भारतकोश
काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

Kashyapa Samhita Hindi

महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा

स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished942 पृष्ठ

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पृष्ठ 645

रेवतीकल्पः ? ] कल्पस्थानम् २८५

अथो स दीर्घजिह्व्यै रेवतीमेव प्राहिणोत् । सा शालावृकी भूत्वाऽसुरसेनाभ्यवर्तत । अथो दीर्घजिह्वीमेवाग्रेऽभक्षयत् । तां हत्वा शकुनिर्भूत्वा सोल्का सविद्युत्साऽश्मवर्षा सर्वप्रहरणवर्षिणी बहुरूपाऽसुरानभ्यजयत्तेऽसुरा वध्यमाना बहुरूपया गर्भानीयुर्मानुषीणां चामानुषीणां च । अथो रेवती तान्सुरान् गर्भेष्वपश्यत् मानुषीणां चामानुषीणां च । तत एनानवधीज्जातहारिणी भूत्वा । तस्माज्जातहारिणी पुष्पं हन्ति वपुश्च हन्ति गर्भंश्च हन्ति जातांश्च हन्ति जायमानांश्च जनिष्यमाणांश्च हन्ति, यद्भवत्या-सुरमधार्मिकाणामपत्यमधर्मोपहतं विशेषेण । सैषा वृद्धजीवक ! रेवती बहुरूपा जातहारिणी पिलिपिच्छकेति चोच्यते, रौद्रीति चोच्यते, वारुणीति चोच्यते । सैषा स्कन्दवराज्ञया सर्वजातिषु भूता याऽधार्मिकाणि मूढयत्यसतां विच्छेदाय । वृद्धजीवक ! तस्यास्तु निदानं चागमनं च पूर्व रूपं च निवर्तनं च भेषजं चोपदेक्ष्यामः । कस्मात्, संस (जने) ह्येषामासुराणामसतां सन्तोऽपि बध्यन्ते । संसर्गे हि जातहारिणी दिव्येन चक्षुषा दृश्यते । तस्यास्तु धर्मएव निवृत्तिकारणमुक्तमिति ।।७।।

उसने दीर्घजिह्वी के लिये रेवती को भेजा। उसने शालावृकी होकर (गीदड़ या वनविलाव का रूप धारण करके) असुरों की सेना का संहार प्रारम्भ किया। तथा सबसे पहले वह दीर्घजिह्वी का ही भक्षण कर गई। उसे मारकर उसने शकुनि बनकर उल्का, विद्युत् (बिजली), पत्थरों की वर्षा करने वाली तथा सम्पूर्ण प्रहरणों (आयुधों) की वर्षा करने वाली-इत्यादि अनेक रूपों वाली होकर असुरों को पराजित किया। इस प्रकार अनेक रूपों वाली शकुनि द्वारा संहार किये जाते हुए वे असुर मनुष्यों तथा अन्य प्राणियों के गर्भो को प्राप्त हुए अर्थात् उनके गर्भो में स्थित हो गये। रेवती ने मनुष्यों तथा अन्य प्राणियों के गर्भो में उन्हें देख लिया। तब उसने जातहारिणी (उत्पन्न हुए प्राणियों का संहार करने वाली) बनकर उनका संहार किया। इस प्रकार वह जातहारिणी पुष्प (आर्त्तवरूप में विद्यमान गर्भ), वपु (शरीर-पिण्ड), गर्भ, उत्पन्न हुए, उत्पन्न होने वाले तथा उत्पन्न किये जाने वाले-प्राणी को नष्ट करती है। विशेषरूप से वह असुरों, अधार्मिक व्यक्तियों के पुत्रों तथा अधर्म युक्त प्राणियों को नष्ट करती है। हे वृद्धजीवक ! इस प्रकार यह अनेक रूपों वाली तथा जातहारिणी (उत्पन्न हुए प्राणियों का हरण करने वाली) रेवती-पिलिपिच्छिका, रौद्री तथा वारुणी आदि नामों से कहलाती है। यह रेवती स्कन्द की आज्ञा से सम्पूर्ण जातियों में उत्पन्न हुए अधार्मिक व्यक्तियों को मूढ कर देती है तथा दुष्टों का विच्छेद (नाश) करती है। हे वृद्धजीवक ! अब इस रेवती का निदान, आगमन (संप्राप्ति), पूर्वरूप, निवृत्ति तथा ओषधि (चिकित्सा) आदि का उपदेश किया जायगा क्योंकि असुरों एवं दुष्टों के संसर्ग से सज्जन प्राणियों का भी वध हो जाता है। संसर्ग होने पर यह यह जातहारिणी (रेवती) दिव्य चक्षुओं के द्वारा ही दिखलाई देती है तथा धर्म (धार्मिक कृत्य) ही उसकी निवृत्ति का उपाय माना गया है ॥७॥

अथ खलु या स्त्री त्यक्तधर्ममङ्गलाचारशौचदेवक्रिया देवगोब्राह्मणगुरुवृद्धसद्वेषिणी दुराचाराऽहङ्कृताऽनवस्थिता वैरकलिमांसाहिंसानिद्रामैथुनप्रिया चण्डाऽरुन्तुदा दन्दशूका वावदूका विगतसाध्वसाऽथोऽकस्मात्प्रहसनाऽथोऽकस्मात्प्ररोदनाऽथोऽकस्माच्छोचनाऽनृतवादिनी घस्मराऽथो आहुः सर्वशिनी स्वमतकारिणी पथ्यवचनभोजनत्यागिनी भृशमहृद्याना परविजातोपहिंसिका स्वार्थपरा परार्थविलम्बिनी प्रतीपा भर्तरि, पुत्रेषु च निःस्नेहा, तैश्च नित्यशपथा, श्वस्रश्वशुरननन्दादेवरातृृत्विजमन्यान् वा तत्स्थानीयान्महतो वाऽवमन्यते तथैनान्मन्युना निर्दहन्त्यभिशपन्ति वा, सपत्नीं वा दुःशीला पापचक्षुरभिध्यायति, मन्त्रासदौषधकर्मभिर्वैनामभिचरति, मूर्ध्नि चाभिहन्ति बालं, न चैषां सुखदुःखज्ञा भवति, मित्रद्रोहिणी ह्यमङ्गलवादिनी शान्तिहोमजपदानबलिकर्मस्वस्त्ययनावष्ठीवनपरिचुम्बनपरिष्वजनपरिवर्जिता स्थानेष्वपि भवति; तस्या एभिः कर्मभिरन्यैश्चाशुभैः पूर्वकैश्चैह कृतैरतिपानभोजनस्वप्नव्यायामसेवनैश्च छिद्रेष्वेतेष्वधर्मद्वारेषु