भारतकोश
काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

Kashyapa Samhita Hindi

महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा

स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished942 पृष्ठ

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पृष्ठ 656

२९६ काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम् रेवतीकल्पः ? ]

का सिञ्चन करें। तथा अपने ही भागधेय (अंश) से इसे सन्तानयुक्त करें। जो इस तथ्य को जानती है उसे वैश्या, शूद्रा अथवा महाशूद्री जातहारिणियां आक्रान्त नहीं करतीं। हे वृद्धजीवक ! इसके अतिरिक्त सूत, मागध, वेन, पुक्कस, अम्बष्ठ, प्राच्यक, चण्डाल, मुष्टिक, मेत (द) डौम्ब, डवाक, द्रुमिड, सिंहल, उडू, खश, शक, यवन, पह्लव, तुखा (षा), र, कम्बोज, अवन्ती, अनेमक, आभीरक, हूण, पारश, वकुलिन्द, किरात, शबर तथा शम्बर आदि देशों में उत्पन्न होने वाली जातहारिणियां भी होती हैं। जो स्त्रियां इन नास्तिक निषाद आदि वर्णसंकर जातहारिणियों से आक्रान्त अथवा ग्रहण की हुई स्त्रियों के पास बैठती हैं, उनका अभिवादन करती हैं, उनसे व्यवहार करती हैं, उनसे बोलती हैं, उनका स्पर्श करती हैं, उनके साथ बैठकर खाती हैं, जिन्हें मारती हैं, उन्हें गाली देती हैं, उनके साथ सोती हैं, अथवा उनके पैर, ऋतु, माला, वस्त्र तथा अलंकारों पर आक्रमण करती हैं-उन्हें वे वर्णसंकर जातहारिणियां आक्रान्त कर देती है। उनका प्रायश्चित (उपचार) यही है कि ये वर्णसंकर स्त्रियां इस ऋतुमती स्त्री का अवसिंचन करें तथा अपने भागधेय (अंश) से उसे सन्तानयुक्त कर दें जो इस तत्त्व को जानती है उसे वर्णसंकर जातहारिणियां आक्रान्त नहीं करती हैं। हे वृद्धजीवक ! जब लिङ्गिनी, परिव्राजिका, श्रमणका, कण्डनी, निर्ग्रन्थी, चीरवल्कलधारिणी, तापसी, चरिका, जटिनी, मातृमण्डलिकी, देवपरिवारिका, वेक्षणिका, आदि जातहारिणियां अथवा इन जातहारिणियों से आक्रान्त स्त्रियां घरों में आयें-उन स्त्रियों के पास जो बैठती है, उनका अभिवादन करती है, उनसे व्यवहार करती है, उनसे बोलती है, उनका स्पर्श करती है, उनके साथ बैठकर खाती है, उन्हें मारती है, उन्हें गाली देती है, उनके साथ सोती है अथवा उनके पैर, ऋतु, माला, वस्त्र तथा अलंकारों पर आक्रमण करती है-उन्हें लिङ्गिनी जातहारिणी आक्रान्त कर देती है। उनका प्रायश्चित्त (उपचार) यही है कि वही लिङ्गिनी स्त्री इस ऋतुमती स्त्री का अवसिंचन करे तथा अपने भागधेय से इसे सन्तानयुक्त कर दे जो इस तत्त्व को जानती है उसे लिङ्गिनी जातहारिणी आक्रान्त नहीं करती है। हे वृद्धजीवक ! जब अयस्करी जातहारिणी से आक्रान्त स्त्री कृष्ण लोह के बने तथा तक्षणी (बढ़इन) दारव (लकड़ी के बने शस्त्र) सहित उपहार से, कुलाली (कुम्हारिन) मिट्टी के उपहार से तथा पदकरी (चमारिन-जूते बनाने वाली) चमड़े के, मालाकरी (माला बनाने वाली-मालिन) युक्तकुसुम के, कुविन्दी तानुक के, सौचिकी स्यूत के, रजकी (रंगरेजिन) अच्छी प्रकार रंगे हुए वस्त्र के, नेजिका (धोबिन) निर्णिंक्त के, गोपी (ग्वाले की स्त्री) तक्र के तथा कारुकुणी (की) आदि अपने २ उपहारों के सहित जातहारिणियों से आविष्ट हुई स्त्रियां घरों में आयें उन स्त्रियों के साथ जो स्त्री बैठती है, उनका अभिवादन करती है, उनसे व्यवहार करती है, उनसे बोलती है, उनका स्पर्श करती है, उनके साथ बैठकर खाती है, उन्हें मारती है, उन्हें गाली देती है, उनके साथ सोती है अथवा उनके पैर, ऋतु, माला, वस्त्र तथा अलंकारों पर आक्रमण करती है उसे कारुकुणी (की) जातहारिणी आक्रान्त करती है। इसका प्रायश्चित्त (उपचार) यही है कि वही कारुकुणी (की) इस ऋतुमती स्त्री का अवसिंचन करे तथा अपने भागधेय (अंश) से उसे सन्तानयुक्त कर दे। जो इस तत्त्व को जानती है उसे कारुकी जातहारिणी आक्रान्त नहीं करती है ॥

अत ऊर्ध्वं वृद्धजीवक ! तिरश्चीं जातहारिणीमनुव्याख्यास्यामः-पञ्चविधा ह्येषा प्रोच्यते । तद्यथा-शकुनी, चतुष्पदी, सर्पा, मत्सी, वनस्पतिरिति । ता एता प्रायेण सतामेव प्रसज्जन्ते । वृद्धजीवक ! ये शकुनीं वर्द्धन्तीं घ्नन्ति घातयन्ति वा तेषां शकुनिरूपा जातहारिणी प्रसज्जते महाग्रहः । सा काकी भासी कुक्कुटी मयूरी चाषी सारिका तैलपायिका उलूकी भोलन्तिका गृध्री श्येनी भारद्वाजी ततोऽन्यतमा वा भूत्वा स्वप्नेऽपूर्वान् दर्शयति, गर्भिणीं सूतिकां बिभीषयति, बालं चोत्रासयति, महावेगा महाप्राणा घोररूपा रौद्राऽनायतपक्षा वज्रतुण्डनखदशनदंष्ट्रा वैदूर्यज्वलनसदृशलोचना बहुविचित्रमहापत्रा कण्ठे कनकमणिविचित्रगुणधारिणी विविधकुसुमगन्धवसनमुसल्लोज्ज्वलधारिणी वरमुकुटा नूपुरकविकम्बूक-दाङ्ग(टका)दंकुण्डल-वामघण्टापताकाऽऽतपत्रोल्काविद्युन्मेघमालाऽलङ्कृता, भगवतः कुमारवरस्य ग्रानी