भारतकोश
काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

Kashyapa Samhita Hindi

महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा

स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished942 पृष्ठ

पृष्ठ 659, कुल 942 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 659

रेवतीकल्पः ? ] | कल्पस्थानम् | २९९


की हिंसा करती है उससे वनस्पति देवता क्रुद्ध हो जाते हैं। वैश्वानर नाम वाला अग्नि, पितृमातृ नाम वाला सोम, शिव नाम वाला स्वधा, वरुण नाम वाला अप् (जल), निर्ऋति नाम वाली भूमि, वियत् नाम वाली गौ, श्लोक नाम वाली गौ, पवित्र करने वाला वायु, पूषा नाम वाला आदित्य, काष्ठा नाम वाली दिशायें, वरुण नाम वाला इन्द्र तथा प्राण नाम वाला वायु इत्यादि ये १२ वनस्पतियों के देवता माने जाते हैं। ये देवता वनस्पतियों की हत्या करने वालों का हनन कर देते हैं। इनके उपचार के लिये वनस्पतियों अथवा वृक्षों के समूह के मध्य में इन्हीं देवताओं की स्थालीपाक के द्वारा पूजा करे। अग्नि देवता की घृत के द्वारा, सोम देवता की श्यामाक (धान्य विशेष) के द्वारा, शिव की दूधद अथवा खीर के द्वारा, जल देवता की दही के द्वारा, भूमि देवता की सप्तान्न के द्वारा, गौ अथवा अग्निदेवता की ग्रामधूपों के द्वारा, पवमान (वायु) की पिशित (मांस) के द्वारा, पूषा देवता की अन्न आदि के द्वारा, दिशाओं की मध्यों के द्वारा तथा इन्द्र देवता की हविष्य भोजन के द्वारा आराधन करना चाहिये। जो वनस्पतियों की हिंसा नहीं करती हैं उनको ये वनस्पति देवता सन्तान से युक्त करती हैं। जो इस तथ्य को जानती है उनके लिये ये वनस्पति देवता जातहारिणी (उत्पन्न हुए को मारने वाले) नहीं होते ॥६९॥

तत्र श्लोकाः—

अधर्मस्यातिसंवृद्ध्या रेवती लभतेऽन्तरम् ।
लब्ध्वाऽन्तरमतिक्रुद्धा नानारूपैर्यथोदितैः ॥ ७० ॥

अन्यैश्च दारुणतरैस्ततो हन्ति प्रजा इमाः ।
यौगपद्येन भार्या वा म्रियन्ते वा पृथक् पृथक् ॥ ७१ ॥

अधर्म की वृद्धि के कारण रेवती अन्तर (अवकाश छिद्र अथवा दोषों) को प्राप्त करती है तथा दोषों को प्राप्त करके क्रुद्ध होकर ऊपर वर्णित किये हुए अथवा वर्णित न किये हुए भी अनेक प्रकार के रूपों को धारण करके इनकी सन्तानों की हत्या करती है। उसी के साथ अथवा उससे पृथक् स्त्री की भी मृत्यु हो जाती है ॥७०-७१॥

ग्रस्तस्य जातहारिण्या शिशो रूपाणि मे शृणु ।
सद्यो रूपं तु तत्तै्रकं यदुच्चैस्त्रस्तवा¹शितम् ॥ ७२ ॥

स्तन्यदूषणमेवाग्रे ज्वरस्तन्द्री प्रमीलकः ।
शिरोभितापो वैवर्ण्यं भृशं वा पाण्डुपीतता ॥ ७३ ॥

तृष्णाऽतिसारो वैस्वर्यं तालुशोषः प्रहर्षणम् ।
मुखपाको मुखस्फोटौ वैसर्पः पाण्डुकामले ॥ ७४ ॥

जागर्ति रोदिति भृशं पीड्यते च मुहुर्मुहुः ।
श्वसते कासते क्षौति शीतीभवति च क्षणात् ॥ ७५ ॥

निश्चेष्टो मृतकल्पश्च मुहुः स्थित्वा प्रचेष्टते ।
न पुष्यति यथाकालं स्तनं न प्रतिनन्दति ॥ ७६ ॥

अपूर्वं च जनं दृष्ट्वा भृशमुद्विजते शिशुः ।
बिडालनकुलाखूनां शब्देनाशु प्ररोदिति ॥ ७७ ॥

मृदुनाऽपि च रोगेण पीडामाप्नोति दारुणाम् ।
अभीक्ष्णं त्रसते सुप्तो न शर्म लभते सुखात् ॥ ७८ ॥

जातहारिणी से आक्रान्त शिशु के लक्षणों को तू मेरे से सुन-उसका तात्कालिक रूप तो यही होता है कि शिशु भय सहित उच्चस्वर से रोता है। तथा उसके बाद स्तन्य (दूध) का दूषित होना, ज्वर, तन्द्रा, प्रमीलक (मूढता), शिरोभिताप, विवर्णता,,अत्यन्त पाण्डु एवं पीलापन, तृष्णा, अतिसार, विकृतस्वर, तालुशोष, प्रहर्ष, मुखपाक, मुखस्फोट, विसर्प, पाण्डु, कामला आदि हो जाते हैं तथा बालक बहुत अधिक जागता रहता है, रोता है, उसे बार २ अत्यन्त पीड़ा होती है। उसे श्वास तथा कास रोग हो जाते हैं। वह छींकता है तथा क्षणभर में ठण्डा पड़ जाता है। वह निश्चेष्ट एवं मृततुल्य हो जाता है तथा कुछ देर बाद उसे संज्ञा प्राप्त होती है। उसका ठीक समय पर पोषण नहीं होता तथा वह दूध से प्रसन्न नहीं होता। वह बालक जब किसी अपरिचित व्यक्ति को देखता है तो अत्यधिक डर जाता है।


१. सत्रासं रोदनमित्यर्थः।