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काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

Kashyapa Samhita Hindi

महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा

स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished942 पृष्ठ

रेवतीकल्पः ? ] कल्पस्थानम् २९५

आहुः—तामेवैनां स्त्रियमृतुमतीमवसिञ्चेत् । सैव तत्र प्रायश्चित्तिः । स्वेनैवैनां भागधेयेन प्रजावतीं करोति । नास्या वर्णसङ्करा जातहारिणी स्त्री जातहारिणी भवति, या एवं वेद । अथो वृद्धजीवक ! लिङ्गिनी परिव्राजिका श्रमणका कण्डनी निर्ग्रन्थी चीरवल्कलधारिणी तापसी चरिका जटिनी मातृमण्डलिकी देवपरिवारिका वेक्षणिका वा जातहारिण्यो वा जातहारिण्याऽऽविष्टा वा गृहानुपेयात् तां प्रत्युपतिष्ठतेऽभिवादयते वा संव्यवहरते वा संस्पृशति संभुङ्क्तेऽभिहन्त्याक्रोशत्युपशेते पदमृतुनिर्मात्यवासोलङ्कारमाक्रामति वा तस्या लिङ्गिनी जातहारिणी भवति । अथो आहुः—सैवैनां लिङ्गिनी स्त्रियमृतुमतीमवसिञ्चेत् । सैव तत्र प्रायश्चित्तिः । स्वेनैवैनां भागधेयेन प्रजावतीं करोति । नास्या लिङ्गिनी जातहारिणी भवति, या एवं वेद । अथो वृद्धजीवक ! अयस्करी जातहारिण्याऽऽविष्टा कार्ष्णायसेनार्हेणे^१नाभ्यैत्यथो तक्षणी दारवेणाथो कुलाली मार्तिकेनाथो पदकरी चार्मणेनाथो मालाकारी मुक्तकुसुमेनाथो कुविन्दी तानुकेनाथो सौचिकी स्यूतेनाथो रजकी सुरक्तेनाथो नेजिका निर्णिंक्तेनाथो गोपी तक्रेणाथो कारुकुणी(की) स्वेनार्हेणेन जातहारिण्याविष्टा गृहानुपेयात् तां स्त्री प्रत्युपतिष्ठतेऽभिवादयते संव्यवहरते संवदति संस्पृशति संभुङ्केऽभिहन्त्याक्रोशत्युपशेते पदमृतुनिर्माल्यवासोलङ्कारमाक्रामति वा तस्याः कारुकुणी(की)जातहारिणी भवति । अथो आहुः—सैवैनां कारुकी स्त्रियमृतुमतीमवसिञ्चेत् । सैव तत्र प्रायश्चित्तिः । स्वेनैवैनां भागधेयेन प्रजावतीं करोति । नास्याः कारुकी जातहारिणी भवति, या एवं वेद ।।६८।।

(इति ताडपत्रपुस्तके १८१ तमं पत्रम् ।)

हे वृद्धजीवक ! ये स्त्रियां वर्ण (ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य तथा शूद्र वर्ण वाली), वर्णान्तरा (वर्ण संकर से उत्पन्न हुई), लिङ्गिनी तथा कारुकी आदि चार प्रकार की जातहारिणी स्त्रियों में प्रवेश करके पुनः स्त्रियों में प्रविष्ट होती है । उनका अब हम हम व्याख्यान करेंगे । जो स्त्री घरों में आई हुई तथा ब्राह्मणी जातहारिणी द्वारा आविष्ट स्त्री के पास बैठती है, उसका अभिवादन करती है, उससे व्यवहार करती है, उससे बोलती है, उसका स्पर्श करती है, उसके साथ बैठकर खाती है, उसे मारती है, उसे गाली देती है, उसके साथ सोती है, अथवा उसके पैर, ऋतु, माला, वस्त्र तथा अलंकारों पर आक्रमण करती है उस स्त्री में ब्राह्मणी जातहारिणी प्रवेश करती है । इसका प्रायश्चित (उपचार) यही है कि वही ब्राह्मणी इस ऋतुमती स्त्री का अवसिंचन करे । तथा अपने भागधेय (अंश) से उसे सन्तानयुक्त कर दे । जो इस तत्त्व को जानती है उसे ब्राह्मणी जातहारिणी आक्रान्त नहीं करती है । हे वृद्धजीवक ! जो स्त्री घर में आई हुई तथा क्षत्रिय जातहारिणी द्वारा आविष्ट स्त्री के पास बैठती है, उसका अभिवादन करती है, उससे व्यवहार करती है, उससे बोलती है, उसका स्पर्श करती है, उसके साथ बैठकर खाती है, उसे मारती है, उसे गाली देती है, उसके साथ सोती है अथवा उसके पैर, ऋतु, माला, वस्त्र तथा अलंकारों पर आक्रमण करती है उस स्त्री में क्षत्रिय जातहारिणी प्रवेश करती है । इसका प्रायश्चित (उपचार) यही है कि वह क्षत्रिय (स्त्री) इस ऋतुमती स्त्री का अवसिंचन करे, तथा अपने भागधेय (अंश) से उसे सन्तानयुक्त कर दे । जो इस तत्त्व को जानती है उसे क्षत्रिय जातहारिणी आक्रान्त नहीं करती । हे वृद्धजीवक ! जो जातहारिणी द्वारा आविष्ट वैश्या अथवा महाशूद्री स्त्री के पास बैठती है, उसका अभिवादन करती है, उससे व्यवहार करती है, उससे बोलती है, उसका स्पर्श करती है, उसके साथ बैठकर खाती है, उसे मारती है, उसे गाली देती है, उसके साथ सोती है अथवा उसके पैर, ऋतु, माला, वस्त्र तथा अलंकारों पर आक्रमण करती है उसे वैश्या, शूद्रा अथवा महाशूद्री जातहारिणी आक्रान्त करती है । इसका प्रायश्चित्त (उपचार) यही है कि वे ही वैश्या, शूद्रा अथवा महाशूद्री स्त्रियां इस ऋतुमती स्त्री


१. अर्हेणेन उपहारेणेत्यर्थः स्यात् ।

२९६ काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम् रेवतीकल्पः ? ]

का सिञ्चन करें। तथा अपने ही भागधेय (अंश) से इसे सन्तानयुक्त करें। जो इस तथ्य को जानती है उसे वैश्या, शूद्रा अथवा महाशूद्री जातहारिणियां आक्रान्त नहीं करतीं। हे वृद्धजीवक ! इसके अतिरिक्त सूत, मागध, वेन, पुक्कस, अम्बष्ठ, प्राच्यक, चण्डाल, मुष्टिक, मेत (द) डौम्ब, डवाक, द्रुमिड, सिंहल, उडू, खश, शक, यवन, पह्लव, तुखा (षा), र, कम्बोज, अवन्ती, अनेमक, आभीरक, हूण, पारश, वकुलिन्द, किरात, शबर तथा शम्बर आदि देशों में उत्पन्न होने वाली जातहारिणियां भी होती हैं। जो स्त्रियां इन नास्तिक निषाद आदि वर्णसंकर जातहारिणियों से आक्रान्त अथवा ग्रहण की हुई स्त्रियों के पास बैठती हैं, उनका अभिवादन करती हैं, उनसे व्यवहार करती हैं, उनसे बोलती हैं, उनका स्पर्श करती हैं, उनके साथ बैठकर खाती हैं, जिन्हें मारती हैं, उन्हें गाली देती हैं, उनके साथ सोती हैं, अथवा उनके पैर, ऋतु, माला, वस्त्र तथा अलंकारों पर आक्रमण करती हैं-उन्हें वे वर्णसंकर जातहारिणियां आक्रान्त कर देती है। उनका प्रायश्चित (उपचार) यही है कि ये वर्णसंकर स्त्रियां इस ऋतुमती स्त्री का अवसिंचन करें तथा अपने भागधेय (अंश) से उसे सन्तानयुक्त कर दें जो इस तत्त्व को जानती है उसे वर्णसंकर जातहारिणियां आक्रान्त नहीं करती हैं। हे वृद्धजीवक ! जब लिङ्गिनी, परिव्राजिका, श्रमणका, कण्डनी, निर्ग्रन्थी, चीरवल्कलधारिणी, तापसी, चरिका, जटिनी, मातृमण्डलिकी, देवपरिवारिका, वेक्षणिका, आदि जातहारिणियां अथवा इन जातहारिणियों से आक्रान्त स्त्रियां घरों में आयें-उन स्त्रियों के पास जो बैठती है, उनका अभिवादन करती है, उनसे व्यवहार करती है, उनसे बोलती है, उनका स्पर्श करती है, उनके साथ बैठकर खाती है, उन्हें मारती है, उन्हें गाली देती है, उनके साथ सोती है अथवा उनके पैर, ऋतु, माला, वस्त्र तथा अलंकारों पर आक्रमण करती है-उन्हें लिङ्गिनी जातहारिणी आक्रान्त कर देती है। उनका प्रायश्चित्त (उपचार) यही है कि वही लिङ्गिनी स्त्री इस ऋतुमती स्त्री का अवसिंचन करे तथा अपने भागधेय से इसे सन्तानयुक्त कर दे जो इस तत्त्व को जानती है उसे लिङ्गिनी जातहारिणी आक्रान्त नहीं करती है। हे वृद्धजीवक ! जब अयस्करी जातहारिणी से आक्रान्त स्त्री कृष्ण लोह के बने तथा तक्षणी (बढ़इन) दारव (लकड़ी के बने शस्त्र) सहित उपहार से, कुलाली (कुम्हारिन) मिट्टी के उपहार से तथा पदकरी (चमारिन-जूते बनाने वाली) चमड़े के, मालाकरी (माला बनाने वाली-मालिन) युक्तकुसुम के, कुविन्दी तानुक के, सौचिकी स्यूत के, रजकी (रंगरेजिन) अच्छी प्रकार रंगे हुए वस्त्र के, नेजिका (धोबिन) निर्णिंक्त के, गोपी (ग्वाले की स्त्री) तक्र के तथा कारुकुणी (की) आदि अपने २ उपहारों के सहित जातहारिणियों से आविष्ट हुई स्त्रियां घरों में आयें उन स्त्रियों के साथ जो स्त्री बैठती है, उनका अभिवादन करती है, उनसे व्यवहार करती है, उनसे बोलती है, उनका स्पर्श करती है, उनके साथ बैठकर खाती है, उन्हें मारती है, उन्हें गाली देती है, उनके साथ सोती है अथवा उनके पैर, ऋतु, माला, वस्त्र तथा अलंकारों पर आक्रमण करती है उसे कारुकुणी (की) जातहारिणी आक्रान्त करती है। इसका प्रायश्चित्त (उपचार) यही है कि वही कारुकुणी (की) इस ऋतुमती स्त्री का अवसिंचन करे तथा अपने भागधेय (अंश) से उसे सन्तानयुक्त कर दे। जो इस तत्त्व को जानती है उसे कारुकी जातहारिणी आक्रान्त नहीं करती है ॥

अत ऊर्ध्वं वृद्धजीवक ! तिरश्चीं जातहारिणीमनुव्याख्यास्यामः-पञ्चविधा ह्येषा प्रोच्यते । तद्यथा-शकुनी, चतुष्पदी, सर्पा, मत्सी, वनस्पतिरिति । ता एता प्रायेण सतामेव प्रसज्जन्ते । वृद्धजीवक ! ये शकुनीं वर्द्धन्तीं घ्नन्ति घातयन्ति वा तेषां शकुनिरूपा जातहारिणी प्रसज्जते महाग्रहः । सा काकी भासी कुक्कुटी मयूरी चाषी सारिका तैलपायिका उलूकी भोलन्तिका गृध्री श्येनी भारद्वाजी ततोऽन्यतमा वा भूत्वा स्वप्नेऽपूर्वान् दर्शयति, गर्भिणीं सूतिकां बिभीषयति, बालं चोत्रासयति, महावेगा महाप्राणा घोररूपा रौद्राऽनायतपक्षा वज्रतुण्डनखदशनदंष्ट्रा वैदूर्यज्वलनसदृशलोचना बहुविचित्रमहापत्रा कण्ठे कनकमणिविचित्रगुणधारिणी विविधकुसुमगन्धवसनमुसल्लोज्ज्वलधारिणी वरमुकुटा नूपुरकविकम्बूक-दाङ्ग(टका)दंकुण्डल-वामघण्टापताकाऽऽतपत्रोल्काविद्युन्मेघमालाऽलङ्कृता, भगवतः कुमारवरस्य ग्रानी

रेवतीकल्पः ? ] कल्पस्थानम् २९७

(?) च स्वसा च स्वप्ने धर्षयित्वारोगागममनन्तरमस्य करोति । ततो मध्याह्नेऽर्धरात्रे वा संध्ययोर्वा सुप्ते वा बालगृहे निलीयते यथोक्तानामेकतमा; ततो बाल उच्चैः क्रोशति रोदिति त्रसते वेपते बिभेति ज्वर्यते विह्वलति निस्तनति मुह्यति विस्खलति सूच्यते शून्यते विस्रंस्यते रोगैरन्यैश्चोपद्रूयते । या त्वभीक्ष्णं शकुनीं स्त्री स्वप्ने पश्यति ततः साऽस्याः शकुनी जातहारिणी सज्जते । तस्या एव शकुन्या निभीतस्या (निलीनाया ?) एव पुरीषेण पक्षोदकेन वैनां वृद्धस्त्री शकुनिना(नीं) स्त्रीं तत्रावासिञ्चेत् । सैव तत्र प्रायश्चित्तिः । स्वेनैवैनां भागधेयेन प्रजावतीं स्त्रियं करोति । नास्याः शकुनी जातहारिणी भवति या शकुनीं न हिनस्ति, या एवं वेद । अथो वृद्धजीवक ! ये गां घ्नन्ति घातयन्ति वा, गोमांसं चोपयुञ्जते तेषां गोमाता जातहारिणी प्रसज्जते । एषा एनां स्वप्नेऽभिद्रवति गोपालो वा वत्सकपालो वा; असाध्या तस्या गोमाता जातहारिणी प्रसज्जति । अथो आहुर्गोमध्ये एनां गोमूत्र पुरीषाभ्यामुपोषितां स्त्रापयेत्, सैव तत्र प्रायश्चित्तिः । स्वेनैवैनां भागधेयेन गौः प्रजावतीं करोति । नास्या गोमाता जातहारिणी भवति, या गां न हिनस्ति, या एवं वेद । एवमेव महिषीणामजानामविकानां गर्दभीनां श्राश्वत्तरीणामुष्ट्रीणां सूकरीणां मूषिकाणां शुनीनां गलगोलिकानां गोपानां विष्पम्भराणां मृगादीनां चैवमेष विधिरुक्तः ।। अथो वृद्धजीवक ! सर्पीं गृहचारिणीमगृहचारिणीं वा स्त्री हन्ति घातयति वा, तस्याः सर्पी जातहारिणी प्रसज्जतेऽथो विषमृत्युमस्याः प्रजाया आहुः । एनां वल्मीके नागकुले वा सिञ्चेदथो आहुर्वल्मीकशतमध्य इति । सैव तत्र प्रायश्चित्तिः । स्वेनैवैनां भागधेयेन प्रजावतीं करोति, नास्याः सर्पी जातहारिणी भवति । या सर्पान् न हिनस्ति, नास्याः प्रजाया विषमृत्युर्भवति या एवं वेद ।। अथो वृद्धजीवक ! या मत्स्यमकर-तिमिङ्गिलनक्रशङ्कशम्बूकसुखनकादीनिभूता-

(इति ताडपत्रपुस्तके १८२ तमं पत्रम्)

न्युदकचराणि हन्ति, तस्यास्तेनाधर्मेण रेवती क्रुद्धा प्रजा हिनस्ति; मत्सी वा मकरी शुक्तिः शङ्खी भूत्वा स्वप्ने पूर्वं हर्षयति, ततो हिनस्ति भूयिष्ठं; तस्या अप्सु प्रजा विनश्यति, जलत्रासेन एकैकरोगैर्वा । अथो आहुः—रोहिणीस्नानेनैवैनां प्रत्युदियात्, सैव तत्र प्रायश्चित्तिः । या मत्स्यान् न हिनस्ति नास्या मत्सी जातहारिणी भवति, या एवं वेद ।। अथो वृद्धजीवक ! ये वनस्पतीन् हिंसन्ति परिगृहीतानपरिगृहीतान् वा, तेषां वनस्पतिदेवता अभिक्रुद्ध्यन्ति । अग्निवैश्वानरो नाम, सोमः पितृमान्नाम, स्वधिति शिवो नाम, आपो वरुणो नाम, भूमिर्निर्ऋतिर्नाम, गौर्विद्युन्नाम, गौः श्लोको नाम, देव पव(मा)नो नाम, आदित्यः पूषा नाम, दिशः काष्ठा नाम, इन्द्रो वरुणो नाम, वायुः प्राणो नाम; ता वै द्वादश वनस्पतीनां देवताः । एता एव वनस्पतीन् घ्नन्ति । अथो आहुर्वनस्पतिमध्ये विवृक्षेषुता एव देवताः स्थालीपाकैर्यजेत् । अग्निमाज्येन, सोमं श्यामाकेन, शिवं पायसेन, आपो दध्ना, भूमिं सप्तान्नेकेन, ग्रामधूपैः गां वाऽग्निं पवमानं पिशितेन, पूषाणमन्नाद्यैः, दिशो मध्वैः, इन्द्रं हविष्यभोजनेनेति । अथो अस्या वनस्पतिदेवताः प्रजामेव प्रयच्छन्ति, या वनस्पतीन् न हिनस्ति । नास्या वनस्पतिदेवता जातहारिण्यो भवन्ति, या एवं वेदेति ।।६९।।

हे वृद्धजीवक ! इसके बाद अब हम तिरश्चीन (तिर्यक्जाति) जातहारिणियों का व्याख्यान करेंगे । ये पांच प्रकार की होती हैं—१. शकुनी २. चतुष्पदी ३. सर्पा ४. मत्सी तथा ५. वनस्पति । ये जातहारिणियां प्रायः सज्जन व्यक्तियों को ही आक्रान्त करती हैं । हे वृद्धजीवक ! जो वृद्धि को प्राप्त होते हुए शकुनी (पक्षी) की स्वयं हिंसा करते हैं अथवा दूसरों से हिंसा करवाते हैं उन्हें महाग्रह वाली शकुनीरूप जातहारिणी आक्रान्त करती है । वह शकुनी रूप जातहारिणी काकी,

२९८ काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम् रेवतीकल्पः ? ]

भासी, कुक्कुटी, मयूरी, चाषी, सारिका, तैलपायिका, उलूकी, भोलन्तिका, गृध्री, श्येनो, भारद्वाजी आदि पक्षियों अथवा अन्य रूपों को धारण करके स्वप्न में अपूर्व (पहले कभी न देखी हुई) आकृतियों को दिखाती है, गर्भिणी तथा सूतिका स्त्री को भय दिखाती है (डराती है), बालक को संत्रस्त करती है, तथा महावेग, महाप्राण, भयंकर रूप, भयावनी, अनायतपक्षा (जिसके पंख विस्तृत नहीं है), वज्र के सदृश सुदृढ नख, दांत तथा दंष्ट्रा वाली, वैदूर्य मणि की ज्वाला के समान नेत्रों वाली, अत्यन्त विचित्र तथा बड़े पत्र (पंखों) वाली, गले में सोने तथा मणि की विचित्र माला को धारण करने वाली, विविध प्रकार के पुष्प, गन्ध, वस्त्र, मुसल तथा उज्ज्वल पदार्थों को धारण करने वाली, श्रेष्ठ मुकुट वाली तथा नूपुरक, विकम्बूकत, अङ्गद, कुण्डल, वामघण्टा, पताका, आतपत्र, उल्का, विद्युत्, एवं मेघमाला आदि से अलंकृत भगवान् कार्तिकेय की ग्रानी (?) तथा बहन स्वप्न में डराकर बाद में रोगों को उत्पन्न कर देती है। उसके बाद उपर्युक्त जातहारिणियों में से कोई एक मध्याह्न, अर्धरात्रि, सन्ध्या समय अथवा सोने के बाद बालगृह में छिपकर स्थित हो जाती है। इससे बालक उच्चस्वर से चिल्लाता है, रोता है, डरता है, कांपता है तथा भयभीत होता है। उसे स्वर हो जाता है, वह विह्वल होता है, लम्बे २ सांस लेता है, मोहित हो जाता है, लड़खड़ाता है, दुःखी होता है, शून्य के समान हो जाता है, उसे मल आदि का स्राव होने लगता है तथा उसे उपद्रव स्वरूप अन्य रोग भी घेर लेते हैं। इस प्रकार जो स्त्री स्वप्न में निरन्तर शकुनी को देखती है, उस पर यह शकुनी नाम की जातहारिणी आक्रमण कर देती है। उसका यही प्रायश्चित है कि शकुनी नामक्क जातहारिणी से आक्रान्त स्त्री को कोई अन्य वृद्ध स्त्री उस शकुनी (पक्षी) के घोंसले में स्थित पुरीष (मल) तथा पक्षोदक (पंखों में लगे हुए पानी) के द्वारा सिंचन करे तथा वह अपने भागधेय (अंश) से उसे सन्तानयुक्त कर दे। जो इस प्रकार जानती है तथा शकुनी (पक्षी) की हिंसा नहीं करती उसे शकुनी नामक जातहारिणी आक्रान्त नहीं करती। हे वृद्धजीवक ! जो स्त्री गौ की स्वयं हत्या करती है अथवा दूसरों से हत्या करवाती है तथा गोमांस का प्रयोग करती है उन पर जातहारिणी का रूप धारण करके गोमाता आक्रमण कर देती है तथा यह जातहारिणी स्वप्न में गौओं अथवा बछड़ों की पालना करने वाले ग्वाले को दौड़ाती है। इस पर गोमाता रूप असाध्य जातहारिणी आक्रमण कर देती है। इसका यही प्रायश्चित्त है कि इस स्त्री को गौओं के बीच में बिठाकर गौओं के मूत्र तथा पुरीष (गोबर) के द्वारा स्नान कराये। उस स्त्री को गौ माता अपने भागधेय (अंश) से युक्त करती है। जो इस तथ्य को जानती है तथा गौ की हत्या नहीं करती उसे गोमाता रूप जातहारिणी आक्रान्त नहीं करती है। इसी प्रकार भैंस, बकरी, भेड़, गधी, खच्चरी, ऊंटनी, सूअरी, चुहिया, कुतिया, गलगोलिका (विषयुक्त कीट विशेष), गोप (ग्वाले), विश्वम्भर (सौम्य कीट विशेष) तथा मृग आदि पशुओं की भी यही उपर्युक्त ही विधि कही गई है। हे वृद्धजीवक ! जो स्त्री घर में अथवा घर से बाहर विचरण करने वाली सर्पिणी की स्वयं हत्या करती है अथवा दूसरों से हत्या करवाती है उस पर सर्पिणी रूप जातहारिणी आक्रमण कर देती है। इसकी सन्तान की विष से मृत्यु हो जाती है। इसका यही प्रायश्चित्त है कि सौ बांबियों के मध्य में वल्मीक (वांबी) अथवा नागकुल में इसका सिञ्चन करना चाहिये। वह सर्पिणी रूप जातहारिणी इस स्त्री को अपने अंश से सन्तान युक्त कर देती है। जो इस तथ्य को जानती है तथा सांपों की हिंसा नहीं करती, उसे सर्परूप जातहारिणी आक्रान्त नहीं करती तथा उसकी सन्तान की विष से मृत्यु नहीं होती। हे वृद्धजीवक ! जो स्त्री मत्स्य, मकर (मगरमच्छ), तिमिङ्गिल, नक्र (नाका), शङ्ख (घोंघा) शम्बूक्त तथा सुखनक आदि जलचर प्राणियों की हत्या करती है, उसके इस अधार्मिक कृत्य से क्रुद्ध हुई रेवती उसकी सन्तान का हनन करती है। स्वप्न में मछली, मगरमच्छी, शुक्ति अथवा शङ्खी का रूप धारण करके पहले हर्ष उत्पन्न करती है। तदनन्तर अत्यन्त हनन करती है (कष्ट पहुंचाती है) उसकी सन्तान का जलत्रास (Hydrophobia) अथवा अन्य रोगों से जल में नाश होता है (मृत्यु होती है)। इसका यही प्रायश्चित्त है कि रोहिणी स्नान के द्वारा इसका उपाय करे। जो इस तथ्य को जानती है तथा मछलियों की हिंसा नहीं करती उसे मत्सी जातहारिणी आक्रान्त नहीं करती। हे वृद्धजीवक ! जो स्त्री ग्रहण की हुई अथवा ग्रहण न की हुई वनस्पतियों

रेवतीकल्पः ? ] | कल्पस्थानम् | २९९


की हिंसा करती है उससे वनस्पति देवता क्रुद्ध हो जाते हैं। वैश्वानर नाम वाला अग्नि, पितृमातृ नाम वाला सोम, शिव नाम वाला स्वधा, वरुण नाम वाला अप् (जल), निर्ऋति नाम वाली भूमि, वियत् नाम वाली गौ, श्लोक नाम वाली गौ, पवित्र करने वाला वायु, पूषा नाम वाला आदित्य, काष्ठा नाम वाली दिशायें, वरुण नाम वाला इन्द्र तथा प्राण नाम वाला वायु इत्यादि ये १२ वनस्पतियों के देवता माने जाते हैं। ये देवता वनस्पतियों की हत्या करने वालों का हनन कर देते हैं। इनके उपचार के लिये वनस्पतियों अथवा वृक्षों के समूह के मध्य में इन्हीं देवताओं की स्थालीपाक के द्वारा पूजा करे। अग्नि देवता की घृत के द्वारा, सोम देवता की श्यामाक (धान्य विशेष) के द्वारा, शिव की दूधद अथवा खीर के द्वारा, जल देवता की दही के द्वारा, भूमि देवता की सप्तान्न के द्वारा, गौ अथवा अग्निदेवता की ग्रामधूपों के द्वारा, पवमान (वायु) की पिशित (मांस) के द्वारा, पूषा देवता की अन्न आदि के द्वारा, दिशाओं की मध्यों के द्वारा तथा इन्द्र देवता की हविष्य भोजन के द्वारा आराधन करना चाहिये। जो वनस्पतियों की हिंसा नहीं करती हैं उनको ये वनस्पति देवता सन्तान से युक्त करती हैं। जो इस तथ्य को जानती है उनके लिये ये वनस्पति देवता जातहारिणी (उत्पन्न हुए को मारने वाले) नहीं होते ॥६९॥

तत्र श्लोकाः—

अधर्मस्यातिसंवृद्ध्या रेवती लभतेऽन्तरम् ।
लब्ध्वाऽन्तरमतिक्रुद्धा नानारूपैर्यथोदितैः ॥ ७० ॥

अन्यैश्च दारुणतरैस्ततो हन्ति प्रजा इमाः ।
यौगपद्येन भार्या वा म्रियन्ते वा पृथक् पृथक् ॥ ७१ ॥

अधर्म की वृद्धि के कारण रेवती अन्तर (अवकाश छिद्र अथवा दोषों) को प्राप्त करती है तथा दोषों को प्राप्त करके क्रुद्ध होकर ऊपर वर्णित किये हुए अथवा वर्णित न किये हुए भी अनेक प्रकार के रूपों को धारण करके इनकी सन्तानों की हत्या करती है। उसी के साथ अथवा उससे पृथक् स्त्री की भी मृत्यु हो जाती है ॥७०-७१॥

ग्रस्तस्य जातहारिण्या शिशो रूपाणि मे शृणु ।
सद्यो रूपं तु तत्तै्रकं यदुच्चैस्त्रस्तवा¹शितम् ॥ ७२ ॥

स्तन्यदूषणमेवाग्रे ज्वरस्तन्द्री प्रमीलकः ।
शिरोभितापो वैवर्ण्यं भृशं वा पाण्डुपीतता ॥ ७३ ॥

तृष्णाऽतिसारो वैस्वर्यं तालुशोषः प्रहर्षणम् ।
मुखपाको मुखस्फोटौ वैसर्पः पाण्डुकामले ॥ ७४ ॥

जागर्ति रोदिति भृशं पीड्यते च मुहुर्मुहुः ।
श्वसते कासते क्षौति शीतीभवति च क्षणात् ॥ ७५ ॥

निश्चेष्टो मृतकल्पश्च मुहुः स्थित्वा प्रचेष्टते ।
न पुष्यति यथाकालं स्तनं न प्रतिनन्दति ॥ ७६ ॥

अपूर्वं च जनं दृष्ट्वा भृशमुद्विजते शिशुः ।
बिडालनकुलाखूनां शब्देनाशु प्ररोदिति ॥ ७७ ॥

मृदुनाऽपि च रोगेण पीडामाप्नोति दारुणाम् ।
अभीक्ष्णं त्रसते सुप्तो न शर्म लभते सुखात् ॥ ७८ ॥

जातहारिणी से आक्रान्त शिशु के लक्षणों को तू मेरे से सुन-उसका तात्कालिक रूप तो यही होता है कि शिशु भय सहित उच्चस्वर से रोता है। तथा उसके बाद स्तन्य (दूध) का दूषित होना, ज्वर, तन्द्रा, प्रमीलक (मूढता), शिरोभिताप, विवर्णता,,अत्यन्त पाण्डु एवं पीलापन, तृष्णा, अतिसार, विकृतस्वर, तालुशोष, प्रहर्ष, मुखपाक, मुखस्फोट, विसर्प, पाण्डु, कामला आदि हो जाते हैं तथा बालक बहुत अधिक जागता रहता है, रोता है, उसे बार २ अत्यन्त पीड़ा होती है। उसे श्वास तथा कास रोग हो जाते हैं। वह छींकता है तथा क्षणभर में ठण्डा पड़ जाता है। वह निश्चेष्ट एवं मृततुल्य हो जाता है तथा कुछ देर बाद उसे संज्ञा प्राप्त होती है। उसका ठीक समय पर पोषण नहीं होता तथा वह दूध से प्रसन्न नहीं होता। वह बालक जब किसी अपरिचित व्यक्ति को देखता है तो अत्यधिक डर जाता है।


१. सत्रासं रोदनमित्यर्थः।

३००काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम्रेवतीकल्पः ? ]

विडाल (बिलाव), नेवले तथा चूहों के शब्दों को सुनकर वह शीघ्र ही रोने लगता है। बहुत स्वल्प (मामूली) रोग से भी उसे भयंकर पीड़ा होती है। वह निरन्तर डरता रहता है तथा सोने पर उसे सुख (आराम) नहीं मिलता ॥७२-७८॥

रूपाण्येतानि संलक्ष्य भेषजं न पृणोति यः । सोऽपत्यैः कुरुते कार्यं स्वप्रलब्धैर्धनैरिव ॥७९॥

जो उपर्युक्त लक्षणों को देखकर इनकी चिकित्सा नहीं कराता, उसकी सन्तान उसी प्रकार नष्ट हो जाती है जिस प्रकार स्वप्न में प्राप्त हुए धन नष्ट हो जाते हैं ॥७९॥

अत ऊर्ध्वं वरणबन्धमुपक्रमिष्यामः । बन्ध्यो हि गर्भिण्याः क्षयति प्रागष्टमान्मासात्, अत ऊर्ध्वं प्रतिषेधस्तस्यान्यत्र । वृद्धजीवक ! श्रद्दधानानां

(इति ताडपत्रपुस्तके १८३ तमं पत्रम् ।)

धर्मक्रियावतां त्रिरात्रोपोषितानां भिषक् छुचिरुपोषितः प्रजावरणं बध्नीयात्; बद्धे चैनां दक्षिणाभिरिष्टाभिरर्चेत्, सा ह्यास्याः प्रजाः प्रयच्छति । तत्र संभारा रोहिणीस्नान स्नाता । स्नपनमप्येके रात्रौ चेत् कुर्याद् गृहेषु, दिवा चेदरण्येऽनुगुप्तमुभयं दिग्बन्धं कृत्वाऽऽत्मर क्षामत्र विधायोद्यारभेत् तत्कर्म । अथ शुचौ देशे गोचर्ममात्रं गोमयेनाद्भिborderश्च स्थण्डिलमुपलिप्य भिषगहतवासाः स्नातोऽलङ्कृतः प्राङ्मुख उपस्पृश्योद्धृतहस्तस्तूष्णीमुपस्पृशेदशब्दवतीभिरफेनाभिरनुष्णाभिरद्भिर्ब्राह्मेण तीर्थेन त्रिः प्राश्नीयात्, द्विरोष्ठौ परिमृजेत्, तत्रित्रित्येके । अक्षिणी कर्णौ नासिकेऽप्यपानं चोपस्पृशेत् । दुव्य(दृश्ये)महति सूर्ये स्थण्डिलमभ्युक्ष्य, हिरण्यपाणिर्दर्भपिञ्जूलीनां गर्भवर्तीं गृहीत्वा, तया लक्षणमुल्लिख्य दर्भपिञ्जूलीमभ्युक्ष्य बहिर्निर्स्यति, तत्राग्निं प्रणयति । यथापूर्वोक्तं परिसमूह्य, परिसंमृक्ष्य, प्रदक्षिणं बर्हिषा परिस्तीर्याग्नेः पुरस्तात् काञ्चनीं राजतीमुशीरमयीं दर्भमयीं वा प्रतिकृतिं प्रतिष्ठाप्य कुमारं षष्ठीं विशाखं च, दक्षिणतो ब्रह्माणमुत्तरत उदपात्रं, द्वाभ्यां दर्भाभ्यामच्छिन्नाग्राभ्यां समाभ्यां विष्टरबद्धाभ्यामाज्यमुत्पूय, आज्यमसि देवभोजनमसि तेजोऽसि चक्षुरसि श्रोत्रमसीन्द्रियमस्यायुरसि सत्यमसि हविरसीति । अथ जुहोति दर्भश्रुवेण आघारौ हुत्वा गर्भिणीं स्त्रियं स्नातामुषितां शुक्लवसनोपसंवीतामलङ्कृतां दक्षिणत उदङ्मुखीं सुखे पीठेऽथोपवेश्य द्वौ दर्भौ हस्ते दत्त्वा, सा तूष्णीमासीत । अथ भिषगनुज्ञातो नित्यं होमं हुत्वाऽऽज्यभागौ हुत्वा मातङ्ग्या विद्यया जुहुयात् । मातङ्गी नाम विद्या पुण्या दुःस्वप्नकलिरक्षोघ्नी पापकल्मषाभिशापमहापातकनाशनी पातकी ब्रह्मर्षिराजर्षिसिद्धचारणपूजिताऽर्चिता मतङ्गेन महर्षिणा कश्यपपुत्रेण कनीयसा महता तपसोग्रेण पितामहादेवासादिता सर्वभयनाशनी सर्वलोकवशीकरणी स्वस्तिककरणी शान्तिकरी प्रजाकरी बन्धनी विमला अमोघकल्याणी; य इमां विद्यां शुचिरावर्तयतिं सन्ध्ययोः पूतो भवति, नास्य सर्वभूतेभ्यो भयं भवति; य एनां शुचिरहन्यहनि जपति बहुपुत्रो बहुधन आयुष्माननमीवा सिद्धार्थश्च भवति, य इमां विद्यां श्राद्धे आवाहयत्यक्षयमस्य पितरश्च श्राद्ध अवतार्यन्ते । य इमां गोमध्ये जपेद् बह्व्योऽस्य भवन्ति गावः । य इमां स्त्रियमृतुस्नातां श्रावयते गर्भिणी भवति । य इमां गर्भिणीं श्रावयति पुत्रवती भवति । य इमां कृच्छ्रप्रसवां श्रावयत्याशु मुच्यते । य इमां म्रियमाणपुत्रां श्रावयति जीवत्पुत्रा भवति । यत्र चैव वेश्मनि सर्पान् रक्षांसि च गुह्यकान् वा विद्यात् तत्र सर्षपानष्टशताभिमन्त्रितानवकिरेत्, सर्वे नश्यन्ति । यो वा द्विष्यात् तस्य वा द्वारेऽवकिरेद्यः पूर्वमाक्रामति, स आर्तिमाप्नोति । दुर्गेषु जपत्तस्तस्कर-

(इति ताडपत्रपुस्तके १८४ तमं पत्रम् ।)

रेवतीकल्पः ? ] कल्पस्थानम् ३०१

मृगव्यालभयं न भवति । रूपे रूपेऽश्वमेधफलमवाप्नोति । सर्वतीर्थेषु स्नातो भवति । सर्वोपवासाः कृताभवन्ति । सर्वाणि दानानि दत्तानि भवन्ति । अर्थविद्या, नचैतामूहैत् । नमो मातङ्गस्य ऋषि(वर्य)स्य सिद्धकस्य नम आस्तीकस्य, तेभ्यो नमस्कृत्या इमां विद्यां प्रयोजयामि, सा मे विद्या समृद्धयतां, सत्यव हिलि मिलि महामिलि कुरुट्टा अट्ठे ममटे तुम्बिपसे करटे गन्धारि केयूरि भुजङ्गमि ओजहारि सर्पच्छेदनि अलगणिलगणि पंसुमसि कक्किकाकण्डि हिलि हिलि बिडि बिडि अट्ठे मट्टे अजिहट्टे कुक्कुक्कुक्कुमति, स्वाहा । इत्येतया मतङ्गविद्यया शमीमयीनां समिधानमष्टशतं पालाशीनामश्वत्थमयीनामष्टशतं श्वेतानां पुष्पाणामष्टशतं सर्षपाणामग्निवर्णानामष्टशतं घृतं तैलं वसामित्युपकल्प्य, समध्वज्यमैकध्यमालोड्य, युगपत्तिस्त्रः समिधो हुत्वा मन्त्रान्ते चाज्यंजुहोति; एवमष्टशतं हुत्वा प्रतिसरं लक्ष्मणापुत्रञ्जीवफल-समुद्रफेनप्रतिग्रथिता(तं) लम्बा(म्बं)ग्रहणीवासुशुक्तिजीवोर्णानां रुद्रमातङ्ग्या विद्ययाऽभिमन्त्र्य कण्ठे विसर्जयेत् । अथैषा विद्या रुद्रमातङ्गी भवति । नैनामूहेत् । नमो भगवतो रुद्रस्य मातङ्गि कपिले जटिले रुद्रशामे रक्ष रक्षेमं रिरक्षुमाज्ञापयेति स्वाहा । इत्येतया रुद्रमातङ्ग्या प्रतिसरं बध्नीयात् । बद्धे प्रतिसरे प्रजावरणं बद्धं भवति । नास्याः सर्वभूतेभ्यो भयं भवति, आशा समृद्धयते, जीवत्पुत्रा सुभगा चाविधवा च भवति । ततः स्विष्टकृतं हुत्वा, यथा पूर्वोक्तं शान्तिं जपित्वा, महाव्याहृतिभिर्हुत्वा, देवतामभ्यर्च्य, विसर्ज्य, बलिं कृत्वाऽग्निमभ्युक्ष्य, तूष्णीं ब्राह्मणान् साधून् पुत्रवत आयुष्मतश्चान्नवासोदक्षिणाभिरभ्यर्च्य, तत उपवसेत् । तत्स्र्वमाह¹वनमुपसंगृह्य चतुष्पथे वोदके वा क्षीरवृक्षे वा निदधाति । एवमेतेन विधिना प्रजावरणं बद्धं भवति, नास्याः प्रजा न भवतीत्याह भगवान् कश्यपः ।। अत ऊर्ध्वं सप्तरात्रं प्राजापत्यं चरुं पयसि शृतं प्रजापतये जुहुयात्, पूर्वोक्तं गोघृतमित्येके । प्रजाकामपशुकामाऽऽयुष्कामानामिति वा ।।८०।।

अब हम वरण बन्ध का वर्णन करेंगे । (जिस बन्धन के द्वारा गर्भ स्थित होता है तथा गर्भपात का भय नहीं रहता उस बन्धन को वरणबन्ध कहते हैं) गर्भिणी स्त्री को आठवें मास से पूर्व यह बन्ध लगाना चाहिये । इसके बाद इसका निषेध किया गया है । हे वृद्धजीवक ! जो पवित्र है तथा जिसने उपवास किया है ऐसा वैद्य श्रद्धा करने वाली तथा धर्मयुक्त आचरण करने वाली स्त्रियों को तीन दिन तक उपवास कराकर उनमें प्रजावरण (सन्तान को स्थिर करने वाला) बन्ध बांधे । तथा बन्धन बांधने के बाद इष्ट दक्षिणाओं के द्वारा उसकी अर्चना करे । इससे उसे सन्तान की प्राप्ति होती है । इसमें संभारा तथा रोहिणी नक्षत्र में स्नान करना चाहिये । कुछ लोग कहते हैं कि स्नान भी यदि रात्रि में किया जाय तो घर के अन्दर करना चाहिये तथा यदि दिन में करे तो जंगल में करना चाहिये । परन्तु दोनों अवस्थाओं में स्नान का कार्य गुप्तरूप से तथा दिग्बन्ध (चारों ओर दिशाओं का बन्धन करके अर्थात् चारदिवारी के अन्दर बन्द होकर) द्वारा अपने को सुरक्षित करके करना चाहिये । इसके बाद पवित्र स्थान में गोबर तथा पानी के द्वारा गोचर्म² प्रमाण (२१०० हाथ लम्बा) वेदी को लीप कर नवीन वस्त्र पहन कर स्नान करके तथा अलंकृत होकर वैद्य पूर्व दिशा की ओर मुख करके आचमन करे तथा ऊपर हाथ उठाये हुए और शान्त हुए शब्द एवं झागरहित तथा शीतल जल के द्वारा अङ्गस्पर्श करे तथा ब्राह्म तीर्थ के द्वारा तीन बार भक्षण करके दो बार ओष्ठों का परिमार्जन करे । कुछ लोगों के मत में तीन वार ओष्ठों का परिमार्जन करना चाहिये । दोनों चक्षु, दोनों कर्ण, दोनों नासिका तथा गुदा का स्पर्श करे । फिर महान् सूर्य के दिखाई देने पर वेदी पर जल के छींटे देकर हिरण्यपाणि (हाथ में स्वर्ण अथवा स्वर्णमय पदार्थ युक्त) होकर दर्भपिञ्जुलि (कुश के गुच्छे-Bunch


१. आहवनं हवनोपकरणमिति यावत् । २. गोचर्म—२१०० हाथ लम्बा चौड़ी भूमि को कहते हैं— सप्तहस्तेन दण्डेन त्रिंशद्दण्डैर्निवर्तनम् । दश तान्येव गोचर्म दत्त्वा स्वर्गे महीयते ॥ अर्थात् ७×३०×१०=२१०० हाथ (अनुवादक)

३०२काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम्रेवतीकल्पः ? ]

of qrass) युक्त गर्भवती को लेकर तथा उसके द्वारा लक्षणों को लिखकर दर्भपिञ्जुलि को जल के छींटे देकर बाहर आ जाये तथा अग्नि को नमस्कार करे। फिर पूर्वोक्तानुसार सब सामान एकत्रित करके तथा उन्हें पवित्र करके तथा बर्हि (कुश) के द्वारा चारों ओर प्रदक्षिणा कर के अग्नि के सामने स्वर्ण, रजत (चांदी), खस अथवा दर्भ की बनी हुई कुमार, षष्ठी अथवा विशाख की प्रतिकृति (मूर्ति) स्थापित कर के तथा दक्षिण की ओर यज्ञ के ब्रह्मा तथा उत्तर की ओर जलपात्र को रखकर जिनके अग्रभाग कटे हुए नहीं हैं, जो सम हैं, ऐसे तथा परस्पर बंधे हुए दोनों दर्भों के द्वारा वृत को पवित्र कर के ‘आज्यमसि, देवभोजनमसि, तेजोऽसि, चक्षुरसि, क्षोत्रमसि, इन्द्रियमसि, आयुरसि, सत्यमसि, हविरसि, इत्यादि बोले। तथा दर्भस्रुवों (दर्भ की बनी हुई स्रुवाओं) के द्वारा $^१$आधारों (अग्नि के एक स्थान से दूसरे स्थान तक मन्त्रोच्चारण पूर्वक घृत का डालना) में आहुति देकर हवन करे। तदनन्तर स्नान एवं उपवास कर के तथा शुक्ल वस्त्रों को पहन कर अलंकृत हुई गर्भवती स्त्री को दक्षिण की ओर से उत्तर की ओर मुख कर के सुखकारक पीठ (आसन) पर बिठाकर हाथ में दो दर्भ देवे। वह गर्भवती स्त्री शान्त बैठी रहे। इसके बाद आज्ञा लेकर वैद्य नित्य होम कर के उसमें आज्यभाग डालकर मातङ्गी विद्या के द्वारा आहुति डाले। मातङ्गी नामक पुण्यकारक, दुःस्वप्न, कलि (रोग) तथा राक्षस (कृमि) आदियों को नष्ट करनेवाली पाप, कल्मष (पाप विशेष), अभिशाप तथा महान् पापों को नष्ट करनेवाली, पातक, ब्रह्मर्षि, राजर्षि, सिद्ध एवं चारणों के द्वारा पूजित एवं अर्चित विद्या को कश्यप के कनिष्ठ पुत्र महर्षि मातङ्ग ने महान् एवं उग्र तपस्या के द्वारा सीधा पितामह ब्रह्मा से प्राप्त किया था। यह विद्या, सम्पूर्ण भयों को नष्ट करनेवाली, सम्पूर्ण लोकों को वश में करनेवाली, कल्याण एवं शान्ति करने वाली, सन्तान को उत्पन्न करने वाली, गर्भ का बन्धन करने वाली (जिससे गर्भपात न हो), विमल तथा अत्यन्त कल्याण युक्त है। जो व्यक्ति दोनों सन्ध्याकालों में स्नान आदि द्वारा शुचि (पवित्र) होकर इस विद्या की आवृत्ति करता है वह पवित्र हो जाता है। इसे सम्पूर्ण प्राणियों से भय नहीं रहता। जो पवित्र होकर प्रतिदिन इस विद्या का जाप करता है वह बहुत पुत्रों एवं धन से युक्त होता है, दीर्घायुष्य को प्राप्त करता है, रोग रहित हो जाता है तथा उसके सब अभीप्सित प्रयोजन सिद्ध हो जाते हैं। जो व्यक्ति श्राद्ध में इस विद्या को स्मरण करता है उसका कभी क्षय (नाश) नहीं होता तथा उसके पितर श्राद्ध में अवतीर्ण हो जाते हैं। जो गौओं के मध्य में इसका जाप करता है उसके बहुत सी गौऐं हो जाती हैं। जो ऋतुस्नाता स्त्री को इस विद्या को सुनाता है वह स्त्री गर्भवती हो जाती है। जो गर्भवती को सुनाता है वह स्त्री बहुत पुत्रों वाली हो जाती है। जिस स्त्री का प्रसव कष्ट से हो रहा है उसे यदि इसका श्रवण कराया जाय तो उसे शीघ्र ही प्रसव हो जाता है। जिस स्त्री के पुत्र मर जाते हों उसे यदि इस विद्या का श्रवण कराया जाय तो उसके पुत्र जीवित रहते हैं। जिस घर में सर्प, राक्षस तथा गुह्य आदि को जाने वहां आठ सौ मन्त्रों से अभिमन्त्रित सरसों को बिखेर दे। इससे वे सब नष्ट हो जाते हैं। जो द्वेष करता हो उसके द्वार पर उनको (सरसों को) बिखेर दे, जो सर्व प्रथम उन्हें लांघेगा वह रोग से पीडित हो जायगा। दुर्गों (दुर्गम स्थानों) में इसका जाप करने से चोर, मृग (पशु आदि) तथा सर्प आदि का भय नहीं रहता। इसके प्रत्येक रूप में अश्वमेध यज्ञ का फल मिल जाता है अर्थात् अश्वमेध यज्ञ का जो फल होता है वह उसके देखने मात्र से मिल जाता है—इससे सम्पूर्ण तीर्थों में स्नान हो जाता है, सम्पूर्ण उपवास किये हुए के समान हो जाते हैं, सम्पूर्ण दान दिये हुए हो जाते हैं। अर्थविद्या (धन प्राप्ति की विद्या) की उसे अपेक्षा (आवश्यकता) नहीं रहती अर्थात् इस मातङ्गी विद्या से वे सब पुण्य एवं फल प्राप्त हो जाते हैं जो अश्वमेध यज्ञ, सम्पूर्ण तीर्थों के स्नान, सब उपवास तथा सब प्रकार के दानों से मिलते हैं। ऋषिवर मातङ्ग, सिद्धक तथा आस्तीक को नमस्कार है। इन सबको नमस्कार करके मैं इस विद्या को प्रयुक्त करता हूँ। वह विद्या मेरी समृद्धि करे। ‘सत्यव हिलिमिलि महामिलि कुरुङ्गे अट्टे ममटे तुम्बिपसे करटे गन्धारि केयूरि भुजङ्गमि ओजहारि सर्पच्छेदनि अलगणिलगणि पंसुमसि ककिकाकण्डि हिलिं हिलि बिडि बिडि अट्टे मट्टे अजिहट्टे कुक्कु कुक्कुमति स्वाहा’ इस मातङ्ग विद्या के द्वारा शमी, पलाश (ढाक) तथा अश्वत्थ की समिधाएं आठ सौ, श्वेत पुष्प आठ सौ, अग्नि के वर्ण वाले सरसों आठ सौ, तथा घृत, तैल एवं वसा को


१. वह्नेः कश्चिद्देशमारभ्य देशान्तरपर्यन्तं समन्त्रकम् आज्यधारायाः आहरणं प्रक्षेपणम् आधार इत्युच्यते। (अनुवादक)

भोजनकल्पः ? ] कल्पस्थानम् ३०३

एकत्रित करके इन सबका मधु एवं घृत के साथ आलोडन करके युगपत् तीन समिधायें अग्नि में डालकर मन्त्र के अन्त में घृत की आहुति देवे। इस प्रकार आठ सौ बार आहुति देकर लक्ष्मणा, पुत्रञ्जीवफल (पित्तौजिया अर्थात् पतजिव) तथा समुद्र फेनसे ग्रथित लम्बी ग्रहघ्नी (श्वेत सरसों) वासु, शुक्ति, जीव तथा ऊर्णा (ऊन) की बनी हुई माला को रुद्रमातङ्गी विद्या के द्वारा अभिमन्त्रित करके गले में डाल दे। रुद्रमातङ्गी विद्या निम्न होती है। इसमें अधिक तर्क न करे अर्थात् तर्क न करके इसे श्रद्धापूर्वक मान ले। 'नमो भवगते रुद्रस्य मातङ्गि कपिले जटिले रुद्रशामे रक्ष रक्षेमं रिरक्षुमाज्ञापयेति स्वाहा' इस रुद्रमातङ्गी विद्या के द्वारा प्रतिसर (माला) को बांधे। प्रतिसर के बांधा जाने पर प्रजावरण बन्ध बंधा हुआ समझा जाता है। इससे उसे सम्पूर्ण प्राणियों का भय नहीं रहता है। आशा में वृद्धि होती है। उस स्त्री के पुत्र जीवित रहते हैं, वह उत्तम ऐश्वर्य वाली होती है तथा विधवा नहीं होती है। उसके बाद स्विष्टकृत आहुति देकर पूर्वोक्तानुसार शान्ति का जाप करके महाव्याहृतियों (भूः, भुवः, स्वः, महः इत्यादि) के द्वारा आहुति देवे। फिर देवताओं की अभ्यर्चंना तथा विसर्जन करके, बलि देकर, अग्नि में जल के छींटे देकर शान्त हो जाये। फिर चुपचाप ब्राह्मण, साधु, पुत्रवान् तथा आयुष्मान् व्यक्तियों को अन्न, वस्त्र एवं दक्षिणा के द्वारा अभ्यर्चंना करके बैठ जाये। उस सम्पूर्ण हवन के उपकरण आदियों को लेकर किसी चौराहे पर, जल (नदी आदि) में अथवा किसी क्षीरी वृक्ष पर रख दे। इस प्रकार उपर्युक्त विधि से प्रजावरण (बन्धन) बांधा जाता है। इसके द्वारा सन्तान उत्पन्न न हो ऐसा नहीं हो सकता—ऐसा भगवान् कश्यप ने कहा था अर्थात् इससे अवश्य सन्तान उत्पन्न होती है। इसके बाद सात रात्रि तक प्रजापत्य चरु (हव्यान्न) को दूध में शृत (पका) करके प्रजापति के लिये आहुति देवे। कुछ लोग कहते हैं कि इसमें गोघृत की आहुति देवे। तथा प्रजा (सन्तान) को चाहने वाले, पशुओं को चाहने वाले तथा आयु को चाहने वाले, व्यक्तियों को उपर्युक्त आहुतियां देनी चाहिये ॥८०॥

इति प्रधानार्थमुदाहृतं परं नृणां हितार्थं भिषजां यशस्करम्।
अलङ्घनीयं हि रहस्यमुत्तमं शुचिः प्रयुञ्जीत न तु प्रकाशयेत् ॥८१॥

यह उपर्युक्त वरणबन्ध का विधान मनुष्यों के हित के लिये प्रधानरूप से कहा गया है। तथा यह वैद्यों के लिये यश का देने वाला है। इस उत्तम रहस्य का लङ्घन नहीं करना चाहिये। पवित्र होकर इसका प्रयोग करना चाहिये तथा इसे किसी दूसरे पर प्रकट नहीं करना चाहिये। अर्थात् इसे रहस्य के रूप में ही रखना चाहिये। प्रत्येक व्यक्ति को यह रहस्य नहीं बताना चाहिये ॥८१॥

इति ह स्माह भगवान् कश्यपः।
(इति कल्पस्थाने) रेवतीकल्पो नामाध्यायः॥


ऐसा भगवान् कश्यप ने कहा था।
(इति कल्पस्थाने) रेवतीकल्पो नामाध्यायः।


भोजनकल्पाध्यायः।

अथातो भोजनकल्पं वक्ष्यामः ॥१॥
यथोवाच भगवान् कश्यपः ॥२॥

अब हम भोजन कल्पाध्याय का व्याख्यान करेंगे। ऐसा भगवान् कश्यप ने कहा था ॥१-२॥


४२ का.सं.

३०४काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम्भोजनकल्पः ? ]

मारीचमासीनमृषिं पुराणं हुताग्निहोत्रं ज्वलनार्कंतुल्यम्।
तपोदमाचारनिधिं महान्तं पप्रच्छ शिष्यः स्थविरोऽनुकूलम् ॥३॥
किं लक्षणं भोः क्षुधितस्य जन्तोः पिपासितस्याथ तथोभयस्य ।
भृशे च मन्दे च कथं नु विद्यात् तृषाक्षुधे तत्र च किं हितं स्यात् ॥४॥
भोज्यानुपूर्वी च कथं हिता स्याद् भक्तं क्व देशे परिपच्यते च ।
किं लक्षणं भुक्तवतो महात्मन्! मन्दाशितात्याशितयोश्च कानि ॥५॥
गुणाश्च दोषाश्च हि तत्र के स्युरत्युष्णशीताशनयोश्च के च ।
विपर्यये के च भवन्ति दोषाः क्षुत्तृष्णायोर्भोजनपानयोगात् ॥६॥
(इति ताडपत्रपुस्तके १८५ तमं पत्रम्)

मण्डश्च केषां भवति प्रशस्तः केषां प्रशस्तो भगवन्न मण्डः ।
मण्डस्य सम्यक् च निषेवितस्य गुणाश्च दोषाश्च विपर्यये के ॥७॥
केषां यवागुरहिता हिता वा कृताकृतौ चाप्यथ मुद्गमण्डौ ।
यूषश्च कस्मै विरसः प्रदिष्टः समूलको वाऽथ सदाडिमो वा ॥८॥
सजाङ्गलो वा रसकौदनो वा संभोजनस्नानमथो हितं क्व ।
इत्येवमुक्त्वा स बभूव जोषं प्रजापतिर्वाक्यमथो बभाषे ॥९॥

अग्निहोत्र करके बैठे हुए, देदीप्यमान सूर्य की समान कान्ति वाले, तप, दम एवं आचार के निधि (कोश=खजाने), मारीचपुत्र प्राचीन महर्षि कश्यप से ज्ञानी शिष्य वृद्धजीवक ने अनुकूल अवस्था में देखकर निम्न प्रश्न किये—

१. जिस व्यक्ति को भूख लगी है उसके क्या लक्षण हैं ? २. प्यासे व्यक्ति के क्या लक्षण हैं ? ३. इन दोनों के क्या लक्षण हैं ? ४. पिपासा एवं क्षुधा के तीव्र एवं मन्द होने पर क्या लक्षण होते हैं ? ५. उस अवस्था में क्या देना हितकर होता है ? ६. भोजन के समय भोज्य पदार्थों का क्या क्रम होना चाहिये ? ७. खाया हुआ भोजन किस स्थान में पचता है ? ८. हे महात्मन् ! भोजन किये हुए व्यक्ति के क्या लक्षण हैं ? ९. मन्द अशित (अल्प भोजन किये हुए) तथा अत्यशित (अधिक भोजन किये हुए) के क्या लक्षण होते हैं ? १०. अत्यन्त उष्ण तथा अत्यन्त शीत भोजन के गुण एवं दोष क्या हैं ? ११. भोजन एवं पान के योग से क्षुधा एवं तृष्णा के विपर्यय (विपरीतावस्था) के क्या दोष हैं ? १२. मण्ड किन्हें हितकर है तथा किन्हें नहीं ? १३. सम्यक् प्रकार से सेवन किये हुए मण्ड के क्या गुण हैं ? तथा असम्यक् प्रकार से सेवन किये हुए के क्या दोष हैं ? १४. यवागू किन्हें अहितकर तथा किन्हें हितकर हैं ? १५. कृत एवं अकृत यूष किन्हें हितकर एवं अहितकर हैं ? १६. मुद्गमण्ड किन्हें हितकर तथा किन्हें अहितकर हैं ? १७. विरस (मसाले आदि से रहित) तथा मूली एवं दाडिम युक्त यूष किनके लिये हितकर कहा गया है ? १८. जांगल मांस रस तथा ओदन किनके लिये हितकर है ? १९. भोजन तथा स्नान किनके लिये हितकर है ? इस प्रकार प्रश्न करके वह शान्त हो गया। तब प्रजापति कश्यप ने उत्तर दिया ॥३-९॥

नासर्वविन्नो खलु मांसचक्षुः प्रश्नानिमान् वक्तुमिहोत्सहेत ।

असर्ववित् (सब कुछ न जानने वाला–असर्वज्ञ) व्यक्ति केवल इन मांस चक्षुओं के द्वारा इन सब उपर्युक्त प्रश्नों का उत्तर नहीं दे सकता है। अर्थात् दिव्य चक्षुओं के द्वारा इनका उत्तर दिया जा सकता है, इसलिये सर्वसाधारण व्यक्ति इसका उत्तर नहीं दे सकता है।

भोजनकल्पः ? ] कल्पस्थानम् ३०५

उत्साहवर्णस्वरदृष्टिहानिविषादकार्श्यश्रमवाग्विकाराः ॥१०॥
भृशं च पीडा हृदयस्य जन्तोर्ग्लानिर्मुखस्यातिबुभुक्षितस्य ।

बुभुक्षित (भूखे) व्यक्ति के लक्षण—अत्यन्त भूखे व्यक्ति में उत्साह, वर्ण, स्वर तथा दृष्टि की कमी हो जाती है, शरीर में विषाद, कृशता तथा थकावट होती है, वाणी विकृत हो जाती है, रोगी के हृदय में अत्यन्त पीडा तथा मुख में ग्लानि होती है ॥१०॥

ताल्वोष्ठजिह्वागलगण्डशोषः श्रोत्राक्षिदौर्बल्यविषादमोहाः ॥११॥
स्मृत्यग्निमेधासुखवाक्यहानिर्जिह्वाविवृद्धिश्च पिपासितस्य ।

पिपासित (प्यासे) व्यक्ति के लक्षण—प्यासे व्यक्ति के तालु, ओष्ठ, जिह्वा, गला तथा गण्डप्रदेश सूख जाते हैं, कर्ण एवं नेत्र दुर्बल हो जाते हैं, विषाद एवं मोह होता है स्मृतिशक्ति, जाठराग्नि, मेधा एवं सुख (स्वास्थ्य) एवं वाणी शक्ति नष्ट हो जाते हैं तथा जिह्वा की वृद्धि हो जाती है ॥११॥

एतानि रूपाण्युभयानि विद्यात् पिपासिते चैव बुभुक्षिते च ॥१२॥
विशोषणं तत्र शिरोरुजार्तिमूत्रग्रहो भुक्तवतश्च भेदः ।
तत्रान्नपानानि यथोपजोषं सात्म्यानि भोज्यानि वदन्ति तज्ज्ञाः ॥१३॥

प्यासे एवं भूखे दोनों व्यक्तियों में सामान्यरूप से शरीर का शोषण, शिरोरोग, मूत्रग्रह तथा भोजन करते ही मल का आ जाना—इत्यादि लक्षण होते हैं। इस अवस्था में विद्वान् लोग आवश्यकतानुसार सात्म्य अन्न पान का भोजन करने को कहते हैं ॥१२-१३॥

तृष्णाबुभुक्षाभृशपीडितेत तु सकृत् कृतं पूरणमप्रशस्तम् ।
ओजो हि दग्धं ज्वलनानिलाभ्यां पुनः पुनः शोषयते च पीतम् ॥१४॥
लोहं यथा तप्तमपोनिषिक्तं तत्रान्नपानस्य गतिः कथं स्यात् ।

तृष्णा (पिपासा) एवं बुभुक्षा (भूख) से अत्यन्त पीडित होने पर एक दम पेट भर के खाना या पीना प्रशस्त नहीं माना गया है। क्योंकि अग्नि एवं वायु के द्वारा जला हुआ ओज जो कुछ पिया जाता है उसे बार २ सुखा डालता है। उस अवस्था में अन्नपान की गति कैसे हो सकती है अर्थात् किसी प्रकार नहीं हो सकती है। एक गरम किये हुए लोहे को पानी में डुबो देने से उसकी जो अवस्था होती है वैसे ही इस व्यक्ति के अन्नपान की होती है ॥१४॥

सकृत्प्रपीतस्य वदन्ति चैके तृप्तिं प्रशस्तां भिषजोऽनुचिन्त्य ॥१५॥
सकृत्पपीतस्य हि नश्यते क्षुद् यथा पृथिव्याः सकृदाप्लुतायाः ।

कुछ वैद्य लोग विचार करके कहते हैं कि—प्यास लगने पर एक दम पानी पी लेने से पूर्णरूप से तृप्ति हो जाती है। परन्तु सहसा जल से आप्लुत हुई पृथ्वी के समान एक दम जल पीने से रोगी की भूख नष्ट हो जाती है ॥१५॥

आदाय पित्तं पवनो ह्युदीर्णओजोदहां संजनबेद्धि तृष्णाम् ॥१६॥
शिरोगतः स्थाननिरुद्धवेगीहृत्कोम संतापयते ततस्तृट् ।

अपने स्थान पर जिसका वेग रुक गया है ऐसा वायु शिर में पहुँचकर उदीर्ण हुआ पित्त को लेकर ओज को जलाने वाली प्यास उत्पन्न कर देता है। जिससे हृदय एवं क्लोम में सन्ताप उत्पन्न होता है तथा अन्त में प्यास लगती है ॥१८॥

३०६काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम्भोजनकल्पः ? ]

शूलारताध्मानगुदप्रकोपज्वराङ्गदाहश्रममोहतृष्णाः ॥१७॥
शय्यासनस्त्रीविषयेष्वभक्तिर्भवन्ति रूपाण्यपतर्पितस्य ।

अपतर्पित व्यक्ति के लक्षण—शूल, ग्लानि, आध्मान, गुद रोग का प्रकोप, ज्वर, अङ्गों में जलन, थकावट, मोह, तृष्णा, शय्या, आसन एवं मैथुन में इच्छा न होना ये अपतर्पित व्यक्ति के लक्षण होते हैं ॥१६॥

आदातुमिच्छत्यपि यस्तु भूयो मध्यस्थता चेद्भवतीप्सितेषु ॥१८॥
तद्देशकालौ भजते च युक्त्या मन्दाशितं तं प्रवदन्ति तज्ज्ञाः ।

मन्द अशित (कम भोजन किये हुए) व्यक्ति के लक्षण-जो बार २ भोजन को ग्रहण करना चाहता हो, ईप्सित पदार्थों में मध्यस्थता हो, उस २ देश एवं काल का युक्तिपूर्वक सेवन करता हो-उसे विद्वान् लोग मन्द अशित कहते हैं ॥१८॥

अत्याशितानां वमनं प्रशस्तं मन्दाशितानामशनं तु युक्त्या ॥१९॥
कालं च देशं च वयो बलं च समीक्ष्य चोपद्रवभेषजं च ।

अत्यशित तथा मन्द अशित का उपक्रम-काल, देश, अवस्था, बल, उपद्रव तथा औषध को दृष्टि में रखते हुए जिसने बहुत भोजन कर लिया हो उसे वमन कराना चाहिये तथा जो मन्द अशित है अर्थात् जिसने कम भोजन किया है उसे युक्तिपूर्वक भोजन कराना चाहिये ॥१९॥

दृष्टिप्रसादो वचनप्रसिद्धिः स्वरस्य गाम्भीर्यमदैन्यमूर्जाः ॥२०॥
इष्टेन्द्रियार्थेषु मनःप्रहर्षः स्निग्धं मुखं भुक्तवतश्च विद्यात् ।

भुक्तवान (जिसने भोजन किया हुआ है) व्यक्ति के लक्षण—भोजन करने के बाद उसके नेत्र निर्मल हो जाते हैं, वचन (वाणी) में प्रसिद्धि होती है अर्थात् जो कुछ वह कहना चाहता है उसे कहने में समर्थ होता है, स्वर गंभीर एवं दीनतारहित हो जाता है तथा शरीर में ऊर्ज (बल) बढ़ता है, इन्द्रियों के इष्ट विषयों में मन प्रसन्न होता है तथा मुख स्निग्ध हो जाता है ॥२०॥

कान्तिर्बलस्मृतिमेधावयांसि प्रमोदसत्त्वस्थितिरङ्गवृद्धिः ॥२१॥
दृढेन्द्रियत्वं स्थिरताऽऽयुषश्च सम्यग्गुणा भुक्तवतो नरस्य ।

सम्यक् प्रकार से भोजन किये हुए व्यक्ति के लक्षण-अच्छी प्रकार भोजन करने के बाद मनुष्य के शरीर में कान्ति, बल, स्मृति, मेधा वय, (अवस्था) की प्राप्ति होती है, प्रमोद, सत्त्वस्थिति (मनः स्थिति) तथा अङ्गों में वृद्धि होती है, इन्द्रियां दृढ़ होती हैं तथा आयु स्थिर होती है ॥२१॥

भोज्यस्य कालं मुनयो बुभुक्षां वदन्ति तृष्णामपि पानकालम् ॥२२॥

मुनिगण बुभुक्षा (भूख-Appetite) को भोजन का काल तथा तृष्णा (प्यास) को पान (पानी पीने) का काल कहते हैं। अर्थात् जब भूख लगे तब भोजन तथा प्यास लगने पर पानी पीना चाहिये ॥२२॥

भोज्यानुपूर्वी तु या हिता स्यात् तां तु प्रवक्ष्यामि निबोध वत्स ! ।
तृष्णाक्षुधौ चेद्युगपद्द्रवेतां तयोर्भिषक् तां प्रथमं चिकित्सेत् ॥२३॥

भोजन में कौनसा द्रव्य पहले तथा कौनसे पीछे अर्थात् किस क्रम से खाना हितकर होता है-वह मैं बतलाता हूँ, हे वत्स ! इसे तुम सुनो—यदि प्यास और भूख दोनों इकट्ठी लगें तो वैद्य को इन दोनों में से प्रथम अर्थात् प्यास की पहले चिकित्सा करनी चाहिये ॥२३॥

भोजनकल्पः ? ] कल्पस्थानम् ३०७

पूर्वं पिपासां शमयेद्विपश्चित् त्रिभागसात्म्योचितपानयोगैः ।
ततोऽशनैः कुक्षितृतीयभागं संपूरयेद्भागमथावशिष्टात् ॥ २४॥
एवं हि भुञ्जानमथो पिबन्तं जितेन्द्रियं साहसवर्जिनं च ।
आरोग्यमायुर्बलमग्निदीप्तिः प्रजा च मुख्या भजते सुखं च ॥ २५॥

बुद्धिमान् व्यक्ति को चाहिये कि त्रिभागसात्म्य की दृष्टि से उचित पेय पदार्थों के द्वारा पहले प्यास को शान्त करे अर्थात् कुक्षि के तृतीय (१/३) भाग को पानी (Liquid) से भर ले। इसके बाद कुक्षि के तृतीय (१/३) भाग को भोजन (अन्न-Solid diet) से पूर्ण करे। तथा एक भाग को अवशिष्ट रहने दे अर्थात् कुक्षि के एक भाग को वातादि दोषों की गति के लिये खाली रहने देना चाहिये जिससे वातादि दोषों की गति (Churning movements) के कारण भोजन सम्यक् प्रकार से पच सके। इस प्रकार भोजन एवं जल (अन्न तथा पान) का सेवन करने वाले जितेन्द्रिय एवं साहस रहित व्यक्ति को आरोग्य, आयु, बल, अग्निदीप्ति, उत्तम सन्तान एवं सुख (स्वास्थ्य) की प्राप्ति होती है।

**वक्तव्य—**चरक वि. अ. २ में भी कुक्षि को उपर्युक्त चार प्रकार से ही अन्न एवं जल से पूर्ण करने को कहा है—
'त्रिविधं कुक्षौ स्थापयेदवकाशांशमाहारस्याहारमुपयुञ्जानः, तद्यथा—एकमवकाशांशं मूर्तानामाहारविकाराणाम्, एकं द्रवाणाम्, एकं पुनर्वातपित्तश्लेष्मणाम्। एतावतीं ह्याहारमात्रामुपयुञ्जानो नामात्राहाजं किंचिदशुभं प्राप्नोति। उपर्युक्त दोनों ग्रन्थों में यह क्रम त्रिभाग सौहित्य की दृष्टि से कहा है। अष्टाङ्गहृदय सू. अ. १० में यह क्रम अर्धसौहित्य की दृष्टि से दिया है—अन्नेन कुक्षेद्वौवंशौ पानेनैकं प्रपूरयेत्। आश्रयं पवनादीनां चतुर्थमवशेषयेत्॥ अर्थात् कुक्षि (आमाशय) के चार भाग करके उनमें से दो को अन्न (Solid matter) से, तथा एक को जल आदि पेय पदार्थों से भरे तथा चौथा भाग वायु आदि के लिये रिक्त रखना चाहिये ॥२४-२५॥

बुभुक्षितो यस्तु पिबेत् पुरस्तादश्नाति चान्नानि पिपासितः सन् ।
तस्याशु रोगाः प्रभवन्ति घोरा विपर्ययादानभवा अपायाः ॥ २६॥
ज्वराङ्गदाहश्रमकार्श्यकुष्ठच्छर्दिभ्रमानाहविसुचिकास्तृट् ।
यक्ष्मातिसारौ गलताळुशोषोदेहेन्द्रियार्थेन्द्रियवर्णहानिः ॥ २७॥

जो व्यक्ति भूख की अवस्था में पानी पीता है तथा प्यास लगने पर अन्न (भोजन) खाता है, उसे इनके विपर्यय (विपरीत अवस्था) के कारण शीघ्र ही अपाययुक्त एवं भयंकर ज्वर, अङ्गदाह, श्रम, कृशता, कुष्ठ, छर्दि, भ्रम, आनाह, विसूचिका, तृषा, यक्ष्मा, अतिसार, गलशोष और तालुशोष आदि रोगों की प्राप्ति तथा शरीर, इन्द्रियों के विषय (शब्द स्पर्श आदि) तथा इन्द्रियों एवं वर्ण का नाश आदि शीघ्र ही हो जाते हैं ॥२६-२७॥

प्रतान्तभोक्तुर्विषमाशिनश्च तोयातिपस्यातिमहाशनस्य ।
विरोध्यजीर्णाधिविभोजनस्य वह्निः प्रशाम्यत्यपि चान्नकाले ॥ २८॥
तस्माच्च पूर्वं न जलं पिबेयुः स्नेहोपरिष्टान्न च चातिभुक्त्वा ।
(इति ताडपत्रपुस्तके १८६ तमं पत्रम्)
पीतं हि सद्यः शमयत्युदर्यं ततो ज्वराद्याः प्रभवन्ति रोगाः ॥ २९॥

बार २ भोजन करने वाले, विषम भोजन करने वाले, अधिक पानी पीने वाले, बहुत अधिक भोजन करने वाले, विरुद्ध भोजन करने वाले, अजीर्ण पर भोजन करने वाले, एवं अध्यशन करने वाले व्यक्ति की अग्नि अन्नकाल में शान्त हो जाती है। इस लिये भोजन से पूर्व जल नहीं पीना चाहिये। इसी प्रकार स्नेह के ऊपर तथा अधिक भोजन करने के

३०८ काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम् भोजनकल्पः ? ]

बाद भी जल नहीं पीना चाहिये। इन अवस्थाओं में जल के पीने से जाठराग्नि शीघ्र ही शान्त (मन्द) हो जाती है तथा ज्वर आदि रोग उत्पन्न हो जाते हैं ॥२८-२९॥

स्नेहं समाक्रम्य विचित्रभोज्यै र्जलं पिबेन्मध्य इवा(हा)शनस्य । भुक्त्वाऽपि पित्तप्रकृतिः पिबेच्च मात्रां च सर्वत्र हितं च सात्म्यम् ॥३०॥ जिह्वौष्ठताल्वन्त्रगलोदरौजो विदह्यते भुक्तफलं न वेत्ति । आनाहदुर्नामजलोदरासृग्वैसर्पतृष्णाक्षिशिरोरुजश्च ॥३१॥

पूर्व सेवन किये हुए स्नेह को नाना प्रकार के भोजनों के द्वारा आच्छादित करके भोजन के मध्य में जल पीना चाहिये। अर्थात् स्नेहपान के बाद यदि जल पीना हो तो कुछ अन्य स्नेहरहित पदार्थ खाकर बाद में जल पीना चाहिये। भोजन करने के बाद भी पित्तप्रकृति मनुष्य को मात्रा में हितकारी एवं सात्म्य जल का ही पान करना चाहिये अन्यथा जिह्वा, ओष्ठ, तालु, आंतें, गला, उदर तथा ओज का दहन हो जाता है, उसे भोजन का फल प्राप्त नहीं होता है तथा आनाह, दुर्नाम (अर्श), जलोदर, रक्तविकार, विसर्प (अथवा रक्त विसर्प), तृष्णा, अक्षिरोग एवं शिरोरोग हो जाते हैं ॥३०-३१॥

अत्युष्णपानान्ननिषेवणेन रेतोऽसृगण्डोपचयश्च दुष्येत् । अग्निः क्षयं याति रसं न वेत्ति श्लेष्मा च पित्तं च निचीयतेऽस्य ॥३२॥

अत्यन्त उष्ण अन्नपान के सेवन से वीर्य, आर्तव तथा बीज दूषित हो जाते हैं, जाठराग्नि क्षीण हो जाती है, रस का ज्ञान नहीं होता तथा उसके शरीर में कफ एवं पित्त का संचय हो जाता है ॥३२॥

शीतान्नपानातिनिषेवणात्तु कफानिलारोचकशूलवाताः । हिक्काशिरोनेत्रगलग्रहाद्या आलस्यविण्मूत्रगुरुत्ववृद्धिः ॥३३॥

अत्यन्त शीतल अन्न-पान के सेवन से कफ एवं वायु के रोग तथा अरुचि, वातशूल, हिक्का, शिरोग्रह, नेत्रग्रह, गलग्रह, आलस्य, मल, मूत्र एवं शरीर के भारीपन में वृद्धि हो जाती है ॥३३॥

स्निग्धं च पूर्वं मधुरं च भोज्यं मध्ये द्रवं शीतमथो विचित्रम् । तीक्ष्णोष्णरूक्षाणि लघूनि पश्चाद् भोज्यानुपूर्वी खलु सात्म्यतश्च ॥३४॥

भोजन में सर्वप्रथम स्निग्ध एवं मधुर पदार्थों का सेवन करना चाहिये। भोजन के मध्य में शीतल द्रव्य पदार्थ एवं नाना प्रकार के व्यञ्जनों का प्रयोग करे तथा अन्त में तीक्ष्ण उष्ण, रूक्ष एवं लघु पदार्थों का सेवन करना चाहिये अथवा अपने सात्म्य के अनुसार भोजन करना चाहिये। यह भोजन का क्रम बतलाया गया है ॥३४॥

यः पैत्तिकः क्षीणकफो निरोगो मूर्च्छाश्रमात्यध्वनिपीडितश्च । अत्युष्णपानान्ननिषेवणाच्च दृष्टिर्हता मद्यनिषेवणाच्च ॥३५॥ शुष्कं कफं ष्ठीवति यश्च कृच्छ्रात् ष्ठीवंश्च यः क्लिश्यति निर्विकारः । क्लेशात् प्रसूते तृषिता च या स्त्री क्षीरोन्द्रियो यश्च मदात्ययार्तः ॥३६॥ मन्दाशिनो योषिति जागरूकाः संशोधनैर्यै मृदिताश्च मर्त्याः । दग्धाश्च वैसर्पविदाहिनश्च कासेन कोपेन मदेन चार्ताः ॥३७॥ उद्भ्रामितः पूगफलेन यश्च जग्धेन वा यो मदनेन मूढः । किंपाकभल्लातविषोपसृष्टाः क्षौद्राशिनो ये गरपीडिताश्च ॥३८॥

भोजनकल्पः ? ] कल्पस्थानम् ३०९

मद्यं पयस्तक्रमथो दधीनि येऽश्नन्ति वाराहमथापि मत्स्यान्।
ताम्बूलपूगोन्मथिताश्च ये स्युः कालोचिता यस्य भवेच्च तृष्णा ।। ३९ ।।
एते तथाऽन्येऽपि च तद्विधा ये तेषां जलं शीतमुशन्ति पथ्यम्।
विष्टम्भतृष्णाग्निनिपीडिता ये तथा लभन्ते बलसत्त्वपुष्टीः ।। ४० ।।

किन्हें शीतल जल हितकर है ?—जो पित्त प्रकृति वाला है तथा जिसमें कफ की क्षीणता है, जो रोग रहित है, जो मूर्च्छा, श्रम तथा अत्यधिक मार्गगमन से पीड़ित है, अत्यन्त उष्ण अन्नपान तथा मद्य के सेवन से जिसकी दृष्टि नष्ट हो गई है अथवा क्षीण हो गई है, जो कष्टपूर्वक शुष्क कफ थूकता है तथा थूकते हुए विकाररहित होने पर भी जिसे कष्ट होता है। जिस स्त्री को कष्ट से प्रसव हो तथा जिसे प्यास लगी हो, जिस व्यक्ति की इन्द्रियां क्षीण हो गई हैं तथा मदात्यय रोग से पीड़ित हो, जो कम भोजन करता हो, जो स्त्रियों में जागरूक हो अर्थात् अधिक मैथुन आदि करता हो, जो व्यक्ति संशोधनों के कारण कमजोर हो गये हों, जो दग्ध हो गये हों, जो विसर्प, विदाह, कास, कोप एवं मद से पीड़ित हैं, जो पूगफल (सुपारी) के अधिक सेवन से उद्भ्रान्त हो गया हो, जो मदनफल के सेवन से मूढ़ हो गया हो, जो किंपाक (कुचले) तथा भिलावे के विष से पीड़ित हों, जो मधु का नित्य सेवन करते हों, जो गर (संयोगज विष) से पीड़ित हों, जो मद्य, दूध, तक्र, दही, सूअर का मांस तथा मछली का सेवन करते हों, पान एवं सुपारी का जो प्रतिदिन व्यवहार करते हों, जिसकी कालोचित तृष्णा हो तथा जो विष्टम्भ तृष्णा एवं अग्नि से पीड़ित हों—इन उपर्युक्त तथा अन्य भी इसी प्रकार के व्यक्तियों के लिये शीतल जल पथ्य माना गया है। इससे उनका बल एवं सत्त्व (मन) पुष्ट होता है ।। ३५-४०।।

कौरुक्षेत्राः कुरवो नैमिषेयाः पाञ्चालमाणीचरकौसलेयाः ।
हारीतपादाश्चरशौरसेनामात्स्या दशार्णाः शिशिराद्रिजाश्च ।। ४१ ।।
सारस्वताः सिन्धुसौवीरकाख्या ये चान्तरे स्युर्मनुजाः कुरूणाम् ।
उद्गविपाट्सिन्धुवसातिजाश्च काश्मीरचीनापरचीनखश्याः ।। ४२ ।।
बाहीकदाशेरकशातसाराः सरामणा ये च परेण तेषाम् ।
एषामवक्षार्यशनादिरुक्ता सात्म्योचितत्वाद्विभिषा विधेया ।। ४३ ।।
सा ह्यास्य तृष्णां शमयत्युदीर्णां बलं च पुष्टिं च रुचिं च धत्ते ।
वातानुलोम्यं प्रकृतिस्थतां च विण्मूत्रदेहेन्द्रियजां करोति ।। ४४ ।।
संतर्पयत्याशु च तेन सैभ्यो हिता मता सात्म्यगुणेन चैव ।

कुरुक्षेत्र के रहने वाले, कुरु एवं निमिष के निवासी तथा पाञ्चाल, माणीचर, कौसल, हारीतपाद, चर, शूरसेन, मत्स्य, दशार्ण, शिशिराद्रि के रहने वाले, सारस्वत, सिन्धु, सौवीरक, तथा कुरूओं के मध्य में रहने वाले मनुष्य, उदग्, विपाट्, सिन्धु, वसातिज, काश्मीर, चीन, अपरचीन तथा खस के निवासी, बाहीक, दासेरक, शातसार तथा रामण देश के निवासियों के लिये सात्म्य होने के कारण वैद्यों ने क्षाररहित भोजन का विधान बताया है। इससे उनकी उदीर्ण हुई पिपासा शान्त होती है तथा बल, पुष्टि एवं अन्न में रुचि बढ़ती है। वायु की गति अनुलोम हो जाती है तथा मल, मूत्र और देह की सम्पूर्ण इन्द्रियां प्रकृतिस्थ हो जाती हैं। इसके द्वारा उस व्यक्ति का शीघ्र ही सन्तर्पण हो जाता हैं। सात्म्य गुण के कारण यह इनके लिये हितकर माना गया है ।। ४१-४४ ।।

पात्रेषु हृद्येषु सुपुष्पवत्सु भुञ्जीत देशे च मनोऽनुकूले ।। ४५ ।।
तक्रं शुक्तं दधि मस्तुगुडं च द्राक्षा मुख्याः सुकृताः शक्तवश्च ।

३१०काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम्भोजनकल्पः ? ]

शीतं हितं दाडिमवारि चार्यं स्यात् सैन्धवं भूस्तृणपल्लवाश्च ।।४६।।
तानि त्रिवृद्वासककारवेल्लाद्रसः कुठरादिसमातुलुङ्गात् ।
स्यादार्द्रकयुताः शक्तवश्च सर्पिर्वरिष्ठं लघवः षाडवाश्च ।।४७।।
भक्ष्याश्च मुख्या लघवः सुपक्वाः सूपा रागाः पानकं मद्ययोगाः ।
अतो गणाद्युक्तिमवेक्ष्य कुर्यात् सात्यादवक्षारमथो विधिज्ञः ।।४८।।

हृदय को अच्छे लगने वाले तथा पुष्प युक्त पात्रों में मन के अनुकूल स्थान में बैठकर उन्हें तक्र, शुक्त, दधिमस्तु गुड़ (गुड़ के बने पदार्थ), द्राक्षा, अच्छी प्रकार बनाये हुए पदार्थ, सत्तू, शीतल एवं श्रेष्ठ अनार का रस, सैन्धव, भूस्तृण के पल्लव (कोमल पत्ते) तथा त्रिवृत्, बांसा, करेला, कुठेर एवं मातुलुङ्ग (बिजौरे) का रस, आर्द्रक स्वरस सहित सत्तू, उत्तम घृत तथा लघु षाडव (मधुर अम्ल) आदि पानक विशेष, लघु एवं सुपक्व प्रधान भक्ष्य पदार्थ, सूप (दाल), राग (अचार आदि), पानक तथा मद्य के प्रयोग—इत्यादि उपर्युक्त गण में से विधि को जानने वाला वैद्य सात्म्य के अनुसार द्रव्यों का प्रयोग करे। यह अवक्षारि (क्षाररहित) भोजन कहा गया है ।।४५-४८।।

काशीन्सपुण्ड्राङ्कवङ्ककाचान् ससा(ग)रानानुपकतौ(कौ)सलेयान् ।
पूर्वं समुद्रं च समाश्रिता ये किरातदेश्यानपि पूर्वशैलान् ।।४९।।
शाकैः समत्स्यामिषशालितैलैर्द्रव्यैश्च तीक्ष्णैः समुपक्रमेत ।
कफो हि तेषां निचितः स्वभावद्विलीयमानः कृशतां करोति ।।५०।।

इसके अतिरिक्त काशी, पुण्ड्र, अङ्क, बङ्ग, काच के रहने वाले सागरपर्यन्त एवं आनूप प्रदेश के कौसलवासी तथा पूर्व समुद्र के किनारे रहने वालों तथा पूर्वीय पर्वत के किरात देश के निवासियों को मछली का मांस, शालिचावल एवं तैलयुक्त शाक तथा अन्य तीक्ष्ण द्रव्य देने चाहिये। इनमें सञ्चित हुआ कफ स्वभाव से विलीन होता (पिघलता) हुआ शरीर में कृशता उत्पन्न कर देता है ।।४९-५०।।

कलिङ्गान् पट्टनवासिनश्च सदक्षिणान् वाऽपि च नार्मदेयान् ।
उच्चावचद्रव्यगुणान्विताभिः पेयाभिरेतान् समुपक्रमेत ।।५१।।
(इति ताडपत्रपुस्तके १८७ तमं पत्रम्)

तैलानि कङ्ग्वाढकीयावकाश्च मूलानि कन्दाश्चणकाः कलायाः ।
एतानि सात्म्यानि भवन्ति तेषां पेयास्तथोष्णाः परिसिद्धिकाश्च ।।५२।।

कलिङ्ग, पट्टन, दक्षिण तथा नर्मदा नदी के किनारे रहने वाले व्यक्तियों को नाना प्रकार के द्रव्यों के गुणों से युक्त पेयाओं का प्रयोग कराना चाहिये। इन लोगों को कङ्गु (प्रियङ्गु), आढकी (अरहर) तथा यावक (कुलथी) के तैल, मूल, कन्द, चने तथा मटर एवं पेया और उष्ण परिसिद्धिका (मण्ड विशेष) आदि सात्म्य होते हैं ।।५१-५२।।

पेया हि सिद्धा सह दाडिमेन तक्रेण चुक्रेण जलेन चोष्णा ।
ससैन्धवा चाशु विहन्ति तृष्णां कालोपपन्ना मरिचार्द्रकाभ्याम् ।।५३।।

अनारदाना, तक्र, चुक्र (सिरका) तथा उष्ण जल से सिद्ध की हुई पेया में सैन्धव, मरिच तथा आर्द्रक डालकर योग्य काल में प्रयोग कराने से तृष्णा शान्त हो जाती है ।।५३।।


१. परिसिद्धिका मण्डविशेषः।

भोजनकल्पः ? ] कल्पस्थानम् ३११

पित्तात्मनः सर्पिषि संस्कृता वा क्षीरोदके शर्करयाऽन्विता वा।
ज्वरातिसारश्रममोहकासान् हिक्कां च तृष्णां च हिनस्ति पेया ।।५४।।

पित्त प्रकृति वाले मनुष्य को घृत में संस्कृत की हुई अथवा क्षीरोदक में सिद्ध की हुई पेया में शर्करा मिलाकर प्रयोग करने से ज्वर, अतिसार, श्रम, मोह, कास, हिक्का तथा तृष्णा नष्ट हो जाती है ॥५४॥

यद्यस्य सात्म्यं च हितं च भोज्यं शरीरदेशप्रकृतौ स्थितं च।
तत्तस्य वैद्यो विदधीत नित्यं काले च हृद्यं लघु मात्रया च।।५५।।

शरीर, देश एवं प्रकृति के अनुसार जिसके लिये जो भोजन सात्म्य तथा हितकर हो, वैद्य को चाहिये कि वह उसको नित्य योग्य समय एवं मात्रा में हृदय को अच्छा लगने वाला तथा लघु भोजन देवे ॥५५॥

स्तनस्य वामस्य भवत्यधस्तादामाशयस्तत्र विपच्यतेऽन्नम्।
धातूरसः प्रीणयते विसर्पन् किट्टान्मलानां प्रभवोऽखिलानाम्।।५६।।

वाम (बांये) स्तन के नीचे आमाशय (Stomach) होता है जिसमें अन्न का पाक होता है वहां से सम्पूर्ण शरीर में विसर्पण (गति) करता हुआ रस धातुओं को तृप्त करता है तथा किट्ट के द्वारा सारे मलों की उत्पत्ति होती है ॥५६॥

दीप्ताग्नयो वर्णबला थनश्च व्यायामनित्या बहुभाषिणश्च।
स्त्रीषु प्रसक्ताः क्षयिनो विनिद्रारोगैर्विमुक्ताः कृशदुर्बलाश्च ।।५७।।
विशुष्कविण्मूत्रकफाध्वखिन्नानिपीड्यमाना विषमज्वरैश्च।
एते नरा मांसरसं पिबेयुः प्राग्भोजनाद्वातविकारिणश्च ।।५८।।

मांसरस का सेवन किन्हें करना चाहिये—जिनकी जाठराग्नि दीप्त है, जो वर्ण एवं बल को चाहते हैं, जो नित्य व्यायाम करते हैं, जो बहुत बोलते हैं (अधिक बोलने का कार्य करते हैं), जो नित्य स्त्री-भोग आदि करते हैं, जिन्हें क्षय रोग हैं, जिन्हें नींद नहीं आती है, जो रोगों से युक्त हैं परन्तु कृश तथा दुर्बल हैं, जो शुष्क हैं, जो मल, मूत्र, कफ एवं अध्व (मार्गगमन) से खिन्न हुए हैं, जो विषम ज्वर से पीडित हैं तथा जिन्हें वायु के विकार हुए हैं—उन व्यक्तियों को भोजन से पूर्व मांसरस पिलाना चाहिये ॥५७-५८॥

प्रक्लिन्नकाया गलवक्त्ररोगैरार्ताः क्षताः पित्तकफादिताश्च।
ज्वरातिसारग्रहशोकनिद्राप्रमेहपाण्ड्वामयकामलार्ताः ।।५९।।
विषाान्विताश्चापि मदान्विता वा ये चोपसृष्टा विविधैर्गदैर्वा।
छर्द्दूरुविष्कम्भविकारिणश्च नैते नरा मांसरसं पिबेयुः ।।६०।।

मांसरस का किन्हें सेवन नहीं करना चाहिये—जिनका शरीर क्लिन्न है, जो गले तथा मुख के रोगों से पीड़ित हैं, जिन्हें क्षत एवं पित्त तथा कफ के रोग हैं, जिन्हें ज्वर, अतिसार, ग्रह रोग, शोक, अधिक निद्रा, प्रमेह, पाण्डु एवं कामला रोग हैं, जो विष, मद एवं अनेक प्रकार के संयोगज विषों से पीडित हैं, जिन्हें वमन तथा ऊरुस्तम्भ रोग हैं—उन्हें मांसरस का सेवन नहीं करना चाहिये ॥५९-६०॥

तक्रं तु तेषां भवति प्रशस्तं ससैन्धवं शर्करयाऽन्वितं वा।
सौवर्चलेनाथ विडेन युक्तं मध्येऽपि चान्तेऽपि सनावनीतम् ।।६१।।

इन व्यक्तियों के लिये भोजन के मध्य तथा अन्त में भी सैन्धव, शर्करा, सौवर्चल नमक, विडनमक एवं मक्खनयुक्त तक्र प्रशस्त मानी गई है ॥६१॥

३१२ काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम् भोजनकल्पः ? ]

तक्रं हि सद्यो मथितं सुगन्धि रुचिं बलं पुष्टिमथो दधाति। अम्लोष्णवैशद्यलघु स्वरो(?) वा निषेव्यमाणं ज्वलयत्युदर्यम् ।।६२।।

ताजा मथा हुआ एवं सुगन्धित तक्र (मठा) रुचि, बल एवं पुष्टि को बढ़ाता है। यह अम्ल, उष्ण, विशदता करने वाला, लघु तथा स्वर को बढ़ाने वाला है। इसके सेवन करने से यह जाठराग्नि को प्रदीप्त करता है॥६२॥

वान्ते विरिक्ते ज्वरिते विशुष्के महोपवासश्रमपीडिते च। तृष्णातिसारोरुगदोपतप्ते वैसर्पपित्तामयघर्मिते च ।।६३।। संसृष्टरोगेषु महाशनेषु विदह्यमानेषु जलोदरेषु। सद्यःप्रसूतास्वपि चाङ्गनासु मण्डं विदध्यादपि कामलासु ।।६४।।

मण्ड का प्रयोग किन्हें कराना चाहिये ?—वमन एवं विरेचन कराने के बाद ज्वर में रोगी के ज्वर से शुष्क होने पर, दीर्घ उपवास एवं परिश्रम से पीड़ित होने पर, तृष्णा, अतिसार, ऊरुस्तम्भ, विसर्प, पैत्तिक रोग तथा धूप से पीड़ित व्यक्ति के संसृष्ट दोषों से उत्पन्न रोगों में, बहुत अधिक भोजन करने वालों को, जिनके शरीर के अन्दर विदाह हो रहा हो, जिन्हें जलोदर रोग हो तथा सद्यः प्रसूता स्त्रियों एवं कामला रोग में मण्ड का प्रयोग कराना चाहिये ॥६३-६४॥

आमातिसारज्वरयोर्विबन्धे कफोद्भवे श्वासगलामयेषु। हिक्कोपजिह्वागलशुण्डिकासु कासेऽक्षिरोगे शिरसो गुरुत्वे ।।६५।। छर्दिश्रमोन्मादविषूचिकासु योन्यामये प्लीह्नि च पीनसे च। गुल्मेषु हृद्रोगहलीमकेषु वातप्रकोपेष्वथ केवलेषु ।।६६।। धात्र्याः प्रवृद्धे पयसि प्रदुष्टे बालस्य निद्राकफवातवृद्धौ। मूत्राभिवृद्धौ हृदयद्रवे च निष्ठीविकालस्यविषादकेषु ।।६७।। छर्दिषु सर्वेषु तथा ग्रहेषु पृष्ठग्रहे यक्ष्मणि हृद्रदे च। चिन्ताश्रमोन्मादमदोपतापे मण्डं भिषङ्नोपदिशेद्विपश्चित् ।।६८।।

मण्ड का प्रयोग किन्हें नहीं कराना चाहिये ?—आमातिसार, ज्वर, विबन्ध, कफ से उत्पन्न श्वास एवं गलरोग, हिक्का, उपजिह्वा (Ranula), गलशुण्डिका (Enlarged uvula), कास, अक्षिरोग, सिर का भारीपन, वमन, श्रम, उन्माद, विसूचिका, योनि रोग, प्लीहा रोग, पीनस (प्रतिश्याय), गुल्म, हृद्रोग, हलीमक, शुद्ध वायु के प्रकोप, धात्री के प्रवृद्ध हुए दूध के दूषित होने, बालक के निद्राधिक्य तथा कफ एवं वायु की वृद्धि, मूत्रवृद्धि, हृदयद्रव (Palpitation of Heart), निष्ठीविका (थूक का बहुत आना), आलस्य, विषाद, छर्दिरोग, पृष्ठग्रह, यक्ष्मा, हृद्रोग तथा चिन्ता, श्रम, उन्माद एवं मद से पीड़ित अवस्था में विद्वान् वैद्य को मण्ड का प्रयोग नहीं कराना चाहिये ॥६५-६८॥

मण्डो हि पीतः कफिना गदे वा कफात्मके वर्धयते कफस्तान्। सोऽस्याग्निमुत्साद्य गदान् पुनस्तान् प्रकोपयन् कष्टतरान् करोति ।।६९।।

यदि कफ प्रकृतिवाला मनुष्य कफरोगों में मण्ड का सेवन करता है तो इससे उसके शरीर में कफ की वृद्धि होती है। जिससे उसकी जाठराग्नि मन्द हो जाती है तथा वे ही (कफ के) रोग पुनः प्रकुपित होकर कष्टसाध्य हो जाते हैं ॥६९॥

तस्मात्तु तेषां काफनां नराणां न मण्डमाहुर्भिषजः प्रशस्तम्। स्यान्मुद्गमण्डोदक एव तेषां ससैन्धवव्योषयुतः सुखाय ।।७०।।

भोजनकल्पः ? ] कल्पस्थानम् ३१३

इसलिये कफ प्रकृतिवाले मनुष्यों को मण्ड का प्रयोग कराना वैद्य प्रशस्त नहीं मानते हैं। इन व्यक्तियों के लिये सैन्धव तथा त्रिकटु मिश्रित मुद्गमण्डोदक ही सुखकारी माना गया है॥७०॥

कषायतिक्तः कटुपाकिभावात् कफं निहन्त्याशु हि मुद्गमण्डः।
तस्मात् कृशं रोगविमुक्तदेहं दीप्तानलं वा सविलम्बिरोगम्॥७१॥
व्यायामिनं वा बलिनं सरोगं यश्चोचितो गोरसमांसमत्स्यैः।
संयोजयेत्तं विरसेन यूष्णा सास्रेण वा गोरससाधितेन॥७२॥

मुद्गमण्ड—रस में कषाय एवं तिक्त तथा विपाक में कटु होने के कारण शीघ्र ही कफ को नष्ट कर देता है। इस लिये जो कृश हैं, जिसका शरीर रोग से मुक्त हो गया है, जिसकी जाठराग्नि प्रदीप्त है, जिसे विलम्बिका रोग हुआ है, जो नित्य व्यायाम करता है, बलवान है तथा रोगयुक्त है, जिसे गोरस (गोदुग्ध), मांस, एवं मछली सात्म्य हैं—ऐसे व्यक्ति को मसालों से रहित तथा रक्त अथवा दूध से सिद्ध किया हुआ यूष देना चाहिये॥

वक्तव्य—विलम्बिका रोग-यह विसूचिका का ही एक भेद है। माधवनिदान में इसके लिये कहा है—दुष्टं च भुक्तं कफमारुताभ्यां प्रवर्तते नोर्ध्वमधश्च यस्य। विलम्बिकां तां भृशदुश्चिकित्स्यामाचक्षते शास्त्रविदः पुराणाः॥७१-७२॥

त्रिःप्रस्रुतो दीपनतोयसिद्धः स्यात्तण्डुलैः संपरिभृष्टकैर्वा।
मुद्गैर्यवैश्चापि तथैव लाजैरुष्णाः सुगन्धिविशदेन पीतः॥७३॥
(इति ताडपत्रपुस्तके १८८ तमं पत्रम्।)
मण्डः क्षणेनास्य बलं दधाति व्याधिस्तथा मार्दवमभ्युपैति।
सर्वेन्द्रियाणि प्रकृतिं भजन्ते भोज्यानुपूर्वी च तथा कृता स्यात्॥७४॥

तीन बार प्रस्रुत किये हुए तथा दीपनीय जल से सिद्ध किये हुए भुने हुए तण्डुल (चावल), मुद्ग, यव तथा लाजा (चावलों की खील) के बने हुए उष्ण सुगन्धि एवं विशद मण्ड के पीने से क्षण भर में बल की प्राप्ति हो जाती है, रोग मृदु (मन्द) हो जाता है तथा सम्पूर्ण इन्द्रियां प्रकृतिस्थ हो जाती हैं। इस प्रकार भोजन का क्रम होता है॥७३-७४॥

मण्डं यथोक्तं पिबतो गुणास्ते विपर्यये चापि विपर्ययः स्यात्।
य एव मण्डस्य भवन्ति योग्या .....................॥७५॥

यथोक्त मण्ड को पीने से उपर्युक्त गुण होते हैं। इसके विपरीत होने से गुणों में भी विपर्यय हो जाता है। जो व्यक्ति मण्ड के योग्य होते हैं (वे ही यवागू के भी योग्य होते हैं)॥७५॥

लघ्वी यवागूर्न विदह्यते च दोषानुलोम्यं विदधाति चोष्णा।
पित्तं च माधुर्यगुणेन हन्ति भोज्यानुपूर्वी क्रमशःश्च युङ्क्ते॥७६॥

यवागू लघु होने के कारण शरीर में दाह उत्पन्न नहीं करती है तथा इसका उष्ण अवस्था में प्रयोग करने से यह दोषों का अनुलोमन करती है। माधुर्य गुण के कारण यह पित्त को नष्ट करती है तथा क्रमशः भोजन के क्रम से युक्त होती है।

सदाडिमा वातकफार्दितस्य, सशर्करा पित्तकफान्वितस्य।
रसेन वा जाङ्गलकेन सिद्धा सगोरसा वा सह दाडिमैर्वा॥७७॥
हितां नृणां मारुतपीडितानां गुल्मे तथा प्लीह्नि च पीनसे च।
सभोजनस्नानविहारयानव्यायामसंभाषणगीतपथ्याम् ॥७८॥

३१४ काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम् भोजनकल्पः ? ]

भिन्न २ अनुपान से यवागू सेवन—वात एवं कफ से पीडित रोगी में दाडिम, पित्त एवं कफ से पीडित में कर्करा तथा वात से पीडित और गुल्म, प्लीहा एवं पीनस रोगों में तथा भोजन, स्नान, विहार, यान, व्यायाम, संभाषण तथा गीत (गाना) जिन्हें हितकर है—उनमें भी जांगल मांसरस से सिद्ध की हुई अथवा गोरस (दूध) से सिद्ध करके अनारदाना पड़ी हुई पेया का प्रयोग कराना चाहिये। स्वस्थ अवस्था में भी रोग के निवृत्त हो जाने पर तथा अग्नि के मन्द होने पर इसे हितकारी माना गया है ।।७०-७८।।

तत्स्वस्थवृत्तौ च हितां वदन्ति रोगे निवृत्ते ज्वलने च मन्दे ।
रोगे निवृत्ते ज्वलने च दीप्ते रोगैविमुक्ताः कृशदुर्बलाश्च ।।७९।।
क्षीणेन्द्रिया वर्णबलाग्निहीनावातार्दिताः पित्तनिपीडिताश्च ।
ज्वरातिसारोदरपायुरोगचिन्तेष्यपानाध्वरोगतप्ताः ||८०||
कासेन शस्त्रेण विषेण चैव निपीडिताः शोकहताश्च नित्यम् ।
व्यायामगेयाध्ययनश्रमातर्धूमाग्निवातातपजागरात्र्ताः ||८१||
विदह्यमानाक्षिगलास्यनासाविषीदमानाः स्मृतिबुद्धिहीनाः ।
आनाहिनः शुष्कपुरीषमूत्राभगन्दराशग्रिहकुण्डलात्र्ताः ।।८२।।
निष्पिष्ठभग्नच्युतपी(डि)ताङ्गे शुद्धव्रणे मांसविवर्जिते च ।
जीर्णज्वरात्येद्यतृतीयकेषु नित्यज्वरे चापि चतुर्थके च ।।८३।।
रक्षःपिशाचोरगभूतयक्षुद्ब्रजतृष्णाग्निहिमाहताश्च ।
स्त्रीबालपुत्राल्यविशुष्कदुग्धागर्भश्च यस्या न विवर्धते च ।।८४।।
नाप्यायते यः स्तनपश्व बालो जागर्ति नित्यं भृशरोदनश्च ।
चक्षुर्हतिर्यस्य च तीक्षणनस्यैविशोषणैर्वा प्रतिकर्मणा वा ।।८५।।

दूध का प्रयोग किन्हें कराना चाहिये—रोग के निवृत्त होकर अग्नि के प्रदीप्त हो जाने पर तथा जो व्यक्ति रोगमुक्त हैं परन्तु कृश तथा दुर्बल हैं, जिनकी इन्द्रियां क्षीण हैं, वर्ण, बल तथा अग्नि जिनकी नष्ट हो गई है, जो वात तथा पित्त से पीडित हैं, एवं ज्वर, अतिसार, उदररोग, गुदरोग, चिन्ता, ईर्ष्या, पान (मद्यपान) एवं मार्गगमन के कारण जो रोगग्रस्त हैं, जो नित्य कास, शस्त्र, विष तथा शोक से पीडित हैं, व्यायाम, गीत तथा अध्ययन के श्रम से जो युक्त हैं; धूम, अग्नि, वायु, आतप (धूप) तथा जागरण के कारण जो पीडित हैं जिसके चक्षु, गला, मुख तथा नासिका में विदाह हो जाता हो, जिन्हें विषाद हो तथा जो स्मृति एवं बुद्धि से हीन हों, जिन्हें आनाह रोग हो, जिनका मल एवं मूत्र शुष्क हो, भगन्दर, अर्श, ग्रह एवं वातकुण्डल रोग से जो पीडित हैं, जिनका शरीर निष्पिष्ट (Lacirated), भग्न (Fracture) तथा च्युत (Dislocation) के कारण पीडित हो जिनका व्रण शुद्ध हो, जो मांस से रहित हों अर्थात् जिनके शरीर में मांस की कमी हो तथा जीर्णज्वर, अन्येद्युष्क, तृतीयक, नित्यज्वर तथा चातुर्थिक ज्वर में एवं जो राक्षस, पिशाच, सांप, भूत, यक्ष, क्षुधा, वज्र, तृष्णा, अग्नि तथा हिम से आहत हों, जो स्त्री अथवा बालक हों जिनके पुत्र अल्प हों तथा जिनका दूध सूख गया है, जिनका गर्भ वृद्धि को प्राप्त नहीं होता है, जो दूध पीने वाला बालक दूध से तृप्त नहीं होता है, जो नित्य जागता रहता है तथा अत्यन्त रोता है, तीक्ष्ण नस्यों, शोषणकारक द्रव्यों अथवा चिकित्सा के द्वारा जिसको नेत्ररोग हो गया हो तथा जो व्यक्ति विरेचन के योग्य हैं—इन सबों को शृत किये हुए दूध का प्रयोग करना चाहिये ।

वक्तव्य—शुद्धव्रण का सुश्रुत सू. अ. २३ में निम्न लक्षण दियां है—त्रिभिर्दोषैरनाक्रान्तः श्यावौष्ठः पिडकी समः । अवेदनो निरास्त्रावो व्रणः शुद्ध इहोच्यते ॥ अर्थात् जो व्रण तीनों दोषों से रहित हैं, जिसके किनारे (Edges) श्याव रंग