भारतकोश
काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

Kashyapa Samhita Hindi

महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा

स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished942 पृष्ठ

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पृष्ठ 649

रेवतीकल्पः ? ] कल्पस्थानम् २८९

सन्ध्ययोरप्सु रजसि शून्यदेवालयेषु च ।।२३।।
मैथुनं यान्ति ये मोहाद्धन्ति ताञ्जातहारिणी ।

जो व्यक्ति अज्ञानवश दोनों सन्ध्याओं में, नदी तालाब आदि के पानी में, धूल में तथा खाली मन्दिरों में मैथुन करता है—उन्हें जातहारिणी नष्ट कर देती है ॥२३॥

अधर्मद्वारमासाद्य यदा विशति रेवती ।।२४।।
नारीं तदा भवन्त्यस्या रूपाणीमानि जीवक ! ।
(इति ताडपत्रपुस्तके १७८¹ तमं पत्रम्)

हे जीवक ! उपर्युक्त अधर्मयुक्त मार्गों से जब रेवती स्त्री में प्रवेश करती है तब उसके शरीर के मलिन होने पर निम्न रूप (लक्षण) होते हैं ॥२४॥

प्रम्लायतस्तनोस्तस्या रूपाणीमानि, हीयते ।।२५।।
दृष्टिर्व्याकुलतां याति यथाकालं न पुष्यति । भ्रष्टसत्त्वा निरुत्साहा कुक्षिशूलनिपीडिता ।।२६।।
भवत्यप्रियरूपा च तैस्तै रोगैरुपद्रुता ।। विपरीतसमारम्भा विपरीतनिषेविणी ।।२७।।
उच्छिष्टा विकृता धृष्टा सर्वार्थेषु प्रवर्तते । अर्थसिद्धिर्न भवति संपच्चास्याः प्रलुप्यते ।।२८।।
गोजाविमहिषीष्वस्या न जीवन्ति च वत्सकाः । अयशः प्राप्नुते घोरं वैधव्यं वा निगच्छति ।।२९।।
कुलक्षयं वा कुरुते प्रसक्ता जातहारिणी ।

जातहारिणी के द्वारा उसके शरीर के म्लान होने पर निम्न लक्षण होते हैं—उसकी दृष्टि कमजोर हो जाती है, व्याकुलता रहती है, ठीक समय पर पोषण नहीं होता, उसका मन पतित हो जाता है, कार्य में उत्साह नहीं होता है, तथा वह कुक्षिशूल से पीडित रहती है । उसका रूप (आकृति) अप्रिय हो जाता है तथा अनेक प्रकार के रोगों से व्याप्त हो जाती है । उसके सब कार्यों के प्रारम्भ विपरीत होते हैं तथा वह विपरीत ही आचरण करती है । वह उच्छिष्ट, विकृत तथा धृष्ट होती है । सम्पूर्ण विषयों में वह प्रवृत्त हो जाती है । उसे अर्थ (धन) की प्राप्ति नहीं होती तथा उसकी सम्पत्ति (प्रशस्त गुण) लुप्त हो जाती है । इसकी गौ, बकरी, भेड़ तथा भैंस आदि के बच्चे जीवित नहीं रहते । उसे भयंकर अपयश प्राप्त होता है, वह विधवा हो जाती है तथा प्रसक्त हुई जातहारिणी उसके कुल का क्षय (नाश) कर देती है ॥२५-२९॥

शास्त्रतस्त्रिविधामाहुर्मुनयो जातहारिणीम् ।।३०।।
साध्यां याप्यामसाध्यां च तासां लक्षणमुच्यते ।।

शास्त्रों के अनुसार ऋषियों ने तीन प्रकार की जातहारिणियां कही हैं । १. साध्य २. याप्य ३. असाध्य । अब उ के लक्षण कहे जाते हैं ॥३०॥

आषोडशवर्षप्राप्ता या स्त्री पुष्पं न पश्यति ।।३१।।
प्रम्लानबाहुरुकुचा तामाहुः शुष्करेवतीम् ।।

पहले साध्य जातहारिणी (रेवती) के भेद तथा उनके लक्षण कहे जाते हैं—


१. मूलताडपत्रपुस्तके ७८-७९ पत्रयोः, ८०-८१ पत्रयोश्च मिथः पत्राङ्कव्यत्ययो दृश्यते, परं ग्रन्थसंलापने लेखकप्रमादाद्व्यत्ययमवधार्य सम्बद्धो ग्रन्थपौर्वापर्यविन्यासस्तदनुसारी पत्राङ्कविन्यासश्चात्र निर्दिष्टः ।