काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)
Kashyapa Samhita Hindi
महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा
स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें२८८ काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम् रेवतीकल्पः ? ]
गोपालस्य प्रजा हन्ति गोमाता जातहारिणी । महिष्युष्ट्र्यजपालानामेवमेव प्रजाक्षयम् ।।१५।। करोत्यधर्मसंजाता प्रसक्ता जातहारिणी ।
गौओं के वध, अङ्गभेद तथा बन्धन, दोहन इत्यादि कारणों से जातहारिणी रूप गोमाता गौओं के पालन करने वाले (ग्वाले) की सन्तान का हनन कर देती है। इसी प्रकार अधर्म से उत्पन्न हुई जातहारिणी भैंस, ऊंटनी तथा बकरी के पालन करने वाले व्यक्तियों की भी सन्तान को नष्ट कर देती है ॥१४-१५॥
ब्रह्मस्वहारिणां लोके विषमाणां दुरात्मनाम् ।।१६।। तस्कराणां शठानां च प्रजा हन्त्युग्ररेवती ।
उग्रस्वरूप वाली रेवती लोक में ब्रह्म (ज्ञान) का हरण करने वाले विषम, दुष्ट, चोर तथा धूर्त व्यक्तियों की सन्तान को नष्ट कर देती है ॥१६॥
रसनाः पापकार्याणां दुष्कुला भिन्नसेतवः ।।१७।। ये भवन्त्यनयप्राया निर्दयाः सर्वजातिषु । अरक्षिणस्तीक्ष्णदण्डा वृद्धानां शासनातिगाः ।।१८।। अनपेक्षितवृत्तान्ता अधर्मस्य प्रवर्तकाः । राज्ञो यस्य च दौर्बल्यात् क्षयं यान्तीह च प्रजाः ।।१९।। गोब्राह्मणं विशेषेण हन्ति तं जातहारिणी ।
जो व्यक्ति पाप कार्यों में रत रहते हैं, नीच कुलवाले होते हैं, जो व्यक्ति मर्यादा का उल्लंघन करने वाले हैं जो अन्याय करते हैं और सम्पूर्ण जातियों के प्रति दयारहित होते हैं, जिनकी कोई रक्षा नहीं की जाती, जो तीक्ष्ण दण्डों को धारण करते हैं, जो वृद्ध व्यक्तियों के शासन (वश) में नहीं रहते, जिनका वृतान्त अपेक्षित नहीं होता, जो अधर्म के प्रवर्तक हों तथा जिस राजा की दुर्बलता के कारण प्रजा—विशेषकर गौ एवं ब्राह्मणों का नाश होता हो—उन्हें जातहारिणी नष्ट कर देती है ॥१७-१९॥
एवमेव दुरात्मानो राजमात्रा नृपाज्ञया ।।२०।। प्रजा यदा प्रबाधन्ते हन्ति ताञ्जातहारिणी ।
इसी प्रकार जब दुष्ट दुष्ट लोग राजा की आज्ञा से प्रजा को सताते हैं तब उन्हें जातहारिणी नष्ट कर देती है ॥२०॥
वणिक् पण्योपघाती यो यश्चाप्यस्य¹ प्रतीक्षकः ।।२१। अतिवार्धुषिकश्चैव हन्यन्ते बहुरूपया ।
जो बनिया बाजार का व्यतिक्रम करता है (अर्थात् Black marketing करता है) अथवा जो इसीका अनुगामी है, तथा जो अत्यन्त धन की वृद्धि का इच्छुक है वह अनेक रूपों वाली जातहारिणी के द्वारा विनष्ट हो जाता है ॥२१॥
कन्याया यश्च भूमेश्च हिरण्यस्याश्वरवाससाम् ।।२२।। कुर्वन्ति येऽनृतान्येषां (घातिनी) जातहारिणी ।
जो व्यक्ति कन्या, भूमि, स्वर्ण, अश्व तथा वस्त्रों के विषय में अनृत (असत्य) व्यवहार करते हैं—उन्हें जातहारिणी नष्ट कर देती है ॥२२॥
१. तदनुगामीत्यर्थः ।