काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)
Kashyapa Samhita Hindi
महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा
स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें२९८ काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम् रेवतीकल्पः ? ]
भासी, कुक्कुटी, मयूरी, चाषी, सारिका, तैलपायिका, उलूकी, भोलन्तिका, गृध्री, श्येनो, भारद्वाजी आदि पक्षियों अथवा अन्य रूपों को धारण करके स्वप्न में अपूर्व (पहले कभी न देखी हुई) आकृतियों को दिखाती है, गर्भिणी तथा सूतिका स्त्री को भय दिखाती है (डराती है), बालक को संत्रस्त करती है, तथा महावेग, महाप्राण, भयंकर रूप, भयावनी, अनायतपक्षा (जिसके पंख विस्तृत नहीं है), वज्र के सदृश सुदृढ नख, दांत तथा दंष्ट्रा वाली, वैदूर्य मणि की ज्वाला के समान नेत्रों वाली, अत्यन्त विचित्र तथा बड़े पत्र (पंखों) वाली, गले में सोने तथा मणि की विचित्र माला को धारण करने वाली, विविध प्रकार के पुष्प, गन्ध, वस्त्र, मुसल तथा उज्ज्वल पदार्थों को धारण करने वाली, श्रेष्ठ मुकुट वाली तथा नूपुरक, विकम्बूकत, अङ्गद, कुण्डल, वामघण्टा, पताका, आतपत्र, उल्का, विद्युत्, एवं मेघमाला आदि से अलंकृत भगवान् कार्तिकेय की ग्रानी (?) तथा बहन स्वप्न में डराकर बाद में रोगों को उत्पन्न कर देती है। उसके बाद उपर्युक्त जातहारिणियों में से कोई एक मध्याह्न, अर्धरात्रि, सन्ध्या समय अथवा सोने के बाद बालगृह में छिपकर स्थित हो जाती है। इससे बालक उच्चस्वर से चिल्लाता है, रोता है, डरता है, कांपता है तथा भयभीत होता है। उसे स्वर हो जाता है, वह विह्वल होता है, लम्बे २ सांस लेता है, मोहित हो जाता है, लड़खड़ाता है, दुःखी होता है, शून्य के समान हो जाता है, उसे मल आदि का स्राव होने लगता है तथा उसे उपद्रव स्वरूप अन्य रोग भी घेर लेते हैं। इस प्रकार जो स्त्री स्वप्न में निरन्तर शकुनी को देखती है, उस पर यह शकुनी नाम की जातहारिणी आक्रमण कर देती है। उसका यही प्रायश्चित है कि शकुनी नामक्क जातहारिणी से आक्रान्त स्त्री को कोई अन्य वृद्ध स्त्री उस शकुनी (पक्षी) के घोंसले में स्थित पुरीष (मल) तथा पक्षोदक (पंखों में लगे हुए पानी) के द्वारा सिंचन करे तथा वह अपने भागधेय (अंश) से उसे सन्तानयुक्त कर दे। जो इस प्रकार जानती है तथा शकुनी (पक्षी) की हिंसा नहीं करती उसे शकुनी नामक जातहारिणी आक्रान्त नहीं करती। हे वृद्धजीवक ! जो स्त्री गौ की स्वयं हत्या करती है अथवा दूसरों से हत्या करवाती है तथा गोमांस का प्रयोग करती है उन पर जातहारिणी का रूप धारण करके गोमाता आक्रमण कर देती है तथा यह जातहारिणी स्वप्न में गौओं अथवा बछड़ों की पालना करने वाले ग्वाले को दौड़ाती है। इस पर गोमाता रूप असाध्य जातहारिणी आक्रमण कर देती है। इसका यही प्रायश्चित्त है कि इस स्त्री को गौओं के बीच में बिठाकर गौओं के मूत्र तथा पुरीष (गोबर) के द्वारा स्नान कराये। उस स्त्री को गौ माता अपने भागधेय (अंश) से युक्त करती है। जो इस तथ्य को जानती है तथा गौ की हत्या नहीं करती उसे गोमाता रूप जातहारिणी आक्रान्त नहीं करती है। इसी प्रकार भैंस, बकरी, भेड़, गधी, खच्चरी, ऊंटनी, सूअरी, चुहिया, कुतिया, गलगोलिका (विषयुक्त कीट विशेष), गोप (ग्वाले), विश्वम्भर (सौम्य कीट विशेष) तथा मृग आदि पशुओं की भी यही उपर्युक्त ही विधि कही गई है। हे वृद्धजीवक ! जो स्त्री घर में अथवा घर से बाहर विचरण करने वाली सर्पिणी की स्वयं हत्या करती है अथवा दूसरों से हत्या करवाती है उस पर सर्पिणी रूप जातहारिणी आक्रमण कर देती है। इसकी सन्तान की विष से मृत्यु हो जाती है। इसका यही प्रायश्चित्त है कि सौ बांबियों के मध्य में वल्मीक (वांबी) अथवा नागकुल में इसका सिञ्चन करना चाहिये। वह सर्पिणी रूप जातहारिणी इस स्त्री को अपने अंश से सन्तान युक्त कर देती है। जो इस तथ्य को जानती है तथा सांपों की हिंसा नहीं करती, उसे सर्परूप जातहारिणी आक्रान्त नहीं करती तथा उसकी सन्तान की विष से मृत्यु नहीं होती। हे वृद्धजीवक ! जो स्त्री मत्स्य, मकर (मगरमच्छ), तिमिङ्गिल, नक्र (नाका), शङ्ख (घोंघा) शम्बूक्त तथा सुखनक आदि जलचर प्राणियों की हत्या करती है, उसके इस अधार्मिक कृत्य से क्रुद्ध हुई रेवती उसकी सन्तान का हनन करती है। स्वप्न में मछली, मगरमच्छी, शुक्ति अथवा शङ्खी का रूप धारण करके पहले हर्ष उत्पन्न करती है। तदनन्तर अत्यन्त हनन करती है (कष्ट पहुंचाती है) उसकी सन्तान का जलत्रास (Hydrophobia) अथवा अन्य रोगों से जल में नाश होता है (मृत्यु होती है)। इसका यही प्रायश्चित्त है कि रोहिणी स्नान के द्वारा इसका उपाय करे। जो इस तथ्य को जानती है तथा मछलियों की हिंसा नहीं करती उसे मत्सी जातहारिणी आक्रान्त नहीं करती। हे वृद्धजीवक ! जो स्त्री ग्रहण की हुई अथवा ग्रहण न की हुई वनस्पतियों