काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)
Kashyapa Samhita Hindi
महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा
स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंरेवतीकल्पः ? ] कल्पस्थानम् २९५
आहुः—तामेवैनां स्त्रियमृतुमतीमवसिञ्चेत् । सैव तत्र प्रायश्चित्तिः । स्वेनैवैनां भागधेयेन प्रजावतीं करोति । नास्या वर्णसङ्करा जातहारिणी स्त्री जातहारिणी भवति, या एवं वेद । अथो वृद्धजीवक ! लिङ्गिनी परिव्राजिका श्रमणका कण्डनी निर्ग्रन्थी चीरवल्कलधारिणी तापसी चरिका जटिनी मातृमण्डलिकी देवपरिवारिका वेक्षणिका वा जातहारिण्यो वा जातहारिण्याऽऽविष्टा वा गृहानुपेयात् तां प्रत्युपतिष्ठतेऽभिवादयते वा संव्यवहरते वा संस्पृशति संभुङ्क्तेऽभिहन्त्याक्रोशत्युपशेते पदमृतुनिर्मात्यवासोलङ्कारमाक्रामति वा तस्या लिङ्गिनी जातहारिणी भवति । अथो आहुः—सैवैनां लिङ्गिनी स्त्रियमृतुमतीमवसिञ्चेत् । सैव तत्र प्रायश्चित्तिः । स्वेनैवैनां भागधेयेन प्रजावतीं करोति । नास्या लिङ्गिनी जातहारिणी भवति, या एवं वेद । अथो वृद्धजीवक ! अयस्करी जातहारिण्याऽऽविष्टा कार्ष्णायसेनार्हेणे^१नाभ्यैत्यथो तक्षणी दारवेणाथो कुलाली मार्तिकेनाथो पदकरी चार्मणेनाथो मालाकारी मुक्तकुसुमेनाथो कुविन्दी तानुकेनाथो सौचिकी स्यूतेनाथो रजकी सुरक्तेनाथो नेजिका निर्णिंक्तेनाथो गोपी तक्रेणाथो कारुकुणी(की) स्वेनार्हेणेन जातहारिण्याविष्टा गृहानुपेयात् तां स्त्री प्रत्युपतिष्ठतेऽभिवादयते संव्यवहरते संवदति संस्पृशति संभुङ्केऽभिहन्त्याक्रोशत्युपशेते पदमृतुनिर्माल्यवासोलङ्कारमाक्रामति वा तस्याः कारुकुणी(की)जातहारिणी भवति । अथो आहुः—सैवैनां कारुकी स्त्रियमृतुमतीमवसिञ्चेत् । सैव तत्र प्रायश्चित्तिः । स्वेनैवैनां भागधेयेन प्रजावतीं करोति । नास्याः कारुकी जातहारिणी भवति, या एवं वेद ।।६८।।
(इति ताडपत्रपुस्तके १८१ तमं पत्रम् ।)
हे वृद्धजीवक ! ये स्त्रियां वर्ण (ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य तथा शूद्र वर्ण वाली), वर्णान्तरा (वर्ण संकर से उत्पन्न हुई), लिङ्गिनी तथा कारुकी आदि चार प्रकार की जातहारिणी स्त्रियों में प्रवेश करके पुनः स्त्रियों में प्रविष्ट होती है । उनका अब हम हम व्याख्यान करेंगे । जो स्त्री घरों में आई हुई तथा ब्राह्मणी जातहारिणी द्वारा आविष्ट स्त्री के पास बैठती है, उसका अभिवादन करती है, उससे व्यवहार करती है, उससे बोलती है, उसका स्पर्श करती है, उसके साथ बैठकर खाती है, उसे मारती है, उसे गाली देती है, उसके साथ सोती है, अथवा उसके पैर, ऋतु, माला, वस्त्र तथा अलंकारों पर आक्रमण करती है उस स्त्री में ब्राह्मणी जातहारिणी प्रवेश करती है । इसका प्रायश्चित (उपचार) यही है कि वही ब्राह्मणी इस ऋतुमती स्त्री का अवसिंचन करे । तथा अपने भागधेय (अंश) से उसे सन्तानयुक्त कर दे । जो इस तत्त्व को जानती है उसे ब्राह्मणी जातहारिणी आक्रान्त नहीं करती है । हे वृद्धजीवक ! जो स्त्री घर में आई हुई तथा क्षत्रिय जातहारिणी द्वारा आविष्ट स्त्री के पास बैठती है, उसका अभिवादन करती है, उससे व्यवहार करती है, उससे बोलती है, उसका स्पर्श करती है, उसके साथ बैठकर खाती है, उसे मारती है, उसे गाली देती है, उसके साथ सोती है अथवा उसके पैर, ऋतु, माला, वस्त्र तथा अलंकारों पर आक्रमण करती है उस स्त्री में क्षत्रिय जातहारिणी प्रवेश करती है । इसका प्रायश्चित (उपचार) यही है कि वह क्षत्रिय (स्त्री) इस ऋतुमती स्त्री का अवसिंचन करे, तथा अपने भागधेय (अंश) से उसे सन्तानयुक्त कर दे । जो इस तत्त्व को जानती है उसे क्षत्रिय जातहारिणी आक्रान्त नहीं करती । हे वृद्धजीवक ! जो जातहारिणी द्वारा आविष्ट वैश्या अथवा महाशूद्री स्त्री के पास बैठती है, उसका अभिवादन करती है, उससे व्यवहार करती है, उससे बोलती है, उसका स्पर्श करती है, उसके साथ बैठकर खाती है, उसे मारती है, उसे गाली देती है, उसके साथ सोती है अथवा उसके पैर, ऋतु, माला, वस्त्र तथा अलंकारों पर आक्रमण करती है उसे वैश्या, शूद्रा अथवा महाशूद्री जातहारिणी आक्रान्त करती है । इसका प्रायश्चित्त (उपचार) यही है कि वे ही वैश्या, शूद्रा अथवा महाशूद्री स्त्रियां इस ऋतुमती स्त्री
१. अर्हेणेन उपहारेणेत्यर्थः स्यात् ।