भारतकोश
काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

Kashyapa Samhita Hindi

महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा

स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished942 पृष्ठ

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२९२ काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम् रेवतीकल्पः ? ]

इस प्रकार धर्म-कर्म से युक्त स्त्रियों में नाम एवं कर्म के अनुसार ये १६ प्रकार की दारुण याप्य याप्य जातहारिणियों का निर्देश किया गया है ॥४८॥

यस्यास्तु गर्भरूपाणि पञ्च षट् सप्त वा मुने ! । म्रियन्तेऽनन्तरं वश्या असाध्या जातहारिणी ॥४९॥
अब असाध्य जातहारिणियों के भेद एवं लक्षण कहे जाते हैं—
वश्या के लक्षण—जिस स्त्री के गर्भरूप बालक ५, ६ या ७ मास की अवस्था में नष्ट हो जाते हैं उसे वश्या नाम की असाध्य जातहारिणी कहते हैं ॥४९॥

म्रियन्ते दारका यस्याः कन्या जीवन्त्ययततः । कुलक्षयकरी नाम साऽसाध्या जातहारिणी ॥५०॥
कुलक्षयकरी का लक्षण—जिसके पुत्र मर जाते हैं तथा कन्याएँ बिना यत्न के भी जीवित रहती हैं उसे कुलक्षयकरी नाम की असाध्य जातहारिणी कहते हैं ॥५०॥

जातं जातमपत्यं तु यस्याश्च म्रियते स्त्रियाः । घोरा पुण्यजनी नाम साऽसाध्या जातहारिणी ॥५१॥
पुण्यजनी का लक्षण—जिस स्त्री की सन्तान उत्पन्न होते ही मर जाती है उसे भयंकर पुणजनी नाम की असाध्य जातहारिणी कहते हैं ॥५१॥

निष्पन्नं म्रियतेऽपत्यं यस्याः प्राक् षोडशाब्दतः । पौरुषादिनी सा प्रोक्ता असाध्या जातहारिणी ॥५२॥
पौरुषादिनी का लक्षण—जिसका पुत्र १६ वर्ष की अवस्था से पूर्व मर जाता है उसे पौरुषादिनी नाम की असाध्य जातहारिणी कहते हैं ॥५२॥

बिभर्त्यन्यं यदा गर्भं तदा पूर्वः प्रमीयते । संदंशीति वदन्त्येनामसाध्यां जात(हारिणीम्) ॥५३॥
इति ताडपत्रपुस्तके १७९ तमं पत्रम्)
संदंशी का लक्षण—जब स्त्री दूसरे गर्भ को धारण करती है तब उसका पहला गर्भ (पुत्र) नष्ट हो जाता है । तब उसे संदंशी नाम की असाध्य जातहारिणी कहते हैं ॥५३॥

गर्भेणैकं ग्रहेणैकं मृत्युनैकेन युज्यते । एषा कर्कोटोकीत्युक्ता दारुणा जातहारिणी ॥५४॥
कर्कोटकी का लक्षण—कभी व्यक्ति गर्भ, कभी ग्रह तथा कभी मृत्यु से युक्त हो जाता है । उस भयंकर जातहारिणी को कर्कोटकी कहते हैं ॥५४॥

यमजं म्रियते यस्या एकं वोभयमेव वा । तामाहुरिन्द्रवडवामसाध्यां जातहारिणीम् ॥५५॥
इन्द्रवडवा का लक्षण—जिसके एक या दोनों यमज (जुडवां-Twins) मर जाते हैं उस असाध्य जातहारिणी को इन्द्रवडवा कहते हैं ॥५५॥

एकनाभिप्रभवयोरेकश्चेन्म्रियते पुरा । म्रियते तद्गदप्येकस्तामाहुर्बडवामुखीम् ॥५६॥
बडवामुखी का लक्षण—एक नाभि से उत्पन्न होनेवाले अर्थात् यमज में से यदि एक की पहले मृत्यु हो जाय तो दूसरे की भी मृत्यु हो जाती है । उसे बडवामुखी कहते हैं ॥५६॥

अथैवंवदिनमृषिं कश्यपं लोकपूजितम् । पुनरेव महाप्रश्नमपृच्छद् वृद्धजीवकः ॥५७॥
इस प्रकार उपदेश करते हुए लोकपूजित महर्षि कश्यप से वृद्धजीवक ने पुनः निम्न प्रश्न किया ॥५७॥