काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)
Kashyapa Samhita Hindi
महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा
स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)
पृष्ठ 653, कुल 942 में से
संदर्भ में पढ़ेंरेवतीकल्पः ? ] कल्पस्थानम् २९३
एकनाभिकयोः कस्मात्तुल्यं मरणजीवितम्। रोगारोग्यं सुखं दुःखं न तु तृप्तिः समानजा ।।५८।।
एक नाभि से उत्पन्न होने वाले (अर्थात् यमल=जुड़वां-Twins) पुत्रों की तृप्ति-पोषण समान न होने पर भी मृत्यु जीवन, रोग, आरोग्य एवं सुख दुःख आदि समान क्यों होते हैं। अर्थात् उनमें से एक की मृत्यु होने पर दूसरे की भी मृत्यु इत्यादि क्यों हो जाते हैं जबकि उनको पोषण समान नहीं मिलता है ॥५८॥
अथ खलु भगवान् कश्यप उवाच-
एकमेव हि तद् बीजं भिन्नं वायुबलादथ ।
समानकर्मकत्वात् प्राङ्नाड्यैकत्वं च जन्म च ।।५९।।
तुल्यं निषेकाद् वृद्धेश्च जन्मनः स्तनसेवनात् ।।
तस्मातुल्यं वयः प्रोक्तं सुखं दुःखं भवाभवौ ।।६०।।
लक्षणाकृतिवर्णाङ्गबलप्रकृतितुल्यता ।। न तु तृप्तिविसर्गाणां पृथग्भावात् समानता ।।६१।। इति
भगवान् कश्यप ने उत्तर दिया—गर्भ में वह बीज एक ही होता है। वह समान कर्मों के कारण वायु द्वारा दो भागों में विभक्त हो जाता है। इन दोनों के नाडी तथा जन्म एक समान होते हैं। इनके निषेक (गर्भाधान), वृद्धि, जन्म तथा स्तनपान आदि तुल्य होने वय (अवस्था-Age), सुख, दुःख, भव (कल्याण-आरोग्य) तथा अभव (रोग) आदि सब समान होते हैं। इनके लक्षण, आकृति, वर्ण, अङ्ग, बल, प्रकृति आदि सब समान होते हैं। परन्तु पृथक् होने से उनकी तृप्ति (पोषण) तथा विसर्ग (मल-मूत्र आदि का त्याग) में समानता नहीं होती है ॥५९-६१॥
अथ खलु वृद्धजीवक ! त्रिविधैव जातहारिणी प्रोच्यते लोकभेदतः—दैवी, मानुषी, तिरश्चीनेति । तस्मात्रयो लोका भगवत्या रेवत्या बहुरूपया व्याप्ताः । इत्यतश्च सर्वलोकभयङ्करी रेवती पठ्यते । तां देवा अ(म)न्यन्त, तत एषां प्रजाः प्रावृध्यन्त; न एषां प्रजा विच्छेदगममत् । नास्य प्रजा विच्छिद्यते य एवं वेद । तामथ रेवतीं सर्वलोकगुरुमभिव्यापिकां सर्वर्षीणां कश्यप एवाग्रे तपसोग्रेणाऽविन्दत । तस्मै प्रजां बहुलामाशीरायुष्मतीमविच्छिन्नां प्रादात् । ततः सर्वेभ्योऽभ्यधिकोऽभवत् । रेवतीमेकशोऽभिज्ञश्च रेवतीकल्पं शिष्येभ्यः प्रादाज्जगद्धितार्थम् ।।६२।।
हे वृद्धजीवक ! लोक भेद से पुनः तीन प्रकार की ही जातहारिणियां कही गई हैं। १ दैवी २ मानुषी ३ तिरश्चीना (पशु-पक्षिसंबन्धी)। इस प्रकार तीनों लोक अनेक रूपों वाली भगवती रेवती के द्वारा व्याप्त हैं। इसलिये रेवती सम्पूर्ण लोकों में भयंकर कही जाती है। देवता उसका सम्मान करते हैं इसलिये उनकी सन्तानों की वृद्धि होती है। उनकी सन्तानों का विच्छेद (वियोग) नहीं होता है। जो इस तथ्य को जानता है उसकी सन्तान का विच्छेद नहीं होता। सम्पूर्ण लोकों की गुरु तथा व्यापक इस रेवती को सब ऋषियों से पूर्व महर्षि कश्यप ने ही उग्र तपस्या के द्वारा प्राप्त किया था। इससे रेवती ने कश्यप को आशीर्वाद दिया तथा उसके बहुत सारी आयुष्मती सन्तान हो गई जो अविच्छिन्न थी। इससे उसके सबसे अधिक सन्तान हो गई। रेवती को प्रकारान्तरूप (पूर्णरूप) से जानकर कश्यप ने लोक कल्याण के लिये शिष्यों को रेवतीकल्प का ज्ञान प्रदान किया ॥६२॥
अतो वृद्धजीवक ! निरुक्ता दैवी रेवती; मानुषीमत्र व्याख्यास्यामः—तत्र यथोक्तैरधर्मद्वारैर्यां यां स्त्रियमत्र प्रविशति, तां तां स्त्रियमनुवर्तयिष्यामः ।।६३।।