काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)
Kashyapa Samhita Hindi
महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा
स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंरेवतीकल्पः ? ] कल्पस्थानम् २९१
स्त्रीविनाशाय सा प्रोक्ता मोहिनी जातहारिणी ।।
मोहिनी के लक्षण—जिसके द्वारा गर्भ आक्रान्त होता है अथवा वह अपने स्थान से मुक्त हुआ प्रतीत होता है उस जातहारिणी को मोहिनी कहते हैं । इससे स्त्री विनष्ट हो जाती है ॥३९॥
यस्या नस्पन्दते गर्भः स्तम्भनी नाम सा स्मृता ।।४०।।
स्तम्भनी के लक्षण—जिसका गर्भ स्पन्दन नहीं करता उसे स्तम्भनी कहते हैं ॥४०॥
उदरस्थो यया क्रोशेत् क्रोशना नाम सा स्मृता ।।
जिस जातहारिणी के कारण उदर में स्थित हुआ गर्भ आक्रोश करता है (चिल्लाता) है उसे क्रोशना कहते हैं ।
दशैता जातहारिण्यो जीवमानासु मातृषु ।।४१।।
असाध्याः पुष्पघातिन्यः साध्या गर्भोपघातिकाः ।।
इस प्रकार जीवित माताओं में ये दस जातहारिणियां कही गई हैं अर्थात् इनमें माताओं की मृत्यु नहीं होती । इनमें पुष्प (आर्तव) को नष्ट करनेवाली असाध्य होती है तथा गर्भ को नष्ट करने वाली साध्य होती हैं ॥४१॥
जायते तु मृतं नित्यं यस्या नार्याः सवे सवे ।।४२।।
नाकिनीमिति तां विद्याद्दारुणां जातहारिणीम् ।।
अब याप्य जातहारिणी के भेद एवं लक्षण कहे जाते हैं—नाकिनी का लक्षण—जिस स्त्री का गर्भ नित्य मृत उत्पन्न होता है उस दारुण जातहारिणी को नाकिनी कहते हैं ॥४२॥
जातं जातमपत्यं तु यस्याः सद्यो विनश्यति ।।४३।।
पिशाची नाम सा घोरा मांसादी जातहारिणी ।।
पिशाची का लक्षण—जिस स्त्री के पुत्र उत्पन्न होते ही नष्ट हो जाते हैं उस मांस भक्षण करनेवाली जातहारिणी को पिशाची कहते हैं ॥४३॥
द्वितीये दिवसे यक्षी, तृतीयेऽहनि चासुरी ।।४४।।
कलिनर्म चतुर्थेऽह्नि, पञ्चमेऽह्नि च वारुणी ।।
षष्ठेऽहनि स्मृता षष्ठी, सप्तमेऽहनि भीरुका ।।४५।।
अष्टमे दिवसे याम्या, मातङ्गी नवमेऽहनि ।।
दशमे भद्रकालीति, रौद्री त्वेकादशेऽहनि । द्वादशे वर्धिका प्रोक्ता, त्रयोदशे च चण्डिका ।।४६।।
कपालमालिनी नाम चतुर्दशे च रेवती । ततः पक्षात् परे काले विज्ञेया पिलिपिच्छिका ।।४७।।
जिस स्त्री के पुत्र जन्म के द्वितीय दिवस नष्ट हो जाते हैं, उसे यक्षी, तृतीय दिवस नष्ट हो जाने वाली को आसुरी, चतुर्थ दिवस नष्ट हो जाने वाली को कलि, पांचवें दिवस नष्ट हो जाने वाली को वारुणी, छठे दिवस नष्ट हो जाने वाली को षष्ठी, सातवें दिवस नष्ट हो जाने वाली को भीरुका, आठवें दिवस नष्ट हो जाने वाली को याम्या, नवें दिवस नष्ट हो जानेवाली को मातङ्गी, दसवें दिवस नष्ट हो जानेवाली को भद्रकाली, ११ वें दिवस नष्ट हो जानेवाली को रौद्री, १२ वें दिवस नष्ट हो जानेवाली को वर्धिका, १३ वें दिवस नष्ट हो जानेवाली को चण्डिका, १४ वें दिवस नष्ट हो जानेवाली रेवती को कपालमालिनी तथा एक पक्ष के बाद जिसका गर्भ नष्ट होता है उसे पिलिपिच्छिका कहते हैं ॥४४-४७॥
एताः षोडश निर्दिष्टा नामभिः कर्मभिः पृथक् । दारुणा जातहारिण्यो याप्या धर्मक्रियावताम् ।।४८।।