काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)
Kashyapa Samhita Hindi
महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा
स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)
पृष्ठ 647, कुल 942 में से
संदर्भ में पढ़ेंरेवतीकल्पः ? ] कल्पस्थानम् २८७
से युक्त स्त्रियों के साथ संयोग करती हो, उनके साथ भोजन तथा स्नान करती हो, वस्त्र तथा अलंकार प्रदान करती हो, उनके स्नान, मूत्र तथा बलिस्थान को आक्रान्त करती है, तथा विशेषरूप से इनके आर्तव (मासिक स्राव) से युक्त केश, लोम, नख, उबटन, जीर्णवस्त्र तथा कटे हुए नाखून-बाल आदि पर आक्रमण करती है, उनके भोजन शेष (भोजन के अवशिष्ट अंश), पानशेष, औषधशेष, गन्धशेष, पुष्प (आर्तव) शेष पर आक्रमण करती है तथा पुराने जूतों को धारण करती है तब उन पर जातहारिणी आक्रमण कर देती है। अथवा जब प्रथम गर्भ वाली, दर्शनीय शरीर वाली, रोगरहित, मोटे श्रोणि, स्तन, ऊरु (जंघा), बाहु तथा सुन्दर मुख वाली, सौभाग्यवती, उत्तम बालों वाली तथा नेत्र के अन्तः भाग जिसके विशाल एवं रक्तवर्ण के हैं, जिसके लोम (शरीर के बाल) बहुत बढ़े हुए हैं, जिसके हाथ, पैर, नख, दृष्टि तथा त्वचा अत्यन्त स्निग्ध हैं, जो अत्यन्त सुकुमारी है तथा क्लेश और परिश्रम को सहन नहीं कर सकती है, कालयोग से जिसका गर्भ वृद्धि को प्राप्त हो रहा है, जिसके शरीर तथा दूध की वृद्धि हो रही है—ऐसी गर्भिणी स्त्री कोक देखकर दुष्ट लोग ईर्ष्या करते हैं, अथवा नजर लगा देते हैं और यदि उसका शान्ति कर्म न किया जाय तो उस पर जातहारिणी आक्रमण कर देती है। इसी कारण से प्रतिदिन पुत्रीय (पुत्रोत्पत्ति) के लिये काम्येष्टि (उत्तम फल की इच्छा से यज्ञ करना) करने का विधान कहा गया है। इससे उसके पाप शान्त हो जाते हैं। इस लिये गर्भिणी स्त्री को अपनी जननी (माता) के साथ भी भोजन नहीं करना चाहिये ॥८॥
विशेषात् प्रथमे गर्भे प्रमादं चात्र वर्जयेत्। बहुयाज्यस्य विप्रस्य संप्रसक्तस्य याजने ॥९॥
विदुषोऽपि स्वदोषेण सज्जते जातहारिणी।
आक्षेप्ता यश्च वादेषु दाम्भिकोऽहङ्कृतश्च यः ॥१०॥
सर्वे ते जातहारिण्या भक्ष्यभूताः सयाजकाः।
विशेष कर प्रथम गर्भ में प्रमाद नहीं करना चाहिये। क्योंकि बहुत यज्ञ करने वाले ब्राह्मण तथा यज्ञ-याग में लगे हुए विद्वान् व्यक्ति पर भी अपने दोष से ही जातहारिणी आक्रमण कर देती है। विवाद में बहुत आक्षेप करने वाला, बहुत दम्भ करने वाला, अहंकारी तथा याजक आदि सब व्यक्ति जातहारिणी के भक्ष्य होते हैं ॥९-१०॥
रात्रौ यदा गतो मार्गात् पतिः पांसुलपादकः ॥११॥
स्पृशेदृतौ वा गर्भे वा तदाऽऽविशति रेवती।
जब रात्रि में मार्गस्खलित पति पांवों में धूल लगे हुए अथवा ऋतुकाल में स्त्री का स्पर्श करता है तब गर्भ में रेवती प्रविष्ट हो जाती है अर्थात् रेवती गर्भ पर आक्रमण कर देती है ॥
गृहीतां जातहारिण्या सेवित्वा यः स्त्रियं पतिः ॥१२॥
भार्यामुपैति तत्कालं सज्जते जातहारिणी।
जब पति जातहारिणी से आक्रान्त स्त्री से संभोग करके अपनी पत्नी के पास जाता है तब उस समय जातहारिणी आक्रमण कर देती है ॥१२॥
गृहीतं जातहारिण्या गृहं नित्यं च वर्जयेत् ॥१३॥
आददानं ततः किञ्चिद्गृह्णीते जातहारिणी।
जातहारिणी से आक्रान्त घर का सदा त्याग कर देना चाहिये अन्यथा उस घर में से कुछ भी लेने वाले व्यक्ति को जातहारिणी ग्रहण कर लेती है अर्थात् उसे आक्रान्त कर देती है ॥१३॥
वधभेदाङ्करणैर्गवां बन्धनदोहनैः ॥१४॥
४१ का.सं.