भारतकोश
काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

Kashyapa Samhita Hindi

महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा

स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished942 पृष्ठ

पृष्ठ 650, कुल 942 में से

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पृष्ठ 650
२९०काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम्रेवतीकल्पः ? ]

शुष्क रेवती के लक्षण—सोलह वर्ष की अवस्था तक भी जिस स्त्री को रजोदर्शन नहीं होता तथा जिसके बाहु एवं कुच (नितम्ब) पतले होते हैं उसे शुष्क रेवती कहते हैं ॥३१॥

विना पुष्पं तु या नारी यथाकालं प्रणश्यति ।।३२।।
कृशा हीनबला क्रुद्धा साऽपि चोक्ता कटम्भरा ।।

कटम्भरा के लक्षण—बिना रजोदर्शन के ही जो स्त्री उचित काल में नष्ट हो जाती है, जो कृश, हीनबल वाली एवं शुद्ध होती है उसे कटम्भरा कहते हैं ॥३२॥

वृथा पुष्पं तु या नारी यथाकालं प्रपश्यति ।।३३।।
स्थूललोमशगण्डा वा पुष्पघ्नी साऽपि रेवती ।।

पुष्पघ्नी के लक्षण—जिस स्त्री को यथासमय रजोदर्शन होता है परन्तु वह व्यर्थ (बिना फल वाला) होता है। जिसके गण्डस्थल (कपोल) स्थूल एवं लोम युक्त होते हैं उस रेवती को पुष्पघ्नी कहते हैं ॥३३॥

कालवर्णप्रमाणैर्या विषमं पुष्पमृच्छति ।।३४।।
अनिवित्तबलम्लानिर्विकुटा नाम सा स्मृता ।।

विकुटा के लक्षण—जिस स्त्री का पुष्प (ऋतुस्त्राव) काल वर्ण एवं प्रमाण से विषम हो अर्थात् विषम काल में, विषम वर्ण वाला तथा प्रारंभ में भी विषम हो। बिना कारण के ही जिसे बल एवं ग्लानि हो जाती हो उसे विकुटा कहते हैं ॥३४॥

अभीक्ष्णं स्त्रवते यस्या नार्या योनिः कृशात्मनः ।।३५।।
परिस्रुतेति सा ज्ञेया नारीणां जातहारिणी ।।

परिस्रुता के लक्षण—जिस कृश स्त्री की योनि से निरन्तर स्राव बहरा रहता है। उस जातहारिणी को परिस्रुता कहते हैं ॥

यस्यास्त्वालक्ष्यमालग्नमण्डं प्रपतति स्त्रियाः ।।३६।।
अण्डघ्नीमिति ह्याहुस्तां दारुणां जातहारिणीम् ।।

अण्डघ्नी के लक्षण—जिस स्त्री का लक्ष्ययुक्त तथा चिपका हुआ अण्ड (गर्भ) गिर जाता है—उस दारुण (भयंकर) जातहारिणी को अण्डघ्नी कहते हैं ॥३६॥

नातिनिर्वृत्तदेहाङ्गो यस्या गर्भो विनश्यति ।।३७।।
दुर्धरा नाम सा ज्ञेया सुघोरा जातहारिणी ।।

दुर्धरा के लक्षण—जिसके देह के अङ्ग अधिक प्रकट नहीं हुए हैं ऐसा गर्भ जिस स्त्री का नष्ट हो जाता है उस अत्यन्त भयंकर जातहारिणी को दुर्धरा कहते हैं ॥३७॥

सम्पूर्णाङ्गं यदा गर्भं हरते जातहारिणी ।।३८।।
कालरात्रीति सा प्रोक्ता दुःखात् स्त्री तत्र जीवतित ।।

कालरात्रि के लक्षण—जब जातहारिणी सम्पूर्ण अङ्गों वाले (अर्थात् पूर्ण रूप से बने हुए) गर्भ का हरण कर लेती है उसे कालरात्रि कहते हैं। इसमें स्त्री बड़े दुःख से जीवित रहती है ॥३८॥

यया विषज्जते गर्भः प्रतीतो वाऽथ मुच्यते ।।३९।।

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