविरिक्तवान्ते।
नस्तः क्रियावस्तिनिरूहितेषु स्वरोपघातक्षयपीनसेषु॥१०७॥
३१८ काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम् भोजनकल्पः ? ]
प्रमेहशोथोरुगदेषु नाद्याद्रोगेष्वभिष्यन्दसमुत्थितेषु । ग्रहेषु सर्वेषु पयोऽतिवृद्धौ बालेऽतिनिद्रे कफरोगिते च ॥१०८॥
इस प्रकार प्रकृति के अनुसार इक्षुरस के भेदों का वर्णन किया गया है। अब मैं इनके हित के लिये रोगों का वर्णन करूंगा। इक्षु का सेवन किन्हें नहीं करना चाहिये—ज्वर, अतिसार, आमदोष, गलरोग, विसूचिका, कुष्ठ, किलास, कास, पाण्डुरोग, शूल, जलोदर तथा वमन रोग में, विरेचन एवं वमन में कफ का उद्रेक (अधिकता) होने पर, नस्य, बस्ति एवं निरूह कराने के बाद, स्वपोघात, क्षय एवं पीनस रोग में, प्रमेह, शोथ एवं ऊरुस्तम्भ में, अभिष्यन्द से उत्पन्न हुए रोगों में, सम्पूर्ण ग्रहरोग, दूध की अत्यधिक वृद्धि, बालक के अत्यन्त निद्रायुक्त होने पर तथा कफ का रोग होने पर इक्षु का प्रयोग नहीं करना चाहिये ॥१०६-१०८॥
इक्षुः प्रयोगो न हितो, हितस्तु येषामिमांस्तानपि मे निबोध ।। जीर्णज्वरारोचकरक्तपित्तकासक्षतक्षीणकफक्षयेषु ।।१०९।। तृष्णाग्निविसर्पमदात्ययेषु मूत्रामये कर्णशिरोक्षिवाते ।। त्वङ्मांसवर्णद्युतिबुद्धिरेतोनिद्राबलौजोरुधिरक्षयेषु ।।११०।।
जिन रोगियों के लिये इक्षुरस हितकर है वे भी तू मेरे से सुन—जीर्ण ज्वर, अरोचक, रक्तपित्त, कास, क्षत, क्षीण एवं कफ के क्षय में तथा तृष्णा, अग्निविसर्प, मदात्यय, मूत्ररोग, कर्ण, शिर, अक्षि एवं वायुरोग में, त्वचा, मांस, वर्ण, द्युति, बुद्धि, रेतस् (वीर्य), निद्रा, बल, ओज तथा रक्त के क्षय में, तथा जिन २ के लिये दूध हितकर होता है उन सबोंके लिये तथा शिशुओं के लिये इक्षुरस हितकर होता है ॥१०९-११०॥
येषामथोक्तं च पयः प्रशस्तं तेषां हितश्चेक्षुरसः शिशूनाम् ।। कफप्रसेकारुचितृप्तिमोहशूलप्रतिश्यायगलामयार्तान् ।।१११।।
जिन व्यक्तियों को कफप्रसेक (कफयुक्त लालास्राव होना), अरुचि, तृप्ति, मोह, शूल, प्रतिश्याय, गलरोग, प्रमेह, हल्लास, जडता तथा अग्निनाश हो—उनमें अधिक मात्रा में पिया हुआ रस ज्वर को उत्पन्न करता है ॥१११॥
प्रमेहहल्लासजडाग्निनाशान् रसोऽतिपीतः कुरुते ज्वरं च ।। इत्येष धन्यः प्रवरश्च कल्पो भोज्यं प्रति प्रश्न उदाहृतस्ते ।।११२।। नृणां हितार्थं भिषजां च वृद्ध ! सुखस्य मूलं प्रवदन्ति धर्म्यम् ।।११३।।
इति ह स्माह भगवान् कश्यपः ।। (इति कल्पस्थाने) भोजनकल्पः ।
इस प्रकार हे वृद्धजीवक ! मनुष्यों तथा वैद्यों के हित के लिये भोजन के प्रति यह धन्य एवं श्रेष्ठ कल्प तुम्हारे लिये कहा गया है । इसे सुख एवं धर्म का मूल कहा गया है ॥११२-११३॥
ऐसा भगवान् कश्यप ने कहा था ?
(इति कल्पस्थाने) भोजनकल्पः ।
विशेषकल्पः ? ] कल्पस्थानम् ३१९
विशेषकल्पाध्यायः ।।
अथातो विशेषकल्पं नामाध्यायं व्याख्यास्यामः ।। १ ।।
इति ह स्माह भगवान् कश्यपः ।। २ ।।
अब हम विशेषकल्प नामक अध्याय का व्याख्यान करेंगे। ऐसा भगवान् कश्यप ने कहा था। (इस अध्याय में सन्निपातज्वर के विशेष लक्षण आदि कहे जायेंगे) ।।१-२।।
हुताग्निहोत्रमासीनं कश्यपं लोकपूजितम् । वृद्धो विशेषमन्विच्छन् पप्रच्छ विनये स्थितः ।। ३ ।।
अग्निहोत्र में आहुति देकर बैठे हुये, ऐसे लोक में पूजित महर्षि कश्यप से सन्निपातों के विशेषों को जानने की इच्छा से विनययुक्त वृद्धजीवक ने निम्न प्रश्न किया ।।३।।
सूत्रस्थाने भगवता निर्दिष्टो द्विविधो ज्वरः । हेतुलिङ्गौषधज्ञानैः प्रतिपन्नोऽस्मि तं तथा ।। ४ ।।
संशयस्त्वस्ति भगवन् ! सन्निपातज्वरं प्रति । तन्न मे संशयं छिन्धि विशेषज्ञ ! विशेषणैः ।। ५ ।।
भगवन् ! सूत्रस्थान में आपने हेतु (Causes), लिङ्ग (Symptoms) तथा औषध (Treatment) आदि के ज्ञान सहित दो प्रकार के ज्वर का निर्देश किया था, उसे मैंने सम्यक् प्रकार से जान लिया है। परन्तु भगवन् ! सन्निपात ज्वर के प्रति मुझे कुछ संशय है। इसलिये हे सन्निपातज्वरों के विशेषज्ञ ! उस विषय में विशेषणों के द्वारा आप मेरे संशय को दूर करें ।।४-५।।
किमेकः सन्निपातोऽयं किं वा किं बहवो मुने ! ।
(इति ताडपत्रपुस्तके १९० तमं पत्रम्)
एकश्चेत् किं समैर्दोषैरनेकत्वं कथं पुनः ।। ६ ।।
हे मुनि ! सन्निपात एक ही होता है अथवा अनेक होते हैं ? । यदि दोषों की समानता के कारण वह एक ही होता है तो वह अनेक प्रकार का कैसे हो जाता है ? ।।६।।
वातपित्तकफानां तु त्रयाणां संप्रकुप्यताम् । क एषां प्रथमं दोषः प्रकुप्यति महामुने ! ।। ७ ।।
युगपद्वा प्रकुप्यन्ति दोषाः किं वाऽनुपूर्वशः । प्रकुप्यतां वा विषममेकैकश्येन वा पुनः ।। ८ ।।
विशेषाः के महाभाग ! दोषव्याससमासतः ।
सन्निपाताः कियन्तो वा कानि नामानि वा पृथक् ।। ९ ।।
उपद्रवाश्च के तेषां परिहारविधिश्च कः । उपक्रमश्च कस्तेषां साध्यासाध्यवराश्च के ।। १० ।।
भगवन् ! वात, पित्त, कफ आदि प्रकुपित होते हुए तीनों दोषों में पहले कौन सा दोष प्रकुपित होता है ? ये तीनों दोष एक साथ प्रकुपित होते हैं अथवा आगे-पीछे करके प्रकुपित होते हैं अथवा आगे-पीछे करके प्रकुपित होते हैं ? हे महाभाग ! (ऐश्वर्यशालिन्) प्रकुपित होते हुए इन दोषों में पृथक् २ क्या विशेषताएँ होती हैं ? दोषों की व्यष्टि एवं समष्टि के अनुसार सन्निपातों की संख्या कितनी होती है ? उनके पृथक्-पृथक् क्या नाम है ? उनके उपद्रव, परिहार विधि तथा चिकित्सा क्या हैं ? उनमें से कौन से साध्य एवं कौन से असाध्य हैं ? ।।७-१०।।
इति पृष्टः स विष्येण स्थविरेण प्रजापतिः । सन्निपातविशेषार्थमद्भुतं वाक्यमब्रवीत् ।। ११ ।।
४३ का.सं.
३२० काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम् विशेषकल्पः ? ]
इस प्रकार ज्ञानी शिष्य द्वारा प्रश्न किये जाने पर सन्निपातों के विशेष ज्ञान के लिये प्रजापति कश्यप ने निम्न आश्चर्यजनक उपदेश दिया ॥११॥
शृणु भार्गव ! तत्त्वार्थं सन्निपातविशेषणम् । जानते भिषजो नैनं बहवोऽकृतबुद्धयः ॥१२॥
हे भार्गव ! तत्त्वज्ञान के लिये सन्निपातों के विशेषों (भेदों) को तू सुन क्योंकि बहुत से अज्ञानी वैद्य इसे नहीं जानते हैं ॥
शीतोपचारात् सूतानां मैथुनाद्विषमाशनात् । प्रजागराद्दिवास्वप्राच्चिन्तेर्ष्याल्लौल्यकर्षणात् ॥१३॥
तथा दुःखप्रजातानां व्यभिचारात् पृथग्विधात् । शिशोर्दुष्टपयःपानात्तथा संकीर्णभोजनात् ॥१४॥
विरुद्धकर्मपानान्नसेविनां सततं नृणाम् । अभोजनादध्यशनाद्विषमाजीर्णभोजनात् ॥१५॥
सहसा चान्नपानस्य परिवर्तार्द्दितोस्तथा । विषोपहतवाय्वम्बुसेवनाद्गरदूषणात् ॥१६॥
पर्वतोपत्यकानां च प्रतिकूले विशेषतः । अवप्रयोगात् स्नेहानां पञ्चानां चैव कर्मणाम् ॥१७॥
यथोक्तानां च हेतूनां मिश्रीभावाद्यथोच्छ्रिताः । त्रयो दोषाः प्रकुप्यन्ति क्षीणे चायुषि भार्गव ! ॥१८॥
हे भार्गव ! प्रसूता तथा दुःखप्रजाता (जिन्हें कष्टपूर्वक प्रसव हुआ हो) स्त्रियों के शीत उपचार, मैथुन, विषमाशन (विषम भोजन), रात्रि जागरण, दिवा स्वप्न, चिन्ता, ईर्ष्या, जिह्वालौल्य तथा अपकर्षण से, नाना प्रकार के व्यभिचार से, बालक के दूषित दूध के पीने तथा संकीर्ण भोजन से, मनुष्यों के निरन्तर विरुद्ध कर्म, विरुद्धपान एवं विरुद्ध भोजन के सेवन से, भोजन के न करने से, अध्यशन (पूर्व भोजन के ऊपर पुनः भोजन) करने से, विषम एवं अजीर्ण भोजन से, अन्नपान एवं ऋतु के सहसा परिवर्तन से, विष से दूषित वायु एवं जल के सेवन से, गरविष (संयोगज विष) से दूषित होने के कारण, विशेषकर प्रतिकूल अवस्थाओं में पर्वत एवं उपत्यकाओं (तलहटी-Valley) में रहने से, स्नेहन एवं पञ्चकर्म के असम्यक् प्रयोग से तथा उपर्युक्त हेतुओं के मिश्रित हो जाने से और आयु के क्षीण होने पर बढ़े हुए तीनों दोष प्रकुपित हो जाते हैं ॥१३-१८॥
ततो ज्वरादयो रोगाः पीडयन्ति भृशं नरम् । सर्वदोषविवोधाच्च दुश्िकित्स्यो महागदः ॥१९॥
तब ज्वर आदि रोग रोगी को अत्यन्त पीडित करते हैं। सम्पूर्ण दोषों के परस्पर विरुद्ध होने से यह महाव्याधि अत्यन्त दुश्िकित्स्य होती है ॥१९॥
यथाऽग्निवज्रपवनैर्न स्यादभिहतो द्रुमः । वातपित्तकफैस्तद्वत् क्रुद्धैर्देही न जीवति ॥२०॥
जिस प्रकार अग्नि, वज्र, एवं पवन के द्वारा आहत वृक्ष जीवित नहीं रहता उसी प्रकार वात, पित्त, कफ आदि तीनों दोषों के प्रकुपित हो जाने से व्यक्ति (रोगी) जीवित नहीं रहता ॥२०॥
विषाग्निशस्त्रैर्युगपन्न जीवन्ति यथा हताः । सन्निपातार्दितास्तद्वन्न जीवन्त्यतपस्विनः ॥२१॥
जिस प्रकार विष, अग्नि एवं शस्त्रों के द्वारा एक साथ अहित हुआ व्यक्ति जीवित नहीं रहता उसी प्रकार सन्निपात के द्वारा पीडित हुए रोगी भी जीवित नहीं रहते ॥२१॥
द्वयं तदुपरिष्टाच्च यथा प्रज्वलितं गृहत् । न शक्यते परित्रातुं सन्निपातस्तथा नृषु ॥२२॥
जिस प्रकार ऊपर एवं नीचे दोनों ओर से जलते हुए गृह की रक्षा नहीं की जा सकती उसी प्रकार मनुष्यों में सन्निपात से भी रक्षा नहीं की जा सकती ॥२२॥
विशेषकल्पः ? ] कल्पस्थानम् ३२१
दिग्धबाणास्त्रयो व्याधाः परिवार्य यथा मृगम् । घ्नन्त्यनौषधयस्तद्वत्त्रयो दोषाः शरीरिणम् ।। २३ ।।
जिस प्रकार विष से बुझे हुए बाणों वाले तीन व्याध (शिकारी) मृग को चारों ओर से घेर कर मार देते हैं उसी प्रकार ओषधियों के अभाव में तीनों वात, पित्त, कफ आदि दोष रोगी को मार देते हैं ॥२३॥
संगता नियतं यस्मात् पातयन्ति कलेवरम् । अन्यच्चाशु संनिपतयतो वा सन्निपातता ।। २४ ।।
क्योंकि ये तीनों दोष मिलकर निश्चितरूप से शरीर को नष्ट कर देते हैं इसलिये इसे सन्निपात कहते हैं अथवा शीघ्र ही नष्ट करने के कारण सन्निपात कहते हैं ॥२४॥
अकस्मादिन्द्रियोत्पत्तिरकस्मान्मूत्रदर्शनम् । अकस्माच्छीलविकृतिः सन्निपाताग्रलक्षणम् ।। २५ ।।
सन्निपातज्वर के मुख्य लक्षण—इसमें सहसा इन्द्रियों के विषयों की उत्पत्ति होती है, सहसा मूत्र आ जाता है तथा सहसा स्वभाव में परिवर्तन हो जाता है। ये सन्निपात ज्वर के मुख्य लक्षण होते हैं। चरक चि. अ. ३ में सन्निपात ज्वर के निम्न लक्षण दिये हैं—क्षणे दाहः क्षणे शीतमस्थिसन्धिशिरोरुजा । सास्रावे कलुषे रक्ते निर्भुग्ने चापि दर्शने ।। सस्वनौ सरुजौकर्णौ कण्ठः शूकैरिव वृतः । तन्द्रा मोहः प्रलापश्च कासः श्वासोऽरुचिर्भ्रमः ।। परिदग्धा खरस्पर्शा जिह्वा स्रस्ताङ्गता परम् । ष्ठीवनं रक्तपित्तस्य कफेनोन्मिश्रितस्य च । शिरसो लोठनं तृष्णा निद्रानाशो हृदि व्यथा । स्वेदमूत्रपुरीषाणां चिराद्दर्शनमल्पशः ।। कृशत्वं नातिगात्राणां प्रततं कण्ठकूजनम् । कोठानां श्यावरक्तानां मण्डलानां च दर्शनम् ।। मूकत्वं स्रोतसां पाको गुरुत्वमुदरस्य च । चिरात्पाकश्च दोषाणां सन्निपातज्वराकृतिः ॥२५॥
निर्दिष्टास्तस्य भेदास्तु भिषक्श्रेष्ठैस्त्रयोदश । हीनमध्याधिकसमद्व्युद्बलैकोद्भवैः¹ लोद्भवाः ।। २६ ।।
श्रेष्ठ वैद्यों ने उस सन्निपात के हीन (निकृष्ट), मध्य, अधिक (प्रधान) अर्थात् तरतम आदि के भेद से सम (तीनों दोषों की समावस्था), दो दोषों की प्रबलता (प्रधानता) एवं एक दोष की प्रबलता के अनुसार १३ भेद कहे हैं। चरक चि. अ. ३ में भी १३ प्रकार के सन्निपात दिये हैं—सन्निपातज्वरस्योर्ध्वं त्रयोदशविधस्य हि । प्राक् सूत्रितस्य वक्ष्यामि लक्षणं वै पृथक् पृथक् ।। इसी प्रकार अष्टाङ्गहृदय.में भी कहा है॥
वातपित्ताधिको यस्य सन्निपातः प्रकुप्यति । तस्य ज्वरोऽङ्गमर्दस्तृट्तालुशोषप्रमीलिकाः ।। २७ ।। अरुचिस्तन्द्रिविड्भेदश्वासकासश्रमभ्रमाः ।
ये १३ भेद निम्न हैं—जिसके वातपित्तप्रधान (कफमन्द) सन्निपात प्रकुपित हो जाता है—उसे ज्वर, अङ्गमर्द, तृषा, तालुशोष, प्रमीलक (मूढता), अरुचि, तन्द्रा अति सार, श्वास, कास, श्रम तथा भ्रमरोग हो जाते हैं। चरक चि. अ. ३ में भी कहा है—भ्रमः पिपासा दाहश्च गौरवं शिरसोऽतिरुक् । वातपित्तोल्वणे विद्याल्लिङ्गं मन्दकफे ज्वरे ॥२७॥
पित्तश्लेष्माधिको यस्य सन्निपातः प्रकुप्यति ।। २८ ।। अन्तर्दाहो बहिः शीतं तस्य तृष्णा च वर्धते । तुद्यते दक्षिणं पार्श्वमुरः शीर्षगलग्रहः ।। २९ ।। निष्ठीवति कफं सासृक्कच्छ्रात् कण्ठश्च दूयते । विड्भेदश्वासहिक्काश्च वर्धन्ते सप्रमीलकाः ।। ३० ।।
जिसके पित्तश्लेष्मप्रधान (वातहीन) सन्निपात प्रकुपित हो जाता है उसके शरीर के आन्तरिक भाग में गरमी परन्तु शरीर का बाह्यभाग ठण्डा होता है। उसे प्यास बहुत लगती है। उसके दायें पार्श्व में वेदना होती है। छाती, सिर एवं
१. प्रबलैकदोष-प्रबलद्विदोषभवा इत्यर्थः ।
३२२ काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम् विशेषकल्पः ? ]
गला जकड़ जाता है, उसके थूक में बड़ी कठिनता से रक्तसहित श्लेष्मा आती है, कण्ठ में वेदना होती है तथा अतिसार, श्वास, हिक्का एवं मूढता हो जाती है। चरक चि. अ. ३ में कहा है—छर्दिः शैत्यं मुहुर्दाहस्तृष्णा मोहोऽस्थिवेदना। मन्दवाते व्यवस्यन्ति लिङ्गं पित्तकफोल्वणे ॥२८-३०॥
विधुफल्गू च तौ नाम्ना सन्निपातावुदाहृतौ।
उन दोनों सन्निपातों के नाम क्रमशः विधु और फल्गु है। अर्थात् वातपित्त प्रधान सन्निपात का नाम विधु एवं पित्त श्लेष्म प्रधान सन्निपात का नाम फल्गु है॥
श्लेष्मानिलाधिको यस्य सन्निपातः प्रकुप्यति ।।३१।।
(इति ताडपत्रपुस्तके १९१<sup>१</sup> तमं<sup>२</sup> पत्रम्।)
..................... सन्निपातः सुदारुणः ।।
श्लेष्म एवं वातप्रधान सन्निपात जिसके प्रकुपित हों......... (उसे शीतज्वर, निद्रा, क्षुधा, तृष्णा, पार्श्वग्रह, सिर का भारीपन, आलस्य, मन्यास्तम्भ, मूढता, उदर में दाह तथा कटि एवं बस्ति में वेदना होती है। इसे मकरी कहते हैं यह अर्थ भालुकितन्त्र के श्लोकों से पूर्ण किया गया है)।
**वक्तव्य—**इससे आगे यह ग्रन्थ खण्डित है। इस त्रुटित ग्रन्थ के पूर्वापर भाग में दिये हुए विषय की माधवनिदान के सन्निपात प्रकरण की मधुकोश एवं आतङ्कदर्पण की व्याख्या में भालुकितन्त्र नाम से दिये हुए श्लोकों के साथ समानता मिलती है। इस ग्रन्थ के त्रुटितअंश से पूर्व एवं पश्चात् के विषय में भालुकितन्त्र के श्लोकों की समानता मिलने से मध्य के त्रुटित भाग की भी समानता होनी चाहिये। भालुकितन्त्र में यह विषय निम्न प्रकार से मिलता है—आमो ह्याहारदोषात् प्रथममुपचितौ हन्ति वह्निं शरीरे—श्लेष्मत्वं याति भुक्तं सकलमपि ततोऽसौ कफो वायुदुष्टः ।। स्रोतांस्यापूर्ण रुन्ध्यादनिलमथ मरुत्कोपयेत्पित्तमन्तः—सम्पूर्च्छयान्योऽन्यमेते प्रबलमिति नृणां कुर्वते सन्निपातम्।। वातपित्ताधिको यस्य सन्निपातः प्रकुप्यति। तस्य ज्वरोऽङ्गमर्दस्तृट् तालुशोषप्रमील कौ ।। आध्मानतन्द्रारुचयः श्वासकासभ्रमश्रमाः। पित्तश्लेष्माधिको यस्य सन्निपातः प्रकुप्यति ।। अन्तर्दाहो बहिः शैत्यं तस्य तन्द्रा च वर्धते । तुद्यते दक्षिणं पार्श्वमुरःशीर्षगलग्रहः ।। निष्ठीवेत्कफपित्तं च कृच्छ्रात्कण्डूश्च जायते । विड्भेदश्वासहिक्काश्च वर्धन्ते सप्रमीलकाः ।। विभुः फल्गुश्च तौ नाम्ना सन्निपातावुदाहृतौ । श्लेष्मानिलाधिको यस्य सन्निपातः प्रकुप्यति ।। तस्य शीतज्वरो निद्रा क्षुत्तृष्णापार्श्वनिग्रहाः ।। शिरोगौरवमालस्यंमन्यास्तम्भप्रमीलकाः । उदरं दह्यते चास्य कटिबस्तिंश्च दूयते । सन्निपातः स विज्ञेयो मकरीति सुदारुणः ।। वातोल्बणः सन्निपातो यस्य जन्तोः प्रकुप्यति। तस्य तृष्णा ज्वरो ग्लानिः पार्श्वरुग् दृष्टिसंक्षयः ।। पिण्डिकोद्वेष्टनं दाह उरुसादो बलक्षयः । सरक्तं चास्य विण्मूत्रं शूलं निद्राविपर्ययः ।। निर्भिद्यते गुदं चास्य बस्तिश्च परिगृह्यते । आयम्यते भिद्यते च हिक्कते विलपत्यपि ।। मूर्च्छते स्फार्यते रौति नाम्ना विस्फारकः स्मृतः । पित्तोल्वणः सन्निपातो यस्य जन्तोः प्रकुप्यति ।। तस्य दाहो ज्वरो घोरो बहिरन्तश्च वर्धते । शीतं च सेवमानस्य कुप्यतः कफमारुतौ ।। ततश्चैनं प्रबाधन्ते हिक्काश्वासप्रमीलिकाः । विसूचिका पर्वभेदः प्रलापो गौरवं क्लमः ।। नाभिपाश्र्वरुजा तस्य स्विन्नस्याशु विवर्धते ।। स्विद्यमानस्य रक्तं च स्रोतोभ्यः संप्रवर्तते ।। शूलेन पीड्यमानस्य तृष्णा श्वासः प्रबाधते । असाध्यः सन्निपातोऽयं शीघ्रकारीति कथ्यते ।। न हि जीवत्यहोरात्रमनेनाविष्टविग्रहः । कफोल्वणः सन्निपातो यस्य
१. अस्याग्रे १९२ तमं पत्रं त्रुटितं ताडपत्रपुस्तके।
२. अत्र त्रुटितग्रन्थस्य पूर्वापरग्रन्थयोर्यादृशो विषयस्तादृश एव माधवनिदानसंनिपातप्रकरणव्याख्ययोर्मधुकोशातङ्कदर्पण-योर्भालुकितन्त्रनाम्नोद्धृतेषु श्लोकेषु दृश्यते। तदीयपूर्वापरभागयोरेतत्संहितायाः १९१ पत्रान्त्र १९३ पत्रादिग्रन्थयोश्च बहुशो लेखविषयसंवाददर्शनेन लुप्त १९२ पत्रीयविषयोऽपि तदीयमध्यभागगतश्लोकोक्तसंवादी स्यादिति विवेचनीयं विवेचकैः ।
विशेषकल्पः ? ] कल्पस्थानम् ३२३
जन्तोः प्रकुप्यति ॥ तस्य शीतज्वरः स्वप्नगौरवालस्यतन्द्रिकाः । छर्दिमूर्च्छा तृषादाहतृष्णाारोचकहृद्ग्रहाः ॥ ष्ठीवनं मुखमाधुर्यं श्रोत्रवाग्दृष्टिनिग्रहः । श्लेष्मणो निग्रह चास्य यदा प्रकुरुते भिषक् ।। तदा तस्य भृशं पित्तं कुर्या सोपद्रवं ज्वरम् ।। निगृहीते तु पित्ते च भृशं वायुः प्रकुप्यति ।। निराहारस्य सोऽत्यर्थं मेदोमज्जास्थि बाधते । अथात्र स्नाति भुङ्क्ते वा त्रिरात्रं नैव जीवति ।। मेदोगतः सन्निपातो ह्युल्वणः परिकीर्तितः । कामान्मोहाच्च लोभाच्च भयाच्चापि प्रपद्यते ।। मध्यहीनाधिकैर्दोषैः सन्निपातो यदा भवेत् । तस्य रोगास्त एवोक्ताः प्रायो दोषबलाश्रयाः ।। अर्थात् इसमें द्वयुल्वण तथा एकोल्वण सन्निपात का वर्णन किया गया है। इनके पृथक् २ नाम भी दिये गये हैं। यथा—
वातपित्ताधिक सन्निपात—विभु ।
पित्तश्लेष्माधिक सन्निपात—फल्गु ।
कफवाताधिक सन्निपात—मकरी ।
वाताधिक सन्निपात—विस्फारक (विस्फुरक) ।
पित्ताधिक सन्निपात—शीघ्रकारी ।
श्लेष्माधिक सन्निपात—उल्वण (कफण) ।
इसके बाद एक दोष हीन, एक वृद्ध तथा एक मध्य के अनुसार ६ सन्निपात दिये हैं ।।३१।।
हीनाभिवृद्धमध्यैस्तु सन्निपातो यदा भवेत् । तस्य रोगास्त एवोक्ता यथादोषबलाश्रयात् ।।
सर्वस्त्रोतोभवं त्वस्य रक्तपित्तं प्रकुप्यति । विस्फोटैरग्निदग्धाभैश्चीयते च समन्ततः ।।
हृदयोदरमन्त्रं च यकृत्प्लीहाऽथ फुप्फुसम् । पच्यतेऽन्तः शरीरस्थमूर्ध्वाधः पूयमेति च ।।
शीर्णदन्तश्च मृत्युश्च तस्याप्येतद्विशेषणम् ।
जब एक (वात) हीन, एक (पित्त) वृद्ध तथा एक (कफ) मध्य दोष वाला (अर्थात् तरतम आदि भेद से) सन्निपात होता है तब दोष एवं बल के अनुसार उसके वे ही रोग होते हैं। उसके सब स्रोतों में स्थित रक्तपित्त प्रकुपित होता है। तथा सम्पूर्ण शरीर पर अग्निदग्ध के समान विस्फोटके हो जाते हैं। हृदय, उदरप्रदेश, आन्त्र, यकृत, प्लीहा तथा फुप्फुस का पाक हो जाता है। शरीर के अन्दर ऊर्ध्व एवं अधः भाग में पूय (पस-Suppuration) हो जाती है। उसके दांत झड़ने लगते हैं तथा अन्त में मृत्यु हो जाती है। ये विशेष लक्षण होते हैं ।।
मध्याभिवृद्धहीनैस्तु सन्निपातो यदा भवेत् ।।
तस्य रोगास्त एवोक्ता यथादोषबलाश्रयात् ।
स्तब्धाङ्गः स्तब्धदृष्टिश्च स तु शेते हतो यथा ।।
विरिच्यतेऽतिमात्रं च पुरीषं बह्वनश्नतः । सर्वेषां स्रोतसां पाक एकदत्र विशेषणम् ।।
जब एक (वात) मध्य, एक (पित्त) वृद्ध तथा एक (कफ) हीन दोष वाला सन्निपात प्रकुपित होता है तब उसे दोष एवं बल के अनुसार वे ही रोग हो जाते हैं। उसके अङ्ग एवं दृष्टि स्तब्ध हो जाती है तथा वह सोते (पेड़) हुए मृत व्यक्ति की तरह प्रतीत होता है। उसे भोजन का अधिक सेवन न करने पर भी मल अधिक मात्रा में आता है तथा उसके सम्पूर्ण स्रोतों का पाक हो जाता है। ये इसके विशेष लक्षण हैं ।।
वृद्धाभिहीनमध्यैस्तु सन्निपातो यदा भवेत् । तस्य रोगास्त एवोक्ता यथादोषबलाश्रयात् ।।
जृम्भाप्रजागरायामविप्रलापशिरोरुजः । मन्यास्तम्भेन मृत्युश्च तस्याप्येतद्विशेषणम् ।।
एषां त्रयाणां नामानि याम्यक्रकचपाकलाः ।
३२४ | काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम् | विशेषकल्पः ? ]
जब एक (वात) वृद्ध, एक (पित्त) हीन तथा एक (कफ) मध्य दोष वाला सन्निपात प्रकुपित होता है तब उसे दोष एवं बल के अनुसार वे ही रोग हो जाते हैं। उसे जंभाई, जागरण, आयाम (अन्तः एवं बाह्य), प्रलाप, शिरोरोग तथा मन्यास्तम्भ (Stiff neck-Torticolis) होकर मृत्यु हो जाती है। ये इसके विशेष लक्षण हैं। इन उपर्युक्त तीनों सन्निपातों के नाम क्रमशः याम्य, क्रकच तथा पाकल होते हैं। चरक चि. अ. ३ में भी १३ सन्निपात दिये हैं। वातपित्त तथा कफ आदि तीनों दोषों के समानरूप से प्रकुपित होने पर जो सन्निपात होता है उसके अतिरिक्त १२ सन्निपातों के लक्षण निम्न प्रकार से दिये हैं—भ्रमः पिपासा दाहश्च गौरवं शिरसोऽतिरुक् । वातपित्तोल्वणे विद्याल्लिङ्गं मन्दकफे ज्वरे ॥ शैत्यं कासोऽरुचिस्तन्द्रा पिपासादाहरुग्व्यथाः । वातश्लेष्मोल्वणे व्याधौ लिङ्गं पित्तावरे विदुः ॥ छर्दिः शैत्यं मुहुर्दाहस्तृष्णा मोहोऽस्थिवेदना । मन्दवाते व्यवस्यन्ते लिङ्गं पित्तकफोल्वणे ॥ सन्ध्यस्थिशिरसः शूलं प्रलापो गौरवं भ्रमः । वातोल्वणे स्याद् द्वयनुगे तृष्णा कण्ठास्यशोषता ॥ रक्तविण्मूत्रता दाहः स्वेदस्तृड्बलसंक्षयः । मूर्च्छा चेति त्रिदोषे स्याल्लिङ्गं पित्तं गरीयसि ॥ आलस्यारुचिहृल्लासदाहवम्यरतिभ्रमैः । कफोल्वणं सन्निपातं तन्द्राकासेन चादिशेत् ॥ प्रतिश्या च्छर्दिरालस्य तन्द्राऽरुच्यग्निमार्दवम् । हीनवाते पित्तमध्ये चिह्नं श्लेष्माधिके मतम् ॥ हारिद्रमूत्रनेत्रत्वं दाहस्तृष्णा भ्रमोऽरुचिः । हीनवाते मध्यकफे लिङ्गं पित्ताधिके मतम् ॥ शिरोरुग्वेपथुः श्वासः प्रलापश्चर्द्दिरोचकौ । हीनपित्ते मध्यकफे लिङ्गं वाताधिके मतम् ॥ शीतको गौरवं तन्द्रा प्रलापोऽस्थिशिरोतिरुक् । हीनपित्ते वातमध्ये लिङ्गं श्लेष्माधिके मतम् । श्वासकासप्रतिश्याय । मुखशोषोऽतिपार्श्वरूक् । कफहीने पित्तमध्ये लिङ्गं वाताधिके मतम् ॥ पर्वभेदोऽग्निमान्द्यं च तृष्णा दाहोऽरुचिर्भ्रमः । कफहीने वातमध्ये लिङ्गं पित्ताधिके विदुः ॥' इन १२ सन्निपातों के लक्षणों का पाठ काश्मीर से उपलब्ध चरक संहिता में दिया है अन्यत्र नहीं। इसे टीकाकार आर्ष नहीं मानते हैं। ये लक्षण प्रकृति समसमवाय से हैं। प्राचीन आचार्यों की शैली प्रकृति समसमवाय से विस्तार से लक्षणों को देने की नहीं है। भिन्न २ दोषों से उत्पन्न ज्वरों के लक्षण कह देने पर सन्निपातों में प्रकृति समसमवाय से उत्पन्न लक्षणों को स्वयं समझा जा सकता है। उन सबको पृथक् २ पढ़ने की आवश्यकता नहीं होती है। इसके अतिरिक्त एक बार सन्निपातज उच्यते' कहकर पुनः 'सन्निपातज्वरस्योर्ध्वम्' आदि का दोबारा कहना भी विशेष अर्थ नहीं रखता है। इस लिये यह पाठ अनार्ष माना जाता है ॥
समैर्दोषैः प्रकुपितं सन्निपातं निबोध मे ।।
त्रयाणामत्र दोषाणां सर्वरूपाणि लक्षयेत् ।
अब वात, पित्त, कफ आदि तीनों दोषों के समानरूप से प्रकुपित होने पर जो सन्निपात होता है उसके लक्षण तू मेरे से सुन। इसमें तीनों दोषों के सब लक्षण दिखाई देते हैं॥
त्रिदण्डवत् समबलान्यथो आहुस्त्रिपादवत् ।।
यानि ज्वरचिकित्सायां रूपाण्युक्तानि तानि च । कूटपाकल इत्येष सन्निपातः सुदारुणः ।।
इसमें तिपाई की तरह तीनों दोषों के सब लक्षण समान बल वाले होते हैं इस लिये त्रिपाद (तीन पर वाला) कहते हैं। तथा ज्वर चिकित्सा में जो लक्षण कहे हैं वे सब इसमें होते हैं। इस सन्निपात का नाम कूटपाकल है तथा यह अत्यन्त भयंकर होता है॥
व्याधिभ्यो दारुणेभ्यश्च वज्रशस्त्राग्नितो यदा । सद्यो हन्ता महाव्याधिर्जायते कूटपाकलः ।।
दारुण व्याधियों एवं वज्र, शस्त्र, अग्नि आदि के द्वारा शीघ्र प्राणघातक कूटपाकल नाम की महाव्याधि उत्पन्न होती है॥
कूटपाकलविग्रस्तो न श्रृणोति न पश्यति । न स्पन्दते न ब्रवीति नाभिष्ठौति न निन्दति ।।
विशेषकल्पः ? ] कल्पस्थानम् ३२५
केवलोच्छ्वासपरमः स्तब्धाङ्गः स्तब्धलोचनः । त्रिरात्रं परमं तस्य जन्तोर्भवति जीवितम् ।।
कूटपाकल नामक सन्निपात (सर्वदोषोल्बण सन्निपात) से पीड़ित रोगी न कुछ सुनता है, न देखता है, न हिलता है, न बोलता है, न किसी की प्रशंसा करता है और न निन्द्रा करता है। वह केवल श्वास-प्रश्वास लेता रहता है। उसके सम्पूर्ण अङ्ग तथा नेत्र स्तब्ध होते हैं। वह व्यक्ति अधिक से अधिक तीन दिन तक जीवित रहता है अर्थात् तीन दिन बाद उसकी मृत्यु हो जाती है ॥
तदवस्थं तु तं दृष्ट्वा मूढो व्याभाषते जनः । धर्षितो रक्षसा नूनमवेलायां चरन्निशि ।।
अन्वयं ब्रुवते चैके यक्षिण्या ब्रह्मराक्षसैः । पिशाचैर्गुह्यकैश्चैव तथाऽन्ये विषयोजितम् ।।
आक्रुष्टमभिशप्तं च तथाऽन्ये मस्तकाहतम् । कुलदेवाचार्विहतं धर्षितं गृहदैवतैः ।।
नक्षत्रपीडामपरे गरकर्माणि चापरे । वदन्ति सन्निपातं तु भिषजः कूटपाकलम् ।।
रोगी की यह अवस्था देखकर कूटपाकल नामक सन्निपात के विषय में कई मूर्ख वैद्य कहते हैं कि रात्रि में असमय में घूमने से इस पर राक्षसों ने आक्रमण कर दिया है। कुछ लोग इसे यक्ष एवं ब्रह्मराक्षसों, पिशाचों तथा गुह्यकों का आक्रमण मानते हैं। कोई इसे विष से पीड़ित कहते हैं। कोई इसे आक्रोश (निन्दा) एवं अभिशाप के कारण मानते हैं। कुछ लोग इस रोग को मस्तक पर आघात लगने से उत्पन्न मानते हैं। कुछ लोग इसे कुलदेवता तथा गृहदेवताओं द्वारा आक्रान्त कहते हैं। कुछ लोग इसे नक्षत्र की पीडा तथा अन्य कुछ लोग इसे संयोगज विष से उत्पन्न मानते हैं ॥
सद्यः स्वस्थस्य युगपद्यदा कुप्यन्ति ते त्रयः । तदा निर्वर्तते देहे पिडका विषसंज्ञिता ।।
सद्यः स्वस्थ व्यक्ति के जब तीनों दोष युगपत् प्रकुपित हो जाते हैं तब उसके शरीर में विषसंज्ञक पिडकाएं उत्पन्न हो जाती हैं ॥
विरुद्धभोजनात् कालात् परिणामाच्च कर्मणाम् । प्रकुप्यत्यनिलः शीघ्रं सोऽस्याग्निमुपहन्त्यनु ।।
विरुद्ध भोजन से तथा समयान्तर से कर्मों के परिणाम से प्रकुपित हुआ वायु शीघ्र ही मनुष्य की अग्नि को नष्ट कर देता है ॥
तस्योपहतकायाग्नेः पूर्ववत् पिबतोऽश्नतः । कफीभवति भूयिष्ठं यदादत्ते चतुर्विधम् ।।
कायाग्नि के नष्ट हो जाने से जब रोगी पहले के समान ही अन्न पान का सेवन करता है तब उसका खाया हुआ चतुर्विध अन्न (चर्व्य, चोष्य, लेह्य, पेय) विशेषरूप से कफ का रूप धारण कर लेता है ।
तं कफं वायुरादाय स्त्रोतांस्यस्य विधावति ।
तस्य स्त्रोतांसि सर्वाणि सूक्ष्माणि च महान्ति च ।।
पूरयित्वा पिधायास्ते संरुद्धः पवनस्ततः । पित्तं प्रकोपयत्यस्य तत् पित्तं मारुतेरितम् ।।
सर्वतः श्लेष्मणा रुद्धमन्योन्यमिथुनाश्रयात् । ज्वरं हल्लासमरुचिं पर्वभेदं विसूचिकाम् ।।
रोगान् नानाविधांश्चान्यान् कुर्वन्मृद्नाति देहिनम् ।
उस कफ को लेकर वायु उसके स्रोतों में गति करता है तथा वह वायु उसके सम्पूर्ण सूक्ष्म एवं महान् स्रोतों को पूर्ण करके उनके मार्ग को रोककर स्थित हो जाता है तथा पित्त को प्रकुपित कर देता है। फिर वायु द्वारा प्रेरित हुआ पित्त चारों ओर से श्लेष्मा से रुका हुआ होने से तथा परस्पर एक दूसरे के आश्रय से ज्वर, हल्लास, अरुचि, पर्वभेद, विसूचिका तथा अन्य भी नाना प्रकार के रोगों को उत्पन्न करके रोगी को कष्ट देता है।
३२६ | काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम् | विशेषकल्पः ? ]
प्रकृतेर्वा विपर्यासात् प्रकृत्या वा प्रकुप्यति ।। यथा यथोद्वलत्वं वा प्राप्नुवन्ति गदाधिपाः । तथैकद्वयुद्बलानाहुर्हीनमध्याधिकानपि ।। कूटस्थे तु समैर्दोषैर्जायते कूटपाकलः । एवमेते विनिर्देश्याः सन्निपातास्त्रयोदश ।।
अथवा प्रकृति के विपर्यास (विपरीतता) से या स्वभाव से ही दोष प्रकुपित होकर बल के अनुसार भिन्न २ रोगों को करते हैं जिससे एक तथा दो दोषों की प्रबलता वाले तथा हीन, मध्य एवं अधिक (तरतमाधिक्य के अनुसार) बलवान् दोषों वाले रोग उत्पन्न हो जाते हैं । तीनों समान दोषों के कूटस्थ (समावस्था) में होने पर कूटपाकल नामक सन्निपात होता है । इस प्रकार इन १३ सन्निपातों का निर्देश किया गया है । अष्टाङ्ग हृदय सू. अ. १२ में ये तेरह सन्निपात निम्नरूप से दिये हैं—त्रयोदश समस्तेषु षट् द्वयेकातिशयेन तु । एकं तुल्याधिकैः षट् च तारतम्यविकल्पनात् ।।
(क) द्वयुल्बण सन्निपात—
| १. वातवृद्ध | पित्तकफ अतिवृद्ध |
|---|---|
| २. पित्तवृद्ध | वातकफ अतिवृद्ध |
| ३. कफवृद्ध | वातपित्त अतिवृद्ध |
(ख) एकोल्वण सन्निपात—
| १. वातपित्त वृद्ध | कफ अतिवृद्ध |
|---|---|
| २. वातकफ वृद्ध | पित्त अतिवृद्ध |
| ३. पित्तकफ वृद्ध | वात अतिवृद्ध |
(ग) समसन्निपात—
| १. वातपित्तकफ | समवृद्ध |
|---|
(घ) हीनमध्याधिक (तरतमाधिक) सन्निपात—
| १. वात वृद्ध | पित्त वृद्धतर | कफ वृद्धतम |
|---|---|---|
| २. वात वृद्ध | कफ वृद्धतर | पित्त वृद्धतम |
| ३. पित्त वृद्ध | कफ वृद्धतर | वात वृद्धतम |
| ४. पित्त वृद्ध | वात वृद्धतर | कफ वृद्धतम |
| ५. कफ वृद्ध | वात वृद्धतर | पित्त वृद्धतम |
| ६. कफ वृद्ध | पित्त वृद्धतर | वात वृद्धतम |
इस प्रकार ये ३+३+१+६=१३ सन्निपात होते हैं ।।
विपन्नस्तु रसो योऽस्य धातून् यात्यनिलेरितः । विषादं गौरवं मूर्च्छा कुर्याच्चास्याङ्गवेदनाम् ।।
दूषित हुआ रोगी का रस वायु द्वारा प्रेरित हुआ धातुओं में पहुँचकर रोगी के शरीर में विषाद, गौरव (भारीपन), मूर्च्छा तथा अङ्गों में वेदना को उत्पन्न करता है ।।
स्वलक्षणेषु दोषाणां भिषक् प्राज्ञो न विभ्रमेत् । उदीरिता हि संसृष्टा दुर्बला एकदोषजाः ।।
प्रकुपित हुए दोषों के अनेक २ लक्षणों में बुद्धिमान् वैद्य को भ्रम में नहीं पड़ना चाहिये । उदीर्ण हुए संसृष्ट (द्विदोषज) तथा एकदोषज विकार दुर्बल होते हैं ।।
विशेषकल्पः ? ] कल्पस्थानम् ३२७
सन्निपातेषु दाहार्तं यः सिञ्चेच्छीतवारिणा ।
(इति ताडपत्रपुस्तके १९३ तमं पत्रम् ।)
आतुरः स कथं जीवेद्भिषग्वा स कथं भवेत् ।।
सन्निपात रोगों में दाह से पीडित रोगी का यदि शीतल जल से सिंचन किया जाय तो वह रोगी किस प्रकार जीवित रह सकता है तथा उसे वैद्य भी कैसे कहा जा सकता है ।।
सन्निपातेषु कम्पन्तं विलपन्तं च यो घृतम् । पाययेद्भोजयेद्वाऽपि तौ च स्यातामुभौ कथम् ।।
सन्निपात रोग में कांपते हुए तथा विलाप करते हुए रोगी को यदि घृत का पान अथवा भोजन कराया जाय तो वह रोगी किस प्रकार जीवित रह सकता है तथा उसे वैद्य भी कैसे कहा जा सकता है ।।
सन्निपातेषु तृप्यन्तं पार्श्वरुक्तालुशोषणम् । यः पाययेज्जलं शीतं स मृत्युर्नरविग्रहः ।।
सन्निपात रोग में प्यास, पार्श्वशूल और तालुशोष से युक्त रोगी में यदि शीतल जल का पान कराया जाय तो वह रोगी में यदि शीतल जल का पान कराया जाय तो वह रोगी मृत्यु से आक्रान्त हो जाता है ।।
समुद्रतरणं ह्येतद्वदन्ति भिषजोऽश्मना । मृत्युना सह योद्धव्यं सन्निपातं चिकित्सता ।।
सन्निपात की चिकित्सा करने को वैद्य लोग पत्थर के द्वारा समुद्र को तैरना तथा मृत्यु के साथ युद्ध करना मानते हैं ।।
सन्निपातारर्णवे मग्नं योऽभ्युद्धरति देहिनम् ।
कस्तेन न कृतो धर्मः कां च पूजां स नार्हति ।।
सन्निपातरूपी समुद्र में डूबते हुए रोगी का जो उद्धार करता है, उसने कौन सा धर्म नहीं किया है ? तथा वह किस पूजा के योग्य नहीं है ? अर्थात् इससे बढ़कर कोई धर्म नहीं है तथा उसकी सब प्रकार से पूजा करनी चाहिये ।।
सन्निपाते समुत्पन्ने किमादावभ्युपक्रमेत् । एतत् प्रश्नमतश्चोर्ध्वं चिकित्सोपक्रमं शृणु ।।
अब यह प्रश्न उपस्थित होता है कि सन्निपात रोग के उत्पन्न होने पर प्रारंभ में क्या उपक्रम करना चाहिये अर्थात् प्रारंभ में किस दोष की चिकित्सा करनी चाहिये । इस लिये अब इसकी चिकित्सा का उपक्रम सुन ।।
संमोहमत्र भूयिष्ठं भिषजो यान्त्यनिश्चिताः । अग्रे मूले च भेषज्यं कुर्वन्तो घ्नन्ति मानवान् ।।
निश्चय के अभाव के कारण वैद्य अत्यन्त मोह को प्राप्त होते हैं तथा कभी प्रारंभ की एवं कभी अन्त की चिकित्सा करते हुए प्राणियों को मार देते हैं । अर्थात् निश्चयाभाव से कभी किसी दोष की तथा कभी किसी दोष की चिकित्सा करने से रोगी को मार देते हैं ।।
यं दोषामुद्गलं पश्येत् सन्निपाते स्वलक्षणैः । तस्याग्रे निग्रहं कुर्यादित्यन्तभि विदुः ।।
कुछ वैद्य कहते हैं कि सन्निपात में अपने लक्षणों के द्वारा जिस दोष को बढ़ा हुआ देखे प्रारम्भ में उसकी चिकित्सा करे ।।
वृद्धजीवक ! नैवं तु वयं कुर्मश्चिकित्सितम् । असम्यग्दर्शिनस्ते तु य एवं भिषजो विदुः ।।
हे वृद्धजीवक ! हम इस प्रकार से चिकित्सा नहीं करते हैं । जो वैद्य ऐसा कहते हैं वे असम्यक्दर्शी होते हैं अर्थात् उन्हें यथावत् ज्ञान नहीं होता है ।।
३२८ काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम् विशेषकल्पः ? ]
श्लेष्मनिग्रहेमेवादौ कुर्याद्व्याधौ त्रिदोषजे। निरस्ते श्लेष्मणि ह्यास्य स्रोतःसूद्धाटितेषु च। लाघवं जायते सद्यस्तृष्णा चैवोपशाम्यति।। शिरोहृदयकर्णस्य पार्श्वरुक् चोपशाम्यति। जिह्वागुरुजडत्वं च दृष्टिश्चैव प्रसीदति।। तस्मात् पुनः पुनः कुर्याच्छ्लेष्मकर्षणमौषधैः।
त्रिदोषज व्याधि (सन्निपात) में सर्वप्रथम श्लेष्मा (कफ) की ही चिकित्सा करनी चाहिये। कफ के निकल जाने पर अथवा शान्त हो जाने पर सब स्रोत खुल जाते हैं। शरीर शीघ्र ही लघु (हलका) हो जाता है। तृष्णा शान्त हो जाती है। शिर, हृदय, कान तथा पार्श्वों के रोग शान्त हो जाते हैं। जिह्वा गुरु (भारी) तथा जड़ हो जाती है और दृष्टि प्रसन्न हो जाती है। इसलिये ओषधियों से पुनः २ श्लेष्मा (कफ) का कर्षण करे। चरक चि. अ. ३ में भी सन्निपात ज्वर का निम्नचिकित्सा सूत्र दिया है—वर्धनेनैकदोषस्य क्षपणेनोच्छ्रितस्य वा। कफस्थानानुपूर्व्या वा सन्निपातज्वरे जयेत्॥ अर्थात् एक दोषकी वृद्धि तथा वृद्ध दोष को क्षीण करके सन्निपात की चिकित्सा करे अथवा कफ स्थान के अनुसार ही चिकित्सा करनी चाहिये। अर्थात् जब सन्निपात में दोष तरतम भेद से बढ़े हुए विद्यमान हों तो वृद्ध को बढ़ाये परन्तु साथ ही वृद्धतर तथा वृद्धतम दोषों को घटाने का प्रयत्न करना चाहिये। परन्तु यदि सन्निपात में तीनों दोष समावस्था में हों तो उस अवस्था में पहले कफ की ही चिकित्सा करनी चाहिये। अर्थात् सर्वप्रथम लङ्घन आदि के द्वारा कफ को शान्त करना चाहिये। परन्तु यह क्रम ज्वरों में ही होता है अन्य सन्निपातों में नहीं। वहां प्रायः पूर्व वात की ही चिकित्सा करनी चाहिये॥
उदीर्णदोषं प्रथमे दिवसे वामयेन्नरम्।। विशोषितं न वमयेदमेध्यं हि वमेत्तथा।
पहले दिन जिसके दोष उदीर्ण हुए हैं उस व्यक्ति को वमन कराये। जिसका शोषण हुआ है उसे वमन न कराये तथा अमेध्य (अपवित्र) वस्तु का ही वमन कराये॥
सर्वेषु सन्निपातेषु न क्षौद्रमवचारयेत्।। शीतोपचारि हि क्षौद्रं शीतं चात्र विरुध्यते।
सब प्रकार के सन्निपातों में मधु का प्रयोग नहीं कराना चाहिये। क्योंकि मधु शीतोपचारी (शीतल उपचार=चिकित्सा वाला) है तथा सन्निपात में शीतोपचार विरुद्ध माना गया है॥
उष्णोपचारी सततं सन्निपाती प्रशस्यते।। वर्जयेच्च दिवास्वप्नं धृति सत्त्वं च संश्रयेत्।
सन्निपात ज्वर में सदा उष्णोपचार (उष्ण चिकित्सा) प्रशस्त माना गया है। इसके साथ दिवास्वप्न का त्याग करना चाहिये तथा धैर्य एवं सत्त्व (मानसिक बल) को स्थिर रखना चाहिये॥
लङ्घनं स्वेदनं नस्यं मर्दनं कवलग्रहः।। एतान्यादौ प्रयुञ्जीत सन्निपातेषु युक्तिवित्।
युक्ति को जानने वाला वैद्य सन्निपात में प्रारम्भ में लङ्घन, स्वेदन, नस्य, मर्दन (मालिश) तथा कवलग्रह (सुखं संचार्र्यते या तु मात्रा स कवलग्रहः) का प्रयोग करे॥
वक्तव्य—लङ्घन का अर्थ अनशन के साथ निर्बल मनुष्यों के लिये लघु भोजन भी होता है। लङ्घन का लक्षण चरक में निम्न दिया है—शरीरलाघवकरं यद् द्रव्यं कर्म वा पुनः। तल्लङ्घ नमिति ज्ञेयम्॥
विशेषकल्पः ? ] कल्पस्थानम् ३२९
त्रिरात्रं पञ्चरात्रं वा दशरात्रमथापि वा ।।
लङ्घनं सन्निपाते तु कुर्याद्ध्याऽऽरोग्यदर्शनात् ।
सन्निपात में लङ्घन की मर्यादा—सन्निपात में तीन, पांच तथा दस दिन तक अथवा आरोग्य (स्वास्थ्य) की प्राप्ति पर्यन्त लङ्घन कराना चाहिये। अर्थात् जब तक शरीर स्वस्थ या रोगमुक्त न हो जाय जाय तब तक लङ्घन का प्रयोग करना चाहिये। चरक चि. अ. ३ में भी लङ्घन की मर्यादा दी है—प्राणाविरोधिना चैनं लङ्घनेनोपपादयेत्। बलाधिष्ठानमारोग्यं यदर्थोऽयं क्रियाक्रमः।। अर्थात् लंघन के द्वारा जब तक प्राण एवं बल की क्षीणता न हो तब तक लंघन किया जा सकता है। अष्टांगसंग्रह में लंघन का निम्न प्रयोजन दिया है—आमाशयस्थो हत्वाग्नि सामो मार्गान् पिधापयन्। विदधाति ज्वरं दोषस्तस्माल्लङ्घनमाचरेत्।। अर्थात् आमरस के द्वारा ही रोग उत्पन्न होते हैं। लङ्घन के द्वारा आमरस का शीघ्र ही पाचन हो जाता है जिससे ज्वर आदि रोग शान्त हो जाते हैं। चरक में भी कहा है—लङ्घनेन क्षयं नीते दोषे संधुक्षितेऽनले। विज्वरत्वं लघत्वं च क्षुच्चैवास्योपजायते।।
प्रकाङ्क्षा लाघवं ग्लानिः स्वच्छता संप्रसन्नता ।।
उपद्रवनिवृत्तिश्च सम्यग्लङ्घितलक्षणम् ।
सम्यक् लङ्घित के लक्षण—लंघन के सम्यक् प्रकार से हो जाने पर प्रकाकांक्षा (भोजन में रुचि), लघुता, ग्लानि, शरीर की स्वच्छता, प्रसन्नता तथा उपद्रवों की शान्ति ये लक्षण होते हैं। सृष्टमारुतविण्मूत्रं क्षुत्पिपासासहं लघुम्। प्रसन्नात्मेन्द्रियं क्षामं नरं विद्यात् सुलङ्घितम्।।
अग्लानिगौरवाश्रद्धाविकृतिश्चाविशोधिते ।।
संमोहक्षामशैथिल्यवातरूक् चातिलङ्घिते ।
अतिलङ्घित के लक्षण—लंघन के मात्रा से अधिक हो जाने पर ग्लानि का अभाव, शरीर की गुरुता (भारीपन), अश्रद्धा (भोजन में अरुचि), विकार, आवश्यकता से अधिक शोषण, संमोह (मूर्च्छा), कमजोरी, शिथिलता तथा अन्य वातिक रोग आदि हो जाते हैं।।
स्वेदाध्याये यथा प्रोक्ताः स्वेदाः सर्वाङ्गिकास्तथा ।।
तच्चास्य स्वेदयेत् प्रायो यत्र यत्रास्य वेदना ।
स्वेदाध्याय में जो सर्वाङ्गिक स्वेद गिनाये हैं—रोगी के शरीर में जहां २ पीडा हो प्रायः उनके द्वारा स्वेदन देना चाहिये। चरक चि. अ. ३ में भी कहा है—त्रयोदशविधः स्वेदाध्याये निदर्शितः। मात्राकालविदा युक्तः।।
कफो हि वायुना क्षिप्तो विष्टब्धः पार्श्वयोर्हृदि ।।
खरीकृतश्च पित्तेन शल्यवद्बाधते नरम् ।
वायु के द्वारा दूर हटाया गया तथा पार्श्व एवं हृदय में विष्टब्ध हुआ कफ पित्त के द्वारा खर (कठोर) होकर मनुष्य को शल्य (मनःशरीराबाधकराणि शल्यानि) की तरह कष्ट पहुँचाता है।।
तस्याशुष्कस्य लीनस्य विलग्नस्य कृशात्मनः ।।
दुःखनिर्हरणं कर्तुं तीक्ष्णादन्यन्न भेषजात् ।
उस अशुष्क, लीन (झुके हुए), विलग्न तथा कृश शरीर वाले रोगी का दुःख (कष्ट-रोग) दूर करने के लिये तीक्ष्ण ओषधियों के अतिरिक्त अन्य कोई उपाय नहीं है अर्थात् इस अवस्था में तीक्ष्ण ओषधियों का ही प्रयोग करना चाहिये।।
३३० काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम् विशेषकल्पः? ]
तस्य तीक्ष्णानि नस्यानि तीक्ष्णाश्च कवलग्रहाः ।।
स्वेदं दिवाजागरणं विदध्यात् पार्श्वशूलिनः ।
उस व्यक्ति को यदि पार्श्वशूल हो तो उसे तीक्ष्ण नस्य, तीक्ष्ण कवलग्रह, स्वेद तथा दिन में जागरण (दिन में न सोना) इत्यादि का प्रयोग करना चाहिये ।।
मातुलुङ्गार्द्रकरसं कोष्णं त्रिलवणान्वितम् ।।
अन्यद्वा सिद्धिविहितं तीक्ष्णं नस्यं विधापयेत् ।
ईषदूष्ण (हलके गरम) बिजौरे तथा अदरक के रस में तीनों नमक (सैन्धव, सामुद्र तथा विडनमक) मिलाकर अथवा सिद्धि स्थान में कहे हुए अन्य तीक्ष्ण नस्यों का प्रयोग करना चाहिये ।।
तेन प्रभिद्यते श्लेष्मा प्रस्विन्नश्च प्रसिच्यते ।।
शिरोहृदयमन्यास्यं दृष्टिश्चास्य प्रसीदति । प्रमीलकस्तालुशोषः श्वासः कासश्च शाम्यति ।।
पुनः पुनश्च निद्रायां कटु नस्याञ्जनं हितम् ।
इसके प्रयोग से कफ का भेदन हो जाता है तथा भेदन होने के बाद वह कफ स्विन्न होकर शरीर से बाहर निकल जाता है। जिससे शिर, हृदय, मन्या, मुख तथा दृष्टि प्रसन्न हो जाती है। उसके प्रमीलक (मूढता), तालुशोष, श्वास तथा कास शान्त हो जाते हैं। निद्रा आने पर पुनः २ कटु नस्य तथा अञ्जन का प्रयोग करना चाहिये ।।
तीक्ष्णैर्द्रव्यैः सलवणैर्मातुलुङ्गरसद्रवैः ।।
द्रवाम्लयुक्तैरथवा कोष्णाः स्युः कवलग्रहाः ।
तीक्ष्ण द्रव्यों से बिजौरे के रस में लवण मिलाकर अथवा अम्ल द्रव्यों से युक्त ईषदूष्ण कवलग्रहों (गरारों) का प्रयोग कराना चाहिये ।।
आर्द्रकस्वरसोपेतं सैन्धवं सकटुकत्रिकम् ।।
आकर्षं धारयेदास्ये निष्ठीवेच्च पुनः पुनः ।
सैन्धव तथा त्रिकटु मिले हुए अदरक के स्वरस को जब तक कफ न निकले मुख में धारण करे तथा उसे बार २ थूक दे ।।
तेनास्य हृदयश्लेष्मा मन्यापार्श्वशिरोगलात् ।।
लीनो व्याकृष्यते शुष्के लाघवं चास्य जायते । पर्वभेदो ज्वरो निद्राश्वासकासगलामयाः ।।
मुखाक्षिगौरवं जाड्यमुत्क्लेशश्चोपशाम्यति । सकृद्द्वित्रिचतुः कुर्याद् दृष्ट्वा दोषबलाबलम् ।।
एतद्धि परमं प्राहुर्भेषजं सन्निपातिनः ।
इससे उसकी लीन हुई हृदयस्थित श्लेष्मा का मन्या, पार्श्व, शिर तथा गले से कर्षण हो जाता है। उस श्लेष्मा के शुष्क हो जाने पर शरीर में लघुता हो जाती है तथा पर्वभेद (सन्धियों में पीडा), ज्वर, निद्रा, श्वास, गले के रोग, मुख तथा आंखों का भारीपन, जड़ता तथा उत्क्लेश शान्त हो जाते हैं। दोष के बलाबल को देखकर इसका एक, दो, तीन अथवा चार बार आवश्यकतानुसार प्रयोग करना चाहिये। यह सन्निपात रोग की श्रेष्ठ ओषधि कही गई है ।।
श्लेष्मणा कृष्यमाणस्य सततं सन्निपातिनः ।।
(इति ताडपत्रपुस्तके १९४ तमं पत्रम् ।)