काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)
Kashyapa Samhita Hindi
महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा
स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें| २८६ | काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम् | रेवतीकल्पः ? ] |
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जातहारिणी सज्जते। अथो परितरस्या एवंशीलो भवति। तयोरसाध्यां जातहारिणीं विद्यात्। अथो दम्पत्यो-
(इति ताडपत्रपुस्तके १७७ तमं पत्रम्)
रेकतरोऽधार्मिको भवति कृच्छ्रा भवति। उभयोस्तु धार्मिकयोरार्जवयोरनभिमानिकयोररोगयोश्च प्रजा वर्धते। यदा वा स्त्री प्रथमगर्भिणी म्रियमाणापत्याभिरालिभिर्वाऽन्याभिरचौक्षाभिरशुभाभिरसतीभिर- मानुषपरिगृहीताभिर्जातहारिणीसत्ताभिर्वा संयोगमुपैति, सह भुङ्क्ते, सह स्नाति, वस्त्रालङ्कारं वा ददाति, तासां स्नानमूत्रबलिभूमीराक्रामति, विशेषदार्तवोपहतानि चैतानि केशलोमनुखोद्धर्त्तनकजीर्णवस्त्रावकर्त्तनान्याक्रामति, भोजनशेषं पानशेषमौषधशेषं गन्धशेषं पुष्पशेषं जीर्णोपानहौ वा दधाति, तदा जातहारिणी सज्जते। यदा वैनां प्रथमगर्भिणीं वा दर्शनीयां वपुष्मतीमरोगान्पीनश्रोणिपयोधरोरुबाहुवदनामभिजायमानसौभाग्यां सुकेशीं विशालरक्तान्तलोचनामभिवर्धमानलोमराजिं स्निग्धकरचरणनखदृष्टित्वचमतिसुकुमारीमक्लेशसहामनायासपरमां कालयोगादभिवर्धमानगर्भामुपचीयमानवपुषमाप्यायमानपयसं स्त्रियं गर्भिणीं दृष्ट्वा दुरात्मानोऽन्वीक्षन्तेन चास्याः शान्तिकर्म क्रियते तदाऽस्य जातहारिणी सज्जते। एतस्मात् कारणात् पुत्रीया काम्येष्टिरह न्यहन्युक्ता, सा ह्यस्याः पापं शमयति तस्माज्जनन्याऽपि सह भोक्तुं नार्हति गर्भिणी ।।८।।
जातहारिणी किन्हें आक्रान्त करती है—? जिस स्त्री ने धर्म, मङ्गलाचार, शौच (शुद्धि) तथा देवताओं के पूजन आदि आवश्यक कर्मों का त्याग कर दिया है। जो देवता, गौ, ब्राह्मण, गुरु, वृद्ध तथा सज्जनों से द्वेष करती है, जो दुराचारिणी, अहंकारयुक्त एवं अस्थिर चित्त वाली है, वैर, कलि (लड़ाई-झगड़ा), मांस, हिंसा, निद्रा एवं मैथुन आदि जिसे प्रिय हैं, जो चण्डा (भयंकर), अरन्तुदा (मर्मस्थल पर प्रहार करने वाली), दन्दशूका (बार २ खाने वाली), वावदूका (बकवाद करने वाली) तथा विगतसाध्वसा (भयरहित) है। जो सहसा हंसने, रोने, एवं शोक करने लगती है, जो असत्य भाषण करती है, जो घस्मरा (बहुत खाती) है, जो सब कुछ खा जाती है, अपनी इच्छा के अनुसार ही कार्य करती है, पथ्य वचन एवं पथ्य भोजन का जिसने त्याग किया हुआ है, जो बिलकुल श्रद्धा (विश्वास) नहीं करती है, जो दूसरों की उत्पन्न हुई सन्तान को मार देती है। जो अत्यन्त स्वार्थिनी है, परार्थ में विलम्ब करने वाली है, जो पति के प्रतिकूल रहती हो, पुत्रों से स्नेह (प्रेम) न करती हो, तथा सदा उनकी शपथ खाती हो, जो अपने श्वशुर, ननद, देवर, ऋत्विज अथवा उनके समान अन्य बड़े व्यक्तियों का अपमान करती हो, इन्हें क्रोधपूर्वक मारती हो तथा शाप देती हो। जो दुश्चरित्र स्त्री अपनी सौत के विषय में पापयुक्त विचार करती हो अथवा मन्त्रों, दूषित ओषधियों एवं दूषित कर्मों के द्वारा उसका अभिचार (मान्त्रिक क्रिया जादू टोना आदि) करती हो, जो बालकों के सिर पर प्रहार करती है तथा उसके सुख एवं दुःख का जिन्हें ज्ञान नहीं होता है। जो मित्रों से द्रोह करती है, अमङ्गल भाषण (प्रवचन) करती है, जो उचित स्थान पर भी शान्ति, होम, जप, दान, बलिकर्म, स्वस्त्ययन, अवष्ठीवन (थूकना), चुम्बन तथा आलिङ्गन आदि से रहित होती है—उस स्त्री को इन कर्मों अथवा पूर्व जन्म के या इस जन्म के अशुभ कर्मों, अतिपान (पेय पदार्थ का अत्यन्त सेवन), अतिभोजन, अतिस्वप्न, तथा अति त्व्यायाम आदि के सेवन के कारण उत्पन्न हुए दोषों अथवा अन्य अधार्मिक कार्यों के कारण जातहारिणी आक्रान्त करती है। इससे उसका पति भी इसी स्वभाव अथवा आचरण वाला हो जाता है। उन दोनों में असाध्य जातहारिणी को जाने। यदि इन दोनों पति-पत्नियों में से एक व्यक्ति अधार्मिक हो जाता है तो वह जातहारिणी कृच्छ्र होती है। यदि वे दोनों ही धार्मिक प्रवृत्ति वाले, सरल प्रकृति के, अभिमानशून्य तथा रोगरहित हों तो उनकी सन्तान की वृद्धि होती है। अथवा जब स्त्री को प्रथम गर्भ हो उस समय म्रियमाण (जिनकी सन्तान मर जाती है) पुत्रों वाली सखियों के साथ तथा अन्य अचौक्ष (असुन्दर), अशुभ, असती तथा मनुष्यों ने जिन्हें स्वीकार नहीं किया ऐसी तथा जातहारिणियों